संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१२०२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सिद्धेश्वरकी महिमा और तुलादानका महत्त्व
भर्तृयज्ञ कहते हैं—राजन्! सिद्धेश्वर नामसे विख्यात जो महादेवजी हैं, उनके प्रादुर्भावकी कथा तो तुम मुझसे पहले ही सुन चुके हो। राजन्! जो सम्पूर्ण भूतलका चक्रवर्ती राजा होना चाहे, उसके लिये तुलापुरुषका दान उत्तम बताया गया है। सिद्धेश्वरके दर्शनसे तुलापुरुषदानका फल चक्रवर्ती राज्य प्राप्त होता है।
आनर्तनरेशने पूछा—महामुने! तुलापुरुषदानकी विधि क्या है? यह बताइये।
भर्तृयज्ञने कहा—चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, अयन, विषुवयोग अथवा किसी तीर्थमें तुलापुरुषका दान उत्तम बताया गया है। सदा अनुष्ठानमें लगे हुए जितेन्द्रिय, सदाचारी, वेदाध्ययनशील तथा निर्दोष ब्राह्मणोंको बाँटकर ही वह दान देना चाहिये। किसी एक ब्राह्मणको ही किसी प्रकार भी नहीं देना चाहिये।
किसी पवित्र समतल स्थानमें, जो पूर्व-उत्तरकी ओर कुछ नीचा हो, एक सोलह हाथका मण्डप बनावे। उसके बीचमें यजमानके हाथसे चार हाथकी वेदीका निर्माण करे। उसकी ऊँचाई एक हाथकी हो। चारों दिशाओंमें भी चार-चार हाथके चार कुण्ड बनावे। इसके सिवा एक हाथ लंबी और एक ही हाथ ऊँची सुन्दर वेदी बनाकर उसीके ऊपर नवग्रहोंकी स्थापना करे। प्रत्येक दिशामें दो-दो ऋत्विजोंको वरण करके होमकार्यमें नियुक्त करे। वे ऋत्विज् क्रमशः बह्वृच (ऋग्वेदी), अध्वर्यु (यजुर्वेदी), छन्दोग (सामवेदी) और आथर्वण होने चाहिये। उन सबको चाहिये कि एकाग्रचित्त होकर देवताओंके लिये अग्निमें आहुति दें। साथ ही उन-उन देवताओंके नामोंसे अंकित मन्त्रोंका जप भी करें। एक हाथ मोटे, चार हाथ ऊँचे दो खंभे वेदीके उत्तर और दक्षिण भागमें खड़ा करे। उन खंभोंके ऊपर एक शुभ एवं सुदृढ़ काष्ठ स्थापित करे। खंभा बनानेके लिये चन्दन, खैर, बेल, पीपल, निम्ब, देवदारु, श्रीपर्णी अथवा वट—ये आठ प्रकारके वृक्ष शुभ बताये गये हैं। उन दोनों खंभोंके बीचमें दो छींकोंसे युक्त तराजू रखे। इसके बाद स्नान करके श्वेत वस्त्र, श्वेत माला और श्वेत चन्दन धारण करके सब ओर लोकपालोंकी क्रमशः पूजा करे। तत्पश्चात् गन्ध, माला और चन्दनके द्वारा खंभों तथा तराजूका पूजन करे। पुण्याहवाचन करे। तदनन्तर यजमान तुलाके पश्चिम जाकर पूर्वाभिमुख खड़ा हो और दोनों हाथ जोड़ श्रद्धापूर्वक इस मन्त्रका उच्चारण करे—
ब्रह्मणो दुहिता नित्यं सत्यं परममाश्रिता।
काश्यपी गोत्रतश्चैव नामतो विश्रुता तुला॥
त्वं तुले सत्यनामासि स्वभीष्टं चात्मनः शुभम्।
करिष्यामि प्रसादं मे सान्निध्यं कुरु साम्प्रतम्॥
‘हे तुले! तू ब्रह्माजीकी पुत्री है, सदा उत्तम सत्यका आश्रय लेकर रहती है। तेरा गोत्र काश्यप है और नाम सर्वत्र विख्यात तुला है। तुले! तेरा एक नाम सत्य भी है; मैं अपने शुभ अभीष्टकी सिद्धि करूँगा। तू इस समय मेरे समीप आ और अपना कृपाप्रसाद मेरे ऊपर कर।'
इसके बाद उस तुलाके एक छींके (पलड़े)-पर आरूढ़ होकर अपनी शक्तिके अनुसार दानमें देनेके लिये जो वस्तु पहलेसे एकत्र करके रखी गयी हो, उसे दूसरे छींकेपर स्थापित करे। सोना, चाँदी, रत्न, वस्त्र आदि जो-जो अभीष्ट वस्तु हो, वह सब चढ़ावे। जबतक दोनों ओरका पलड़ा बराबर न हो जाय, तबतक चढ़ावे। अधिक या कम नहीं। तत्पश्चात् इष्टदेवकी शरण लेकर छींकेपरसे ही उस देवताके लिये जलमें जल, तिल, सुवर्ण और अक्षत छोड़े। इसके बाद उसपरसे उतरकर वह सब सामग्री ब्राह्मणोंको बाँट दे। इस दानके प्रभावसे मनुष्य जानकर या अनजानमें किये हुए समस्त पापोंका नाश कर
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * १२०३
देता है। जो शारीरिक क्लेशसे डरनेवाले हैं, ऐसे धनियोंके लिये यह तुलादान पुरश्चरणके समान है। राजन्! राजा दिलीप, कार्तवीर्य अर्जुन, पृथु, पुरुकुत्स तथा अन्यान्य राजाओंने भी यह तुलादान किया है। तुलापुरुषका दान पुण्यजनक, परम उत्तम, मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको देनेवाला तथा सम्पूर्ण उपद्रवोंका नाश करनेवाला है। जो भगवान् सिद्धेश्वरके आगे तुलापुरुषका दान देता है, उसे सहस्रगुने फलकी प्राप्ति होती है। अतः सब प्रकारसे प्रयत्न करके भगवान् सिद्धेश्वरके पास पहुँचकर विवेकी पुरुषको तुलापुरुषका दान करना चाहिये। भगवान् सिद्धेश्वरका दर्शन, स्पर्श और पूजन करनेपर मानव सब शिवलिंगोंके दर्शनका फल पा लेता है।
पृथ्वीदानकी महिमा
भर्तृयज्ञ कहते हैं—जो राजा श्रद्धापूर्वक भगवान् गौतमेश्वरके आगे सुवर्णमयी पृथ्वीका दान करता है, वह निश्चय ही चक्रवर्ती राजा होता है—ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। मान्धाता, धुन्धुमार, हरिश्चन्द्र, पुरूरवा, भरत और कार्तवीर्य—ये छः चक्रवर्ती राजा हुए हैं। पूर्वकालमें भगवान् गौतमेश्वरके समीप स्वर्णमयी पृथ्वीका दान करनेसे ही इन्हें सार्वभौम राज्य प्राप्त हुआ था।
आनर्तने पूछा—भगवन्! किस विधिसे स्वर्णमयी भूमिका दान करना चाहिये? मैं उसका दान करूँगा। इसके लिये मेरी बड़ी श्रद्धा है।
भर्तृयज्ञने कहा—नृपश्रेष्ठ! सौ भर सोनेकी पृथ्वी बनानी चाहिये। अथवा शक्तिके अनुसार पचास भर या पचीस भर सोनेकी ही पृथ्वीका निर्माण करावे। अधिक न हो तो किसी प्रकार भी पाँच भरसे कमकी पृथ्वी तो देनी ही नहीं चाहिये। उसमें लवण, इक्षु, सुरा, घृत, दही, दूध तथा जलके सात समुद्र और जम्बू, प्लक्ष, कुश, क्रौंच, शाक, शाल्मलि एवं पुष्कर—ये सात द्वीप क्रमशः एकसे दूसरे दूने बड़े बनाने चाहिये। महेन्द्र, मलय, सह्य, हिमवान्, गन्धमादन, विन्ध्य तथा शृंगी—इन सातों कुलपर्वतोंको भी अंकित करे। मध्यभागमें मेरुको और उसके चारों ओर विष्कम्भ पर्वतोंका भी उल्लेख करावे। जम्बू, न्यग्रोध (वट), नीप (कदम्ब) तथा प्लक्ष (पाकड़) आदि वृक्षों तथा गंगा आदि नदियोंका भी उस स्वर्णमयी भूमिमें मुख्यतः अंकन करे। इस प्रकार सुवर्णमयी पृथ्वीका पूर्णतः निर्माण कराकर फिर पहले बताये अनुसार मण्डप, कुण्ड और तोरण आदि बनावे। ब्राह्मणोंका पूजन करे। पूर्ववत् सब कुछ करके मध्यभागमें वेदीका निर्माण करे। उस वेदीपर हेममयी पृथ्वीको स्थापित करे और यथोक्त मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए उसे पंचगव्यसे नहलावे। इसके बाद 'इमं मे गङ्गे यमुने०,' 'पञ्चनद्यः सरस्वती०' 'त्रिपुष्करम्०' श्रीसूक्त, पावमानी ऋचा, स्वर्णघर्मानुवाक तथा स्नान-कर्मोपयोगी अन्यान्य मन्त्रोंके पाठपूर्वक उस स्वर्णप्रतिमाका अभिषेक करे। इस प्रकार विधिपूर्वक स्नान कराकर 'युवा सुवासा' इत्यादि मन्त्रसे नाना प्रकारके सूक्ष्म वस्त्र पहनावे। 'ये भूतानामधी०' इत्यादि मन्त्रोंका उच्च स्वरसे उच्चारण करके पूजन करे। फिर 'धूरसि' इत्यादि मन्त्रसे धूप निवेदन करके 'अग्निर्ज्योतिः' इत्यादि मन्त्रद्वारा आरती उतारे। 'अन्नमस्मि' इस मन्त्रसे सप्तधान्य निवेदन करे। इस प्रकार उस हेममयी पृथ्वीका सब पूजन विधिपूर्वक सम्पन्न करके सामने खड़ा हो जाय और हाथ जोड़कर निम्नांकित मन्त्रोंका उच्चारण करे—
त्वया सन्धार्यते देवि जगदेतच्चराचरम्।
तव दानं करिष्यामि सान्निध्यं कुरु मेदिनि॥
शरीरेष्वपि भूतानां त्वं देवि प्रथमं स्थिता।
ततश्चान्यानि भूतानि जलादीनि वसुन्धरे॥
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ये त्वां वाञ्छन्ति ते भूयस्त्वां लभन्ते न संशयः।
इह लोके परे चैव पार्थिवं रूपमाश्रिता ॥
‘पृथ्वी देवि! आप इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को धारण करती हैं। मैं आपका दान करूँगा, आप मेरे समीप पधारें। देवि वसुन्धरे! समस्त प्राणियोंके शरीरोंमें भी प्रधानतया आपकी स्थिति है। उसके बाद जल आदि दूसरे भूत स्थित हैं। जो आपको चाहते हैं, वे पाते हैं, इसमें संशय नहीं है। इहलोक और परलोकमें सर्वत्र आप पार्थिव रूप धारण करके स्थित हैं।’
इस प्रकार सुवर्णमयी धरादेवीका स्तवन करके उसे जलसहित हाथमें ले और भगवान् वासुदेवका मन-ही-मन ध्यान करते हुए इस मन्त्रद्वारा संकल्प करे—
पातालादुद्धृता येन पृथ्वी सा लोककारिणा।
अस्या दानेन च सदा प्रीयतां मे जनार्दनः ॥
‘जिन लोकस्रष्टा भगवान्ने वाराहरूप धारणकर पातालसे इस पृथ्वीका उद्धार किया था, वे ही जनार्दन इस स्वर्णमयी भूमिके दानसे मुझपर सदा सन्तुष्ट रहें।’
ऐसा कहकर उस जलको जलमें ही गिरावे। न तो भूमिपर उसे गिराना चाहिये और न ब्राह्मणके हाथमें ही देना चाहिये। तदनन्तर पृथ्वीदेवीका इस प्रकार विसर्जन करे—
आगता च यथान्यायं पूजिता च यथाविधि।
अस्माकं त्वं हितार्थाय यत्रेष्टं तत्र गम्यताम्॥
‘देवि! तुम हमारे हितके लिये यहाँ आयीं, न्यायोचित ढंगसे विधिपूर्वक तुम्हारी पूजा की गयी। अब हमारे हितके लिये ही तुम अभीष्ट स्थानको पधारो।’
‘उस्रा वेद’ इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके उस स्वर्णमयी भू-प्रतिमाको वेदीपरसे उतारे और ब्राह्मणको बाँट दे। जो राजा इस विधिसे भूमिदान करता है, उसके वंशमें भी कभी किसीका राज्य भ्रष्ट नहीं होता है। यह पृथ्वीदान सब दानोंसे उत्तम, पुण्यजनक एवं प्रशंसनीय है। जो इसकी महिमा सुनते हैं, उनकी भी समस्त जड़ताका यह विनाश करनेवाला है। इस प्रकार भूमिदान करनेवाले लोग अकण्टक राज्यका उपभोग करके प्रसन्नचित्त हो भगवान् विष्णुके अविनाशी सनातन पदको प्राप्त होते हैं। अन्यत्र किया हुआ भूमिदान भी एक जन्मतक अवश्य चक्रवर्ती बनाता है, परंतु जो भगवान् गौतमेश्वरके आगे भूमिदान किया जाता है, वह सात जन्मोंतक मनुष्यको चक्रवर्ती राजा बनाता है, इसमें संदेह नहीं है। अतः सब प्रकारसे प्रयत्नपूर्वक वहाँ भूमिदान करना चाहिये।
चार प्रकारके कालमानका वर्णन, दुःशील नामक ब्राह्मणका चरित्र तथा दुःशीलेश्वरकी महिमा
सूतजी कहते हैं— ब्राह्मणो! भूमण्डलमें सबका समय सौर, सावन, चान्द्र तथा नाक्षत्र— इन चार प्रकारके मानोंसे व्यतीत होता है। सौरमानसे तीन सौ पैंसठ दिनोंका एक वर्ष होता है। सावनमानसे तीन सौ साठ दिनोंका, चान्द्रमानसे तीन सौ चौवन दिनोंका और नाक्षत्रमानसे तीन सौ पैंतीस दिनोंका वर्ष होता है। सर्दी, गरमी और वर्षा सौरमानसे होती है। अग्निष्टोम आदि यज्ञ, उत्सव और विवाह— ये सावनमानसे किये जाते हैं। व्याज आदि व्यवहार मलमासयुक्त चान्द्रमानसे होता है। नाक्षत्रमानसे ग्रहोंकी चाल होती है। पृथ्वीपर इन चारोंके सिवा दूसरा कोई मान नहीं है। इसी मानसे देवता, दैत्य और मनुष्य सबका व्यवहार चलता है। जो मनुष्य हाटकेश्वरक्षेत्रके सप्त शिवलिंगोंके आगे इस प्रसंगका भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं, उनकी किसी प्रकार भी अपमृत्यु नहीं होती है।
हाटकेश्वरक्षेत्रमें महर्षि दुर्वासाद्वारा स्थापित
* नागरखण्ड-उत्तरार्ध * १२०५
देवाधिदेव भगवान् शंकरका एक लिंगमय विग्रह है। जो मनुष्य चैत्रमासमें तीनों समय अथवा एक क्षण भी नृत्य, गीत और वाद्यके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना करता है, वह अवश्य ही उनकी कृपासे गन्धर्वोंका अधिपति होता है।
प्राचीन कालमें वैदिश नामक उत्तम नगरमें निम्बशुच नामवाले एक ब्राह्मण रहते थे। वे किसी मठके अध्यक्ष थे और प्रतिदिन शिवलिंगका पूजन किया करते थे। शिवभक्तोंसे उन्हें जो कुछ भी वस्त्र आदि वस्तुएँ प्राप्त होती थीं, उन सबको वे बेच डालते और उनके मूल्यसे सोना खरीद लेते थे। उसमेंसे थोड़ा भी खर्च नहीं करते थे। केवल संग्रह ही करते रहते थे। इससे दीर्घकालके पश्चात् उनकी छोटी-सी पेटी सुवर्णसे भर गयी। निम्बशुच बड़े कृपण थे। घड़ीभरके लिये भी उस सुवर्णकी पेटीको अलग नहीं रखते। सदा अपनी काँखमें ही दबाये रहते थे। देवताकी पूजा करते समय भी उसे नहीं छोड़ते; कभी किसीपर उन्हें विश्वास नहीं होता था।
एक समय दूसरोंका धन हड़प लेनेमें कुशल दुःशील नामक एक खोटी बुद्धिवाले ब्राह्मणने पुजारीजीकी गतिविधिको ताड़ लिया और मन-ही-मन सोचा—'इस दुरात्माको विश्वास दिलानेके लिये मैं इसका शिष्य बनूँगा। चिकनी-चुपड़ी बातें बनाकर दिन-रात इसकी सेवा-टहलमें लगा रहूँगा और कभी मौका पाकर निःसन्देह अपना काम बना लूँगा।' ऐसा निश्चय करके दूसरे दिन वह उनके समीप गया। वे बहुत लोगोंके बीचमें बैठे हुए थे। उसने विनयपूर्वक प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा—'भगवन् ! मैंने आपकी तपस्याका अद्भुत प्रभाव सुना है। इस पृथ्वीपर आपके समान दूसरा कोई महात्मा नहीं है। इसीलिये मैं बहुत दूरसे आपके पास आया हूँ। संसारकी असारता जानकर मेरे मनमें बड़ा वैराग्य हुआ है। इस लोकमें मनुष्योंका यौवन बिजलीकी चमकके समान सहसा विलुप्त हो जानेवाला है। जैसे पर्वतसे निकली हुई नदी क्षणभंगुर होती है, उसी प्रकार स्त्री-पुत्र, बन्धु-बान्धव आदि सब अनित्य हैं। नदी प्रवाहरूपसे ही सत्य प्रतीत होती है, वास्तवमें उसका जल क्षण-क्षणमें परिवर्तित होता रहता है। उसी प्रकार समस्त संसार परिवर्तनशील है। भाई-बन्धु आदि सगे-सम्बन्धियोंका संयोग भी पाप-समागमके ही तुल्य जानने योग्य है। अतः सुव्रत ! इस संसार-समुद्रसे पार होनेके लिये मुझे ऐसे किसी उपायका उपदेश दीजिये, जो मेरे लिये नौकाके समान पार लगानेवाला हो। जिसका आश्रय लेकर मैं आपकी कृपासे इस भवसागरसे पार हो जाऊँ।'
उसकी यह बात सुनकर पुजारीजीके शरीरमें हर्षके मारे रोमांच हो आया। सोचने लगे—'यह कौन शिवभक्त पुरुष परदेशसे यहाँ आया है?' फिर बोले—'तुम धन्य हो, जिसकी बुद्धि तरुणावस्थामें भी ऐसी वैराग्यपूर्ण है। जो पहली अवस्था (तरुणाई)-में शान्त है (मन और इन्द्रियोंको जीत चुका है), वही शान्त है—ऐसा मेरा विचार है। शरीरके सब धातुओंके क्षीण हो जानेपर कौन शान्त नहीं होता ? यदि तुम्हारे मनमें संसारकी ओरसे इतनी विरक्ति है, तो देवताओंके स्वामी और परम कल्याणकारी भगवान् चन्द्रशेखरकी आराधना करो। अन्यथा घोर जपसे भी भवसागरको पार करना असम्भव है। यह बात मैंने शास्त्रोंका भलीभाँति मनन करके जानी है। शूद्र हो या ब्राह्मण, म्लेच्छ हो या और कोई पापात्मा; जो मनुष्य शिवकी दीक्षा लेकर षडक्षरमन्त्रसे भक्तिपूर्वक एक फूल भी शिवलिंगपर चढ़ा देता है, वह उसी गतिको प्राप्त होता है, जिसे बड़े-बड़े यज्ञकर्ता पाते हैं। जो शिवदीक्षा लिये हुए पुरुषोंको भक्तिभावसे वस्त्र, उपानह और जलपात्र आदि समर्पण करता है, उसे बहुतेरे यज्ञोंसे क्या काम है ?'
यह सुनकर दुःशीलने निम्बशुचके चरण पकड़ लिये और उनपर अपना मस्तक रखकर
१२०६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
बड़े आदरसे कहा—'प्रभो! आप मुझे शिवदीक्षा देकर अनुगृहीत कीजिये, जिससे मैं एकाग्रचित्त होकर नित्य आपकी सेवा कर सकूँ।' तब उस तापस ब्राह्मणने मनमें विचार किया—'यह कोई चतुर मनुष्य दिखायी देता है, दूसरा कोई ऐसा शिष्य नहीं आवेगा। इसलिये मैं इसे शिष्य बनाये लेता हूँ।' ऐसा निश्चय करके निम्बशुचने उसका हाथ पकड़कर कहा—'वत्स! यदि ऐसी बात है तो मेरे साथ कुछ प्रतिज्ञा या शपथ करो, जिससे मैं तुम्हें आज ही दीक्षा दे दूँ। तुम्हें इस मठसे बहुत दूर अपनी कुटी बनानी होगी। सूर्यास्त हो जानेपर तुम्हें कदापि इस मठमें प्रवेश नहीं करना चाहिये।'
दुःशीलने कहा—गुरुदेव! मेरे लिये तो आपका आदेश ही प्रमाण है। जो शिष्य गुरुकी आज्ञाका पालन नहीं करता, उसका वह व्रत व्यर्थ हो जाता है और फिर उसे नरककी प्राप्ति होती है।
दुःशीलका यह वचन सुनकर निम्बशुचको सन्तोष हो गया। तब उन्होंने उसे शिवमन्त्रकी दीक्षा दी—पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश किया। तबसे दुःशील उनकी सेवामें अत्यन्त तत्पर रहने लगा। अपनी सेवाओंसें उसने तापसके चित्तको प्रसन्न कर लिया था। वह प्रतिदिन मन-ही-मन सुवर्णकी वह पेटी हथिया लेनेकी बात सोचता था, किंतु किसी दिन मौका नहीं पाता था। तब उसने विचार किया—'क्या इसे विष दे दूँ, अथवा हथियारसे मार डालूँ या गला दबाकर इसके प्राण ले लूँ?' ऐसी ही बातें वह प्रतिदिन सोचता रहा। इतनेमें ही वर्षाका समय उपस्थित हुआ। श्रावणके कृष्णपक्षमें जब सूर्यदेव कर्कराशिपर स्थित थे, कोई धनी शिवभक्त वहाँ आया और उसने प्रणाम करके कहा—'स्वामिन्! आपकी आज्ञा हो तो मैं आगामी चतुर्दशीके दिन आपका सत्कार करना चाहता हूँ। यदि आप मेरे गाँवमें पधारनेका कष्ट करें, तो बड़ी कृपा हो।'
यह सुनकर निम्बशुच मुनि बहुत सन्तुष्ट हुए और बोले—'बहुत अच्छा, मैं नियत समयपर अपने शिष्यके साथ तुम्हारे यहाँ आऊँगा।' ऐसा कहकर उसे विदा कर दिया। जब वह समय आया, तब सबेरे ही निम्बशुच मुनि दुःशीलके साथ प्रस्थित हुए। मार्गमें मुरला नामवाली सागरगामिनी नदी मिली। उसे देखकर उन्होंने दुःशीलसे कहा—'वत्स! मैं मुरलामें तुम्हारे साथ देवपूजा करूँगा। थोड़ी देर यहीं ठहरो।' 'जो आज्ञा' कहकर दुःशील नदीके शुभ तटपर खड़ा रहा। निम्बशुच दुःशीलके गुणोंसे सर्वदा सन्तुष्ट रहते थे। उसे एक अच्छा शिष्य जानकर उनके मनमें उसके प्रति विश्वास हो गया था। उन्होंने छिपायी हुई सोनेकी पेटी और यागेश्वरकी मूर्तिके साथ अपनी गुदड़ी उतारकर धरतीपर रख दी और स्वयं थोड़ी दूरपर मलत्याग करनेके लिये चले गये। वे ज्यों ही बेतके वृक्षोंकी ओटमें पहुँचे, त्यों ही दुःशील उनकी सोनेकी पेटी लेकर प्रसन्नचित्त हो शीघ्रतापूर्वक उत्तर दिशाकी ओर चल दिया। निम्बशुच जब मैदान होकर लौटे, तब दुःशील नहीं दिखायी दिया। केवल यागेश्वरसहित गुदड़ी वहीं पड़ी हुई थी। ब्राह्मणका मन खिन्न हो गया। वे जल्दी-जल्दी हाथ-पैर धोकर कुल्ला किये बिना ही उस स्थानपर आये, जहाँ गुदड़ी रखी थी। देखा, तो वहाँ सोनेकी पेटी नहीं थी। फिर यह जानकर कि वही शिष्य उसे चुरा ले गया, वे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। चेत होनेपर वहाँसे वे बड़े कष्टसे उठे और पत्थरपर अपना सिर पटकने लगे। फिर विलाप करते हुए बोले—'हाय! हाय! उस दुष्ट दुरात्माने मुझे मार डाला। मैं नष्ट हो गया। उसने मुझे लूट लिया। क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? कैसे उसे देख पाऊँ?' तदनन्तर उसके पैरोंकी निशानी देखते हुए निम्बशुच मुनि उसका पीछा करने लगे। किंतु एक तो वे बूढ़े थे, दूसरे, रोगोंनें भी उन्हें और थका दिया था; इसलिये निराश होकर अपने मठपर लौट गये।
* नागरखण्ड-उत्तरार्ध * १२०७
दुःशील भी सोनेकी पेटी लेकर दूसरे स्थानपर चला गया। उस सुवर्णसे वह व्यापार करने लगा। विवाह करके उसने गृहस्थी बसा ली। बुढ़ापा आ गया, परंतु उसे कोई सन्तान नहीं हुई। एक समय वह अपनी स्त्रीके साथ तीर्थयात्रा करता हुआ चमत्कारपुरमें गया। सब तीर्थोंमें स्नान और सम्पूर्ण मन्दिरोंमें घूम-घूमकर देवदर्शन करते हुए उसने एक स्थानपर दुर्वासा मुनिको देखा। वे अपने इष्टदेवके सामने भक्तिपूर्वक नृत्य और गान कर रहे थे। दुःशीलने उनको प्रणाम करके पूछा—'महर्षे ! इस निर्मल शिवलिंगकी स्थापना किसने की है? आप क्यों इसके सम्मुख नृत्य और गान करते हैं? आपका यह व्यवहार मुनियोंको शोभा नहीं देता।'
दुर्वासा बोले—देवताओंके भी आराध्यदेव शूलपाणि भगवान् शंकरके इस लिंगमय विग्रहकी स्थापना मैंने ही की है। देवदेव महेश्वरको नृत्य और गान विशेष प्रिय है। अतः मैं यही करता हूँ।
दुर्वासाका वचन सुनकर दुःशीलके मनमें महादेवजीके प्रति भक्तिभावका उदय हुआ। उसने मुनिको पुनः प्रणाम करके कहा—'भगवन् ! मैं केवल जातिसे ब्राह्मण हूँ, कर्मसे नहीं। मैंने आजतक किसीको भोजन नहीं दिया। केवल ठग-ठगकर देवताओं और ब्राह्मणोंके धनका अपहरण किया है। मैं सदा जुआ खेलने और वेश्यागमनके दुर्व्यसनमें ही फँसा रहा हूँ। जातिसे ब्राह्मण होकर भी मैंने एक शैवको गुरु बनाया। फिर अनेक प्रकारकी चिकनी-चुपड़ी बातें कहकर उन्हें धोखा दिया और उनका सारा धन चुरा लिया। मेरे वे गुरु परलोकवासी हो गये हैं। मैं पश्चात्तापकी आगमें रात-दिन जलता रहता हूँ। आप मुझे कोई प्रायश्चित्त बताकर मुझे अनुगृहीत कीजिये। मुनीश्वर! मेरे पास धन बहुत है, परंतु सन्तान एक भी नहीं है। अतः ऐसा कोई उपाय बताइये, जिससे उस धनका सदुपयोग हो, इहलोक और परलोकमें भी वह हितकारक हो सके। आप जो बतावेंगे, वह सब मैं करूँगा।'
दुर्वासाने कहा—जो पुरुष सहस्रों पाप करके पीछे धर्मपरायण होता है, वह बड़ी कठिनाईसे संसार-सागरके पार होता है। तूने कुमार्गपर चलकर महापाप किया है।
दुःशील बोला—महाभाग ! मेरे पास धन बहुत है, यदि उससे कोई धर्मकार्य सिद्ध हो सके तो बताइये, मैं सब करूँगा।
दुर्वासाने कहा—तुम्हारे पापनाशका एक ही उपाय है। सत्ययुगमें तपकी, त्रेतामें ज्ञानकी, द्वापरमें तीर्थयात्राकी और कलियुगमें दानकी ही मुनिलोग प्रशंसा करते हैं*। इस समय भयंकर कलिकाल उपस्थित है। अतः समस्त पापोंकी शुद्धिके लिये दान करो। तुम्हारे मनमें गुरुके यहाँसे धनका अपहरण करनेके कारण उस धनकी ओरसे घृणा भी है ही, अतः तुम गुरुके ही नामसे भगवान् शंकरका एक मन्दिर बनवा दो। इससे गुरुके ऋणसे भी उऋण हो जाओगे। अन्यत्र भी यदि कहीं उनका धन प्राप्त हो तो प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उस धनका दान किया करो। स्वयं अपने लिये भी तिलपात्र और सुवर्णका दान करो, जिससे तुम्हारे शरीरसे सब पाप दूर हो जायँ। दूसरी बात यह है कि मैं सुदूरवर्ती कल्पग्रामसे सदा चैत्रमासमें यहाँ अपने बनवाये हुए शिवमन्दिरके दर्शन-पूजनके लिये आया करता हूँ; फिर वहीं चला जाऊँगा। यह मेरा सदाका नियम है। अतः मेरे चले जानेपर तुम्हें मेरे बनवाये हुए इस मन्दिरमें भगवान् शिवके स्नान-पूजन आदिका ध्यान रखना चाहिये।
दुःशील बोला—मुनिश्रेष्ठ ! मैं आपकी सब आज्ञाका पालन करूँगा, परंतु मुझे निर्वाण-दीक्षा दीजिये।
* तपः कृते प्रशंसन्ति त्रेतायां ज्ञानमेव च। द्वापरे तीर्थयात्रां च दानमेव कलौ युगे॥ (स्क० पु०, ना० उ० २२९। ९१)
| १२०८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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मुनि दुर्वासाके आज्ञानुसार तिलपात्रादिके दानसे जब उसके पाप दूर हो गये, तब दुर्वासाजीने उसे निर्वाणदीक्षा दी। दीक्षा देनेके बाद मधुर वाणीमें कहा—'अब मुझे गुरुदक्षिणा दो।'
दुःशील बोला—प्रभो! आप दक्षिणामें क्या लेना चाहते हैं? शीघ्र बताइये।
दुर्वासाने कहा—देखो, इस समय कलियुग आ गया है। अब मैं कल्पग्रामको चला जाऊँगा और चैत्रमासमें जो मेरी यात्रा यहाँ होती थी, वह अब नहीं होगी। जबतक सत्ययुग नहीं आ जायगा, तबतक मैं यहाँ नहीं आऊँगा। यह मन्दिर जो मैंने बनवाना प्रारम्भ किया था, अबतक आधा ही बन पाया है, अब तुम इसे पूरा कर देना, यही मेरी गुरुदक्षिणा है। अपनी शक्तिके अनुसार यहाँ नृत्य-गीत आदि करते रहना। फूल आदि भी चढ़ाना चाहिये।
ऐसा कहकर मुनीश्वर दुर्वासा कल्पग्रामको चले गये। दुःशीलने भी जैसा दुर्वासाजीने कहा था, सब कुछ उसी प्रकार किया। इसी प्रकार भक्तिभावसे पूजन आदि करते हुए दुःशीलके ही नामपर उस शिवलिंगकी प्रसिद्धि हुई; उसकी संज्ञा 'दुःशीलेश्वर' हो गयी। जो चैत्रमासमें प्रतिदिन दुःशीलेश्वर देवका दर्शन करता है, वह क्षणभरमें वर्षभरके पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो उनको नहलाता है, उसके शरीरसे तीस वर्षका पाप नष्ट हो जाता है। जो उनके आगे नृत्य-गीत आदिका आयोजन करता है, उसके शरीरसे तीस वर्षका पाप नष्ट हो जाता है। जो उनके आगे नृत्य-गीत आदि करता है, वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
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निम्बेश्वरकी स्थापना तथा ग्यारह रुद्रोंका प्राकट्य एवं उनके दर्शन-पूजनकी महिमा
सूतजी कहते हैं—दुःशीलने दक्षिण दिशामें अपने गुरुके नामसे भी शिवालय बनवाया, जो निम्बेश्वरके नामसे विख्यात हुआ। वह बड़े भक्तिभावसे उनके चरणारविन्दोंका चिन्तन करने लगा। उसकी स्त्रीका नाम शाकम्भरी था। उसने अपने नामवाली श्रीदुर्गादेवीकी वहाँ स्थापना की। उनके पास जो शेष धन था, उसे उन दोनों पति-पत्नीने देव-पूजनके लिये ब्राह्मणोंको अर्पित कर दिया और स्वयं भिक्षान्न भोजन करने लगे। कुछ कालके अनन्तर दुःशीलकी मृत्यु हो गयी। उस समय शाकम्भरीने दृढ़चित्त होकर पतिके साथ चिताकी आगमें प्रवेश किया। फिर वे दोनों पति-पत्नी विमानमें बैठकर स्वर्गको चले गये। जो दुःशीलका यह उत्तम उपाख्यान पढ़ेगा, वह अज्ञानजनित सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जायगा।
पूर्वकालकी बात है, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले काशीनिवासी मुनि हाटकेश्वरदेवके दर्शनके लिये उत्सुक होकर चले। उनमें परस्पर होड़ लग गयी थी कि 'पहले मैं, पहले मैं, भगवान् हाटकेश्वरका दर्शन करूँगा। जो सबके आगे वहाँ जाकर भी पहले हाटकेश्वर शिवका दर्शन नहीं कर लेगा, वह अकेला सबको कष्ट देनेके पापका भागी होगा।' ऐसा कहकर वे सब काशीपुरीसे अत्यन्त वेगपूर्वक दौड़ते हुए चले। इसी समय भगवान् हाटकेश्वर उन सब मुनियोंका स्पर्धाजनित अभिप्राय जानकर उन सबको दर्शन देनेके लिये पातालसे नागच्छिद्रके द्वारा निकले और ग्यारह स्वरूपोंमें स्थित हो गये। त्रिशूल, तीन नेत्र, जटाजूट, अर्धचन्द्र तथा मुण्डमालासे विभूषित हो, वे एक ही साथ सबकी दृष्टिमें आये। उन मुनियोंने अपने समक्ष खड़े हुए भगवान् वृषभध्वजका दर्शन करके धरतीपर घुटने टेक उन्हें प्रणाम किया और पृथक्-पृथक् उनकी स्तुति की। उनमेंसे एक जानता था,
| * नागरखण्ड-उत्तरार्ध * | १२०९ |
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भक्तवत्सल देवदेव महादेवजी पहले मेरी दृष्टिमें आये हैं। दूसरा समझता था, पहले मुझे ही भगवान्का दर्शन हुआ है। ऐसा जानते हुए उन श्रेष्ठ तापसोंने भगवान्का इस प्रकार स्तवन किया—
तापस बोले—जो देवताओंके भी अधिदेवता तथा सर्वदेवस्वरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। शान्त, सूक्ष्म तथा अन्धकासुरका नाश करनेवाले शिवको नमस्कार है। जो सदा द्युलोकके आश्रित रहकर विभिन्न वायुओंके द्वारा सम्पूर्ण जगत्को जीवन प्रदान करते हैं, उन सम्पूर्ण रुद्रोंको नमस्कार है। जो पूर्व दिशामें रहकर सब लोकोंकी भूतोंके महान् भयसे रक्षा करते हैं, उन सम्पूर्ण रुद्रोंको नमस्कार है। जो पश्चिम दिशामें रहकर दुरात्मा पिशाचोंके भयसे समस्त जगत्की रक्षा करते हैं, उन सम्पूर्ण रुद्रोंको नमस्कार है। जो ऊपरके लोकोंमें रहकर जम्भके महान् भयसे सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करते हैं, उन सब रुद्रोंको नमस्कार है। जो नीचे-ऊपर दोनों जगह रहकर सम्पूर्ण लोकोंकी कूष्माण्डोंके भयसे रक्षा करते हैं, उन सब रुद्रोंको नमस्कार है। जो सहस्रोंकी संख्यावाले अथवा असंख्य रुद्र, पृथ्वीपर रहकर रोगोंसे जगत्को बचाते हैं, उन सबको भी नमस्कार है।
इस प्रकार ग्यारह तपस्वियोंद्वारा स्तुति की जानेपर वे ग्यारहों रुद्र भक्तिसे नतमस्तक हुए उन तपस्वी मुनियोंसे बोले।
रुद्र बोले—श्रेष्ठ तापसो ! मैं तुम्हारी बड़ी भारी भक्ति देखकर सन्तुष्ट हूँ और ग्यारह स्वरूपोंमें प्रकट हुआ हूँ, तुम सब लोग मनोवांछित वर माँगो।
तापसोंने कहा—देव ! यदि आप हमपर सन्तुष्ट हैं, तो कृपा करके इन ग्यारह स्वरूपोंमें सदा यहीं रहें, जिससे हम आपकी आराधना करते हुए हाटकेश्वरक्षेत्रमें सदैव निवास करें।
भगवान् श्रीशिव बोले—मैंने इस क्षेत्रमें जिन ग्यारह मूर्तियोंको प्रकट किया है, इन सबके साथ यहाँ सदैव निवास करूँगा। मेरी जो आद्या मूर्ति है, वह तो कैलासपर रहती है। इस क्षेत्रमें भी जो उत्तम कैलासपर्वत है, वहाँ सदा उसकी स्थिति बनी हुई है। ये मेरी ग्यारह मूर्तियाँ सम्पूर्ण जगत्की रक्षाके लिये यहाँ सदा उपस्थित रहेंगी। तुम्हारे ही नामोंसे इन सबकी प्रसिद्धि होगी। जो मनुष्य विश्वामित्र-कुण्डमें स्नान करके मेरी इन मूर्तियोंकी पूजा करेंगे, वे परम गतिको प्राप्त होंगे। मेरे वचनसे उन्हें ग्यारहगुने पुण्यफलकी प्राप्ति होगी; इसमें संशय नहीं है।
ऐसा कहकर भगवान् त्रिलोचन वहीं अन्तर्धान हो गये। वे मुनि भी वहाँ आश्रम बनाकर बड़ी श्रद्धासे उन मूर्तियोंकी आराधना करते हुए परम पदको प्राप्त हो गये। दूसरा कोई मनुष्य भी यदि इन ग्यारह विग्रहोंका दर्शन और पूजन करेगा, वह उस परमधाममें जायगा, जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर विराजमान हैं। जो मानव चैत्रमासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीके दिन उन सबका भक्तिपूर्वक पूजन करेगा, वह परम गतिको प्राप्त होगा। षडक्षर मन्त्रके द्वारा भगवान् शिवको एक फूल चढ़ानेसे जो फल मिलता है, उससे सौ गुना फल उस मनुष्यको प्राप्त होता है, जिसने शिवकी दीक्षा ली है। उसकी अपेक्षा भी सौगुना फल उसे मिलता है, जिसने भगवान् शिवकी शरण ले रखी है। जो लोग भक्ति एवं विनयपूर्वक उन विग्रहोंका पूजन करते हैं, वे पूर्वोक्त सभी लोगोंसे सौगुना पुण्यफल प्राप्त करते हैं।
ऋषियोंने पूछा—सूतजी ! काशीसे आये हुए उन मुनियोंके नाम क्या थे, जिनकी भक्तिके कारण भगवान् शिव ग्यारह स्वरूपोंमें अभिव्यक्त हुए?
सूतजीने कहा—उनमेंसे प्रथमका नाम त्रिभुवन-प्रसिद्ध मृगव्याध था, दूसरेका शर्व, तीसरेका निन्दित, चौथेका महायशा, पाँचवेंका अजैकपाद, छठेका अहिर्बुध्न्य, सातवेंका पिनाकी, आठवेंका परन्तप, नवेंका दहन, दसवेंका ईश्वर तथा
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- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ग्यारहवेंका नाम कपाली था। ये ही नाम भगवान् शिवने उन ग्यारह रुद्र-मूर्तियोंके भी रखे।
मृगव्याधके लिये प्रत्यक्ष गौ तथा गुड़ की बनी हुई गौ भी दान करनी चाहिये। कपालीके लिये मक्खनकी, अजैकपादके लिये घीकी, अहिर्बुध्न्यके लिये सुवर्णकी, पिनाकीके लिये नमककी, परन्तपके लिये रसकी, दहनके लिये अन्नकी, ईश्वरके लिये जलकी तथा अन्य मूर्तियोंके लिये प्रत्यक्ष गौ दान करनी चाहिये। जो इन रुद्रोंकी प्रीतिके लिये इन सब प्रकारकी गौओंका दान करता है, वह निश्चय ही चक्रवर्ती राजा होता है, ऐसा पितामह ब्रह्माजीका कथन है।
नागरखण्डका उपसंहार, श्रवण तथा व्यासपूजनका माहात्म्य
सूतजी कहते हैं— पूर्वकालमें स्कन्दजीने यह समस्त पुराण ब्रह्मपुत्र महर्षि भृगुको सुनाया था। उनसे अंगिराने प्राप्त किया। अंगिरासे च्यवनको और च्यवनसे ऋचीकको इसकी प्राप्ति हुई। इस परम्परासे यह स्कन्द-कथित पुराण सब लोकोंमें प्रचलित हुआ। जो मनुष्य सत्पुरुषोंके मध्यमें बैठकर इस पुराणको सुनता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है। यह पुराण आयुकी वृद्धि करनेवाला और सब वर्णोंको सुख देनेवाला है। इसे महात्मा षडानन (स्कन्दजी)-ने प्रकट किया है। जो मनुष्य हाटकेश्वरक्षेत्रका माहात्म्य सुनता है, उसके पुण्यकी गणना कोई नहीं कर सकता। जो मानव भक्तिपूर्वक इस कथाको कुछ दिन सुनता और पढ़ता है, उसके समस्त मनोरथोंकी सिद्धि होती है। जो गुरु अपने शिष्यको एक अक्षर भी उपदेश करता है, उस गुरुको देनेके लिये पृथ्वीपर ऐसा कोई धन नहीं है, जिसे देकर मनुष्य उसके ऋणसे उऋण हो सके। अतः शास्त्र-पुराणका उपदेश करनेवाले व्यासको गौ, भूमि, सुवर्ण, अन्न और वस्त्र आदि देकर उसका पूर्णतः सत्कार करना चाहिये। जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर इस परम उत्तम शास्त्रका पाठ एवं श्रवण करता है तथा उपदेश करनेवाले व्यासका पूजन करता है, वह भगवान् शिवके धामको प्राप्त होता है।
नागरखण्ड (उत्तरार्ध) सम्पूर्ण।
नागरखण्ड समाप्त।
१८. प्रभासखण्ड (प्रभास, वस्त्रपूत, अर्बुद व द्वारका)
ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः
संक्षिप्त श्रीस्कन्दमहापुराण
## प्रभासखण्ड
सूतजीके द्वारा प्रभास-खण्डका उपक्रम तथा पुराणों और उपपुराणोंका वर्णन
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर, सरस्वती देवी तथा व्यासजीको नमस्कार करके जय (इतिहास-पुराण)-का पाठ करे।
नैमिषारण्यके निवासी महर्षियोंने लोमहर्षण सूतजीसे पूछा—महाबुद्धिमान् सूतजी! प्रभासक्षेत्रका क्या माहात्म्य है? यह हमें बतानेकी कृपा करें।
मुनियोंका यह वचन सुनकर सूतजी अपने गुरुदेव सत्यवतीनन्दन व्यासको प्रणाम करके बोले।
लोमहर्षणजीने कहा—जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है, जो सम्पूर्ण जगत्के उत्पत्ति-स्थान, सबको मोहनेवाले, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, अप्रमेय, गुरु, देव, निर्भय, निर्भय-आश्रय, हंस (शुद्ध-स्वरूप), शुचिषद् (पवित्र अन्तःकरणमें निवास करनेवाले), आकाशकी भाँति सर्वव्यापी, सर्वगत, शिव (कल्याणमय), उदासीन (राग-द्वेषरहित), आयासशून्य, प्रपंचसे परे, निरंजन, बिन्दुस्वरूप, ध्येय तथा ध्यानरहित हैं, ज्ञानीजन जिन्हें अस्ति-नास्ति (भावाभावस्वरूप) कहते हैं, जो दूरसे दूर और निकटसे निकट हैं, मनसे जिनका ग्रहण नहीं हो सकता, जो परम धाम, पुरुष नामसे प्रसिद्ध, जगन्मय, हृदय-कमलके आसनपर विराजमान, तेजोरूप तथा इन्द्रियरहित हैं, ऐसे परमात्माको नमस्कार करके मैं पापनाशिनी कथा आरम्भ करता हूँ। आपलोग सावधान होकर सुनें। यह कथा श्रद्धालु एवं शान्त द्विजको सुनाने योग्य है। जैसे सब देवताओंमें देवदेव महेश्वर श्रेष्ठ हैं, जिस प्रकार नदियोंमें गंगा, वर्णोंमें ब्राह्मण, अक्षरोंमें ॐकार, पूजनीयोंमें माता तथा गुरुजनोंमें पिता सबसे श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सब शास्त्रोंमें स्कन्दपुराण उत्तम है। पूर्वकालमें कैलास पर्वतके शिखरपर ब्रह्मा आदि देवताओंके समीप पिनाकपाणि भगवान् शिवने पार्वतीजीके सम्मुख स्कन्दपुराण सुनाया था। फिर पार्वतीजीने अपने पुत्र स्कन्दको, स्कन्दने नन्दीगणको, नन्दीने कुमार (सनकादि)-को और कुमारने परम बुद्धिमान् व्यासको सुनाया था। व्यासजीके मुखसे कही हुई उसी कथाको मैं आपलोगोंके सामने कहता हूँ। आप सब महर्षि सद्भावसे युक्त हैं, अतः मुझे आपको स्कन्दपुराण-संहिता सुनानेके लिये उत्साह होता है।
प्राचीन कालमें ब्रह्माजीने उग्र तप किया, तब छहों अंग, पद और क्रमके सहित वेद प्रकट हुए। तदनन्तर सर्वशास्त्रमय सम्पूर्ण पुराणका प्रादुर्भाव हुआ। जो नित्य शब्दमय, पुण्यजनक तथा सौ करोड़ श्लोकोंसे विस्तारको प्राप्त हुआ है। ब्रह्माजीके मुखसे क्रमशः १ ब्रह्मपुराण, २ विष्णुपुराण, ३ शिवपुराण,
१२१२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
४ भागवतपुराण, ५ भविष्यपुराण, ६ नारदीयपुराण, ७ मार्कण्डेयपुराण, ८ आग्नेय पुराण, ९ ब्रह्मवैवर्तपुराण, १० लिंगपुराण, ११पद्मपुराण, १२ वाराहपुराण, १३ स्कन्दपुराण, १४ वामनपुराण, १५ कूर्मपुराण, १६ मत्स्यपुराण, १७ गरुड़पुराण तथा १८ वायुपुराणका प्राकट्य हुआ। इन अठारह पुराणोंका नामोच्चारण सब पातकोंका नाश करनेवाला है।
इसके सिवा मुनियोंने अठारह उपपुराण भी बताये हैं— १ सनत्कुमार, २ नरसिंह, ३ स्कन्द, ४ नन्दीश्वरकथित शिवधर्म, ५ दुर्वासा, ६ नारद, ७ कपिल, ८ मनु, ९ उशना, १० ब्रह्माण्ड, ११ वरुण, १२ कालिका, १३ माहेश्वर, १४ साम्ब, १५ सौर, १६ पाराशर, १७ मारीच तथा १८ भार्गव। विप्रवरो! ये उपपुराणोंके नाम बताये गये हैं।
**ऋषि बोले—**सूतजी! अब क्रमशः पुराणोंकी श्लोक संख्या बताइये।
**सूतजीने कहा—**पहले एक ही पुराण था, जो शतकोटि श्लोकोंद्वारा विस्तृत तथा धर्म, अर्थ और कामका साधन करनेवाला था। प्रलयकालमें जब संकर्षणरूपधारी परमात्मा श्रीहरिने सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध कर दिया, तब अंगोंसहित चारों वेद, पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र सबको लेकर उन्होंने अपने अधीन कर लिया। तत्पश्चात् दूसरे कल्पके प्रारम्भमें एकार्णवके जलमें मत्स्यरूपसे विचरनेवाले भगवान्ने दिव्यदृष्टिसम्पन्न ब्रह्माजीको समस्त वेदादि शास्त्रोंका उपदेश किया। फिर ब्रह्माजीने त्रिकालदर्शी मुनियोंको उपदेश दिया। इस प्रकार सब शास्त्रों और पुराणोंकी प्रवृत्ति हुई। तदनन्तर कालक्रमसे व्यासरूपधारी श्रीहरि प्रत्येक द्वापरयुगमें अठारह पुराणोंको संक्षिप्त करते हैं। सौ कोटि श्लोकोंको संक्षिप्त करके चार लाख श्लोकोंके रूपमें स्थापित करते हैं। इन्हीं चार लाख श्लोकोंको अठारह भागोंमें विभक्त करके इस भूलोकमें अठारह पुराणोंका उपदेश करते हैं। अब भी देवलोकमें सौ कोटि श्लोकोंके विस्तारसे युक्त पुराणका संस्करण विद्यमान है। उसीका सारभूत अर्थ यहाँ चार लाख श्लोकोंमें नियोजित हुआ है। इस लोकमें अठारह पुराण हैं। अब उन पुराणोंके नामोल्लेखपूर्वक उनकी श्लोकसंख्या बतलाता हूँ। ब्रह्माजीने मरीचिसे जितने श्लोकोंका उपदेश किया है, उसका नाम 'ब्रह्मपुराण' है। उसकी श्लोकसंख्या दस हजार है। जो मनुष्य ब्रह्मपुराणको लिखकर वैशाखकी पूर्णिमाके दिन जलधेनुसहित उसका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है। जिस समय सुवर्णमय ब्रह्माण्ड भगवान्की नाभिसे कमलरूपमें प्रकट हुआ था, उस कथाका आश्रय लेकर जो पुराण प्रकाशमें आया है, उसे विद्वानोंने 'पद्मपुराण' नाम दिया है। उसकी श्लोकसंख्या यहाँ पचपन हजार बतायी जाती है। जो मनुष्य सुवर्णमय कमलयुक्त पद्मपुराण ज्येष्ठमासमें तिलसहित दान करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। वाराहकल्पकी कथाको लेकर जो भगवान् विष्णुका चरित्र निर्मित हुआ है, उसे लोकमें 'विष्णुपुराण' कहते हैं। वह तेईस हजार श्लोकोंका बताया गया है। जो शुद्धचित्त मानव आषाढ़मासकी पूर्णिमाको घृत-धेनु के साथ विष्णुपुराणका दान करता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।
श्वेतकल्पके प्रसंगको लेकर जिसमें वायुदेवने धर्मका उपदेश किया है, वह 'वायुपुराण' कहलाता है। उसमें भगवान् शिवकी महिमाका भी वर्णन है। वायुपुराण चौबीस हजार श्लोकोंका बताया जाता है। श्रावणमासकी पूर्णिमाको गुड़मयी धेनुके साथ उक्त पुराणका जो कुटुम्बी ब्राह्मणके लिये दान करता है, वह शुद्धचित्त हो एक कल्पतक शिवलोकमें निवास करता है। जिसमें गायत्री-मन्त्रका आश्रय लेकर धर्मका विस्तृत रूपसे वर्णन किया गया है तथा जिसमें वृत्रासुरके वधका भी प्रसंग है, उसे 'भागवतपुराण' कहते हैं। जो उसे लिखकर भाद्रपदकी पूर्णिमाको स्वर्णमय सिंहासनके
- प्रभासखण्ड * १२१३
साथ दान करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। भागवतपुराण अठारह हजार श्लोकोंका बताया गया है। जिसमें बृहत्कल्पकी कथाका आश्रय लेकर नारदजीने धर्मोंका वर्णन किया है, वह 'नारदीयपुराण' है। उसकी श्लोकसंख्या पचीस हजार है। जो आश्विनकी पूर्णिमाको धेनुसहित उस पुराणका दान करता है, वह पुनरावृत्तिरहित उत्तम सिद्धिको प्राप्त होता है। जिसमें पक्षियोंके प्रसंगको लेकर धर्माधर्मका विचार किया गया है, वह 'मार्कण्डेयपुराण' कहलाता है। उसकी श्लोकसंख्या नौ हजार है। जो उसे लिखकर सुवर्णमय हाथीके साथ कार्तिककी पूर्णिमाको दान देता है, वह पुण्डरीक यज्ञके फलका भागी होता है। जहाँ ईशानकल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर अग्निदेवने वसिष्ठको उपदेश दिया है, उसे 'आग्नेयपुराण' कहते हैं। उसकी श्लोकसंख्या सोलह हजार है। जो उसे लिखकर मार्गशीर्षमासमें स्वर्णमय कमलके साथ तिलधेनुसहित दान करता है, उसे सब यज्ञोंका फल मिलता है। जिसमें लोकनाथ ब्रह्माजीने अघोरकल्पके वृत्तान्तके प्रसंगसे सूर्यकी महिमाका आश्रय ले मनुसे जीवसमुदायका लक्षण बताया है; प्रायः भविष्य चरित्रके वर्णनसे युक्त वह पुराण 'भविष्यपुराण' कहलाता है। उसकी श्लोकसंख्या साढ़े चौदह हजार है। जो पौषमासकी पूर्णिमाको द्वेषरहित हो गुड़ और घटसहित उक्त पुराणका दान करता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है। जिसमें रथन्तरकल्पके वृत्तान्तको लेकर नारदजीसे श्रीकृष्ण-माहात्म्यसहित ब्रह्मवाराह-चरित्रका वर्णन किया जाता है, वह अठारह हजार श्लोकोंका पुराण 'ब्रह्मवैवर्त' कहा गया है। जो मनुष्य माघमासकी पूर्णिमाको परम पवित्र ब्रह्मवैवर्तका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है। जिसमें अग्निकल्पके वृत्तान्तको लेकर लिंगमें स्थित देवदेव महेश्वरने अग्निसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका वर्णन किया है, वह 'लिंगपुराण' कहा गया है। उसकी श्लोकसंख्या ग्यारह हजार है। जो फाल्गुनकी पूर्णिमाको तिलधेनुके साथ ब्राह्मणको उस पुराणका दान करता है, वह भगवान् शिवके सारूप्यको प्राप्त होता है।
जिसमें महावाराहके माहात्म्यको लेकर भगवान् विष्णुने पृथ्वीसे कथा कही है, वह चौबीस हजार श्लोकोंका पुराण 'वाराहपुराण' कहलाता है। जो चैत्रकी पूर्णिमाको सोनेके गरुड और तिलकी धेनुसहित वह पुराण कुटुम्बी ब्राह्मणको देता है, वह भगवान् वाराहके प्रसादसे वैष्णवपदको प्राप्त होता है। जिसमें माहेश्वर धर्मोंका आश्रय लेकर तत्पुरुष कल्पके वृत्तान्त एवं चरित्रोंके साथ कथावस्तुका वर्णन स्कन्दजीके प्रति (अथवा स्कन्दजीके द्वारा) किया गया है, वह 'स्कन्दपुराण' कहा गया है। उसमें इक्यासी हजार एक सौ श्लोक हैं। जो उक्त पुराण लिखकर सूर्यके मकर राशिपर स्थित रहते समय उसे स्वर्णमय त्रिशूलके साथ दान करता है, वह भगवान् शिवके धाममें जाता है। जिसमें ब्रह्माजीने त्रिविक्रमकी महिमाको लेकर धर्म, अर्थ और कामका वर्णन किया है, वह 'वामनपुराण' कहा गया है। उसकी श्लोकसंख्या दस हजार है और उसमें कूर्मकल्पकी कथा है। जो शरत्कालीन विषुवयोगमें धेनु-सुवर्ण तथा रेशमीवस्त्रसहित उक्त पुराणका दान करता है, वह विष्णुधामको प्राप्त होता है। जिसमें कच्छपरूपधारी श्रीहरिने रसातलमें ऋषियों तथा इन्द्रके समीप इन्द्रद्युम्नके प्रसंगसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका माहात्म्य कहा है, वह लक्ष्मीकल्पके वृत्तान्तसे युक्त सत्रह हजार श्लोकोंका पुराण 'कूर्मपुराण' कहलाता है। जो मनुष्य अयनारम्भके दिन स्वर्णमय कूर्मके साथ कूर्मपुराणका दान करता है, वह एक सहस्र गोदानका फल पाता है। जहाँ कल्पके आदिमें श्रुतियोंकी प्रवृत्तिके लिये मत्स्यरूपधारी भगवान्ने मनुसे नरसिंहकल्पसे लेकर सात कल्पतककी सब बातोंका वर्णन किया है, उसे चौदह हजार श्लोकोंका 'मत्स्यपुराण'
१२१४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
समझना चाहिये। जो विषुवयोगमें सुवर्णमय मत्स्य, धेनु तथा दो रेशमी पीताम्बरसे युक्त मत्स्यपुराण दान करता है, उसके द्वारा मानो सम्पूर्ण पृथ्वीका दान कर दिया गया। जब गरुडकल्प बीत रहा था, उस समयकी ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिकथाका आश्रय लेकर भगवान् विष्णुने गरुडसे जो कुछ कहा है, वह 'गरुडपुराण' कहलाता है। उसकी श्लोक-संख्या भी अठारह हजार है। जो उत्तरायणमें स्वर्णमय हंससहित गरुडपुराण दान करता है, वह मुख्य सिद्धि तथा शिवलोकमें निवास पाता है। ब्रह्माण्डकी महिमाको लेकर ब्रह्माजीने जिस पुराणका वर्णन किया है, जिसमें भविष्य कल्पोंका भी विस्तृत वर्णन सुना जाता है, वह 'ब्रह्माण्डपुराण' है। उसकी श्लोक संख्या बारह हजार दो सौ है। जो मानव व्यतीपात योगमें उस पुराणका दान करता है, वह सहस्र राजसूय यज्ञोंका फल पाता है। ब्राह्मणो! अद्भुत कर्म करनेवाले व्यासजीने इहलोकमें सबका हित करनेके लिये द्वापरमें बृहत्पुराणका संक्षेप करके चार लाख श्लोकोंका पुराण प्रकट किया है।
पद्मपुराणमें जो भगवान् नरसिंहके अवतारका वर्णन हुआ है, उसी प्रसंगको लेकर जो उपपुराण कहा गया है, उसे 'नरसिंहपुराण' कहते हैं। मुनीश्वरो! जहाँ कार्तिकेयजी नन्दीके माहात्म्यका वर्णन करते हैं, वह उपपुराण लोकमें 'नन्दिपुराण' के नामसे विख्यात है। जिसमें साम्बके चरित्रको प्रधानता देकर कथा कही गयी है; वह लोकमें 'साम्बपुराण' कहलाता है। वही आदित्यपुराण भी कहा गया है। अठारह पुराणोंसे पृथक् जो पुराण देखा जाता है, वह उन महापुराणोंसे ही निकला है। मुनीश्वरोंने पुराणोंके पाँच अंग बताये हैं—सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित। जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य तथा रुद्रका माहात्म्य और समस्त विश्वके सृष्टि-संहारका वर्णन देखा जाता है, वह इन पाँच लक्षणोंसे युक्त पुराण है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका भी वर्णन पुराणोंमें किया गया है।
पुराणोंके तीन विभाग हैं—सात्त्विक, राजस और तामस। सात्त्विक पुराणोंमें श्रीहरिके ही माहात्म्य और उनकी आराधनाके फलका अधिक वर्णन है। राजस पुराणोंमें ब्रह्माका ही अधिक माहात्म्य है। इसी प्रकार तामस पुराणोंमें अग्निदेव और रुद्रका विशेष माहात्म्य कहा गया है। जो सात्त्विक, राजस और तामस सभी भावोंसे संकीर्ण (व्याप्त) हैं, उन पुराणोंमें सरस्वती देवी एवं पितरोंकी महिमाका वर्णन है। पुराणोंमेंसे चारके द्वारा भगवान् विष्णुका, दो-दोके द्वारा ब्रह्मा और सूर्यदेवका तथा शेष सभी पुराणोंद्वारा विशेषतः भगवान् शिवका माहात्म्य कहा गया है। पुराणोंमें सब वेद प्रतिष्ठित हैं, इसमें सन्देह नहीं है। जो अंग और उपनिषदोंसहित चारों वेदोंको तो जानता है, किंतु पुराणको नहीं जानता, वह विशिष्ट विद्वान् नहीं है। सत्यवतीनन्दन व्यासने द्वापरके अन्तमें अठारह पुराणोंका निर्माण करके वेदार्थोंसे परिपूर्ण महाभारत उपाख्यानकी रचना की है। उसकी श्लोकसंख्या एक लाख है। वाल्मीकिने जो परम उत्तम श्रीरामोपाख्यानका वर्णन किया है, वह भी बहुत उत्तम है। ब्रह्माजीने जो शतकोटि श्लोकोंद्वारा विस्तृत रामचरितका वर्णन किया है, उसीका यह सार है। पहले ब्रह्माजीने नारदजीको बुलाकर वह चरित्र कहा था, फिर नारदजीने वाल्मीकिजीसे कहा। इस प्रकार चार लाख पुराणके, एक लाख महाभारतके और चौबीस हजार वाल्मीकीय रामायणके—ये सवा पाँच लाख श्लोक अतिशय पुण्यजनक कहे गये हैं।
परम बुद्धिमान् वेदव्यासजीने स्कन्दपुराणके सात खण्ड किये हैं और इक्यासी हजार उसके श्लोक हैं। स्कन्दपुराणका प्रथम खण्ड स्कन्दके माहात्म्यसे परिपूर्ण है। उसका नाम माहेश्वरखण्ड है। दूसरा वैष्णवखण्ड और तीसरा ब्राह्मखण्ड है। यह ब्रह्माजीके द्वारा कहा गया है और सृष्टिकथाको
* प्रभासखण्ड * १२१५
संक्षेपसे सूचित करनेवाला है। चौथे खण्डका नाम काशीखण्ड है। पाँचवाँ खण्ड अवन्ती-माहात्म्यसहित रेवाखण्ड है। छठा खण्ड नागरखण्ड है, जो तीर्थोंकी महिमाको सूचित करनेवाला है। सातवाँ खण्ड यही है, जो प्राभासिक खण्ड माना गया है। स्कन्दपुराणके सभी खण्ड किंचित् न्यूनाधिकताके साथ बारह-बारह हजार हैं।
## शिव-पार्वती-संवाद, तीर्थोंका संक्षिप्त वर्णन तथा प्रभासक्षेत्रकी विशेष महिमा
ऋषि बोले—सूतजी! अब हम तीर्थोंका विस्तृत वर्णन सुनना चाहते हैं।
सूतजीने कहा—प्राचीन कालमें पर्वतश्रेष्ठ कैलासपर देवी पार्वतींने यही बात पूछी थी, वह प्रसंग सुनाता हूँ। एक समयकी बात है, गिरिराजकुमारी उमाने अत्यन्त विस्मित होकर महादेवजीके मुखकी ओर देखा और हाथ जोड़कर मधुर वाणीमें कहा—'जगन्नाथ! महेश्वर! मैंने आपको प्रसन्न करनेकी इच्छासे अनेक जन्मोंतक आपके स्वरूपका अनुसन्धान किया; परंतु आपका कहीं अन्त नहीं मिला। देवदेव! आपका रूप अनन्त है, आपको नमस्कार है। आप वेदके रहस्य तथा वेदवाणीद्वारा प्रशंसित हैं, आपको नमस्कार है। आप सदा श्मशानभूमिमें रमते रहते हैं तथा आकाशमें भी विचरण करते हैं, आपको नमस्कार है।'
भगवान् शिव बोले—देवेश्वरि! मैं तुम्हारा स्रष्टा हूँ और तुम सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करती हो; तुम्हारे तथा मेरे द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् ओतप्रोत है। मैं और तुम दोनों सम्पूर्ण ऐश्वर्यशक्तिसे युक्त होकर सब प्राणियोंके भीतर स्थित हैं। सब ओर प्रतिष्ठित हैं। मैं तुम्हारे साथ खेल करता हूँ। तुम्हीं धृति और धारणाशक्ति हो। तुम्हीं प्रकृति हो। सदा मेरे अंगोंमें निवास करनेवाली हो। अधिक क्या कहूँ, तुम मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो; तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।
देवी बोलीं—जगन्नाथ! मैं धन्य हूँ, पुण्यात्मा हूँ और मैंने उत्तम तपका अनुष्ठान किया है, जिससे आपने मेरी ओर हर्षभरी दृष्टिसे देखा है। देव! इस समय मुझसे सब तीर्थोंका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
भगवान् शिवने कहा—देवेश्वरि! तीर्थोंका दर्शन और उनमें स्नान परम कल्याणकारी है। श्रेष्ठ मुनिगण तीर्थोंके श्रवणकी भी प्रशंसा करते हैं। पृथ्वीपर नैमिष और आकाशमें पुष्करतीर्थ प्रसिद्ध हैं। इनके सिवा केदार, प्रयाग, विपाशा (व्यास), उर्मिला, कृष्णा, वेणा, महादेवी, चन्द्रभागा (चनाव), सरस्वती, गंगासागरसंगम, शुभदायिनी काशीपुरी, महाभागा शतभद्रा, महानदी सिन्धु, गोदावरी, कपिला, महानद शोण, पयोधि, कौशिकी, देवखात, गया, द्वारावती तथा महातीर्थ प्रभास—ये सब पातकोंका नाश करनेवाले हैं। ये सब तीर्थ जो इस पृथ्वीपर मौजूद हैं, उनका दर्शन करके मनुष्यका फिर इस संसारमें जन्म नहीं होता। वायुदेवने कहा है कि 'पृथ्वीपर साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं, वे सभी महापापोंका नाश करनेवाले और परम पवित्र हैं।' महादेवि! स्वधर्मकी वृद्धिके लिये इन सभी तीर्थोंकी यात्रा करनी चाहिये। जहाँ शरीरसे जाना सम्भव न हो, वहाँ मनसे ही जाना चाहिये।
देवी बोलीं—भगवन्! सभी प्राणी सब प्रकारके उपद्रवोंसे ग्रस्त हैं। उनकी आयु थोड़ी है। वे अनेक प्रकारके व्यामोहसे बँधे हुए हैं। त्रेता और द्वापरमें भी ऐसी स्थिति रहती है, फिर भयंकर कलिकालकी
१२१६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
तो बात ही क्या है? अतः उन सबके हितके लिये आप ऐसे किसी तीर्थका वर्णन कीजिये, जिसके दर्शनसे सब तीर्थोंका फल प्राप्त हो।
भगवान् शिवने कहा—देवि! तुम मेरे बाहर विचरनेवाले प्राण हो, तुम्हीं सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिस्थान हो। तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैं सब बातोंका यथावत् वर्णन करूँगा। यह रहस्यका भी रहस्य है। इसको प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये। नास्तिकों तथा पापाचारियोंको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। जिसके भीतर भक्ति हो, ऐसे उत्तम शिष्य एवं श्रद्धालु पुत्रको ही इस रहस्यका उपदेश करना चाहिये। सुव्रते! चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं, यह बात पहले बतायी गयी है। उन सबमें छिपा हुआ श्रेष्ठ तीर्थ प्रभास है। इसे देखकर कलियुगके पापसे मोहित संस्काररहित मनुष्य बड़े उद्वेगको प्राप्त होते हैं। जहाँ-तहाँ कुपित हो उठते हैं। अपने-आपमें बड़प्पनका अभिमान रखनेवाले तथा मिथ्या ज्ञानसे मोहित जो अधम मानव भेद और कपट रखकर तीर्थयात्रा करते हैं, वे तीर्थमें मृत्युको प्राप्त होकर भी सिद्धि नहीं पाते हैं। इसलिये मैंने अनेक तीर्थों और शिवलिंगोंको गुप्त कर रखा है। वे कलियुगमें पापाचारियोंके लिये सिद्धिप्रद नहीं होते। जो क्रोध, लोभ और इन्द्रियोंको जीत चुके हैं, ऐसे दम्भ और मात्सर्यसे रहित, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कोई भी क्यों न हों, यदि सद्भावसे भावित हो उत्तम व्रतका पालन करते हुए तीर्थका सेवन करते हैं, तो उनके हितके लिये मैं त्रिभुवनविख्यात सर्वोत्तम प्रभासक्षेत्रका ही नाम लेता हूँ। जो लोग यम-नियमसे युक्त और अहंकारसे रहित हैं, उनके लिये कहता हूँ—पृथ्वीपर सब तीर्थोंमें उत्तम एकमात्र प्रभासक्षेत्र मुझे विशेष प्रिय है। महादेवि! उस तीर्थमें मैं निरन्तर स्थित रहता हूँ। वहाँ मेरा दिव्य लिंग प्रकट हुआ है, जो दिव्य तेजसे युक्त और अग्निमण्डलसे मण्डित है। संसारकी सृष्टिमें हेतुभूता जो इच्छा, ज्ञान और क्रिया—ये तीन शक्तियाँ हैं, वे मेरे इसी दिव्य लिंगसे प्रकट हुई हैं। यह चराचर जगत् उसीमें लीन होता और उसीसे प्रकट होता है। उस उत्तम क्षेत्रको कोई नहीं जानता है। वरानने! प्रभास क्षेत्रमें जो मेरा स्वरूप है, यह क्षेत्रज्ञ कहा गया है। मैं वहाँ 'सोमनाथ' नामसे प्रसिद्ध हूँ। जो मनुष्य इस क्षेत्रमें मेरे अंशसे प्रकट हुए हैं, उन्हींको मेरे उस लिंगके तत्त्वका ज्ञान है। वह लिंग प्राचीन कालके भैरव-कल्पमें प्रकट हुआ था। दूसरे लोग देवता ही क्यों न हों, उनके लिये उस लिंगका रहस्य दुर्लभ है।
कलियुगमें जो मनुष्य केवल तर्कवादी, महापापी और पाखण्डी होंगे, वे कहेंगे—'यह सब मिथ्या है, मूर्खोंकी कल्पना है, कहाँ तीर्थ है? कहाँ प्रभास है और कहाँ देवता रहते हैं? सब झूठ है, मूर्खोंका मिथ्या प्रलाप है।' इस प्रकार वे नास्तिक, नरकगामी तथा पापदूषित चित्तवाले मूर्ख मानव बातें करेंगे और तीर्थ आदिकी हँसी उड़ायेंगे। अतः उन्हें कभी सिद्धि नहीं प्राप्त होगी। जो मनुष्य शिवजीकी निन्दामें तत्पर रहते हैं, वे तीर्थमें मरें तो भी वे पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेते देखे जाते हैं। क्षेत्रोंको गुप्त रखनेका यही कारण है। देवेश्वरि! युग-युगमें जितने तीर्थ कहे गये हैं, उन सबमें प्रभासक्षेत्र ही मुझे विशेष प्रिय है।
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* प्रभासखण्ड * १२१७
प्रभासतीर्थकी सीमा, क्षेत्रविभाग, महिमा तथा रक्षकगणोंका वर्णन
पार्वतीदेवी बोलीं—महेश्वर! यदि प्रभासक्षेत्र सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ है तो अन्य बहुत तीर्थोंके विस्तारसे क्या लेना है। प्रभासक्षेत्रका ही माहात्म्य बताइये। प्रभासक्षेत्र कौन है? उसकी सीमा क्या है तथा उसका सारतत्त्व क्या है? यह सब आप बतानेकी कृपा करें।
भगवान् शिवने कहा—देवि! समस्त क्षेत्रोंमें प्रभास मुझे अधिक प्रिय है, प्रभासमें उत्तम सिद्धि और परम गति प्राप्त होती है। उसके पूर्वभागमें अन्धकारका नाश करनेवाले स्वामी सूर्यनारायणजी हैं। पश्चिममें माधवजीका स्थान है। दक्षिणमें समुद्र तथा उत्तरमें भवानी हैं। इस प्रकारकी सीमासे युक्त वह क्षेत्र बारह योजनका है। इसीका नाम प्रभासक्षेत्र है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। उसके मध्यमें पाँच योजन विस्तृत पीठिका है, जो न्यंकुमतीसे पश्चिम, वज्रिणीसे पूर्व, माहेश्वरीसे दक्षिण तथा समुद्रसे उत्तरमें स्थित है। उसकी लम्बाई और चौड़ाई मिलाकर पाँच योजनका विस्तार है। यह पीठ कहा गया है। अब इसके गर्भगृहका वर्णन सुनो—दक्षिणसे उत्तरकी ओर वह समुद्रसे कौरवेश्वरीदेवीतक फैला है और पूर्व-पश्चिममें गोमुखसे आश्वमेधिक तीर्थतक उसका विस्तार है। यह गर्भगृह मुझे कैलाससे भी अधिक प्रिय है। इस गर्भगृहकी सीमामें पृथ्वीपर जितने भी तीर्थ, बावलियाँ, कूप, तड़ाग, देवमन्दिर, सरोवर, सरिताएँ, गड्ढे और कुण्ड हैं, वे सभी परम पवित्र तथा सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। इनमें जहाँ कहीं भी स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
इस क्षेत्रका प्रथम भाग माहेश्वर कहा गया है, जो परम पवित्र है। दूसरा वैष्णवभाग और तीसरा ब्रह्मभाग है, ब्रह्मभागमें एक करोड़ तीर्थ हैं। वैष्णवभागमें भी एक कोटि तीर्थ हैं। इन दोनोंके मध्यमें रुद्रभाग (या माहेश्वरभाग) है। इसमें डेढ़ करोड़ तीर्थ हैं। इस प्रकार यह क्षेत्र तीन देवताओंका बताया गया है। यह गोपनीयसे भी गोपनीय तथा मुझे विशेष प्रिय है। सब विभागोंको मिलाकर इस क्षेत्रमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं। इसकी यात्रा भी तीन प्रकारकी है—पहली रौद्री यात्रा, दूसरी वैष्णवी यात्रा और तीसरी ब्राह्मी यात्रा कही गयी है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाली है। ब्राह्म-विभागमें इच्छाशक्ति कही गयी, वैष्णवभागमें क्रियाशक्ति और तीसरे रुद्रभागमें ज्ञानशक्ति बतायी गयी है। पापी, शठ अथवा दूसरोंको हानि पहुँचानेवाला मनुष्य ही क्यों न हो, यदि वह प्रभासक्षेत्रके मध्यभागमें निवास करता है तो सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। हिमवान्, गन्धमादन, कैलास, निषध, परम प्रकाशमय मेरुगिरि, मनोहर त्रिकूट, महागिरि मानसोत्तर, रमणीय देवोद्यान, नन्दनवन तथा स्वर्गलोकके रमणीय तीर्थ और मन्दिर—इन सबको छोड़कर प्रभासमें मेरा मन लगता है। देवि! जो एकाग्रचित्त होकर प्रभासमें संयमपूर्वक निवास करता है, वह तीनों समय भोजन करके भी वायु पीकर रहनेवाले तपस्वीके समान पुण्यफलका भागी होता है। जो विघ्नोंसे आक्रान्त होकर भी प्रभासतीर्थका सेवन नहीं छोड़ता, वह जरा और मृत्युको त्याग देता तथा जन्मके अशाश्वत चक्रसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य प्रभासक्षेत्रमें निश्चयपूर्वक निवास करते हैं, उनको एक ही जन्ममें मोक्ष प्राप्त हो जाता है। जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण प्रभासक्षेत्रमें स्थित हैं, जो मृत्युंजय-मन्त्रके साथ शतरुद्रियका जप करते हैं, उन्हें छः महीनेके भीतर ज्ञान प्राप्त हो जाता है। नामका पर्याय बतानेवाले विद्वान् पुरुष शिव कहते हैं वेदको। शतरुद्र मन्त्र शिवस्वरूप वेदका आत्मा है। जो प्रभासक्षेत्रमें आकर 'ईड्यम्' इत्यादि मन्त्रसे मेरा पूजन करते हैं, वे निःसन्देह मुक्त हो जाते हैं। जो मनुष्य वहाँ समन्त्र या अमन्त्रभावसे रहते हैं, अर्थात् मन्त्र जपे
१२१८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
या न जपें, केवल वहाँ सदा निवास करते हैं, वे भी जिस गतिको पाते हैं, वह बड़े-बड़े दानों और यज्ञोंसे भी नहीं मिलती। इस क्षेत्रमें स्वयम्भू लिंगके रूपमें साक्षात् हम महेश्वर ही निवास करते हैं। प्रभासमें भगवान् सोमनाथके दक्षिणमें करोड़ों रुद्र स्थित हैं। ब्रह्माण्डमें जितने तीर्थ हैं, वे सभी वैशाखकी चतुर्दशीको सोमनाथके समीप जाते हैं। प्रभासक्षेत्रमें निवास करनेवाले पुरुषोंके लिये जो सद्गति बतायी गयी है, वह न तो कुरुक्षेत्रमें है न हरिद्वारमें और न पुष्करमें ही है। देवदेव महादेवजीका वह गुप्त क्षेत्र सात योजन है। वहाँ ब्रह्मा और विष्णु आदि देवता तथा असंख्य योगी सनातन भगवान् मुझ सदाशिवकी उपासना करते हैं। वे सभी मेरे भक्त हैं और मेरी उपासनामें तत्पर रहते हैं। संयमशील संन्यासी आठ मासतक भ्रमण करते हैं और चार मासतक एक जगह प्रभासतीर्थमें नियम ग्रहण करके उन्हें निवास करना चाहिये। एक मनुष्य सोमेश्वर शिवका पूजन करता है और दूसरा तप करता है; उन दोनोंमें वही श्रेष्ठ है, जो सोमनाथकी पूजामें संलग्न है। जो योग, सांख्य, पांचरात्र तथा अन्य शास्त्रोंद्वारा जाननेयोग्य हैं, वे ही शिव प्रभासक्षेत्रमें स्थित हैं। सोमनाथ लिंगमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत् स्थित है, इसलिये उस लिंगमें सदा महादेवका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। मनुष्य मानव-बुद्धिके अनुसार जो कुछ भी अशुभ कर्म कर बैठता है, वह श्रीसोमनाथके पूजनसे विलीन हो जाता है। वेदवादी पुरुष जिन्हें कालाग्निरुद्र कहते हैं, वे ही भैरव नामसे प्रभासतीर्थमें स्थित हैं। मैं ही भैरवरूप धारण करके सब पापोंका नाश करता हूँ। 'अग्निमीळे' इस मन्त्रके द्वारा जिसके प्रभावका वर्णन हुआ है, वही मैं प्रभासक्षेत्रमें 'अग्निमीळ' नाम धारण करता हूँ। इसके सिवा सब देवताओंने वहाँ मेरा नाम 'कालाग्निरुद्र' भी रखा है। मेरा एक नाम 'अग्नीशान' भी है। इस प्रकार तीन नाम बताये जाते हैं। प्रत्येक कल्पमें जो मेरे नाम होते हैं, उनकी गणना नहीं की जा सकती। क्योंकि कल्प और ब्रह्मा असंख्य हैं। इस प्रकार यह सोमेश्वर देवका रहस्य परम गोपनीय है। देवि! तुम्हारे प्रति स्नेह होनेसे और तुम्हारी भक्तिके कारण यह सब मैंने तुमसे कहा है।
पुरुष, स्त्री, बालक, वृद्ध, नपुंसक, चाण्डाल, पुक्कस, शूद्र, म्लेच्छ, मूर्ख तथा अन्य जो निन्दित मनुष्य इस पृथ्वीपर निवास करते हैं, वे सब यदि प्रभासतीर्थमें मृत्युको प्राप्त हों तो मुक्त हो जाते हैं। यहाँ मैंने दक्षिण भागमें विश्वनाथकी और उत्तरमें दण्डपाणिकी स्थापना की है। वे दोनों इस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं। अन्यान्य गणाध्यक्ष भी मेरी आज्ञाके अधीन होकर इस क्षेत्रकी रक्षा करते रहते हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—महारुद्र, चण्डीश, घण्टाकर्ण, गोमुख, विनायक, महानाद, काकवक्त्र, शुभेक्षण, एकाक्ष, दुन्दुभि, चण्ड, तालजंघ, भूमिदण्ड, दण्ड, शंकुकर्ण, वैधृति, तालदण्ड, महातेजा, चिपिटाक्ष, हयानन, हस्तिवक्त्र, श्ववक्त्र, विडालवदन, सिंहमुख, व्याघ्रमुख तथा वीरभद्र। ये सब गणेशजीको आगे रखकर देवदेव शिव तथा इस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं। प्रभासक्षेत्रमें कुल एक अरब, ग्यारह करोड़, तेरह लाख गण निवास करते हैं। वे सभी प्रभासक्षेत्रकी रक्षामें तत्पर रहते हैं। अट्टहास नामक गणाध्यक्ष सौ करोड़ गणोंके साथ पूर्वद्वारमें रहकर इस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं। घण्टाकर्ण नामक गण अन्य अठारह करोड़ गणोंके साथ दक्षिण द्वारपर रहते हैं। विस्वर नामक गण पश्चिम द्वारके रक्षक हैं तथा दण्डपाणि देवदेव सोमेश्वरके उत्तर द्वारपर रहते हैं। ईशानकोणमें भीषणस्य, अग्निकोणमें छागवक्त्र, नैर्ऋत्यकोणमें चण्ड तथा वायव्यकोणमें भैरवानन रक्षा करते हैं। नन्दी, महाकाल, दण्डपाणि और विनायक—ये मध्यभागमें सौ कोटि गणोंके साथ सोमनाथके अंगरक्षक हैं। इस प्रकार असंख्य गणाध्यक्ष उस क्षेत्रकी रक्षामें रहते हैं। कलियुगके पातकोंसे जिनका चित्त दूषित है, उनके लिये मेरा वह
* प्रभासखण्ड * १२१९
स्थान अगम्य है। मेरे लोकमें जो पातालवासी सिद्ध हैं, वे कालभैरव सोमनाथकी प्रदक्षिणा करते हैं। पृथ्वीमें जो पुण्यतीर्थ, मन्दिर और देवता हैं, वे सभी सोमेश्वर देवकी परिक्रमा करते हैं।
शाकुनि, भारभूति, आषाढि, दण्ड, पुष्कर, नैमिष, अमरेश्वर, भैरव, मध्यम, काल, केदार, कणवीरक, अट्टहास, महेन्द्र, श्रीशैल तथा गया आदि सभी तीर्थ भगवान् सोमनाथकी प्रदक्षिणा तथा उनके लिंगकी स्तुति करते हैं। जहाँ प्राची सरस्वती है, वहाँ दस सहस्र अरब तथा तीन करोड़ ऋषि निवास करते हैं। जो मनुष्य यहाँ अपने पापनाशके लिये स्नान करेंगे, उन्हें दस गोदानका पुण्य प्राप्त होगा। वहाँपर शूलभेद आदि लिंग पूजन करने योग्य हैं। महापापाचारी मनुष्य भी प्राची सरस्वतीमें प्राणत्याग करके साक्षात् शिवको प्राप्त होता है। विप्रवरो! वहाँ दही और कम्बल दान करने चाहिये। यह दान सब पापोंका नाश करनेवाला तथा सारसे भी सार पुण्य है। ब्राह्मस्थानमें एक ब्राह्मणको भोजन करानेसे कोटिगुना फल मिलता है। यह जानकर मैं वहाँ प्रसन्नतापूर्वक स्थित रहता हूँ। कलियुगमें वहाँ सभी तीर्थ अदृश्य होकर रहते हैं। मनोहर प्रभासक्षेत्रमें जहाँ सोमनाथजी स्थित हैं, वहाँ मेरे दो गण उद्भ्रम और संभ्रम रहते हैं। वे वहाँ रहनेवाले दुष्ट लोगोंके मनमें भ्रम एवं विभ्रम उत्पन्न कर देते हैं। इस प्रकार वे दुष्ट चित्तवाले प्राणियोंसे उस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं।
जो श्रेष्ठ मानव इस तीर्थमें भक्तिपूर्वक दण्डपाणिका दर्शन करते हैं, उन्हें किसी प्रकारका विघ्न नहीं प्राप्त होता। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा वर्णसंकर इच्छा या अनिच्छासे उस शुभ क्षेत्रके भीतर मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे सभी मेरा सारूप्य प्राप्त करके मेरे दिव्यधाममें चले जाते हैं। मेरु, सातों द्वीप तथा सातों समुद्रोंके गुणोंका वर्णन किया जा सकता है; परंतु आदिदेव सोमेश्वर शिवके गुणोंका वर्णन सौ कोटि वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता है।
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सोमनाथके दिव्य स्वरूपका दिग्दर्शन
महादेवजी कहते हैं—देवि! जो निर्भय, निर्मल, नित्य, निरपेक्ष, निराश्रय, निरंजन, निष्प्रपंच, निःसंग तथा निरुपद्रव तत्त्व है, वही प्रभासतीर्थमें सोमेश्वर लिंगके रूपमें स्थित है—यह समझो। जो मोक्षदायक, अज्ञेय, अनुपम, अनामय, नित्य, कारणरूप, दिव्य, निर्लेप, विश्वतोमुख, शिव, सर्वात्मक, सूक्ष्म, अनादि, दैवतरूप, आत्मस्वरूपसे जाननेयोग्य, चित्तके चिन्तनसे परे, गमनागमनसे मुक्त, बाहर-भीतर व्याप्त, केवल (अद्वितीय), निष्कल, निर्मल एवं ज्ञानका प्रकाशक है, वही प्रभासतीर्थमें प्रणवमय सोमेश्वर लिंगके रूपमें स्थित है—यह जानो। स्पन्दरहित, महात्मा, भावातीत, लक्षणरहित, वाक्प्रपंच आदिसे शून्य, निष्प्रपंच, शिव, ज्ञान और ज्ञेयकी दृष्टिमें स्थित, हेत्वाभासशून्य, अनाहत, शब्दगत तथा शब्दादि गुणोंको प्रकट करनेवाले—ऐसे विशेषणोंसे युक्त मुझ शिवको ही प्रभासक्षेत्रमें सोमनाथ लिंगके रूपमें प्रकट मानो।
प्रभासक्षेत्रमें शिवलिंगरूपी सोमनाथको शब्द-ब्रह्ममय, शान्त, अशान्त, निरास्पद, सबसे दूर, सबके ध्यानमें स्थित, अनादि, अच्युत, दिव्य, प्रमाणातीत, प्रमाणगोचर, अधोगत, ऊर्ध्वगत, नित्य, देहस्थित जीवरूप, हृदय आदि बारह अंगोंमें स्थित, प्राण और अपानके उदय-अस्तमें व्याप्त, अग्राह्य, इन्द्रियरूप, निष्कलंक, सूक्ष्म, स्वरका आदि, व्यंजनसे अतीत, वर्ण आदिसे रहित, निःशब्द, निष्कल, सौम्य, देहातीत, परात्पर, समस्त भूतोंके लिये अगम्य, भावाभावसे रहित,
१२२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
भावभक्तिसे जानने योग्य, परम सूक्ष्म, पचीस तत्त्वोंकी उत्पत्तिका कारण, अप्रमेय, अनन्त, अक्षय, इच्छानुसार रूपधारी, सब प्राणियोंकी उत्पत्तिका कारण, बीज और अंकुरको भी प्रकट करनेवाला, व्यापक, सर्वकाम, अक्षर (नाशरहित), परमपद, स्थूल और सूक्ष्म सभी विभागोंमें स्थित, व्यक्ताव्यक्तस्वरूप, सनातन, कल्प-कल्पान्तरहित, अनादि, अनन्त, महाभूत, महाकाम, शिव तथा निर्वाणभैरव समझो। इतना ही नहीं, उन्हें योगक्रियासे मुक्त, मृत्युंजय, अनादिमान्, समस्त उपसर्गोंसे रहित, सर्वव्यापी, शिव, परम अकल, द्वैतवर्जित, अन्य तेजसे रहित, प्रभासक्षेत्रनिवासी, सूर्यके समान अधिक कान्तिमान्, सम्पूर्ण तेजोंसे अधिक बढ़े हुए, शरणागतवत्सल, ईशान, देव, ॐकार, शिवरूपी, देवदेव, महादेव, पंचमुख, वृषध्वज, निर्मल, मनके अगोचर, भावग्राह्य, उपमारहित, सदा शान्त, विरूपाक्ष, शूलहस्त, जटाधर, हृदयकमलके मध्यकोषमें विराजमान, शून्यरूप तथा निरंजन जानो। जो परात्पर देव 'हंस' और 'नाद' कहे गये हैं, वे ही इस प्रभास-स्थानमें स्वयं विराजमान हैं।
देवि! अपने इस आदिस্বরূপको मैंने योगबलसे जाना है और स्वयं ही इसका निरूपण किया है। ये सोमनाथ पूर्वाह्नकालमें ऋग्वेदमें स्थित होते हैं, मध्याह्नमें यजुर्वेदके भीतर इनकी स्थिति होती है, अपराह्नकालमें सामवेदमें और सन्ध्याके समय अथर्ववेदमें ये विराजमान होते हैं। मैं अन्धकारसे परे, सूर्यके समान प्रकाशमान इस अन्तर्यामी महापुरुष सोमेश्वरको जानता हूँ। इनको ही जानकर मनुष्य कभी मृत्युको नहीं प्राप्त होता (मुक्त हो जाता है)। मनुष्योंकी मुक्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं है। पार्वती! इस प्रकार महामहिमाशाली सोमनाथके माहात्म्यका दिग्दर्शन-मात्र कराया गया है।
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सोमनाथके आठ नाम और पार्वतीके अठारह नामोंका वर्णन, सोमनाथ नामका हेतु तथा सोमेश्वरकी महिमा
सूतजी कहते हैं— महर्षियो! महादेवी पार्वती ने इस प्रकार प्रभासकी महिमा सुनकर पुनः भगवान् शंकरसे पूछा—'देवदेव! जगन्नाथ! भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले! सम्पूर्ण ज्ञानसे सम्पन्न! सुरेश्वर! आपको नमस्कार है। प्रभो! इस दिव्य लिंगका 'सोमेश्वर' नाम किस समय हुआ?'
महादेवजीने कहा— पूर्वकालमें मैं ही स्पर्शलिंग-स्वरूपसे विद्यमान था। उस समय कोई भी मनुष्य यहाँ मुझे नहीं जानता था। जब प्रलयके बाद महाकल्पका प्रारम्भ होता है और ब्रह्माका भी लय होकर नूतन ब्रह्माकी सृष्टि होती है। उस समय मेरे इस दिव्य लिंगका नाम भी बदलकर दूसरा हो जाता है। अबतक छः ब्रह्मा बदल गये हैं और अब ये सातवें ब्रह्मा चल रहे हैं। इस समय जो प्रजापति ब्रह्मा हैं, इनका नाम 'शतानन्द' है। देवेश्वरि! ये ब्रह्मा जब आठ वर्षके हुए, तबसे लेकर मेरे इस लिंगका नाम सोमनाथ प्रसिद्ध हुआ है। बीते हुए कल्पोंमें जो पहले ब्रह्मा थे, उनका नाम 'विरिंचि' था। उनके समयमें इन सोमनाथका नाम 'मृत्युंजय' था। तत्पश्चात् दूसरे कल्पमें जो दूसरे ब्रह्मा हुए, वे 'पद्मभू' नामसे विख्यात हुए। देवि! उनके समयमें मेरे इस लिंगका नाम 'कालाग्निरुद्र' हुआ। तीसरे ब्रह्माकी प्रसिद्धि 'स्वयम्भू' नामसे हुई है। उस समय सोमनाथका नाम 'अमृतेश' था। चौथे ब्रह्मा 'परमेष्ठी' नामसे विख्यात हुए; उस समय उनका नाम 'अनामय' था। पाँचवें ब्रह्मा 'सुरज्येष्ठ' नामसे विख्यात हुए। उस समय
- प्रभासखण्ड * १२२१
सोमेश्वरदेवका नाम 'कृत्तिवास' था। छठे ब्रह्माका नाम 'हेमगर्भ' था। उनके समयमें सोमनाथका नाम 'भैरवनाथ' रखा गया था। ये जो सातवें ब्रह्मा हैं, 'शतानन्द' कहलाते हैं; इस समय मेरे इस लिंगका नाम 'सोमनाथ' प्रसिद्ध हुआ है। इसके बाद आगामी कल्पमें आठवें ब्रह्मा 'चतुर्मुख' नामसे विख्यात होंगे। उस समय सोमेश्वरदेवका नाम 'प्राणनाथ' होगा। इस तरह जो-जो ब्रह्मा बीत जाते हैं और प्रलयके पश्चात् पुनः जो नये ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, उनकी आठ वर्षकी आयु होनेतक 'सोमेश्वरदेवका' एक नाम रहता है। उसके बाद वह बदल जाता है। इस प्रकार संक्षेपमें मैंने तुम्हें 'सोमनाथ' के नाम बताये हैं।
पार्वतीदेवी बोलीं— देवदेवेश्वर! मनुष्योंके ऊपर दया करनेके लिये मैं भी आपके साथ बार-बार प्रकट हुई हूँ। उस समय मेरे कौन-कौन-से नाम हुए हैं, यह भी बताइये।
महादेवजीने कहा— आदिकल्पमें तुम्हारा नाम 'जगन्माता' था। दूसरेमें 'जगद्योनि', तीसरेमें 'शाम्भवी', चौथेमें 'विश्वरूपिणी', पाँचवेंमें 'नन्दिनी', छठेमें 'गणाम्बिका', तथा सातवेंमें तुम्हारा नाम 'विभूति' हुआ है। इसी प्रकार आठवेंमें 'सुभू' नवेंमें 'आनन्दा', दसवेंमें 'वामलोचना', ग्यारहवेंमें 'वरारोहा', बारहवेंमें 'सुमंगला', तेरहवेंमें 'महामाया', चौदहवेंमें 'अनन्ता', पंद्रहवेंमें 'भूतमाता', सोलहवेंमें 'उत्तमा' तथा सत्रहवें कल्पमें तुम्हारा नाम 'पितृकल्पा' प्रसिद्ध हुआ है। तत्पश्चात् तुम दक्षकन्या सतीके नामसे प्रसिद्ध हुई। उस समय दक्षद्वारा अपमानित होनेसे तुमने अपना शरीर त्याग दिया। तदनन्तर वाराहकल्प आनेपर पुनः हिमवान्ने तुम्हारी आराधना करके तुम्हें पुत्रीरूपमें प्राप्त किया। उसके बाद अत्यन्त दुष्कर एवं अद्भुत तपस्या करके तुमने मुझे पतिरूपमें पाया और 'पार्वती' नामसे प्रसिद्ध हुई। सुमुखि! जबतक इस कल्पका अन्त होगा, तबतक मैं तुम्हारे साथ कैलास पर्वतपर क्रीडा करूँगा। द्वापरमें महिषासुरका वध करनेके लिये तुम भगवान् विष्णुके साथ 'कृष्णपिंगला' नामसे प्रकट हुईं। तबसे 'कात्यायनी' और 'दुर्गा' आदि विविध नामोंसे तुम नवकोटि भेदके साथ वसुधातुलपर प्रकट हुईं। सुन्दरि! पूर्वकालमें जो तुम्हारे कल्पानुसार नाम थे तथा जो भूत, भविष्य एवं वर्तमानमें तुम्हारे नाम थे, होंगे और हैं, वे सब नाम मैंने बता दिये। उन्हें इसी प्रकार जानना चाहिये।
शतानन्द नामसे विख्यात जो ये ब्रह्माजी हैं, उनके आठवें वर्षमें जो पहले मनु हुए थे और उस मन्वन्तरमें जो प्रथम चन्द्रमा थे, वे लक्ष्मी और कौस्तुभमणि आदिके साथ समुद्रसे प्रकट हुए। उन्होंने कालभैरव नामसे इस सोमेश्वर लिंगकी आराधना की और बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न हो चौदह युग व्यतीत किये। सुन्दरि! उनकी वह अद्भुत तपस्या देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ और बोला—'चन्द्रदेव! वर माँगो।' शुभे! तब उन्होंने अपने भक्तिभावसे मुझे संतुष्ट करके कहा—'प्रभो! ये ब्रह्माजी जबतक रहें, तबतक आपका नाम 'सोमनाथ' के रूपमें प्रसिद्ध हो।' मन्वन्तर समाप्त होनेपर जो कोई भी दूसरे-दूसरे चन्द्रमा हों, उन सबके ये सोमनाथजी कुलदेवता हों। तब मैं 'तथास्तु' कहकर पुनः उस शिवलिंगमें ही लीन हो गया। यह मैंने सोमनाथके गुणोंको संक्षेपसे सूचित किया है। समुद्रके रत्नोंकी भाँति सोमेश्वरके गुणोंका विस्तार अचिन्त्य है। उनकी महिमाका चिन्तन भक्तोंकी बुद्धिको बढ़ानेवाला है। मदमोहित मूढ़ मानव उनके स्वरूपको नहीं देख पाते।
पार्वतीदेवीने पूछा— भगवन्! जिस तेजोमय लिंगका ऐसा माहात्म्य है, उसकी इस प्रभास-क्षेत्रमें कहाँ स्थिति है?
महादेवजीने कहा— देवि! सुनो—वज्रिणी नदीके पूर्व न्यंकुमती नदीतक चार योजन चौड़ा और पाँच योजन लम्बा मेरा गर्भगृह है; इसको मैं कभी नहीं छोड़ता। पश्चिम दिशामें समुद्रके