संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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है वह नरकको नहीं देखता। जो कार्तिककी पूर्णिमाको कृत्तिका नक्षत्रके योगमें मौन भावसे तीनों पुष्कर तीर्थोंकी परिक्रमा करता है, वह नरक नहीं देखता। मकरसंक्रान्ति होनेपर रविवारको जो चण्डीश्वरका दर्शन करते हैं, वे मनुष्य नरकमें नहीं जाते हैं। जो गायको कीचड़से, ब्राह्मणको जीविका न होनेके कारण दासता करनेसे और द्विजको वध-स्थानसे छुड़ा देता है, वह जन्मसे लेकर मृत्युकतके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। गौ तथा ब्राह्मणको वधसे और साधु ब्राह्मणको चोरोंके भयसे जो मुक्त करता है, वह जन्मसे लेकर मृत्युकतके सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है।
जो विलद्वारपर शयनके लिये स्थित हुए जलशायी भगवान् विष्णुका दर्शन करता है, वह पापी हो तो भी पापसे मुक्त हो जाता है। सम्पूर्ण लोकोंके आश्रयभूत परम पवित्र विलद्वारमें स्नान करके जो शेषशय्यापर शयन करनेवाले श्रीहरिका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह जीवनभरके पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मानव वर्षके चार महीनेतक जलमें शयन करनेवाले देवेश्वर विष्णुका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह इस लोकमें फिर जन्म नहीं लेता। वहाँ विलद्वारमें या जलमात्रमें पहलेके महाभाग मुनिने भगवान् शेषशायीकी आराधना की और उनके शुभ निवासस्थानसे मृत्तिका ग्रहण की। इससे वे भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त हुए। सब तीर्थों और सम्पूर्ण यज्ञोंमें जो फल प्राप्त होता है, वही फल चौमासेमें भगवान् शेषशायीकी पूजासे भी प्राप्त होता है। गोशालामें मृत्युको प्राप्त हुए मनुष्य जिस फलको पाते हैं, वही चौमासेमें जलशायीकी पूजासे भी पा लेते हैं। उन देवाधिदेव, निर्गुण, गुणस्वरूप, अव्यक्त, अप्रमेय, सर्वदेवमय, सर्वेश्वर, सबके एकमात्र आवासस्थान तथा सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा श्रीहरिको नमस्कार है। उन भगवान् विष्णुके शयन और बोधनके दिन एकादशी तिथिमें जो कुछ भी उत्तम कर्म किया जाता है, वह अविनाशी होता है। उस दिन जो अन्न खाता है, वह मनुष्य पापात्मा है। अतः विज्ञ पुरुषको अन्य एकादशी तिथियोंके आनेपर भी प्रयत्नपूर्वक अन्नसे बचना चाहिये।
## चातुर्मास्य व्रतके पालनीय नियम और उनकी महिमा
**ऋषि बोले—** सूतजी ! शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुके शयन करनेपर जो कोई भी पालन करने योग्य नियम, व्रत आदि हो, वह हमें बताइये।
**सूतजीने कहा—** ब्राह्मणो ! भगवान् विष्णुके शयन करनेपर चातुर्मास्यमें जो कोई नियम पालित होता है, वह अनन्त फल देनेवाला होता है—ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। अतः विज्ञ पुरुषको सर्वथा प्रयत्न करके कोई नियम ग्रहण करना चाहिये। विप्रवरो ! भगवान् विष्णुके संतोषके लिये नियम, जप, होम, स्वाध्याय अथवा व्रतका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये। जो मानव भगवान् वासुदेवके उद्देश्यसे केवल शाकाहार करके वर्षके चार महीने व्यतीत करता है, वह धनी होता है। जो भगवान् विष्णुके शयनकालमें प्रतिदिन नक्षत्रोंका दर्शन करके ही एक बार भोजन करता है, वह धनवान्, रूपवान् और माननीय होता है। द्विजवरो! जो एक दिनका अन्तर देकर भोजन करते हुए चौमासा व्यतीत करता है, वह सदा वैकुण्ठधाममें निवास करता है। जो जनार्दनके शयन करनेपर छठे दिन भोजन करता है, वह राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञोंका सम्पूर्ण फल पाता है। जो सदा तीन रात उपवास करके चौथे दिन भोजन करते हुए चौमासा बिताता है, वह इस संसारमें फिर किसी प्रकार जन्म नहीं लेता। जो श्रीहरिके शयनकालमें