भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1230

* नागरखण्ड-उत्तरार्ध * १२०१

पापोंसे भरे हुए इस कलिकालमें कोई एक दिन ऐसा बताइये, जो वर्षभरके पापोंकी शुद्धि कर सके। जिस दिन आपकी पूजा करके मनुष्य सब पापोंसे शुद्ध हो सकें। जिससे उनका किया हुआ होम, दान आदि हमलोगोंको प्राप्त हो सके; क्योंकि कलिकालमें अशुद्ध मनुष्योंके द्वारा दी हुई कोई भी वस्तु हमें नहीं मिल पाती है।'

भगवान् शिवने कहा—देवेश्वरो! माघमासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशीको रातके समय मनुष्योंके वर्षभरके पापको शुद्ध करनेके लिये भूतलके समस्त चल-अचल शिवलिंगोंमें संक्रमण करूँगा। जो मनुष्य उस रातमें निम्नांकित मन्त्रोंद्वारा मेरी पूजा करेगा, वह पापरहित हो जायगा। ॐ सद्योजाताय नमः। ॐ वामदेवाय नमः। ॐ अघोराय नमः। ॐ ईशानाय नमः। ॐ तत्पुरुषाय नमः। इस प्रकार गन्ध, पुष्प, चन्दन, धूप, दीप और नैवेद्यद्वारा इन पाँच मन्त्रोंसे मेरे पाँच मुखोंका पूजन करके निम्नलिखित मन्त्रको पढ़ते हुए मन-ही-मन मेरा ध्यान करे और अर्घ्य प्रदान करे—

अर्घ्य-मन्त्र

गौरीवल्लभ देवेश सर्पाढ्य शशिशेखर।
वर्षपापविशुद्ध्यर्थमर्घ्यो मे गृह्यतां ततः॥

'पार्वती देवीके प्रियतम, सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी तथा सर्पोंकी मालासे विभूषित भगवान् चन्द्रशेखर! आप वर्षभरके पापोंकी शुद्धिके लिये मेरा अर्घ्य ग्रहण कीजिये।'

अर्घ्यदानके पश्चात् भोजन-वस्त्र आदिके द्वारा ब्राह्मणका पूजन करे। उसे दक्षिणा दे। मन्दिरमें बैठकर धार्मिक उपाख्यान, कथा और शिवमहिमा सुने। देवेश्वरो! जो इस प्रकार शिवरात्रिव्रत करेगा, उसके सब पापोंकी शुद्धिके लिये यह सर्वोत्तम प्रायश्चित्तका कार्य करेगा।

भर्तृयज्ञ कहते हैं—नरश्रेष्ठ! यह सुनकर सब देवता भगवान् चन्द्रशेखरको प्रणाम करके अपने-अपने उत्तम स्थानोंको चले गये। वहाँसे उन्होंने शिवरात्रिव्रतका पालन करनेके लिये लोगोंको समझाने और उपदेश देनेके निमित्त मुनिश्रेष्ठ देवर्षि नारदजीको भेजा। नारदजीने भूतलपर पधारकर सब ओर सब लोगोंको शिवरात्रिकी महिमा सुनायी। जो अपने लिये ऐश्वर्य एवं कल्याणकी इच्छा करे, उसे प्रयत्नपूर्वक शिवरात्रिव्रत करना चाहिये। शिवि, नल, नहुष, मान्धाता, धुन्धुमार, सगर, युयुत्सु तथा अन्य महापुरुषोंने भी श्रद्धापूर्वक शिवरात्रिव्रतका पालन किया है और अपने मनोवांछित पदार्थोंको पाया है। स्त्रियोंमें सावित्री, लक्ष्मीदेवी, सीता, अरुन्धती, सरस्वती, पार्वती, मेना, इन्द्राणी, दृषद्वती, स्वधा, स्वाहा, रति, प्रीति, गायत्री तथा अन्य देवियोंने भी शिवरात्रि-व्रत किया है और अत्यन्त सौभाग्यके साथ सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथोंको पाया है। जो भक्तिपूर्वक भगवान् शिवके समीप इस शिवरात्रिव्रतकी महिमाको सुनता है, वह दिनभरके समस्त पापसे मुक्त हो जाता है। गंगाजीके समान कोई तीर्थ नहीं है। महादेवजीके समान दूसरा देवता नहीं है तथा शिवरात्रिसे बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है। यह मैंने सत्य कहा है*। मेरु सब रत्नोंसे भरा है। आकाश सब आश्चर्योंसे परिपूर्ण है। इसी प्रकार शिवरात्रि सर्वधर्ममयी बतायी गयी है। जैसे पक्षियोंमें गरुड़ और जलाशयोंमें समुद्र श्रेष्ठ है, वैसे ही सब धर्मोंमें शिवरात्रि उत्तम है।


* नास्ति गंगासमं तीर्थं नास्ति देवो हरोपमः। शिवरात्रेः परं नास्ति तपः सत्यं मयोदितम्॥
(स्क० पु०, ना० उ० २२१। ८४, ८५)