संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* प्रभासखण्ड * १२१७
प्रभासतीर्थकी सीमा, क्षेत्रविभाग, महिमा तथा रक्षकगणोंका वर्णन
पार्वतीदेवी बोलीं—महेश्वर! यदि प्रभासक्षेत्र सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ है तो अन्य बहुत तीर्थोंके विस्तारसे क्या लेना है। प्रभासक्षेत्रका ही माहात्म्य बताइये। प्रभासक्षेत्र कौन है? उसकी सीमा क्या है तथा उसका सारतत्त्व क्या है? यह सब आप बतानेकी कृपा करें।
भगवान् शिवने कहा—देवि! समस्त क्षेत्रोंमें प्रभास मुझे अधिक प्रिय है, प्रभासमें उत्तम सिद्धि और परम गति प्राप्त होती है। उसके पूर्वभागमें अन्धकारका नाश करनेवाले स्वामी सूर्यनारायणजी हैं। पश्चिममें माधवजीका स्थान है। दक्षिणमें समुद्र तथा उत्तरमें भवानी हैं। इस प्रकारकी सीमासे युक्त वह क्षेत्र बारह योजनका है। इसीका नाम प्रभासक्षेत्र है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। उसके मध्यमें पाँच योजन विस्तृत पीठिका है, जो न्यंकुमतीसे पश्चिम, वज्रिणीसे पूर्व, माहेश्वरीसे दक्षिण तथा समुद्रसे उत्तरमें स्थित है। उसकी लम्बाई और चौड़ाई मिलाकर पाँच योजनका विस्तार है। यह पीठ कहा गया है। अब इसके गर्भगृहका वर्णन सुनो—दक्षिणसे उत्तरकी ओर वह समुद्रसे कौरवेश्वरीदेवीतक फैला है और पूर्व-पश्चिममें गोमुखसे आश्वमेधिक तीर्थतक उसका विस्तार है। यह गर्भगृह मुझे कैलाससे भी अधिक प्रिय है। इस गर्भगृहकी सीमामें पृथ्वीपर जितने भी तीर्थ, बावलियाँ, कूप, तड़ाग, देवमन्दिर, सरोवर, सरिताएँ, गड्ढे और कुण्ड हैं, वे सभी परम पवित्र तथा सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। इनमें जहाँ कहीं भी स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
इस क्षेत्रका प्रथम भाग माहेश्वर कहा गया है, जो परम पवित्र है। दूसरा वैष्णवभाग और तीसरा ब्रह्मभाग है, ब्रह्मभागमें एक करोड़ तीर्थ हैं। वैष्णवभागमें भी एक कोटि तीर्थ हैं। इन दोनोंके मध्यमें रुद्रभाग (या माहेश्वरभाग) है। इसमें डेढ़ करोड़ तीर्थ हैं। इस प्रकार यह क्षेत्र तीन देवताओंका बताया गया है। यह गोपनीयसे भी गोपनीय तथा मुझे विशेष प्रिय है। सब विभागोंको मिलाकर इस क्षेत्रमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं। इसकी यात्रा भी तीन प्रकारकी है—पहली रौद्री यात्रा, दूसरी वैष्णवी यात्रा और तीसरी ब्राह्मी यात्रा कही गयी है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाली है। ब्राह्म-विभागमें इच्छाशक्ति कही गयी, वैष्णवभागमें क्रियाशक्ति और तीसरे रुद्रभागमें ज्ञानशक्ति बतायी गयी है। पापी, शठ अथवा दूसरोंको हानि पहुँचानेवाला मनुष्य ही क्यों न हो, यदि वह प्रभासक्षेत्रके मध्यभागमें निवास करता है तो सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। हिमवान्, गन्धमादन, कैलास, निषध, परम प्रकाशमय मेरुगिरि, मनोहर त्रिकूट, महागिरि मानसोत्तर, रमणीय देवोद्यान, नन्दनवन तथा स्वर्गलोकके रमणीय तीर्थ और मन्दिर—इन सबको छोड़कर प्रभासमें मेरा मन लगता है। देवि! जो एकाग्रचित्त होकर प्रभासमें संयमपूर्वक निवास करता है, वह तीनों समय भोजन करके भी वायु पीकर रहनेवाले तपस्वीके समान पुण्यफलका भागी होता है। जो विघ्नोंसे आक्रान्त होकर भी प्रभासतीर्थका सेवन नहीं छोड़ता, वह जरा और मृत्युको त्याग देता तथा जन्मके अशाश्वत चक्रसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य प्रभासक्षेत्रमें निश्चयपूर्वक निवास करते हैं, उनको एक ही जन्ममें मोक्ष प्राप्त हो जाता है। जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण प्रभासक्षेत्रमें स्थित हैं, जो मृत्युंजय-मन्त्रके साथ शतरुद्रियका जप करते हैं, उन्हें छः महीनेके भीतर ज्ञान प्राप्त हो जाता है। नामका पर्याय बतानेवाले विद्वान् पुरुष शिव कहते हैं वेदको। शतरुद्र मन्त्र शिवस्वरूप वेदका आत्मा है। जो प्रभासक्षेत्रमें आकर 'ईड्यम्' इत्यादि मन्त्रसे मेरा पूजन करते हैं, वे निःसन्देह मुक्त हो जाते हैं। जो मनुष्य वहाँ समन्त्र या अमन्त्रभावसे रहते हैं, अर्थात् मन्त्र जपे