भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1228

* नागरखण्ड-उत्तरार्ध *

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व्रतपरायण होकर चौमासा व्यतीत करता है, वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है। जो भगवान् मधुसूदनके शयन करनेपर अयाचित अन्नका भोजन करता है, उसको अपने भाई-बन्धुओंसे कभी वियोग नहीं होता। जो वर्षाके चार महीनेतक तैल और घी लगाना छोड़ देता है, वह स्वर्गीय भोगका भागी होता है। जो मानव ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक चौमासा व्यतीत करता है, वह श्रेष्ठ विमानपर बैठकर स्वेच्छासे स्वर्गलोकमें जाता है। द्विजवरो! जो चौमासेभर नमकीन वस्तुओं एवं नमकको छोड़ देता है, उसके सभी पूर्तकर्म सफल होते हैं। जो चौमासेमें प्रतिदिन स्वाहान्त विष्णुसूक्तके मन्त्रोंद्वारा तिल और चावलकी आहुति देता है, वह कभी रोगी नहीं होता। जो चातुर्मास्यमें प्रतिदिन स्नान करके भगवान् विष्णुके आगे खड़ा हो पुरुषसूक्तका जप करता है, उसकी बुद्धि बढ़ती है। जो अपने हाथमें फल लेकर मौनभावसे भगवान् विष्णुकी एक सौ आठ परिक्रमा करता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता। जो अपनी शक्तिके अनुसार चौमासेमें—विशेषतः कार्तिकमासमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको मिष्ठान्न भोजन कराता है, वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है। जो वर्षाके चार महीनोंतक नित्यप्रति वेदोंके स्वाध्यायसे भगवान् विष्णुकी आराधना करता है, वह सर्वदा विद्वान् होता है। जो चौमासेभर भगवान्‌के मन्दिरमें रात-दिन नृत्य-गीत आदिका आयोजन करता है, वह गन्धर्व भावको प्राप्त होता है। यदि चार महीनोंतक नियम पालन करना सम्भव न हो तो, एक कार्तिकमासमें ही सब नियमोंका पालन करना चाहिये। जो ब्राह्मण सम्पूर्ण कार्तिकमासमें कांस, मांस, क्षौरकर्म, मधु, दुबारा भोजन और मैथुन छोड़ देता है, वह पूर्वोक्त सभी नियमोंका फल पाता है*। जिसने कुछ उपयोगी वस्तुओंको चौमासेभर त्याग देनेका नियम लिया हो, उसे वे वस्तुएँ ब्राह्मणको दान करनी चाहिये। ऐसा करनेसे ही वह त्याग सफल होता है। जो मनुष्य नियम, व्रत अथवा जपके बिना ही चौमासा बिताता है, वह मूर्ख है।

श्रावणमें कृष्ण पक्षकी द्वितीयाको श्रवण नक्षत्रमें प्रातःकाल उठे। पापी, पतित और म्लेच्छ आदिसे वार्तालाप न करे। फिर दोपहरमें स्नान करके धुले वस्त्र पहनकर पवित्र हो जलशायी श्रीहरिके समीप जा इस मन्त्रसे पूजन करे—

श्रीवत्सधारिञ्छ्रीकान्त श्रीधाम श्रीपतेऽव्यय।
गार्हस्थ्यं मा प्रणाशं मे यातु धर्मार्थकामदम्॥
पितरौ मा प्रणश्येतां मा प्रणश्यन्तु चाग्नयः।
तथा कलत्रसम्बन्धो देव मा मे प्रणश्यतु॥
लक्ष्म्या त्वशून्यशयनं यथा ते देव सर्वदा।
शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथा जन्मनि जन्मनि॥

‘श्रीवत्सचिह्न धारण करनेवाले लक्ष्मीकान्त! श्रीधाम! श्रीपते! अविनाशी परमेश्वर! धर्म, अर्थ एवं काम देनेवाला मेरा गार्हस्थ्य आश्रम नष्ट न हो। मेरे माता-पिता नष्ट न हों, मेरे अग्निहोत्र गृहकी अग्नि कभी न बुझे। मेरी स्त्रीसे सम्बन्धविच्छेद न हो। देव! जैसे आपका शयनगृह लक्ष्मीजीसे कभी शून्य नहीं होता, उसी प्रकार प्रत्येक जन्ममें मेरी भी शय्या धर्मपत्नीसे शून्य न रहे।’

द्विजवरो! ऐसा कहकर अर्घ्य दे अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणकी पूजा करे। इसी प्रकार भाद्रपद, आश्विन और कार्तिकमासमें भी जलशायी जगदीश्वरका पूजन करे। खारी वस्तु और नमकसे रहित अन्न भोजन करे। व्रत समाप्त होनेपर श्रेष्ठ ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक दान दे। जौ, धान्य, शय्या, वस्त्र तथा सुवर्ण दक्षिणामें दे। जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो इस प्रकार भलीभाँति व्रतका पालन करता है, उसके ऊपर जलशायी जगद्गुरु भगवान् विष्णु बहुत सन्तुष्ट होते हैं। किसी भी जन्ममें उसकी शय्या धर्मपत्नीसे शून्य नहीं होती। जानकर या अनजानमें आठ मासतक किये हुए सब पापको वह व्रत तत्काल नष्ट


* कांसं मांसं क्षुरं क्षौद्रं पुनर्भोजनमैथुने। कार्तिके वर्जयेद् यस्तु सम्पूर्णे ब्राह्मणः सदा॥
पूर्वोक्तानां च सर्वेषां नियमानां फलं लभेत्॥ (स्क० पु०, ना० ख० २१९। ३०, ३१)