संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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समझना चाहिये। जो विषुवयोगमें सुवर्णमय मत्स्य, धेनु तथा दो रेशमी पीताम्बरसे युक्त मत्स्यपुराण दान करता है, उसके द्वारा मानो सम्पूर्ण पृथ्वीका दान कर दिया गया। जब गरुडकल्प बीत रहा था, उस समयकी ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिकथाका आश्रय लेकर भगवान् विष्णुने गरुडसे जो कुछ कहा है, वह 'गरुडपुराण' कहलाता है। उसकी श्लोक-संख्या भी अठारह हजार है। जो उत्तरायणमें स्वर्णमय हंससहित गरुडपुराण दान करता है, वह मुख्य सिद्धि तथा शिवलोकमें निवास पाता है। ब्रह्माण्डकी महिमाको लेकर ब्रह्माजीने जिस पुराणका वर्णन किया है, जिसमें भविष्य कल्पोंका भी विस्तृत वर्णन सुना जाता है, वह 'ब्रह्माण्डपुराण' है। उसकी श्लोक संख्या बारह हजार दो सौ है। जो मानव व्यतीपात योगमें उस पुराणका दान करता है, वह सहस्र राजसूय यज्ञोंका फल पाता है। ब्राह्मणो! अद्भुत कर्म करनेवाले व्यासजीने इहलोकमें सबका हित करनेके लिये द्वापरमें बृहत्पुराणका संक्षेप करके चार लाख श्लोकोंका पुराण प्रकट किया है।
पद्मपुराणमें जो भगवान् नरसिंहके अवतारका वर्णन हुआ है, उसी प्रसंगको लेकर जो उपपुराण कहा गया है, उसे 'नरसिंहपुराण' कहते हैं। मुनीश्वरो! जहाँ कार्तिकेयजी नन्दीके माहात्म्यका वर्णन करते हैं, वह उपपुराण लोकमें 'नन्दिपुराण' के नामसे विख्यात है। जिसमें साम्बके चरित्रको प्रधानता देकर कथा कही गयी है; वह लोकमें 'साम्बपुराण' कहलाता है। वही आदित्यपुराण भी कहा गया है। अठारह पुराणोंसे पृथक् जो पुराण देखा जाता है, वह उन महापुराणोंसे ही निकला है। मुनीश्वरोंने पुराणोंके पाँच अंग बताये हैं—सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित। जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य तथा रुद्रका माहात्म्य और समस्त विश्वके सृष्टि-संहारका वर्णन देखा जाता है, वह इन पाँच लक्षणोंसे युक्त पुराण है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका भी वर्णन पुराणोंमें किया गया है।
पुराणोंके तीन विभाग हैं—सात्त्विक, राजस और तामस। सात्त्विक पुराणोंमें श्रीहरिके ही माहात्म्य और उनकी आराधनाके फलका अधिक वर्णन है। राजस पुराणोंमें ब्रह्माका ही अधिक माहात्म्य है। इसी प्रकार तामस पुराणोंमें अग्निदेव और रुद्रका विशेष माहात्म्य कहा गया है। जो सात्त्विक, राजस और तामस सभी भावोंसे संकीर्ण (व्याप्त) हैं, उन पुराणोंमें सरस्वती देवी एवं पितरोंकी महिमाका वर्णन है। पुराणोंमेंसे चारके द्वारा भगवान् विष्णुका, दो-दोके द्वारा ब्रह्मा और सूर्यदेवका तथा शेष सभी पुराणोंद्वारा विशेषतः भगवान् शिवका माहात्म्य कहा गया है। पुराणोंमें सब वेद प्रतिष्ठित हैं, इसमें सन्देह नहीं है। जो अंग और उपनिषदोंसहित चारों वेदोंको तो जानता है, किंतु पुराणको नहीं जानता, वह विशिष्ट विद्वान् नहीं है। सत्यवतीनन्दन व्यासने द्वापरके अन्तमें अठारह पुराणोंका निर्माण करके वेदार्थोंसे परिपूर्ण महाभारत उपाख्यानकी रचना की है। उसकी श्लोकसंख्या एक लाख है। वाल्मीकिने जो परम उत्तम श्रीरामोपाख्यानका वर्णन किया है, वह भी बहुत उत्तम है। ब्रह्माजीने जो शतकोटि श्लोकोंद्वारा विस्तृत रामचरितका वर्णन किया है, उसीका यह सार है। पहले ब्रह्माजीने नारदजीको बुलाकर वह चरित्र कहा था, फिर नारदजीने वाल्मीकिजीसे कहा। इस प्रकार चार लाख पुराणके, एक लाख महाभारतके और चौबीस हजार वाल्मीकीय रामायणके—ये सवा पाँच लाख श्लोक अतिशय पुण्यजनक कहे गये हैं।
परम बुद्धिमान् वेदव्यासजीने स्कन्दपुराणके सात खण्ड किये हैं और इक्यासी हजार उसके श्लोक हैं। स्कन्दपुराणका प्रथम खण्ड स्कन्दके माहात्म्यसे परिपूर्ण है। उसका नाम माहेश्वरखण्ड है। दूसरा वैष्णवखण्ड और तीसरा ब्राह्मखण्ड है। यह ब्रह्माजीके द्वारा कहा गया है और सृष्टिकथाको