भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1247

१२१८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

या न जपें, केवल वहाँ सदा निवास करते हैं, वे भी जिस गतिको पाते हैं, वह बड़े-बड़े दानों और यज्ञोंसे भी नहीं मिलती। इस क्षेत्रमें स्वयम्भू लिंगके रूपमें साक्षात् हम महेश्वर ही निवास करते हैं। प्रभासमें भगवान् सोमनाथके दक्षिणमें करोड़ों रुद्र स्थित हैं। ब्रह्माण्डमें जितने तीर्थ हैं, वे सभी वैशाखकी चतुर्दशीको सोमनाथके समीप जाते हैं। प्रभासक्षेत्रमें निवास करनेवाले पुरुषोंके लिये जो सद्गति बतायी गयी है, वह न तो कुरुक्षेत्रमें है न हरिद्वारमें और न पुष्करमें ही है। देवदेव महादेवजीका वह गुप्त क्षेत्र सात योजन है। वहाँ ब्रह्मा और विष्णु आदि देवता तथा असंख्य योगी सनातन भगवान् मुझ सदाशिवकी उपासना करते हैं। वे सभी मेरे भक्त हैं और मेरी उपासनामें तत्पर रहते हैं। संयमशील संन्यासी आठ मासतक भ्रमण करते हैं और चार मासतक एक जगह प्रभासतीर्थमें नियम ग्रहण करके उन्हें निवास करना चाहिये। एक मनुष्य सोमेश्वर शिवका पूजन करता है और दूसरा तप करता है; उन दोनोंमें वही श्रेष्ठ है, जो सोमनाथकी पूजामें संलग्न है। जो योग, सांख्य, पांचरात्र तथा अन्य शास्त्रोंद्वारा जाननेयोग्य हैं, वे ही शिव प्रभासक्षेत्रमें स्थित हैं। सोमनाथ लिंगमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत् स्थित है, इसलिये उस लिंगमें सदा महादेवका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। मनुष्य मानव-बुद्धिके अनुसार जो कुछ भी अशुभ कर्म कर बैठता है, वह श्रीसोमनाथके पूजनसे विलीन हो जाता है। वेदवादी पुरुष जिन्हें कालाग्निरुद्र कहते हैं, वे ही भैरव नामसे प्रभासतीर्थमें स्थित हैं। मैं ही भैरवरूप धारण करके सब पापोंका नाश करता हूँ। 'अग्निमीळे' इस मन्त्रके द्वारा जिसके प्रभावका वर्णन हुआ है, वही मैं प्रभासक्षेत्रमें 'अग्निमीळ' नाम धारण करता हूँ। इसके सिवा सब देवताओंने वहाँ मेरा नाम 'कालाग्निरुद्र' भी रखा है। मेरा एक नाम 'अग्नीशान' भी है। इस प्रकार तीन नाम बताये जाते हैं। प्रत्येक कल्पमें जो मेरे नाम होते हैं, उनकी गणना नहीं की जा सकती। क्योंकि कल्प और ब्रह्मा असंख्य हैं। इस प्रकार यह सोमेश्वर देवका रहस्य परम गोपनीय है। देवि! तुम्हारे प्रति स्नेह होनेसे और तुम्हारी भक्तिके कारण यह सब मैंने तुमसे कहा है।

पुरुष, स्त्री, बालक, वृद्ध, नपुंसक, चाण्डाल, पुक्कस, शूद्र, म्लेच्छ, मूर्ख तथा अन्य जो निन्दित मनुष्य इस पृथ्वीपर निवास करते हैं, वे सब यदि प्रभासतीर्थमें मृत्युको प्राप्त हों तो मुक्त हो जाते हैं। यहाँ मैंने दक्षिण भागमें विश्वनाथकी और उत्तरमें दण्डपाणिकी स्थापना की है। वे दोनों इस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं। अन्यान्य गणाध्यक्ष भी मेरी आज्ञाके अधीन होकर इस क्षेत्रकी रक्षा करते रहते हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—महारुद्र, चण्डीश, घण्टाकर्ण, गोमुख, विनायक, महानाद, काकवक्त्र, शुभेक्षण, एकाक्ष, दुन्दुभि, चण्ड, तालजंघ, भूमिदण्ड, दण्ड, शंकुकर्ण, वैधृति, तालदण्ड, महातेजा, चिपिटाक्ष, हयानन, हस्तिवक्त्र, श्ववक्त्र, विडालवदन, सिंहमुख, व्याघ्रमुख तथा वीरभद्र। ये सब गणेशजीको आगे रखकर देवदेव शिव तथा इस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं। प्रभासक्षेत्रमें कुल एक अरब, ग्यारह करोड़, तेरह लाख गण निवास करते हैं। वे सभी प्रभासक्षेत्रकी रक्षामें तत्पर रहते हैं। अट्टहास नामक गणाध्यक्ष सौ करोड़ गणोंके साथ पूर्वद्वारमें रहकर इस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं। घण्टाकर्ण नामक गण अन्य अठारह करोड़ गणोंके साथ दक्षिण द्वारपर रहते हैं। विस्वर नामक गण पश्चिम द्वारके रक्षक हैं तथा दण्डपाणि देवदेव सोमेश्वरके उत्तर द्वारपर रहते हैं। ईशानकोणमें भीषणस्य, अग्निकोणमें छागवक्त्र, नैर्ऋत्यकोणमें चण्ड तथा वायव्यकोणमें भैरवानन रक्षा करते हैं। नन्दी, महाकाल, दण्डपाणि और विनायक—ये मध्यभागमें सौ कोटि गणोंके साथ सोमनाथके अंगरक्षक हैं। इस प्रकार असंख्य गणाध्यक्ष उस क्षेत्रकी रक्षामें रहते हैं। कलियुगके पातकोंसे जिनका चित्त दूषित है, उनके लिये मेरा वह