भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1240

ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः

संक्षिप्त श्रीस्कन्दमहापुराण

## प्रभासखण्ड

सूतजीके द्वारा प्रभास-खण्डका उपक्रम तथा पुराणों और उपपुराणोंका वर्णन

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर, सरस्वती देवी तथा व्यासजीको नमस्कार करके जय (इतिहास-पुराण)-का पाठ करे।

नैमिषारण्यके निवासी महर्षियोंने लोमहर्षण सूतजीसे पूछा—महाबुद्धिमान् सूतजी! प्रभासक्षेत्रका क्या माहात्म्य है? यह हमें बतानेकी कृपा करें।

मुनियोंका यह वचन सुनकर सूतजी अपने गुरुदेव सत्यवतीनन्दन व्यासको प्रणाम करके बोले।

लोमहर्षणजीने कहा—जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है, जो सम्पूर्ण जगत्‌के उत्पत्ति-स्थान, सबको मोहनेवाले, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, अप्रमेय, गुरु, देव, निर्भय, निर्भय-आश्रय, हंस (शुद्ध-स्वरूप), शुचिषद् (पवित्र अन्तःकरणमें निवास करनेवाले), आकाशकी भाँति सर्वव्यापी, सर्वगत, शिव (कल्याणमय), उदासीन (राग-द्वेषरहित), आयासशून्य, प्रपंचसे परे, निरंजन, बिन्दुस्वरूप, ध्येय तथा ध्यानरहित हैं, ज्ञानीजन जिन्हें अस्ति-नास्ति (भावाभावस्वरूप) कहते हैं, जो दूरसे दूर और निकटसे निकट हैं, मनसे जिनका ग्रहण नहीं हो सकता, जो परम धाम, पुरुष नामसे प्रसिद्ध, जगन्मय, हृदय-कमलके आसनपर विराजमान, तेजोरूप तथा इन्द्रियरहित हैं, ऐसे परमात्माको नमस्कार करके मैं पापनाशिनी कथा आरम्भ करता हूँ। आपलोग सावधान होकर सुनें। यह कथा श्रद्धालु एवं शान्त द्विजको सुनाने योग्य है। जैसे सब देवताओंमें देवदेव महेश्वर श्रेष्ठ हैं, जिस प्रकार नदियोंमें गंगा, वर्णोंमें ब्राह्मण, अक्षरोंमें ॐकार, पूजनीयोंमें माता तथा गुरुजनोंमें पिता सबसे श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सब शास्त्रोंमें स्कन्दपुराण उत्तम है। पूर्वकालमें कैलास पर्वतके शिखरपर ब्रह्मा आदि देवताओंके समीप पिनाकपाणि भगवान् शिवने पार्वतीजीके सम्मुख स्कन्दपुराण सुनाया था। फिर पार्वतीजीने अपने पुत्र स्कन्दको, स्कन्दने नन्दीगणको, नन्दीने कुमार (सनकादि)-को और कुमारने परम बुद्धिमान् व्यासको सुनाया था। व्यासजीके मुखसे कही हुई उसी कथाको मैं आपलोगोंके सामने कहता हूँ। आप सब महर्षि सद्भावसे युक्त हैं, अतः मुझे आपको स्कन्दपुराण-संहिता सुनानेके लिये उत्साह होता है।

प्राचीन कालमें ब्रह्माजीने उग्र तप किया, तब छहों अंग, पद और क्रमके सहित वेद प्रकट हुए। तदनन्तर सर्वशास्त्रमय सम्पूर्ण पुराणका प्रादुर्भाव हुआ। जो नित्य शब्दमय, पुण्यजनक तथा सौ करोड़ श्लोकोंसे विस्तारको प्राप्त हुआ है। ब्रह्माजीके मुखसे क्रमशः १ ब्रह्मपुराण, २ विष्णुपुराण, ३ शिवपुराण,