भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1226, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1226
  • नागरखण्ड-उत्तरार्ध * | ११९७ ---|---

खड़े होते हैं, वे वहाँ दुःखी होकर यातना भोगते हैं। उनके पास द्वादश मासिक श्राद्ध पहुँचता और उन्हें संकटसे बचाता है। मरे हुए पुरुषके लिये उसके भाई-बन्धुओंद्वारा वर्षके भीतर जो कुछ भी अन्न और जल दिया जाता है, उसे वे यमलोकके मार्गमें भोगते हैं।

तत्पश्चात् वर्ष पूरा होनेपर वे धर्मराजके समीप पहुँचकर अपने शुभाशुभ कर्मका फल पाते हैं। इस प्रकार पंद्रह नरकोंका सेवन करके मनुष्य पुनः मर्त्यलोकमें जन्म ग्रहण करते हैं। जो लोग हेतुवादी (कोरे तर्कका सहारा लेनेवाले) हैं, उनका जन्म विदेशमें (भारतवर्षसे भिन्न देशमें) होता है। नित्य तर्पण करनेसे उनकी तृप्ति होती है। जो स्वामीसे द्रोह रखनेवाले हैं, वे कुराज्यमें जन्म पाते हैं। एकोद्दिष्ट श्राद्धसे उनकी तृप्ति होती है। जो मनुष्य देवता, पितर और ब्राह्मणोंको दिये बिना ही भोजन करते हैं, उन्हें उस पापके कारण ऐसे देशमें जन्म लेना पड़ता है जो दुर्भिक्षसे पीड़ित रहता हो। ऐसे लोगोंको उनकी क्षयाह तिथिमें श्राद्ध होनेपर तृप्ति प्राप्त होती है। जो लोग परस्पर अनुरागपूर्वक रहनेवाले पति-पत्नीमें एक-दूसरेसे झूठी बातें कहकर भेद (कलह एवं फूट) पैदा करते हैं, उनको दुष्टा स्त्री प्राप्त होती है, जो कि एक बात कहनेपर क्रोधपूर्वक दस बात सुनाती है। ऐसे लोगोंको कन्यादानके फलसे सुख प्राप्त होता है। जो मनुष्य कन्यादानमें विघ्न डालते हैं, अथवा कन्याका विक्रय करते हैं, वे केवल कन्याओंको जन्म देते हैं, पुत्रको नहीं। उनकी वे कन्याएँ पुंश्चली, विधवा और दुर्भाग्यवती होती हैं। उन्हें भी कन्यादानका फल प्राप्त होनेसे ही सुख मिलता है। जिन्होंने रत्नों और शास्त्रोंकी चोरी की है, वे निर्धन, गूँगे, लँगड़े और अन्धे होते हैं। शास्त्रदानके पुण्यसे उन्हें सुख प्राप्त होता है। इस प्रकार ये मर्त्यलोकमें स्पष्ट दिखायी देनेवाले नरक बताये गये हैं।

नरकों और पापोंसे मुक्त होनेका उपाय तथा भगवान् जलशायीकी महिमा

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह ! नरकोंके स्वरूपका वर्णन तो मुझे बड़ा भयानक प्रतीत हुआ है। उन पापी जीवोंको भी कैसे नरक-यातनासे छुटकारा मिल सकता है? किन व्रतों, नियमों, हवनादि कर्मों तथा तीर्थोंके सेवनसे उनकी सद्गति हो सकती है?

भीष्मजीने कहा— वत्स! इस लोकमें जिनकी हड्डियाँ गंगाजीमें डाली जाती हैं, वे नरकमें हों तो भी वहाँकी आग उनपर कोई प्रभाव नहीं डालती। जिनके नामसे उनके पुत्र गंगातटपर श्राद्ध करते हैं, वे विमानपर चढ़कर नरकसे ऊपर चले जाते हैं। जो पापोंका शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त करते हैं तथा जो स्वर्ण आदि दान देते हैं, उनको भी नरककी प्राप्ति नहीं होती। शेष मनुष्य अपने कर्मका यथोचित फल भोगते हैं। जो अपने स्वामीके आगे खड़े हो धारातीर्थ (रणभूमि)-में प्राणत्याग करते हैं, वे नरकोंसे बहुत दूर उत्तम स्थानको प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य काशी, कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य, नागरपुर (हाटकेश्वरक्षेत्र या चमत्कारपुर), प्रयाग अथवा प्रभासक्षेत्रमें शरीर छोड़ते हैं, वे नरकको नहीं देखते। जिसके वंशज उसकी मृत्युतिथिको नील वृषका उत्सर्ग करते (साँड़ छोड़ते) हैं, वह नरकको नहीं देखता। जो मनुष्य भगवान् विष्णुका हृदयमें ध्यान करते हुए मनुष्योंको यथायोग्य भोजन देता है, वह भी नरकको नहीं देखता। जो सूर्यके वृषराशिपर रहते समय ज्येष्ठमासमें जलका और मकरसंक्रान्ति होनेपर माघमें तिलकी गायका दान करता है, उसे नरकका दर्शन नहीं होता। सोमवारके दिन या चन्द्रग्रहणके समय समुद्र और सरस्वती नदीके संगममें स्नान करके जो सोमनाथका दर्शन करता है, वह नरकमें नहीं जाता। रविवारको एवं सूर्यग्रहणके समय जो कुरुक्षेत्रमें स्नान करता

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