संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११९५
कहलाता है। पुत्र, भाई अथवा उसकी पत्नीको ही उसका सपिण्डीकरण श्राद्ध करना चाहिये। अन्यथा वह किसी तरह पितरोंमें मिलकर चतुर्थ स्थान नहीं प्राप्त करता। मनीषी पुरुष कर्मलोपकी अपेक्षा क्षेत्रज आदि ग्यारह प्रकारके पुत्रोंको पुत्रका प्रतिनिधि बताते हैं। अतः उन्हींके द्वारा क्रिया करानी चाहिये। राजेन्द्र ! यदि समयपर प्रेतकी उत्तरक्रिया सविधि न हो सके तो प्रेतत्वविनाशक नारायणबलिका अनुष्ठान करना चाहिये। जैसे अपमृत्युको प्राप्त हुए अथवा आत्मघात करनेवाले मनुष्योंके लिये ब्राह्मणद्वारा नारायणबलिका अनुष्ठान कराना आवश्यक होता है, उसी प्रकार उसका भी करना चाहिये।
आनर्तने पूछा—महामते! मनुष्य यहाँ कैसे मृत्युको प्राप्त होता है? किस कर्मसे वह स्वर्ग या नरकमें जाता है? अथवा महाभाग! कैसे उसकी मुक्ति होती है? यह सब मुझे विस्तारपूर्वक बताइये।
भर्तृयज्ञने कहा—राजन्! इस जगत्में तीन प्रकारके मनुष्य होते हैं—धर्मी, पापी तथा ज्ञानी। इन तीनोंकी पृथक्-पृथक् तीन गतियाँ मानी गयी हैं। धर्मसे स्वर्ग, पापसे नरक और ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। श्रीकृष्णसहित धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिरने शान्तनुनन्दन पितामह भीष्मसे इसी विषयको इस प्रकार पूछा था।
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! यमलोकमें कितने नरक बताये गये हैं। उन सबमें जीव किस पापसे जाते हैं?
भीष्मजी बोले—वत्स! यमलोकमें प्रधानतः इक्कीस नरक बताये गये हैं, जिनमें जीव अपने-अपने कर्मके अनुसार जाते हैं। वहाँ चित्र और विचित्र नामक दो लेखक हैं। चित्र सब प्राणियोंका धर्म लिखते हैं और विचित्र यत्नपूर्वक सब पातकोंका उल्लेख करते हैं। धर्मराजके आठ दूत हैं, जो सदा अपने वशमें आये हुए मनुष्योंको मर्त्यलोकसे यमलोकमें ले जाते हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—कराल, विकराल, वक्रनास, महोदर, सौम्य, शान्त, नन्द और सुवाक्य। इनमें पहलेके चार दूत बड़े भयंकर बताये गये हैं। ये सब पापियोंको यमलोकमें ले जाते हैं। शेष चार सौम्य रूप और सौम्य शरीर धारण करनेवाले हैं। वे धर्मात्मा मनुष्यको विमानद्वारा धर्मराजके नगरमें ले जाते हैं। इन सबके असंख्य किंकर हैं। इनकी सहायताके लिये यमने ज्वरसे लेकर यक्ष्मातक एक सौ आठ रोग बनाये हैं। वे रोग ही पहले जाकर मनुष्यको अपने वशमें करते हैं। तत्पश्चात् यमदूत सब लोगोंसे अलक्षित रहकर वहाँ जाते हैं और नाभिके मूलभागमें स्थित हुए वायुरूपधारी सूक्ष्म शरीराभिमानी जीवको लेकर यमलोकके मार्गसे जाते हैं। वहाँ पापी जीवको वे भूमिपर खड़ा करके पैदल चलाते हैं। यमलोकमें जानेके छियासी हजार मार्ग हैं, उन सबमें पहले सब ओरसे बहती हुई वैतरणी नदी प्राप्त होती है। जिसके एक स्रोतमें रक्त और तीखे अस्त्र-शस्त्र बहते हैं। जो मनुष्य मृत्युकालमें ब्राह्मणको धेनु-दान करते हैं, वे उसीकी पूँछ पकड़कर उस नदीके पार हो जाते हैं। दूसरे लोगोंको वह सौ योजन विस्तृत नदी हाथोंसे ही तैरकर पार करनी पड़ती है। वैतरणीका दूसरा स्रोत जलमय है। उस मार्गसे धर्मात्मा पुरुष ही यात्रा करते हैं। जो लोग मृत्युकालमें गोदान करते हैं, वे उसकी पूँछ पकड़कर वैतरणीके पार होते हैं। दूसरे गोदानरहित पुरुष अपनी बाँहोंसे ही तैरकर उसके पार होते हैं।
वैतरणी पार होनेपर पापी और धर्मात्मा पुरुषोंके मार्ग अलग हो जाते हैं। पापी पाप-मार्गसे पैदल जाते हैं और धर्मात्मा धर्ममार्गसे श्रेष्ठ विमानपर बैठकर यात्रा करते हैं। वैतरणीके उस पार पाँच योजन विस्तृत असिपत्र नामक वन है, जो पापियोंको महान् दुःख देनेवाला है। वहाँ एक-एक वृक्षकी एक-एक टहनीमें लोहेके ही सौ-सौ पत्ते हैं, जो तलवारकी तरह सब ओरसे मनुष्योंके शरीरको छिन्न-भिन्न कर देते हैं। जिन