भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1241, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1241

१२१२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

४ भागवतपुराण, ५ भविष्यपुराण, ६ नारदीयपुराण, ७ मार्कण्डेयपुराण, ८ आग्नेय पुराण, ९ ब्रह्मवैवर्तपुराण, १० लिंगपुराण, ११पद्मपुराण, १२ वाराहपुराण, १३ स्कन्दपुराण, १४ वामनपुराण, १५ कूर्मपुराण, १६ मत्स्यपुराण, १७ गरुड़पुराण तथा १८ वायुपुराणका प्राकट्य हुआ। इन अठारह पुराणोंका नामोच्चारण सब पातकोंका नाश करनेवाला है।

इसके सिवा मुनियोंने अठारह उपपुराण भी बताये हैं— १ सनत्कुमार, २ नरसिंह, ३ स्कन्द, ४ नन्दीश्वरकथित शिवधर्म, ५ दुर्वासा, ६ नारद, ७ कपिल, ८ मनु, ९ उशना, १० ब्रह्माण्ड, ११ वरुण, १२ कालिका, १३ माहेश्वर, १४ साम्ब, १५ सौर, १६ पाराशर, १७ मारीच तथा १८ भार्गव। विप्रवरो! ये उपपुराणोंके नाम बताये गये हैं।

**ऋषि बोले—**सूतजी! अब क्रमशः पुराणोंकी श्लोक संख्या बताइये।

**सूतजीने कहा—**पहले एक ही पुराण था, जो शतकोटि श्लोकोंद्वारा विस्तृत तथा धर्म, अर्थ और कामका साधन करनेवाला था। प्रलयकालमें जब संकर्षणरूपधारी परमात्मा श्रीहरिने सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध कर दिया, तब अंगोंसहित चारों वेद, पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र सबको लेकर उन्होंने अपने अधीन कर लिया। तत्पश्चात् दूसरे कल्पके प्रारम्भमें एकार्णवके जलमें मत्स्यरूपसे विचरनेवाले भगवान्ने दिव्यदृष्टिसम्पन्न ब्रह्माजीको समस्त वेदादि शास्त्रोंका उपदेश किया। फिर ब्रह्माजीने त्रिकालदर्शी मुनियोंको उपदेश दिया। इस प्रकार सब शास्त्रों और पुराणोंकी प्रवृत्ति हुई। तदनन्तर कालक्रमसे व्यासरूपधारी श्रीहरि प्रत्येक द्वापरयुगमें अठारह पुराणोंको संक्षिप्त करते हैं। सौ कोटि श्लोकोंको संक्षिप्त करके चार लाख श्लोकोंके रूपमें स्थापित करते हैं। इन्हीं चार लाख श्लोकोंको अठारह भागोंमें विभक्त करके इस भूलोकमें अठारह पुराणोंका उपदेश करते हैं। अब भी देवलोकमें सौ कोटि श्लोकोंके विस्तारसे युक्त पुराणका संस्करण विद्यमान है। उसीका सारभूत अर्थ यहाँ चार लाख श्लोकोंमें नियोजित हुआ है। इस लोकमें अठारह पुराण हैं। अब उन पुराणोंके नामोल्लेखपूर्वक उनकी श्लोकसंख्या बतलाता हूँ। ब्रह्माजीने मरीचिसे जितने श्लोकोंका उपदेश किया है, उसका नाम 'ब्रह्मपुराण' है। उसकी श्लोकसंख्या दस हजार है। जो मनुष्य ब्रह्मपुराणको लिखकर वैशाखकी पूर्णिमाके दिन जलधेनुसहित उसका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है। जिस समय सुवर्णमय ब्रह्माण्ड भगवान्की नाभिसे कमलरूपमें प्रकट हुआ था, उस कथाका आश्रय लेकर जो पुराण प्रकाशमें आया है, उसे विद्वानोंने 'पद्मपुराण' नाम दिया है। उसकी श्लोकसंख्या यहाँ पचपन हजार बतायी जाती है। जो मनुष्य सुवर्णमय कमलयुक्त पद्मपुराण ज्येष्ठमासमें तिलसहित दान करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। वाराहकल्पकी कथाको लेकर जो भगवान् विष्णुका चरित्र निर्मित हुआ है, उसे लोकमें 'विष्णुपुराण' कहते हैं। वह तेईस हजार श्लोकोंका बताया गया है। जो शुद्धचित्त मानव आषाढ़मासकी पूर्णिमाको घृत-धेनु के साथ विष्णुपुराणका दान करता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।

श्वेतकल्पके प्रसंगको लेकर जिसमें वायुदेवने धर्मका उपदेश किया है, वह 'वायुपुराण' कहलाता है। उसमें भगवान् शिवकी महिमाका भी वर्णन है। वायुपुराण चौबीस हजार श्लोकोंका बताया जाता है। श्रावणमासकी पूर्णिमाको गुड़मयी धेनुके साथ उक्त पुराणका जो कुटुम्बी ब्राह्मणके लिये दान करता है, वह शुद्धचित्त हो एक कल्पतक शिवलोकमें निवास करता है। जिसमें गायत्री-मन्त्रका आश्रय लेकर धर्मका विस्तृत रूपसे वर्णन किया गया है तथा जिसमें वृत्रासुरके वधका भी प्रसंग है, उसे 'भागवतपुराण' कहते हैं। जो उसे लिखकर भाद्रपदकी पूर्णिमाको स्वर्णमय सिंहासनके