संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1242, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * १२१३
साथ दान करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। भागवतपुराण अठारह हजार श्लोकोंका बताया गया है। जिसमें बृहत्कल्पकी कथाका आश्रय लेकर नारदजीने धर्मोंका वर्णन किया है, वह 'नारदीयपुराण' है। उसकी श्लोकसंख्या पचीस हजार है। जो आश्विनकी पूर्णिमाको धेनुसहित उस पुराणका दान करता है, वह पुनरावृत्तिरहित उत्तम सिद्धिको प्राप्त होता है। जिसमें पक्षियोंके प्रसंगको लेकर धर्माधर्मका विचार किया गया है, वह 'मार्कण्डेयपुराण' कहलाता है। उसकी श्लोकसंख्या नौ हजार है। जो उसे लिखकर सुवर्णमय हाथीके साथ कार्तिककी पूर्णिमाको दान देता है, वह पुण्डरीक यज्ञके फलका भागी होता है। जहाँ ईशानकल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर अग्निदेवने वसिष्ठको उपदेश दिया है, उसे 'आग्नेयपुराण' कहते हैं। उसकी श्लोकसंख्या सोलह हजार है। जो उसे लिखकर मार्गशीर्षमासमें स्वर्णमय कमलके साथ तिलधेनुसहित दान करता है, उसे सब यज्ञोंका फल मिलता है। जिसमें लोकनाथ ब्रह्माजीने अघोरकल्पके वृत्तान्तके प्रसंगसे सूर्यकी महिमाका आश्रय ले मनुसे जीवसमुदायका लक्षण बताया है; प्रायः भविष्य चरित्रके वर्णनसे युक्त वह पुराण 'भविष्यपुराण' कहलाता है। उसकी श्लोकसंख्या साढ़े चौदह हजार है। जो पौषमासकी पूर्णिमाको द्वेषरहित हो गुड़ और घटसहित उक्त पुराणका दान करता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है। जिसमें रथन्तरकल्पके वृत्तान्तको लेकर नारदजीसे श्रीकृष्ण-माहात्म्यसहित ब्रह्मवाराह-चरित्रका वर्णन किया जाता है, वह अठारह हजार श्लोकोंका पुराण 'ब्रह्मवैवर्त' कहा गया है। जो मनुष्य माघमासकी पूर्णिमाको परम पवित्र ब्रह्मवैवर्तका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है। जिसमें अग्निकल्पके वृत्तान्तको लेकर लिंगमें स्थित देवदेव महेश्वरने अग्निसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका वर्णन किया है, वह 'लिंगपुराण' कहा गया है। उसकी श्लोकसंख्या ग्यारह हजार है। जो फाल्गुनकी पूर्णिमाको तिलधेनुके साथ ब्राह्मणको उस पुराणका दान करता है, वह भगवान् शिवके सारूप्यको प्राप्त होता है।
जिसमें महावाराहके माहात्म्यको लेकर भगवान् विष्णुने पृथ्वीसे कथा कही है, वह चौबीस हजार श्लोकोंका पुराण 'वाराहपुराण' कहलाता है। जो चैत्रकी पूर्णिमाको सोनेके गरुड और तिलकी धेनुसहित वह पुराण कुटुम्बी ब्राह्मणको देता है, वह भगवान् वाराहके प्रसादसे वैष्णवपदको प्राप्त होता है। जिसमें माहेश्वर धर्मोंका आश्रय लेकर तत्पुरुष कल्पके वृत्तान्त एवं चरित्रोंके साथ कथावस्तुका वर्णन स्कन्दजीके प्रति (अथवा स्कन्दजीके द्वारा) किया गया है, वह 'स्कन्दपुराण' कहा गया है। उसमें इक्यासी हजार एक सौ श्लोक हैं। जो उक्त पुराण लिखकर सूर्यके मकर राशिपर स्थित रहते समय उसे स्वर्णमय त्रिशूलके साथ दान करता है, वह भगवान् शिवके धाममें जाता है। जिसमें ब्रह्माजीने त्रिविक्रमकी महिमाको लेकर धर्म, अर्थ और कामका वर्णन किया है, वह 'वामनपुराण' कहा गया है। उसकी श्लोकसंख्या दस हजार है और उसमें कूर्मकल्पकी कथा है। जो शरत्कालीन विषुवयोगमें धेनु-सुवर्ण तथा रेशमीवस्त्रसहित उक्त पुराणका दान करता है, वह विष्णुधामको प्राप्त होता है। जिसमें कच्छपरूपधारी श्रीहरिने रसातलमें ऋषियों तथा इन्द्रके समीप इन्द्रद्युम्नके प्रसंगसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका माहात्म्य कहा है, वह लक्ष्मीकल्पके वृत्तान्तसे युक्त सत्रह हजार श्लोकोंका पुराण 'कूर्मपुराण' कहलाता है। जो मनुष्य अयनारम्भके दिन स्वर्णमय कूर्मके साथ कूर्मपुराणका दान करता है, वह एक सहस्र गोदानका फल पाता है। जहाँ कल्पके आदिमें श्रुतियोंकी प्रवृत्तिके लिये मत्स्यरूपधारी भगवान्ने मनुसे नरसिंहकल्पसे लेकर सात कल्पतककी सब बातोंका वर्णन किया है, उसे चौदह हजार श्लोकोंका 'मत्स्यपुराण'