संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कर देता है। जो पुत्रहीना, काकवन्ध्या अथवा विधवा स्त्री भी एकाग्रचित्त हो इस व्रतका पालन करती है, उसके ऊपर प्रसन्न हो जगन्नाथ सदा शुद्धि प्रदान करते हैं। उसकी बुद्धि कभी पापमें नहीं लगती, कभी कामभावनासे कलंकित नहीं होती। कुमारी कन्या भी यदि इस व्रतका पालन करे तो उसे कुलीन एवं रूपवान् पतिकी प्राप्ति होती है। जो मनुष्य इस व्रतका निष्क्रय देता (मूल्य चुकाता) है, वह भी चातुर्मास्यके नियमोंका फल पाता है।
शिवरात्रिकी महिमा
**ऋषि बोले—**महाभाग! हाटकेश्वरक्षेत्रमें जो पुण्यमय लिंग हैं, जिनके दर्शनसे सब लिंगोंके दर्शनका कल्याणमय फल प्राप्त होता है, उनका विस्तारपूर्वक वर्णन करें।
**सूतजीने कहा—**वहाँ मंकणकेश्वर नामक शोभायमान शिवलिंग है। वहीं शुद्धेश्वर, गौतमेश्वर और चौथे कपालेश्वर भी हैं। इनमेंसे एक-एक शिवलिंग वहाँके सब शिवविग्रहोंके दर्शनका फल प्रदान करता है, इसमें सन्देह नहीं है। शिवरात्रि आनेपर जो मनुष्य मंकणकेश्वरके सामने उपवास एवं पवित्रतापूर्वक रातभर जागरण करता है, उसे सम्पूर्ण शिवलिंगोंके दर्शनका शुभ फल प्राप्त होता है।
**ऋषियोंने पूछा—**महाभाग! शिवरात्रि किस समय होती है, उसका विधान और माहात्म्य क्या है? यह हमें विस्तारपूर्वक बताइये।
**सूतजीने कहा—**माघमासके कृष्णपक्षमें जो चतुर्दशी तिथि आती है, उसकी रात्रि ही शिवरात्रि है।^१ उस समय सर्वव्यापी भगवान् शिव सम्पूर्ण शिवलिंगोंमें विशेषरूपसे संक्रमण करते हैं। पूर्वकालमें अश्वसेन नामसे विख्यात एक आनर्तदेशके राजा हो गये हैं जो सदा धर्ममें तत्पर रहते थे। उन्होंने वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् भर्तृयज्ञ मुनिसे इस प्रकार पूछा—'मुने! कलिकालमें पालन करने योग्य कोई ऐसा व्रत है, जो थोड़े ही परिश्रमसे साध्य होनेपर भी महान् पुण्यप्रद तथा सब पापोंका नाश करनेवाला हो? यदि हो तो उसे बताइये। मनुष्यको चाहिये कि वह कलका काम आज ही कर ले; जो कार्य अपराह्नमें किया जानेवाला हो, उसे पूर्वाह्नमें ही कर ले। क्योंकि मृत्यु इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती है कि इस मनुष्यका कार्य पूरा हो गया है या नहीं?'^२
राजाका यह वचन सुनकर उदार बुद्धिवाले भर्तृयज्ञने चिरकालतक ध्यान करके दिव्य दृष्टिसे सब बात जानकर कहा—राजन्! शिवरात्रि नामसे विख्यात एक पुण्यदायक व्रत है। जो-जो कामना मनमें लेकर मनुष्य इस व्रतका अनुष्ठान करता है, उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है और जो निष्कामभावसे इसका पालन करता है, वह मोक्षको प्राप्त होता है तथा वर्षभरके किये हुए पापोंसे छुटकारा पा जाता है। इस लोकमें जो-जो चल अथवा अचल शिवलिंग हैं, उन सबमें उस रात्रिको भगवान् शिवका संक्रमण होता है। इसीलिये उसे शिवरात्रि कहा गया है। वह भगवान् शंकरको बहुत प्रिय है। सम्पूर्ण देवताओंने एक समय सब लोकोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे भगवान् शंकरसे प्रार्थना की—'भगवन्! समस्त
१- यहाँ अमावास्यान्त मासकी दृष्टिसे माघ कहा गया है। जहाँ कृष्ण पक्षमें मासका आरम्भ और पूर्णिमापर उसकी समाप्ति होती है, उसके अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशीमें यह शिवरात्रिका व्रत होता है।
२- श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्निकम्। न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वास्य न वा कृतम्॥ (स्क० पु०, ना० उ० २२१। १८)