संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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सिद्धेश्वरकी महिमा और तुलादानका महत्त्व
भर्तृयज्ञ कहते हैं—राजन्! सिद्धेश्वर नामसे विख्यात जो महादेवजी हैं, उनके प्रादुर्भावकी कथा तो तुम मुझसे पहले ही सुन चुके हो। राजन्! जो सम्पूर्ण भूतलका चक्रवर्ती राजा होना चाहे, उसके लिये तुलापुरुषका दान उत्तम बताया गया है। सिद्धेश्वरके दर्शनसे तुलापुरुषदानका फल चक्रवर्ती राज्य प्राप्त होता है।
आनर्तनरेशने पूछा—महामुने! तुलापुरुषदानकी विधि क्या है? यह बताइये।
भर्तृयज्ञने कहा—चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, अयन, विषुवयोग अथवा किसी तीर्थमें तुलापुरुषका दान उत्तम बताया गया है। सदा अनुष्ठानमें लगे हुए जितेन्द्रिय, सदाचारी, वेदाध्ययनशील तथा निर्दोष ब्राह्मणोंको बाँटकर ही वह दान देना चाहिये। किसी एक ब्राह्मणको ही किसी प्रकार भी नहीं देना चाहिये।
किसी पवित्र समतल स्थानमें, जो पूर्व-उत्तरकी ओर कुछ नीचा हो, एक सोलह हाथका मण्डप बनावे। उसके बीचमें यजमानके हाथसे चार हाथकी वेदीका निर्माण करे। उसकी ऊँचाई एक हाथकी हो। चारों दिशाओंमें भी चार-चार हाथके चार कुण्ड बनावे। इसके सिवा एक हाथ लंबी और एक ही हाथ ऊँची सुन्दर वेदी बनाकर उसीके ऊपर नवग्रहोंकी स्थापना करे। प्रत्येक दिशामें दो-दो ऋत्विजोंको वरण करके होमकार्यमें नियुक्त करे। वे ऋत्विज् क्रमशः बह्वृच (ऋग्वेदी), अध्वर्यु (यजुर्वेदी), छन्दोग (सामवेदी) और आथर्वण होने चाहिये। उन सबको चाहिये कि एकाग्रचित्त होकर देवताओंके लिये अग्निमें आहुति दें। साथ ही उन-उन देवताओंके नामोंसे अंकित मन्त्रोंका जप भी करें। एक हाथ मोटे, चार हाथ ऊँचे दो खंभे वेदीके उत्तर और दक्षिण भागमें खड़ा करे। उन खंभोंके ऊपर एक शुभ एवं सुदृढ़ काष्ठ स्थापित करे। खंभा बनानेके लिये चन्दन, खैर, बेल, पीपल, निम्ब, देवदारु, श्रीपर्णी अथवा वट—ये आठ प्रकारके वृक्ष शुभ बताये गये हैं। उन दोनों खंभोंके बीचमें दो छींकोंसे युक्त तराजू रखे। इसके बाद स्नान करके श्वेत वस्त्र, श्वेत माला और श्वेत चन्दन धारण करके सब ओर लोकपालोंकी क्रमशः पूजा करे। तत्पश्चात् गन्ध, माला और चन्दनके द्वारा खंभों तथा तराजूका पूजन करे। पुण्याहवाचन करे। तदनन्तर यजमान तुलाके पश्चिम जाकर पूर्वाभिमुख खड़ा हो और दोनों हाथ जोड़ श्रद्धापूर्वक इस मन्त्रका उच्चारण करे—
ब्रह्मणो दुहिता नित्यं सत्यं परममाश्रिता।
काश्यपी गोत्रतश्चैव नामतो विश्रुता तुला॥
त्वं तुले सत्यनामासि स्वभीष्टं चात्मनः शुभम्।
करिष्यामि प्रसादं मे सान्निध्यं कुरु साम्प्रतम्॥
‘हे तुले! तू ब्रह्माजीकी पुत्री है, सदा उत्तम सत्यका आश्रय लेकर रहती है। तेरा गोत्र काश्यप है और नाम सर्वत्र विख्यात तुला है। तुले! तेरा एक नाम सत्य भी है; मैं अपने शुभ अभीष्टकी सिद्धि करूँगा। तू इस समय मेरे समीप आ और अपना कृपाप्रसाद मेरे ऊपर कर।'
इसके बाद उस तुलाके एक छींके (पलड़े)-पर आरूढ़ होकर अपनी शक्तिके अनुसार दानमें देनेके लिये जो वस्तु पहलेसे एकत्र करके रखी गयी हो, उसे दूसरे छींकेपर स्थापित करे। सोना, चाँदी, रत्न, वस्त्र आदि जो-जो अभीष्ट वस्तु हो, वह सब चढ़ावे। जबतक दोनों ओरका पलड़ा बराबर न हो जाय, तबतक चढ़ावे। अधिक या कम नहीं। तत्पश्चात् इष्टदेवकी शरण लेकर छींकेपरसे ही उस देवताके लिये जलमें जल, तिल, सुवर्ण और अक्षत छोड़े। इसके बाद उसपरसे उतरकर वह सब सामग्री ब्राह्मणोंको बाँट दे। इस दानके प्रभावसे मनुष्य जानकर या अनजानमें किये हुए समस्त पापोंका नाश कर