भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1239

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  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ग्यारहवेंका नाम कपाली था। ये ही नाम भगवान् शिवने उन ग्यारह रुद्र-मूर्तियोंके भी रखे।

मृगव्याधके लिये प्रत्यक्ष गौ तथा गुड़ की बनी हुई गौ भी दान करनी चाहिये। कपालीके लिये मक्खनकी, अजैकपादके लिये घीकी, अहिर्बुध्न्यके लिये सुवर्णकी, पिनाकीके लिये नमककी, परन्तपके लिये रसकी, दहनके लिये अन्नकी, ईश्वरके लिये जलकी तथा अन्य मूर्तियोंके लिये प्रत्यक्ष गौ दान करनी चाहिये। जो इन रुद्रोंकी प्रीतिके लिये इन सब प्रकारकी गौओंका दान करता है, वह निश्चय ही चक्रवर्ती राजा होता है, ऐसा पितामह ब्रह्माजीका कथन है।


नागरखण्डका उपसंहार, श्रवण तथा व्यासपूजनका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं— पूर्वकालमें स्कन्दजीने यह समस्त पुराण ब्रह्मपुत्र महर्षि भृगुको सुनाया था। उनसे अंगिराने प्राप्त किया। अंगिरासे च्यवनको और च्यवनसे ऋचीकको इसकी प्राप्ति हुई। इस परम्परासे यह स्कन्द-कथित पुराण सब लोकोंमें प्रचलित हुआ। जो मनुष्य सत्पुरुषोंके मध्यमें बैठकर इस पुराणको सुनता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है। यह पुराण आयुकी वृद्धि करनेवाला और सब वर्णोंको सुख देनेवाला है। इसे महात्मा षडानन (स्कन्दजी)-ने प्रकट किया है। जो मनुष्य हाटकेश्वरक्षेत्रका माहात्म्य सुनता है, उसके पुण्यकी गणना कोई नहीं कर सकता। जो मानव भक्तिपूर्वक इस कथाको कुछ दिन सुनता और पढ़ता है, उसके समस्त मनोरथोंकी सिद्धि होती है। जो गुरु अपने शिष्यको एक अक्षर भी उपदेश करता है, उस गुरुको देनेके लिये पृथ्वीपर ऐसा कोई धन नहीं है, जिसे देकर मनुष्य उसके ऋणसे उऋण हो सके। अतः शास्त्र-पुराणका उपदेश करनेवाले व्यासको गौ, भूमि, सुवर्ण, अन्न और वस्त्र आदि देकर उसका पूर्णतः सत्कार करना चाहिये। जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर इस परम उत्तम शास्त्रका पाठ एवं श्रवण करता है तथा उपदेश करनेवाले व्यासका पूजन करता है, वह भगवान् शिवके धामको प्राप्त होता है।


नागरखण्ड (उत्तरार्ध) सम्पूर्ण।


नागरखण्ड समाप्त।