संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* प्रभासखण्ड * १२१५
संक्षेपसे सूचित करनेवाला है। चौथे खण्डका नाम काशीखण्ड है। पाँचवाँ खण्ड अवन्ती-माहात्म्यसहित रेवाखण्ड है। छठा खण्ड नागरखण्ड है, जो तीर्थोंकी महिमाको सूचित करनेवाला है। सातवाँ खण्ड यही है, जो प्राभासिक खण्ड माना गया है। स्कन्दपुराणके सभी खण्ड किंचित् न्यूनाधिकताके साथ बारह-बारह हजार हैं।
## शिव-पार्वती-संवाद, तीर्थोंका संक्षिप्त वर्णन तथा प्रभासक्षेत्रकी विशेष महिमा
ऋषि बोले—सूतजी! अब हम तीर्थोंका विस्तृत वर्णन सुनना चाहते हैं।
सूतजीने कहा—प्राचीन कालमें पर्वतश्रेष्ठ कैलासपर देवी पार्वतींने यही बात पूछी थी, वह प्रसंग सुनाता हूँ। एक समयकी बात है, गिरिराजकुमारी उमाने अत्यन्त विस्मित होकर महादेवजीके मुखकी ओर देखा और हाथ जोड़कर मधुर वाणीमें कहा—'जगन्नाथ! महेश्वर! मैंने आपको प्रसन्न करनेकी इच्छासे अनेक जन्मोंतक आपके स्वरूपका अनुसन्धान किया; परंतु आपका कहीं अन्त नहीं मिला। देवदेव! आपका रूप अनन्त है, आपको नमस्कार है। आप वेदके रहस्य तथा वेदवाणीद्वारा प्रशंसित हैं, आपको नमस्कार है। आप सदा श्मशानभूमिमें रमते रहते हैं तथा आकाशमें भी विचरण करते हैं, आपको नमस्कार है।'
भगवान् शिव बोले—देवेश्वरि! मैं तुम्हारा स्रष्टा हूँ और तुम सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करती हो; तुम्हारे तथा मेरे द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् ओतप्रोत है। मैं और तुम दोनों सम्पूर्ण ऐश्वर्यशक्तिसे युक्त होकर सब प्राणियोंके भीतर स्थित हैं। सब ओर प्रतिष्ठित हैं। मैं तुम्हारे साथ खेल करता हूँ। तुम्हीं धृति और धारणाशक्ति हो। तुम्हीं प्रकृति हो। सदा मेरे अंगोंमें निवास करनेवाली हो। अधिक क्या कहूँ, तुम मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो; तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।
देवी बोलीं—जगन्नाथ! मैं धन्य हूँ, पुण्यात्मा हूँ और मैंने उत्तम तपका अनुष्ठान किया है, जिससे आपने मेरी ओर हर्षभरी दृष्टिसे देखा है। देव! इस समय मुझसे सब तीर्थोंका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
भगवान् शिवने कहा—देवेश्वरि! तीर्थोंका दर्शन और उनमें स्नान परम कल्याणकारी है। श्रेष्ठ मुनिगण तीर्थोंके श्रवणकी भी प्रशंसा करते हैं। पृथ्वीपर नैमिष और आकाशमें पुष्करतीर्थ प्रसिद्ध हैं। इनके सिवा केदार, प्रयाग, विपाशा (व्यास), उर्मिला, कृष्णा, वेणा, महादेवी, चन्द्रभागा (चनाव), सरस्वती, गंगासागरसंगम, शुभदायिनी काशीपुरी, महाभागा शतभद्रा, महानदी सिन्धु, गोदावरी, कपिला, महानद शोण, पयोधि, कौशिकी, देवखात, गया, द्वारावती तथा महातीर्थ प्रभास—ये सब पातकोंका नाश करनेवाले हैं। ये सब तीर्थ जो इस पृथ्वीपर मौजूद हैं, उनका दर्शन करके मनुष्यका फिर इस संसारमें जन्म नहीं होता। वायुदेवने कहा है कि 'पृथ्वीपर साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं, वे सभी महापापोंका नाश करनेवाले और परम पवित्र हैं।' महादेवि! स्वधर्मकी वृद्धिके लिये इन सभी तीर्थोंकी यात्रा करनी चाहिये। जहाँ शरीरसे जाना सम्भव न हो, वहाँ मनसे ही जाना चाहिये।
देवी बोलीं—भगवन्! सभी प्राणी सब प्रकारके उपद्रवोंसे ग्रस्त हैं। उनकी आयु थोड़ी है। वे अनेक प्रकारके व्यामोहसे बँधे हुए हैं। त्रेता और द्वापरमें भी ऐसी स्थिति रहती है, फिर भयंकर कलिकालकी