भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1225, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1225
११९६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

दुरात्माओंने दूसरोंका धन और परायी स्त्रियोंका अपहरण किया है, उनको असिपत्रवनकी यातना सहनी पड़ती है। नौ श्राद्धोंसे उससे छुटकारा मिलता है। उसके आगे बहुत ऊँचा सुविख्यात कूटशाल्मलि है, जो सब ओरसे काँटोंसे भरा हुआ है। सदा निर्दयतापूर्ण बर्ताव करनेवाले विश्वासघाती मनुष्य उस वृक्षकी डालमें नीचे मुँह करके लटका दिये जाते हैं और नीचे आग जलाकर उन्हें दिन-रात संताप दिया जाता है। एकादशाह श्राद्ध करनेपर उस कष्टसे छुटकारा मिलता है। वहाँसे आगे भयानक आकारवाला नरक है, जो तैलयन्त्रके समान है। उसमें ब्रह्महत्यारे तथा अन्यान्य पापकर्मी जीव पेरे जाते हैं। द्वादशाह श्राद्ध एवं दान करनेपर जीवको उस संकटसे छुटकारा मिलता है। उसके बाद बहुत-से लोहेके तपे-तपाये खम्भे खड़े किये गये हैं; परायी स्त्रियोंमें अनुरक्त होनेवाले मनुष्योंको उन खम्भोंका आलिंगन करना पड़ता है। मासिक श्राद्ध करनेसे जीव उस कष्टसे छुटकारा पाते हैं। उससे आगे लोहेके समान दाढ़ोंवाले भयंकर कुत्ते खड़े रहते हैं, जो मांसभक्षी मनुष्योंको खाते हैं। त्रैपाक्षिक श्राद्ध करनेपर उन्हें इस कष्टसे मुक्ति मिलती है। तदनन्तर लोहेकी-सी चोंचवाले कौवे उपस्थित रहते हैं, जो उन मनुष्योंकी आँखें नोंच लेते या फोड़ देते हैं, जिन्होंने आसक्तिपूर्वक परायी स्त्रियोंकी ओर दृष्टिपात किया है। द्वितीय मासिक श्राद्धके द्वारा उस कष्टसे रक्षा होती है। तदनन्तर शाल्मलिकूट और अन्य लोहकण्टक हैं; चुगली करनेवाले मनुष्य उनके बीचसे ले जाये जाते हैं। त्रैमासिक श्राद्धद्वारा उस यातनासे बचाव होता है। उसके बाद रौरव नामसे प्रसिद्ध महाभयंकर नरक है, उसमें बड़ी भारी पीड़ा होती है। ब्रह्महत्या करनेवाले पापियोंको उसी नरकमें डालनेका आदेश दिया जाता है। कृतघ्न पुरुष भी उसीमें ऊपर पैर और नीचे मुँह करके लटकाये जाते हैं। चातुर्मासिक श्राद्धके दानसे उस संकटसे छुटकारा मिलता है। तदनन्तर कुम्भीपाक नामक भयंकर आकारवाला नरक है; जो लोग यहाँ दम्भ और पाखण्डमें संलग्न एवं नरहत्या करते देखे जाते हैं, वे कुम्भीपाकके खौलते हुए तैलमें डाल दिये जाते हैं। ऊनषाण्मासिक श्राद्धके द्वारा उससे मुक्ति प्राप्त होती है। विश्वासघाती मानव रौद्र नरकमें गिरते हैं और षाण्मासिक श्राद्धके दानद्वारा उस संकटसे छुटकारा पाते हैं। दूसरा नरक साँपों और बिच्छुओंसे भरा हुआ है। जो इस संसारमें पाखण्ड फैलाते हैं, वे नीच मनुष्य उसीमें गिराये जाते हैं। सप्तम मासिक श्राद्धमें दिये हुए दानके द्वारा उस संकटसे मुक्ति मिलती है। उससे भिन्न संवर्तक नामक नरक बताया गया है। जो वेदोंको नष्ट करनेवाले, साधु पुरुषोंके निन्दक और दुरात्मा हैं, उनकी जीभको आगमें तपाये हुए सँड़सोंद्वारा उखाड़ लिया जाता है। जो लोग अपना काम बनानेके लिये और दूसरेके लिये भी झूठ बोलते हैं, उनके सब अंगोंको वहाँ कुत्ते नोंच-नोंचकर खाते हैं। अष्टम मासिक श्राद्धके दान द्वारा उनकी उस संकटसे मुक्ति होती है। इसके बाद महातप्त अग्निकूप नामक अत्यन्त भयंकर नरक है, जिसमें झूठी गवाही देनेवाले मूढ़ मानव गिराये जाते हैं। वे अत्यन्त दुःखी होकर वहाँकी भयंकर यातना सहन करते हैं। नवम मासिकश्राद्ध उनको परम आह्लाद प्रदान करनेवाला होता है। उस नरकके आगे दूसरा भयानक नरक है, जो सब ओर लोहेकी कीलोंसे भरा हुआ है। वहाँ आग लगाने और स्त्री-हत्या करनेवाले पापात्मा यमदूतोंकी मार खाते और दुःखसे आतुर होकर चारों ओर भागते हैं। दशम मासिक श्राद्धके द्वारा उन्हें उस संकटसे छुटकारा मिलता है। तत्पश्चात् अंगारराशिसे व्याप्त भयंकर नरक है; उसमें स्वामीसे द्रोह करनेवाले मनुष्य सब ओर घुमाये जाते हैं। एकादश मासिक श्राद्धका दान उन्हें उस संकटसे बचाता है। उसके बाद तपी हुई बालूसे भरा हुआ एक भयंकर नरक है। जो मनुष्य स्वामीको आया हुआ देख उनकी यथायोग्य सेवा न करके भाग