संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तो बात ही क्या है? अतः उन सबके हितके लिये आप ऐसे किसी तीर्थका वर्णन कीजिये, जिसके दर्शनसे सब तीर्थोंका फल प्राप्त हो।
भगवान् शिवने कहा—देवि! तुम मेरे बाहर विचरनेवाले प्राण हो, तुम्हीं सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिस्थान हो। तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैं सब बातोंका यथावत् वर्णन करूँगा। यह रहस्यका भी रहस्य है। इसको प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये। नास्तिकों तथा पापाचारियोंको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। जिसके भीतर भक्ति हो, ऐसे उत्तम शिष्य एवं श्रद्धालु पुत्रको ही इस रहस्यका उपदेश करना चाहिये। सुव्रते! चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं, यह बात पहले बतायी गयी है। उन सबमें छिपा हुआ श्रेष्ठ तीर्थ प्रभास है। इसे देखकर कलियुगके पापसे मोहित संस्काररहित मनुष्य बड़े उद्वेगको प्राप्त होते हैं। जहाँ-तहाँ कुपित हो उठते हैं। अपने-आपमें बड़प्पनका अभिमान रखनेवाले तथा मिथ्या ज्ञानसे मोहित जो अधम मानव भेद और कपट रखकर तीर्थयात्रा करते हैं, वे तीर्थमें मृत्युको प्राप्त होकर भी सिद्धि नहीं पाते हैं। इसलिये मैंने अनेक तीर्थों और शिवलिंगोंको गुप्त कर रखा है। वे कलियुगमें पापाचारियोंके लिये सिद्धिप्रद नहीं होते। जो क्रोध, लोभ और इन्द्रियोंको जीत चुके हैं, ऐसे दम्भ और मात्सर्यसे रहित, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कोई भी क्यों न हों, यदि सद्भावसे भावित हो उत्तम व्रतका पालन करते हुए तीर्थका सेवन करते हैं, तो उनके हितके लिये मैं त्रिभुवनविख्यात सर्वोत्तम प्रभासक्षेत्रका ही नाम लेता हूँ। जो लोग यम-नियमसे युक्त और अहंकारसे रहित हैं, उनके लिये कहता हूँ—पृथ्वीपर सब तीर्थोंमें उत्तम एकमात्र प्रभासक्षेत्र मुझे विशेष प्रिय है। महादेवि! उस तीर्थमें मैं निरन्तर स्थित रहता हूँ। वहाँ मेरा दिव्य लिंग प्रकट हुआ है, जो दिव्य तेजसे युक्त और अग्निमण्डलसे मण्डित है। संसारकी सृष्टिमें हेतुभूता जो इच्छा, ज्ञान और क्रिया—ये तीन शक्तियाँ हैं, वे मेरे इसी दिव्य लिंगसे प्रकट हुई हैं। यह चराचर जगत् उसीमें लीन होता और उसीसे प्रकट होता है। उस उत्तम क्षेत्रको कोई नहीं जानता है। वरानने! प्रभास क्षेत्रमें जो मेरा स्वरूप है, यह क्षेत्रज्ञ कहा गया है। मैं वहाँ 'सोमनाथ' नामसे प्रसिद्ध हूँ। जो मनुष्य इस क्षेत्रमें मेरे अंशसे प्रकट हुए हैं, उन्हींको मेरे उस लिंगके तत्त्वका ज्ञान है। वह लिंग प्राचीन कालके भैरव-कल्पमें प्रकट हुआ था। दूसरे लोग देवता ही क्यों न हों, उनके लिये उस लिंगका रहस्य दुर्लभ है।
कलियुगमें जो मनुष्य केवल तर्कवादी, महापापी और पाखण्डी होंगे, वे कहेंगे—'यह सब मिथ्या है, मूर्खोंकी कल्पना है, कहाँ तीर्थ है? कहाँ प्रभास है और कहाँ देवता रहते हैं? सब झूठ है, मूर्खोंका मिथ्या प्रलाप है।' इस प्रकार वे नास्तिक, नरकगामी तथा पापदूषित चित्तवाले मूर्ख मानव बातें करेंगे और तीर्थ आदिकी हँसी उड़ायेंगे। अतः उन्हें कभी सिद्धि नहीं प्राप्त होगी। जो मनुष्य शिवजीकी निन्दामें तत्पर रहते हैं, वे तीर्थमें मरें तो भी वे पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेते देखे जाते हैं। क्षेत्रोंको गुप्त रखनेका यही कारण है। देवेश्वरि! युग-युगमें जितने तीर्थ कहे गये हैं, उन सबमें प्रभासक्षेत्र ही मुझे विशेष प्रिय है।
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