संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1223, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें१९९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
प्रयोग किये बिना ही किया जाता है, वह नहीं किये हुएके समान है; पितरोंको उसकी प्राप्ति नहीं होती। अतः विज्ञ ब्राह्मणको प्रयत्नपूर्वक यथोक्त विभक्तियोंके प्रयोगके साथ श्राद्धविधिका अनुष्ठान करना चाहिये।
तदनन्तर वर्षके पश्चात् सपिण्डीकरण श्राद्धका अनुष्ठान होना चाहिये। यदि वर्षके भीतर कोई विवाह आदि आभ्युदयिक कार्य आनेवाला हो तो वर्ष पूर्ण होनेके पहले भी सपिण्डीकरण किया जा सकता है। सपिण्डीकरण श्राद्ध पार्वणोक्त विधिसे किया जाता है। किंतु इसमें विश्वेदेवोंका आवाहन आदि नहीं होता। प्रेतके पिता, पितामह और प्रपितामह—ये तीन उसके प्रधान देवता हैं। राजन्! उसमें प्रेतके उद्देश्यसे एकोद्दिष्ट करना चाहिये। प्रेतके लिये जो अर्घ्यपात्र निश्चित किया गया हो, उसे लेकर उसके पिता आदिके तीनों अर्घ्यपात्रोंमें विधिपूर्वक उसका जल आदि डाले। इसी प्रकार प्रेत-पिण्डके तीन भाग करके तीनों पितृ-पिण्डोंमें एक-एक भाग मिलावे। उस समय 'ये समानाः' इत्यादि दो मन्त्रोंका उच्चारण करता रहे। तत्पश्चात् पितासे लेकर प्रपितामहपर्यन्त सबके लिये क्रमशः अवनेजन देकर पुनः गन्ध, पुष्प आदि सब कुछ निवेदन करे। चौथा अवनेजन पात्र न दे। कोई-कोई प्रेतको लक्ष्यमें रखकर चौथा अवनेजन भी देते हैं; परंतु यह मेरा मत नहीं है। सपिण्डीकरणके बाद क्षयाह तिथि और शस्त्राहतके लिये चतुर्दशी तिथिको छोड़ और कभी एकोद्दिष्ट श्राद्ध नहीं करना चाहिये। जो सपिण्डीकृत प्रेतके लिये पृथक् पिण्डदान करता है, उसका वह श्राद्ध नहीं किये हुएके तुल्य है। यह वैसा करके पितृहत्याके पापका भागी होता है। जिसके पिता मर गये हों और पितामह जीवित हों, वह पहले पिताका नाम लेकर फिर पितामहका उच्चारण करे। उस समय पितामह प्रत्यक्ष भोजन करके पिण्डग्रहण करें। पितामहकी क्षयाह तिथिपर पार्वण श्राद्ध करना चाहिये (एकोद्दिष्ट नहीं), अपने पिताको छोड़कर किसी प्रकार पितामहको पिण्ड देना उचित नहीं है। उस दशामें पितामहका एकोद्दिष्ट श्राद्ध न करनेसे पितरोंकी ओरसे तनिक भी भय नहीं मानना चाहिये। पिताकी मृत्यु हो गयी हो तो प्रत्येक अमावास्याको पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। पिताकी मृत्यु हो जानेपर जबतक उसका सपिण्डन (वार्षिक श्राद्ध) न हो जाय, तबतक बीचमें पिता आदि पितरोंका पार्वण श्राद्ध नहीं करना चाहिये। इस बीचमें श्राद्धपक्ष (महालय) आवे तो उसमें पितामह आदिका ही श्राद्ध करना चाहिये (पिताको साथ रखकर नहीं)। क्योंकि पिताका सपिण्डीकरण न होनेसे पितरोंकी श्रेणीमें उनका प्रवेश नहीं हुआ है।
~~ ० ~~
सपिण्डनकी आवश्यकता, तीन गति, भीष्मद्वारा मृत्युके बादकी स्थितिका निरूपण
**भर्तृयज्ञ कहते हैं—**पितृपिण्डोंके साथ प्रेतके पिण्डका मेलन करनेसे प्रेतको सपिण्ड (पितरोंके साथ बैठकर पिण्डग्रहणका अधिकारी) बनाया जाता है; इस कारण जबतक सपिण्डता नहीं होती, तबतक उसके प्रेतभावकी निवृत्ति भी नहीं होती। इसीलिये मुनियोंने सपिण्डीकरण श्राद्धको आवश्यक बताया है। जीव अन्यत्र जाकर जिस-जिस योनिमें जन्म लेता है, वहीं रहकर अपने पूर्व वंशजोंद्वारा दी हुई प्रत्येक वस्तुको अपने वर्तमान शरीरके अनुकूल पदार्थके रूपमें प्राप्त करता है।
**आनर्तने पूछा—**जिस मनुष्यका यहाँ कोई पुत्र नहीं है, उसका सपिण्डीकरण कैसे करना चाहिये?
**भर्तृयज्ञने कहा—**जिसका यहाँ कोई औरस पुत्र नहीं है, वह चारों पितरोंमेंसे चौथा कैसे हो सकता है? वह दूसरोंद्वारा खींच-तानमें पड़कर इधर-उधर ले जाया जाता है, इसलिये प्रेत