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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ग्यारहवेंका नाम कपाली था। ये ही नाम भगवान् शिवने उन ग्यारह रुद्र-मूर्तियोंके भी रखे।

मृगव्याधके लिये प्रत्यक्ष गौ तथा गुड़ की बनी हुई गौ भी दान करनी चाहिये। कपालीके लिये मक्खनकी, अजैकपादके लिये घीकी, अहिर्बुध्न्यके लिये सुवर्णकी, पिनाकीके लिये नमककी, परन्तपके लिये रसकी, दहनके लिये अन्नकी, ईश्वरके लिये जलकी तथा अन्य मूर्तियोंके लिये प्रत्यक्ष गौ दान करनी चाहिये। जो इन रुद्रोंकी प्रीतिके लिये इन सब प्रकारकी गौओंका दान करता है, वह निश्चय ही चक्रवर्ती राजा होता है, ऐसा पितामह ब्रह्माजीका कथन है।


नागरखण्डका उपसंहार, श्रवण तथा व्यासपूजनका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं— पूर्वकालमें स्कन्दजीने यह समस्त पुराण ब्रह्मपुत्र महर्षि भृगुको सुनाया था। उनसे अंगिराने प्राप्त किया। अंगिरासे च्यवनको और च्यवनसे ऋचीकको इसकी प्राप्ति हुई। इस परम्परासे यह स्कन्द-कथित पुराण सब लोकोंमें प्रचलित हुआ। जो मनुष्य सत्पुरुषोंके मध्यमें बैठकर इस पुराणको सुनता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है। यह पुराण आयुकी वृद्धि करनेवाला और सब वर्णोंको सुख देनेवाला है। इसे महात्मा षडानन (स्कन्दजी)-ने प्रकट किया है। जो मनुष्य हाटकेश्वरक्षेत्रका माहात्म्य सुनता है, उसके पुण्यकी गणना कोई नहीं कर सकता। जो मानव भक्तिपूर्वक इस कथाको कुछ दिन सुनता और पढ़ता है, उसके समस्त मनोरथोंकी सिद्धि होती है। जो गुरु अपने शिष्यको एक अक्षर भी उपदेश करता है, उस गुरुको देनेके लिये पृथ्वीपर ऐसा कोई धन नहीं है, जिसे देकर मनुष्य उसके ऋणसे उऋण हो सके। अतः शास्त्र-पुराणका उपदेश करनेवाले व्यासको गौ, भूमि, सुवर्ण, अन्न और वस्त्र आदि देकर उसका पूर्णतः सत्कार करना चाहिये। जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर इस परम उत्तम शास्त्रका पाठ एवं श्रवण करता है तथा उपदेश करनेवाले व्यासका पूजन करता है, वह भगवान् शिवके धामको प्राप्त होता है।


नागरखण्ड (उत्तरार्ध) सम्पूर्ण।


नागरखण्ड समाप्त।


१८. प्रभासखण्ड (प्रभास, वस्त्रपूत, अर्बुद व द्वारका)

ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः

संक्षिप्त श्रीस्कन्दमहापुराण

## प्रभासखण्ड

सूतजीके द्वारा प्रभास-खण्डका उपक्रम तथा पुराणों और उपपुराणोंका वर्णन

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर, सरस्वती देवी तथा व्यासजीको नमस्कार करके जय (इतिहास-पुराण)-का पाठ करे।

नैमिषारण्यके निवासी महर्षियोंने लोमहर्षण सूतजीसे पूछा—महाबुद्धिमान् सूतजी! प्रभासक्षेत्रका क्या माहात्म्य है? यह हमें बतानेकी कृपा करें।

मुनियोंका यह वचन सुनकर सूतजी अपने गुरुदेव सत्यवतीनन्दन व्यासको प्रणाम करके बोले।

लोमहर्षणजीने कहा—जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है, जो सम्पूर्ण जगत्‌के उत्पत्ति-स्थान, सबको मोहनेवाले, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, अप्रमेय, गुरु, देव, निर्भय, निर्भय-आश्रय, हंस (शुद्ध-स्वरूप), शुचिषद् (पवित्र अन्तःकरणमें निवास करनेवाले), आकाशकी भाँति सर्वव्यापी, सर्वगत, शिव (कल्याणमय), उदासीन (राग-द्वेषरहित), आयासशून्य, प्रपंचसे परे, निरंजन, बिन्दुस्वरूप, ध्येय तथा ध्यानरहित हैं, ज्ञानीजन जिन्हें अस्ति-नास्ति (भावाभावस्वरूप) कहते हैं, जो दूरसे दूर और निकटसे निकट हैं, मनसे जिनका ग्रहण नहीं हो सकता, जो परम धाम, पुरुष नामसे प्रसिद्ध, जगन्मय, हृदय-कमलके आसनपर विराजमान, तेजोरूप तथा इन्द्रियरहित हैं, ऐसे परमात्माको नमस्कार करके मैं पापनाशिनी कथा आरम्भ करता हूँ। आपलोग सावधान होकर सुनें। यह कथा श्रद्धालु एवं शान्त द्विजको सुनाने योग्य है। जैसे सब देवताओंमें देवदेव महेश्वर श्रेष्ठ हैं, जिस प्रकार नदियोंमें गंगा, वर्णोंमें ब्राह्मण, अक्षरोंमें ॐकार, पूजनीयोंमें माता तथा गुरुजनोंमें पिता सबसे श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सब शास्त्रोंमें स्कन्दपुराण उत्तम है। पूर्वकालमें कैलास पर्वतके शिखरपर ब्रह्मा आदि देवताओंके समीप पिनाकपाणि भगवान् शिवने पार्वतीजीके सम्मुख स्कन्दपुराण सुनाया था। फिर पार्वतीजीने अपने पुत्र स्कन्दको, स्कन्दने नन्दीगणको, नन्दीने कुमार (सनकादि)-को और कुमारने परम बुद्धिमान् व्यासको सुनाया था। व्यासजीके मुखसे कही हुई उसी कथाको मैं आपलोगोंके सामने कहता हूँ। आप सब महर्षि सद्भावसे युक्त हैं, अतः मुझे आपको स्कन्दपुराण-संहिता सुनानेके लिये उत्साह होता है।

प्राचीन कालमें ब्रह्माजीने उग्र तप किया, तब छहों अंग, पद और क्रमके सहित वेद प्रकट हुए। तदनन्तर सर्वशास्त्रमय सम्पूर्ण पुराणका प्रादुर्भाव हुआ। जो नित्य शब्दमय, पुण्यजनक तथा सौ करोड़ श्लोकोंसे विस्तारको प्राप्त हुआ है। ब्रह्माजीके मुखसे क्रमशः १ ब्रह्मपुराण, २ विष्णुपुराण, ३ शिवपुराण,

१२१२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

४ भागवतपुराण, ५ भविष्यपुराण, ६ नारदीयपुराण, ७ मार्कण्डेयपुराण, ८ आग्नेय पुराण, ९ ब्रह्मवैवर्तपुराण, १० लिंगपुराण, ११पद्मपुराण, १२ वाराहपुराण, १३ स्कन्दपुराण, १४ वामनपुराण, १५ कूर्मपुराण, १६ मत्स्यपुराण, १७ गरुड़पुराण तथा १८ वायुपुराणका प्राकट्य हुआ। इन अठारह पुराणोंका नामोच्चारण सब पातकोंका नाश करनेवाला है।

इसके सिवा मुनियोंने अठारह उपपुराण भी बताये हैं— १ सनत्कुमार, २ नरसिंह, ३ स्कन्द, ४ नन्दीश्वरकथित शिवधर्म, ५ दुर्वासा, ६ नारद, ७ कपिल, ८ मनु, ९ उशना, १० ब्रह्माण्ड, ११ वरुण, १२ कालिका, १३ माहेश्वर, १४ साम्ब, १५ सौर, १६ पाराशर, १७ मारीच तथा १८ भार्गव। विप्रवरो! ये उपपुराणोंके नाम बताये गये हैं।

**ऋषि बोले—**सूतजी! अब क्रमशः पुराणोंकी श्लोक संख्या बताइये।

**सूतजीने कहा—**पहले एक ही पुराण था, जो शतकोटि श्लोकोंद्वारा विस्तृत तथा धर्म, अर्थ और कामका साधन करनेवाला था। प्रलयकालमें जब संकर्षणरूपधारी परमात्मा श्रीहरिने सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध कर दिया, तब अंगोंसहित चारों वेद, पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र सबको लेकर उन्होंने अपने अधीन कर लिया। तत्पश्चात् दूसरे कल्पके प्रारम्भमें एकार्णवके जलमें मत्स्यरूपसे विचरनेवाले भगवान्ने दिव्यदृष्टिसम्पन्न ब्रह्माजीको समस्त वेदादि शास्त्रोंका उपदेश किया। फिर ब्रह्माजीने त्रिकालदर्शी मुनियोंको उपदेश दिया। इस प्रकार सब शास्त्रों और पुराणोंकी प्रवृत्ति हुई। तदनन्तर कालक्रमसे व्यासरूपधारी श्रीहरि प्रत्येक द्वापरयुगमें अठारह पुराणोंको संक्षिप्त करते हैं। सौ कोटि श्लोकोंको संक्षिप्त करके चार लाख श्लोकोंके रूपमें स्थापित करते हैं। इन्हीं चार लाख श्लोकोंको अठारह भागोंमें विभक्त करके इस भूलोकमें अठारह पुराणोंका उपदेश करते हैं। अब भी देवलोकमें सौ कोटि श्लोकोंके विस्तारसे युक्त पुराणका संस्करण विद्यमान है। उसीका सारभूत अर्थ यहाँ चार लाख श्लोकोंमें नियोजित हुआ है। इस लोकमें अठारह पुराण हैं। अब उन पुराणोंके नामोल्लेखपूर्वक उनकी श्लोकसंख्या बतलाता हूँ। ब्रह्माजीने मरीचिसे जितने श्लोकोंका उपदेश किया है, उसका नाम 'ब्रह्मपुराण' है। उसकी श्लोकसंख्या दस हजार है। जो मनुष्य ब्रह्मपुराणको लिखकर वैशाखकी पूर्णिमाके दिन जलधेनुसहित उसका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है। जिस समय सुवर्णमय ब्रह्माण्ड भगवान्की नाभिसे कमलरूपमें प्रकट हुआ था, उस कथाका आश्रय लेकर जो पुराण प्रकाशमें आया है, उसे विद्वानोंने 'पद्मपुराण' नाम दिया है। उसकी श्लोकसंख्या यहाँ पचपन हजार बतायी जाती है। जो मनुष्य सुवर्णमय कमलयुक्त पद्मपुराण ज्येष्ठमासमें तिलसहित दान करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। वाराहकल्पकी कथाको लेकर जो भगवान् विष्णुका चरित्र निर्मित हुआ है, उसे लोकमें 'विष्णुपुराण' कहते हैं। वह तेईस हजार श्लोकोंका बताया गया है। जो शुद्धचित्त मानव आषाढ़मासकी पूर्णिमाको घृत-धेनु के साथ विष्णुपुराणका दान करता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।

श्वेतकल्पके प्रसंगको लेकर जिसमें वायुदेवने धर्मका उपदेश किया है, वह 'वायुपुराण' कहलाता है। उसमें भगवान् शिवकी महिमाका भी वर्णन है। वायुपुराण चौबीस हजार श्लोकोंका बताया जाता है। श्रावणमासकी पूर्णिमाको गुड़मयी धेनुके साथ उक्त पुराणका जो कुटुम्बी ब्राह्मणके लिये दान करता है, वह शुद्धचित्त हो एक कल्पतक शिवलोकमें निवास करता है। जिसमें गायत्री-मन्त्रका आश्रय लेकर धर्मका विस्तृत रूपसे वर्णन किया गया है तथा जिसमें वृत्रासुरके वधका भी प्रसंग है, उसे 'भागवतपुराण' कहते हैं। जो उसे लिखकर भाद्रपदकी पूर्णिमाको स्वर्णमय सिंहासनके

  • प्रभासखण्ड * १२१३

साथ दान करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। भागवतपुराण अठारह हजार श्लोकोंका बताया गया है। जिसमें बृहत्कल्पकी कथाका आश्रय लेकर नारदजीने धर्मोंका वर्णन किया है, वह 'नारदीयपुराण' है। उसकी श्लोकसंख्या पचीस हजार है। जो आश्विनकी पूर्णिमाको धेनुसहित उस पुराणका दान करता है, वह पुनरावृत्तिरहित उत्तम सिद्धिको प्राप्त होता है। जिसमें पक्षियोंके प्रसंगको लेकर धर्माधर्मका विचार किया गया है, वह 'मार्कण्डेयपुराण' कहलाता है। उसकी श्लोकसंख्या नौ हजार है। जो उसे लिखकर सुवर्णमय हाथीके साथ कार्तिककी पूर्णिमाको दान देता है, वह पुण्डरीक यज्ञके फलका भागी होता है। जहाँ ईशानकल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर अग्निदेवने वसिष्ठको उपदेश दिया है, उसे 'आग्नेयपुराण' कहते हैं। उसकी श्लोकसंख्या सोलह हजार है। जो उसे लिखकर मार्गशीर्षमासमें स्वर्णमय कमलके साथ तिलधेनुसहित दान करता है, उसे सब यज्ञोंका फल मिलता है। जिसमें लोकनाथ ब्रह्माजीने अघोरकल्पके वृत्तान्तके प्रसंगसे सूर्यकी महिमाका आश्रय ले मनुसे जीवसमुदायका लक्षण बताया है; प्रायः भविष्य चरित्रके वर्णनसे युक्त वह पुराण 'भविष्यपुराण' कहलाता है। उसकी श्लोकसंख्या साढ़े चौदह हजार है। जो पौषमासकी पूर्णिमाको द्वेषरहित हो गुड़ और घटसहित उक्त पुराणका दान करता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है। जिसमें रथन्तरकल्पके वृत्तान्तको लेकर नारदजीसे श्रीकृष्ण-माहात्म्यसहित ब्रह्मवाराह-चरित्रका वर्णन किया जाता है, वह अठारह हजार श्लोकोंका पुराण 'ब्रह्मवैवर्त' कहा गया है। जो मनुष्य माघमासकी पूर्णिमाको परम पवित्र ब्रह्मवैवर्तका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है। जिसमें अग्निकल्पके वृत्तान्तको लेकर लिंगमें स्थित देवदेव महेश्वरने अग्निसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका वर्णन किया है, वह 'लिंगपुराण' कहा गया है। उसकी श्लोकसंख्या ग्यारह हजार है। जो फाल्गुनकी पूर्णिमाको तिलधेनुके साथ ब्राह्मणको उस पुराणका दान करता है, वह भगवान् शिवके सारूप्यको प्राप्त होता है।

जिसमें महावाराहके माहात्म्यको लेकर भगवान् विष्णुने पृथ्वीसे कथा कही है, वह चौबीस हजार श्लोकोंका पुराण 'वाराहपुराण' कहलाता है। जो चैत्रकी पूर्णिमाको सोनेके गरुड और तिलकी धेनुसहित वह पुराण कुटुम्बी ब्राह्मणको देता है, वह भगवान् वाराहके प्रसादसे वैष्णवपदको प्राप्त होता है। जिसमें माहेश्वर धर्मोंका आश्रय लेकर तत्पुरुष कल्पके वृत्तान्त एवं चरित्रोंके साथ कथावस्तुका वर्णन स्कन्दजीके प्रति (अथवा स्कन्दजीके द्वारा) किया गया है, वह 'स्कन्दपुराण' कहा गया है। उसमें इक्यासी हजार एक सौ श्लोक हैं। जो उक्त पुराण लिखकर सूर्यके मकर राशिपर स्थित रहते समय उसे स्वर्णमय त्रिशूलके साथ दान करता है, वह भगवान् शिवके धाममें जाता है। जिसमें ब्रह्माजीने त्रिविक्रमकी महिमाको लेकर धर्म, अर्थ और कामका वर्णन किया है, वह 'वामनपुराण' कहा गया है। उसकी श्लोकसंख्या दस हजार है और उसमें कूर्मकल्पकी कथा है। जो शरत्कालीन विषुवयोगमें धेनु-सुवर्ण तथा रेशमीवस्त्रसहित उक्त पुराणका दान करता है, वह विष्णुधामको प्राप्त होता है। जिसमें कच्छपरूपधारी श्रीहरिने रसातलमें ऋषियों तथा इन्द्रके समीप इन्द्रद्युम्नके प्रसंगसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका माहात्म्य कहा है, वह लक्ष्मीकल्पके वृत्तान्तसे युक्त सत्रह हजार श्लोकोंका पुराण 'कूर्मपुराण' कहलाता है। जो मनुष्य अयनारम्भके दिन स्वर्णमय कूर्मके साथ कूर्मपुराणका दान करता है, वह एक सहस्र गोदानका फल पाता है। जहाँ कल्पके आदिमें श्रुतियोंकी प्रवृत्तिके लिये मत्स्यरूपधारी भगवान्ने मनुसे नरसिंहकल्पसे लेकर सात कल्पतककी सब बातोंका वर्णन किया है, उसे चौदह हजार श्लोकोंका 'मत्स्यपुराण'

१२१४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

समझना चाहिये। जो विषुवयोगमें सुवर्णमय मत्स्य, धेनु तथा दो रेशमी पीताम्बरसे युक्त मत्स्यपुराण दान करता है, उसके द्वारा मानो सम्पूर्ण पृथ्वीका दान कर दिया गया। जब गरुडकल्प बीत रहा था, उस समयकी ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिकथाका आश्रय लेकर भगवान् विष्णुने गरुडसे जो कुछ कहा है, वह 'गरुडपुराण' कहलाता है। उसकी श्लोक-संख्या भी अठारह हजार है। जो उत्तरायणमें स्वर्णमय हंससहित गरुडपुराण दान करता है, वह मुख्य सिद्धि तथा शिवलोकमें निवास पाता है। ब्रह्माण्डकी महिमाको लेकर ब्रह्माजीने जिस पुराणका वर्णन किया है, जिसमें भविष्य कल्पोंका भी विस्तृत वर्णन सुना जाता है, वह 'ब्रह्माण्डपुराण' है। उसकी श्लोक संख्या बारह हजार दो सौ है। जो मानव व्यतीपात योगमें उस पुराणका दान करता है, वह सहस्र राजसूय यज्ञोंका फल पाता है। ब्राह्मणो! अद्भुत कर्म करनेवाले व्यासजीने इहलोकमें सबका हित करनेके लिये द्वापरमें बृहत्पुराणका संक्षेप करके चार लाख श्लोकोंका पुराण प्रकट किया है।

पद्मपुराणमें जो भगवान् नरसिंहके अवतारका वर्णन हुआ है, उसी प्रसंगको लेकर जो उपपुराण कहा गया है, उसे 'नरसिंहपुराण' कहते हैं। मुनीश्वरो! जहाँ कार्तिकेयजी नन्दीके माहात्म्यका वर्णन करते हैं, वह उपपुराण लोकमें 'नन्दिपुराण' के नामसे विख्यात है। जिसमें साम्बके चरित्रको प्रधानता देकर कथा कही गयी है; वह लोकमें 'साम्बपुराण' कहलाता है। वही आदित्यपुराण भी कहा गया है। अठारह पुराणोंसे पृथक् जो पुराण देखा जाता है, वह उन महापुराणोंसे ही निकला है। मुनीश्वरोंने पुराणोंके पाँच अंग बताये हैं—सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित। जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य तथा रुद्रका माहात्म्य और समस्त विश्वके सृष्टि-संहारका वर्णन देखा जाता है, वह इन पाँच लक्षणोंसे युक्त पुराण है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका भी वर्णन पुराणोंमें किया गया है।

पुराणोंके तीन विभाग हैं—सात्त्विक, राजस और तामस। सात्त्विक पुराणोंमें श्रीहरिके ही माहात्म्य और उनकी आराधनाके फलका अधिक वर्णन है। राजस पुराणोंमें ब्रह्माका ही अधिक माहात्म्य है। इसी प्रकार तामस पुराणोंमें अग्निदेव और रुद्रका विशेष माहात्म्य कहा गया है। जो सात्त्विक, राजस और तामस सभी भावोंसे संकीर्ण (व्याप्त) हैं, उन पुराणोंमें सरस्वती देवी एवं पितरोंकी महिमाका वर्णन है। पुराणोंमेंसे चारके द्वारा भगवान् विष्णुका, दो-दोके द्वारा ब्रह्मा और सूर्यदेवका तथा शेष सभी पुराणोंद्वारा विशेषतः भगवान् शिवका माहात्म्य कहा गया है। पुराणोंमें सब वेद प्रतिष्ठित हैं, इसमें सन्देह नहीं है। जो अंग और उपनिषदोंसहित चारों वेदोंको तो जानता है, किंतु पुराणको नहीं जानता, वह विशिष्ट विद्वान् नहीं है। सत्यवतीनन्दन व्यासने द्वापरके अन्तमें अठारह पुराणोंका निर्माण करके वेदार्थोंसे परिपूर्ण महाभारत उपाख्यानकी रचना की है। उसकी श्लोकसंख्या एक लाख है। वाल्मीकिने जो परम उत्तम श्रीरामोपाख्यानका वर्णन किया है, वह भी बहुत उत्तम है। ब्रह्माजीने जो शतकोटि श्लोकोंद्वारा विस्तृत रामचरितका वर्णन किया है, उसीका यह सार है। पहले ब्रह्माजीने नारदजीको बुलाकर वह चरित्र कहा था, फिर नारदजीने वाल्मीकिजीसे कहा। इस प्रकार चार लाख पुराणके, एक लाख महाभारतके और चौबीस हजार वाल्मीकीय रामायणके—ये सवा पाँच लाख श्लोक अतिशय पुण्यजनक कहे गये हैं।

परम बुद्धिमान् वेदव्यासजीने स्कन्दपुराणके सात खण्ड किये हैं और इक्यासी हजार उसके श्लोक हैं। स्कन्दपुराणका प्रथम खण्ड स्कन्दके माहात्म्यसे परिपूर्ण है। उसका नाम माहेश्वरखण्ड है। दूसरा वैष्णवखण्ड और तीसरा ब्राह्मखण्ड है। यह ब्रह्माजीके द्वारा कहा गया है और सृष्टिकथाको

* प्रभासखण्ड * १२१५


संक्षेपसे सूचित करनेवाला है। चौथे खण्डका नाम काशीखण्ड है। पाँचवाँ खण्ड अवन्ती-माहात्म्यसहित रेवाखण्ड है। छठा खण्ड नागरखण्ड है, जो तीर्थोंकी महिमाको सूचित करनेवाला है। सातवाँ खण्ड यही है, जो प्राभासिक खण्ड माना गया है। स्कन्दपुराणके सभी खण्ड किंचित् न्यूनाधिकताके साथ बारह-बारह हजार हैं।


## शिव-पार्वती-संवाद, तीर्थोंका संक्षिप्त वर्णन तथा प्रभासक्षेत्रकी विशेष महिमा

ऋषि बोले—सूतजी! अब हम तीर्थोंका विस्तृत वर्णन सुनना चाहते हैं।

सूतजीने कहा—प्राचीन कालमें पर्वतश्रेष्ठ कैलासपर देवी पार्वतींने यही बात पूछी थी, वह प्रसंग सुनाता हूँ। एक समयकी बात है, गिरिराजकुमारी उमाने अत्यन्त विस्मित होकर महादेवजीके मुखकी ओर देखा और हाथ जोड़कर मधुर वाणीमें कहा—'जगन्नाथ! महेश्वर! मैंने आपको प्रसन्न करनेकी इच्छासे अनेक जन्मोंतक आपके स्वरूपका अनुसन्धान किया; परंतु आपका कहीं अन्त नहीं मिला। देवदेव! आपका रूप अनन्त है, आपको नमस्कार है। आप वेदके रहस्य तथा वेदवाणीद्वारा प्रशंसित हैं, आपको नमस्कार है। आप सदा श्मशानभूमिमें रमते रहते हैं तथा आकाशमें भी विचरण करते हैं, आपको नमस्कार है।'

भगवान् शिव बोले—देवेश्वरि! मैं तुम्हारा स्रष्टा हूँ और तुम सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करती हो; तुम्हारे तथा मेरे द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् ओतप्रोत है। मैं और तुम दोनों सम्पूर्ण ऐश्वर्यशक्तिसे युक्त होकर सब प्राणियोंके भीतर स्थित हैं। सब ओर प्रतिष्ठित हैं। मैं तुम्हारे साथ खेल करता हूँ। तुम्हीं धृति और धारणाशक्ति हो। तुम्हीं प्रकृति हो। सदा मेरे अंगोंमें निवास करनेवाली हो। अधिक क्या कहूँ, तुम मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो; तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।

देवी बोलीं—जगन्नाथ! मैं धन्य हूँ, पुण्यात्मा हूँ और मैंने उत्तम तपका अनुष्ठान किया है, जिससे आपने मेरी ओर हर्षभरी दृष्टिसे देखा है। देव! इस समय मुझसे सब तीर्थोंका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।

भगवान् शिवने कहा—देवेश्वरि! तीर्थोंका दर्शन और उनमें स्नान परम कल्याणकारी है। श्रेष्ठ मुनिगण तीर्थोंके श्रवणकी भी प्रशंसा करते हैं। पृथ्वीपर नैमिष और आकाशमें पुष्करतीर्थ प्रसिद्ध हैं। इनके सिवा केदार, प्रयाग, विपाशा (व्यास), उर्मिला, कृष्णा, वेणा, महादेवी, चन्द्रभागा (चनाव), सरस्वती, गंगासागरसंगम, शुभदायिनी काशीपुरी, महाभागा शतभद्रा, महानदी सिन्धु, गोदावरी, कपिला, महानद शोण, पयोधि, कौशिकी, देवखात, गया, द्वारावती तथा महातीर्थ प्रभास—ये सब पातकोंका नाश करनेवाले हैं। ये सब तीर्थ जो इस पृथ्वीपर मौजूद हैं, उनका दर्शन करके मनुष्यका फिर इस संसारमें जन्म नहीं होता। वायुदेवने कहा है कि 'पृथ्वीपर साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं, वे सभी महापापोंका नाश करनेवाले और परम पवित्र हैं।' महादेवि! स्वधर्मकी वृद्धिके लिये इन सभी तीर्थोंकी यात्रा करनी चाहिये। जहाँ शरीरसे जाना सम्भव न हो, वहाँ मनसे ही जाना चाहिये।

देवी बोलीं—भगवन्! सभी प्राणी सब प्रकारके उपद्रवोंसे ग्रस्त हैं। उनकी आयु थोड़ी है। वे अनेक प्रकारके व्यामोहसे बँधे हुए हैं। त्रेता और द्वापरमें भी ऐसी स्थिति रहती है, फिर भयंकर कलिकालकी

१२१६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तो बात ही क्या है? अतः उन सबके हितके लिये आप ऐसे किसी तीर्थका वर्णन कीजिये, जिसके दर्शनसे सब तीर्थोंका फल प्राप्त हो।

भगवान् शिवने कहा—देवि! तुम मेरे बाहर विचरनेवाले प्राण हो, तुम्हीं सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिस्थान हो। तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैं सब बातोंका यथावत् वर्णन करूँगा। यह रहस्यका भी रहस्य है। इसको प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये। नास्तिकों तथा पापाचारियोंको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। जिसके भीतर भक्ति हो, ऐसे उत्तम शिष्य एवं श्रद्धालु पुत्रको ही इस रहस्यका उपदेश करना चाहिये। सुव्रते! चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं, यह बात पहले बतायी गयी है। उन सबमें छिपा हुआ श्रेष्ठ तीर्थ प्रभास है। इसे देखकर कलियुगके पापसे मोहित संस्काररहित मनुष्य बड़े उद्वेगको प्राप्त होते हैं। जहाँ-तहाँ कुपित हो उठते हैं। अपने-आपमें बड़प्पनका अभिमान रखनेवाले तथा मिथ्या ज्ञानसे मोहित जो अधम मानव भेद और कपट रखकर तीर्थयात्रा करते हैं, वे तीर्थमें मृत्युको प्राप्त होकर भी सिद्धि नहीं पाते हैं। इसलिये मैंने अनेक तीर्थों और शिवलिंगोंको गुप्त कर रखा है। वे कलियुगमें पापाचारियोंके लिये सिद्धिप्रद नहीं होते। जो क्रोध, लोभ और इन्द्रियोंको जीत चुके हैं, ऐसे दम्भ और मात्सर्यसे रहित, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कोई भी क्यों न हों, यदि सद्भावसे भावित हो उत्तम व्रतका पालन करते हुए तीर्थका सेवन करते हैं, तो उनके हितके लिये मैं त्रिभुवनविख्यात सर्वोत्तम प्रभासक्षेत्रका ही नाम लेता हूँ। जो लोग यम-नियमसे युक्त और अहंकारसे रहित हैं, उनके लिये कहता हूँ—पृथ्वीपर सब तीर्थोंमें उत्तम एकमात्र प्रभासक्षेत्र मुझे विशेष प्रिय है। महादेवि! उस तीर्थमें मैं निरन्तर स्थित रहता हूँ। वहाँ मेरा दिव्य लिंग प्रकट हुआ है, जो दिव्य तेजसे युक्त और अग्निमण्डलसे मण्डित है। संसारकी सृष्टिमें हेतुभूता जो इच्छा, ज्ञान और क्रिया—ये तीन शक्तियाँ हैं, वे मेरे इसी दिव्य लिंगसे प्रकट हुई हैं। यह चराचर जगत् उसीमें लीन होता और उसीसे प्रकट होता है। उस उत्तम क्षेत्रको कोई नहीं जानता है। वरानने! प्रभास क्षेत्रमें जो मेरा स्वरूप है, यह क्षेत्रज्ञ कहा गया है। मैं वहाँ 'सोमनाथ' नामसे प्रसिद्ध हूँ। जो मनुष्य इस क्षेत्रमें मेरे अंशसे प्रकट हुए हैं, उन्हींको मेरे उस लिंगके तत्त्वका ज्ञान है। वह लिंग प्राचीन कालके भैरव-कल्पमें प्रकट हुआ था। दूसरे लोग देवता ही क्यों न हों, उनके लिये उस लिंगका रहस्य दुर्लभ है।

कलियुगमें जो मनुष्य केवल तर्कवादी, महापापी और पाखण्डी होंगे, वे कहेंगे—'यह सब मिथ्या है, मूर्खोंकी कल्पना है, कहाँ तीर्थ है? कहाँ प्रभास है और कहाँ देवता रहते हैं? सब झूठ है, मूर्खोंका मिथ्या प्रलाप है।' इस प्रकार वे नास्तिक, नरकगामी तथा पापदूषित चित्तवाले मूर्ख मानव बातें करेंगे और तीर्थ आदिकी हँसी उड़ायेंगे। अतः उन्हें कभी सिद्धि नहीं प्राप्त होगी। जो मनुष्य शिवजीकी निन्दामें तत्पर रहते हैं, वे तीर्थमें मरें तो भी वे पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेते देखे जाते हैं। क्षेत्रोंको गुप्त रखनेका यही कारण है। देवेश्वरि! युग-युगमें जितने तीर्थ कहे गये हैं, उन सबमें प्रभासक्षेत्र ही मुझे विशेष प्रिय है।

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* प्रभासखण्ड * १२१७


प्रभासतीर्थकी सीमा, क्षेत्रविभाग, महिमा तथा रक्षकगणोंका वर्णन

पार्वतीदेवी बोलीं—महेश्वर! यदि प्रभासक्षेत्र सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ है तो अन्य बहुत तीर्थोंके विस्तारसे क्या लेना है। प्रभासक्षेत्रका ही माहात्म्य बताइये। प्रभासक्षेत्र कौन है? उसकी सीमा क्या है तथा उसका सारतत्त्व क्या है? यह सब आप बतानेकी कृपा करें।

भगवान् शिवने कहा—देवि! समस्त क्षेत्रोंमें प्रभास मुझे अधिक प्रिय है, प्रभासमें उत्तम सिद्धि और परम गति प्राप्त होती है। उसके पूर्वभागमें अन्धकारका नाश करनेवाले स्वामी सूर्यनारायणजी हैं। पश्चिममें माधवजीका स्थान है। दक्षिणमें समुद्र तथा उत्तरमें भवानी हैं। इस प्रकारकी सीमासे युक्त वह क्षेत्र बारह योजनका है। इसीका नाम प्रभासक्षेत्र है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। उसके मध्यमें पाँच योजन विस्तृत पीठिका है, जो न्यंकुमतीसे पश्चिम, वज्रिणीसे पूर्व, माहेश्वरीसे दक्षिण तथा समुद्रसे उत्तरमें स्थित है। उसकी लम्बाई और चौड़ाई मिलाकर पाँच योजनका विस्तार है। यह पीठ कहा गया है। अब इसके गर्भगृहका वर्णन सुनो—दक्षिणसे उत्तरकी ओर वह समुद्रसे कौरवेश्वरीदेवीतक फैला है और पूर्व-पश्चिममें गोमुखसे आश्वमेधिक तीर्थतक उसका विस्तार है। यह गर्भगृह मुझे कैलाससे भी अधिक प्रिय है। इस गर्भगृहकी सीमामें पृथ्वीपर जितने भी तीर्थ, बावलियाँ, कूप, तड़ाग, देवमन्दिर, सरोवर, सरिताएँ, गड्ढे और कुण्ड हैं, वे सभी परम पवित्र तथा सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। इनमें जहाँ कहीं भी स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

इस क्षेत्रका प्रथम भाग माहेश्वर कहा गया है, जो परम पवित्र है। दूसरा वैष्णवभाग और तीसरा ब्रह्मभाग है, ब्रह्मभागमें एक करोड़ तीर्थ हैं। वैष्णवभागमें भी एक कोटि तीर्थ हैं। इन दोनोंके मध्यमें रुद्रभाग (या माहेश्वरभाग) है। इसमें डेढ़ करोड़ तीर्थ हैं। इस प्रकार यह क्षेत्र तीन देवताओंका बताया गया है। यह गोपनीयसे भी गोपनीय तथा मुझे विशेष प्रिय है। सब विभागोंको मिलाकर इस क्षेत्रमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं। इसकी यात्रा भी तीन प्रकारकी है—पहली रौद्री यात्रा, दूसरी वैष्णवी यात्रा और तीसरी ब्राह्मी यात्रा कही गयी है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाली है। ब्राह्म-विभागमें इच्छाशक्ति कही गयी, वैष्णवभागमें क्रियाशक्ति और तीसरे रुद्रभागमें ज्ञानशक्ति बतायी गयी है। पापी, शठ अथवा दूसरोंको हानि पहुँचानेवाला मनुष्य ही क्यों न हो, यदि वह प्रभासक्षेत्रके मध्यभागमें निवास करता है तो सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। हिमवान्, गन्धमादन, कैलास, निषध, परम प्रकाशमय मेरुगिरि, मनोहर त्रिकूट, महागिरि मानसोत्तर, रमणीय देवोद्यान, नन्दनवन तथा स्वर्गलोकके रमणीय तीर्थ और मन्दिर—इन सबको छोड़कर प्रभासमें मेरा मन लगता है। देवि! जो एकाग्रचित्त होकर प्रभासमें संयमपूर्वक निवास करता है, वह तीनों समय भोजन करके भी वायु पीकर रहनेवाले तपस्वीके समान पुण्यफलका भागी होता है। जो विघ्नोंसे आक्रान्त होकर भी प्रभासतीर्थका सेवन नहीं छोड़ता, वह जरा और मृत्युको त्याग देता तथा जन्मके अशाश्वत चक्रसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य प्रभासक्षेत्रमें निश्चयपूर्वक निवास करते हैं, उनको एक ही जन्ममें मोक्ष प्राप्त हो जाता है। जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण प्रभासक्षेत्रमें स्थित हैं, जो मृत्युंजय-मन्त्रके साथ शतरुद्रियका जप करते हैं, उन्हें छः महीनेके भीतर ज्ञान प्राप्त हो जाता है। नामका पर्याय बतानेवाले विद्वान् पुरुष शिव कहते हैं वेदको। शतरुद्र मन्त्र शिवस्वरूप वेदका आत्मा है। जो प्रभासक्षेत्रमें आकर 'ईड्यम्' इत्यादि मन्त्रसे मेरा पूजन करते हैं, वे निःसन्देह मुक्त हो जाते हैं। जो मनुष्य वहाँ समन्त्र या अमन्त्रभावसे रहते हैं, अर्थात् मन्त्र जपे

१२१८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

या न जपें, केवल वहाँ सदा निवास करते हैं, वे भी जिस गतिको पाते हैं, वह बड़े-बड़े दानों और यज्ञोंसे भी नहीं मिलती। इस क्षेत्रमें स्वयम्भू लिंगके रूपमें साक्षात् हम महेश्वर ही निवास करते हैं। प्रभासमें भगवान् सोमनाथके दक्षिणमें करोड़ों रुद्र स्थित हैं। ब्रह्माण्डमें जितने तीर्थ हैं, वे सभी वैशाखकी चतुर्दशीको सोमनाथके समीप जाते हैं। प्रभासक्षेत्रमें निवास करनेवाले पुरुषोंके लिये जो सद्गति बतायी गयी है, वह न तो कुरुक्षेत्रमें है न हरिद्वारमें और न पुष्करमें ही है। देवदेव महादेवजीका वह गुप्त क्षेत्र सात योजन है। वहाँ ब्रह्मा और विष्णु आदि देवता तथा असंख्य योगी सनातन भगवान् मुझ सदाशिवकी उपासना करते हैं। वे सभी मेरे भक्त हैं और मेरी उपासनामें तत्पर रहते हैं। संयमशील संन्यासी आठ मासतक भ्रमण करते हैं और चार मासतक एक जगह प्रभासतीर्थमें नियम ग्रहण करके उन्हें निवास करना चाहिये। एक मनुष्य सोमेश्वर शिवका पूजन करता है और दूसरा तप करता है; उन दोनोंमें वही श्रेष्ठ है, जो सोमनाथकी पूजामें संलग्न है। जो योग, सांख्य, पांचरात्र तथा अन्य शास्त्रोंद्वारा जाननेयोग्य हैं, वे ही शिव प्रभासक्षेत्रमें स्थित हैं। सोमनाथ लिंगमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत् स्थित है, इसलिये उस लिंगमें सदा महादेवका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। मनुष्य मानव-बुद्धिके अनुसार जो कुछ भी अशुभ कर्म कर बैठता है, वह श्रीसोमनाथके पूजनसे विलीन हो जाता है। वेदवादी पुरुष जिन्हें कालाग्निरुद्र कहते हैं, वे ही भैरव नामसे प्रभासतीर्थमें स्थित हैं। मैं ही भैरवरूप धारण करके सब पापोंका नाश करता हूँ। 'अग्निमीळे' इस मन्त्रके द्वारा जिसके प्रभावका वर्णन हुआ है, वही मैं प्रभासक्षेत्रमें 'अग्निमीळ' नाम धारण करता हूँ। इसके सिवा सब देवताओंने वहाँ मेरा नाम 'कालाग्निरुद्र' भी रखा है। मेरा एक नाम 'अग्नीशान' भी है। इस प्रकार तीन नाम बताये जाते हैं। प्रत्येक कल्पमें जो मेरे नाम होते हैं, उनकी गणना नहीं की जा सकती। क्योंकि कल्प और ब्रह्मा असंख्य हैं। इस प्रकार यह सोमेश्वर देवका रहस्य परम गोपनीय है। देवि! तुम्हारे प्रति स्नेह होनेसे और तुम्हारी भक्तिके कारण यह सब मैंने तुमसे कहा है।

पुरुष, स्त्री, बालक, वृद्ध, नपुंसक, चाण्डाल, पुक्कस, शूद्र, म्लेच्छ, मूर्ख तथा अन्य जो निन्दित मनुष्य इस पृथ्वीपर निवास करते हैं, वे सब यदि प्रभासतीर्थमें मृत्युको प्राप्त हों तो मुक्त हो जाते हैं। यहाँ मैंने दक्षिण भागमें विश्वनाथकी और उत्तरमें दण्डपाणिकी स्थापना की है। वे दोनों इस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं। अन्यान्य गणाध्यक्ष भी मेरी आज्ञाके अधीन होकर इस क्षेत्रकी रक्षा करते रहते हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—महारुद्र, चण्डीश, घण्टाकर्ण, गोमुख, विनायक, महानाद, काकवक्त्र, शुभेक्षण, एकाक्ष, दुन्दुभि, चण्ड, तालजंघ, भूमिदण्ड, दण्ड, शंकुकर्ण, वैधृति, तालदण्ड, महातेजा, चिपिटाक्ष, हयानन, हस्तिवक्त्र, श्ववक्त्र, विडालवदन, सिंहमुख, व्याघ्रमुख तथा वीरभद्र। ये सब गणेशजीको आगे रखकर देवदेव शिव तथा इस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं। प्रभासक्षेत्रमें कुल एक अरब, ग्यारह करोड़, तेरह लाख गण निवास करते हैं। वे सभी प्रभासक्षेत्रकी रक्षामें तत्पर रहते हैं। अट्टहास नामक गणाध्यक्ष सौ करोड़ गणोंके साथ पूर्वद्वारमें रहकर इस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं। घण्टाकर्ण नामक गण अन्य अठारह करोड़ गणोंके साथ दक्षिण द्वारपर रहते हैं। विस्वर नामक गण पश्चिम द्वारके रक्षक हैं तथा दण्डपाणि देवदेव सोमेश्वरके उत्तर द्वारपर रहते हैं। ईशानकोणमें भीषणस्य, अग्निकोणमें छागवक्त्र, नैर्ऋत्यकोणमें चण्ड तथा वायव्यकोणमें भैरवानन रक्षा करते हैं। नन्दी, महाकाल, दण्डपाणि और विनायक—ये मध्यभागमें सौ कोटि गणोंके साथ सोमनाथके अंगरक्षक हैं। इस प्रकार असंख्य गणाध्यक्ष उस क्षेत्रकी रक्षामें रहते हैं। कलियुगके पातकोंसे जिनका चित्त दूषित है, उनके लिये मेरा वह

* प्रभासखण्ड * १२१९


स्थान अगम्य है। मेरे लोकमें जो पातालवासी सिद्ध हैं, वे कालभैरव सोमनाथकी प्रदक्षिणा करते हैं। पृथ्वीमें जो पुण्यतीर्थ, मन्दिर और देवता हैं, वे सभी सोमेश्वर देवकी परिक्रमा करते हैं।

शाकुनि, भारभूति, आषाढि, दण्ड, पुष्कर, नैमिष, अमरेश्वर, भैरव, मध्यम, काल, केदार, कणवीरक, अट्टहास, महेन्द्र, श्रीशैल तथा गया आदि सभी तीर्थ भगवान् सोमनाथकी प्रदक्षिणा तथा उनके लिंगकी स्तुति करते हैं। जहाँ प्राची सरस्वती है, वहाँ दस सहस्र अरब तथा तीन करोड़ ऋषि निवास करते हैं। जो मनुष्य यहाँ अपने पापनाशके लिये स्नान करेंगे, उन्हें दस गोदानका पुण्य प्राप्त होगा। वहाँपर शूलभेद आदि लिंग पूजन करने योग्य हैं। महापापाचारी मनुष्य भी प्राची सरस्वतीमें प्राणत्याग करके साक्षात् शिवको प्राप्त होता है। विप्रवरो! वहाँ दही और कम्बल दान करने चाहिये। यह दान सब पापोंका नाश करनेवाला तथा सारसे भी सार पुण्य है। ब्राह्मस्थानमें एक ब्राह्मणको भोजन करानेसे कोटिगुना फल मिलता है। यह जानकर मैं वहाँ प्रसन्नतापूर्वक स्थित रहता हूँ। कलियुगमें वहाँ सभी तीर्थ अदृश्य होकर रहते हैं। मनोहर प्रभासक्षेत्रमें जहाँ सोमनाथजी स्थित हैं, वहाँ मेरे दो गण उद्भ्रम और संभ्रम रहते हैं। वे वहाँ रहनेवाले दुष्ट लोगोंके मनमें भ्रम एवं विभ्रम उत्पन्न कर देते हैं। इस प्रकार वे दुष्ट चित्तवाले प्राणियोंसे उस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं।

जो श्रेष्ठ मानव इस तीर्थमें भक्तिपूर्वक दण्डपाणिका दर्शन करते हैं, उन्हें किसी प्रकारका विघ्न नहीं प्राप्त होता। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा वर्णसंकर इच्छा या अनिच्छासे उस शुभ क्षेत्रके भीतर मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे सभी मेरा सारूप्य प्राप्त करके मेरे दिव्यधाममें चले जाते हैं। मेरु, सातों द्वीप तथा सातों समुद्रोंके गुणोंका वर्णन किया जा सकता है; परंतु आदिदेव सोमेश्वर शिवके गुणोंका वर्णन सौ कोटि वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता है।

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सोमनाथके दिव्य स्वरूपका दिग्दर्शन

महादेवजी कहते हैं—देवि! जो निर्भय, निर्मल, नित्य, निरपेक्ष, निराश्रय, निरंजन, निष्प्रपंच, निःसंग तथा निरुपद्रव तत्त्व है, वही प्रभासतीर्थमें सोमेश्वर लिंगके रूपमें स्थित है—यह समझो। जो मोक्षदायक, अज्ञेय, अनुपम, अनामय, नित्य, कारणरूप, दिव्य, निर्लेप, विश्वतोमुख, शिव, सर्वात्मक, सूक्ष्म, अनादि, दैवतरूप, आत्मस्वरूपसे जाननेयोग्य, चित्तके चिन्तनसे परे, गमनागमनसे मुक्त, बाहर-भीतर व्याप्त, केवल (अद्वितीय), निष्कल, निर्मल एवं ज्ञानका प्रकाशक है, वही प्रभासतीर्थमें प्रणवमय सोमेश्वर लिंगके रूपमें स्थित है—यह जानो। स्पन्दरहित, महात्मा, भावातीत, लक्षणरहित, वाक्प्रपंच आदिसे शून्य, निष्प्रपंच, शिव, ज्ञान और ज्ञेयकी दृष्टिमें स्थित, हेत्वाभासशून्य, अनाहत, शब्दगत तथा शब्दादि गुणोंको प्रकट करनेवाले—ऐसे विशेषणोंसे युक्त मुझ शिवको ही प्रभासक्षेत्रमें सोमनाथ लिंगके रूपमें प्रकट मानो।

प्रभासक्षेत्रमें शिवलिंगरूपी सोमनाथको शब्द-ब्रह्ममय, शान्त, अशान्त, निरास्पद, सबसे दूर, सबके ध्यानमें स्थित, अनादि, अच्युत, दिव्य, प्रमाणातीत, प्रमाणगोचर, अधोगत, ऊर्ध्वगत, नित्य, देहस्थित जीवरूप, हृदय आदि बारह अंगोंमें स्थित, प्राण और अपानके उदय-अस्तमें व्याप्त, अग्राह्य, इन्द्रियरूप, निष्कलंक, सूक्ष्म, स्वरका आदि, व्यंजनसे अतीत, वर्ण आदिसे रहित, निःशब्द, निष्कल, सौम्य, देहातीत, परात्पर, समस्त भूतोंके लिये अगम्य, भावाभावसे रहित,

१२२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भावभक्तिसे जानने योग्य, परम सूक्ष्म, पचीस तत्त्वोंकी उत्पत्तिका कारण, अप्रमेय, अनन्त, अक्षय, इच्छानुसार रूपधारी, सब प्राणियोंकी उत्पत्तिका कारण, बीज और अंकुरको भी प्रकट करनेवाला, व्यापक, सर्वकाम, अक्षर (नाशरहित), परमपद, स्थूल और सूक्ष्म सभी विभागोंमें स्थित, व्यक्ताव्यक्तस्वरूप, सनातन, कल्प-कल्पान्तरहित, अनादि, अनन्त, महाभूत, महाकाम, शिव तथा निर्वाणभैरव समझो। इतना ही नहीं, उन्हें योगक्रियासे मुक्त, मृत्युंजय, अनादिमान्, समस्त उपसर्गोंसे रहित, सर्वव्यापी, शिव, परम अकल, द्वैतवर्जित, अन्य तेजसे रहित, प्रभासक्षेत्रनिवासी, सूर्यके समान अधिक कान्तिमान्, सम्पूर्ण तेजोंसे अधिक बढ़े हुए, शरणागतवत्सल, ईशान, देव, ॐकार, शिवरूपी, देवदेव, महादेव, पंचमुख, वृषध्वज, निर्मल, मनके अगोचर, भावग्राह्य, उपमारहित, सदा शान्त, विरूपाक्ष, शूलहस्त, जटाधर, हृदयकमलके मध्यकोषमें विराजमान, शून्यरूप तथा निरंजन जानो। जो परात्पर देव 'हंस' और 'नाद' कहे गये हैं, वे ही इस प्रभास-स्थानमें स्वयं विराजमान हैं।

देवि! अपने इस आदिस্বরূপको मैंने योगबलसे जाना है और स्वयं ही इसका निरूपण किया है। ये सोमनाथ पूर्वाह्नकालमें ऋग्वेदमें स्थित होते हैं, मध्याह्नमें यजुर्वेदके भीतर इनकी स्थिति होती है, अपराह्नकालमें सामवेदमें और सन्ध्याके समय अथर्ववेदमें ये विराजमान होते हैं। मैं अन्धकारसे परे, सूर्यके समान प्रकाशमान इस अन्तर्यामी महापुरुष सोमेश्वरको जानता हूँ। इनको ही जानकर मनुष्य कभी मृत्युको नहीं प्राप्त होता (मुक्त हो जाता है)। मनुष्योंकी मुक्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं है। पार्वती! इस प्रकार महामहिमाशाली सोमनाथके माहात्म्यका दिग्दर्शन-मात्र कराया गया है।

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सोमनाथके आठ नाम और पार्वतीके अठारह नामोंका वर्णन, सोमनाथ नामका हेतु तथा सोमेश्वरकी महिमा

सूतजी कहते हैं— महर्षियो! महादेवी पार्वती ने इस प्रकार प्रभासकी महिमा सुनकर पुनः भगवान् शंकरसे पूछा—'देवदेव! जगन्नाथ! भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले! सम्पूर्ण ज्ञानसे सम्पन्न! सुरेश्वर! आपको नमस्कार है। प्रभो! इस दिव्य लिंगका 'सोमेश्वर' नाम किस समय हुआ?'

महादेवजीने कहा— पूर्वकालमें मैं ही स्पर्शलिंग-स्वरूपसे विद्यमान था। उस समय कोई भी मनुष्य यहाँ मुझे नहीं जानता था। जब प्रलयके बाद महाकल्पका प्रारम्भ होता है और ब्रह्माका भी लय होकर नूतन ब्रह्माकी सृष्टि होती है। उस समय मेरे इस दिव्य लिंगका नाम भी बदलकर दूसरा हो जाता है। अबतक छः ब्रह्मा बदल गये हैं और अब ये सातवें ब्रह्मा चल रहे हैं। इस समय जो प्रजापति ब्रह्मा हैं, इनका नाम 'शतानन्द' है। देवेश्वरि! ये ब्रह्मा जब आठ वर्षके हुए, तबसे लेकर मेरे इस लिंगका नाम सोमनाथ प्रसिद्ध हुआ है। बीते हुए कल्पोंमें जो पहले ब्रह्मा थे, उनका नाम 'विरिंचि' था। उनके समयमें इन सोमनाथका नाम 'मृत्युंजय' था। तत्पश्चात् दूसरे कल्पमें जो दूसरे ब्रह्मा हुए, वे 'पद्मभू' नामसे विख्यात हुए। देवि! उनके समयमें मेरे इस लिंगका नाम 'कालाग्निरुद्र' हुआ। तीसरे ब्रह्माकी प्रसिद्धि 'स्वयम्भू' नामसे हुई है। उस समय सोमनाथका नाम 'अमृतेश' था। चौथे ब्रह्मा 'परमेष्ठी' नामसे विख्यात हुए; उस समय उनका नाम 'अनामय' था। पाँचवें ब्रह्मा 'सुरज्येष्ठ' नामसे विख्यात हुए। उस समय

  • प्रभासखण्ड * १२२१

सोमेश्वरदेवका नाम 'कृत्तिवास' था। छठे ब्रह्माका नाम 'हेमगर्भ' था। उनके समयमें सोमनाथका नाम 'भैरवनाथ' रखा गया था। ये जो सातवें ब्रह्मा हैं, 'शतानन्द' कहलाते हैं; इस समय मेरे इस लिंगका नाम 'सोमनाथ' प्रसिद्ध हुआ है। इसके बाद आगामी कल्पमें आठवें ब्रह्मा 'चतुर्मुख' नामसे विख्यात होंगे। उस समय सोमेश्वरदेवका नाम 'प्राणनाथ' होगा। इस तरह जो-जो ब्रह्मा बीत जाते हैं और प्रलयके पश्चात् पुनः जो नये ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, उनकी आठ वर्षकी आयु होनेतक 'सोमेश्वरदेवका' एक नाम रहता है। उसके बाद वह बदल जाता है। इस प्रकार संक्षेपमें मैंने तुम्हें 'सोमनाथ' के नाम बताये हैं।

पार्वतीदेवी बोलीं— देवदेवेश्वर! मनुष्योंके ऊपर दया करनेके लिये मैं भी आपके साथ बार-बार प्रकट हुई हूँ। उस समय मेरे कौन-कौन-से नाम हुए हैं, यह भी बताइये।

महादेवजीने कहा— आदिकल्पमें तुम्हारा नाम 'जगन्माता' था। दूसरेमें 'जगद्योनि', तीसरेमें 'शाम्भवी', चौथेमें 'विश्वरूपिणी', पाँचवेंमें 'नन्दिनी', छठेमें 'गणाम्बिका', तथा सातवेंमें तुम्हारा नाम 'विभूति' हुआ है। इसी प्रकार आठवेंमें 'सुभू' नवेंमें 'आनन्दा', दसवेंमें 'वामलोचना', ग्यारहवेंमें 'वरारोहा', बारहवेंमें 'सुमंगला', तेरहवेंमें 'महामाया', चौदहवेंमें 'अनन्ता', पंद्रहवेंमें 'भूतमाता', सोलहवेंमें 'उत्तमा' तथा सत्रहवें कल्पमें तुम्हारा नाम 'पितृकल्पा' प्रसिद्ध हुआ है। तत्पश्चात् तुम दक्षकन्या सतीके नामसे प्रसिद्ध हुई। उस समय दक्षद्वारा अपमानित होनेसे तुमने अपना शरीर त्याग दिया। तदनन्तर वाराहकल्प आनेपर पुनः हिमवान्ने तुम्हारी आराधना करके तुम्हें पुत्रीरूपमें प्राप्त किया। उसके बाद अत्यन्त दुष्कर एवं अद्भुत तपस्या करके तुमने मुझे पतिरूपमें पाया और 'पार्वती' नामसे प्रसिद्ध हुई। सुमुखि! जबतक इस कल्पका अन्त होगा, तबतक मैं तुम्हारे साथ कैलास पर्वतपर क्रीडा करूँगा। द्वापरमें महिषासुरका वध करनेके लिये तुम भगवान् विष्णुके साथ 'कृष्णपिंगला' नामसे प्रकट हुईं। तबसे 'कात्यायनी' और 'दुर्गा' आदि विविध नामोंसे तुम नवकोटि भेदके साथ वसुधातुलपर प्रकट हुईं। सुन्दरि! पूर्वकालमें जो तुम्हारे कल्पानुसार नाम थे तथा जो भूत, भविष्य एवं वर्तमानमें तुम्हारे नाम थे, होंगे और हैं, वे सब नाम मैंने बता दिये। उन्हें इसी प्रकार जानना चाहिये।

शतानन्द नामसे विख्यात जो ये ब्रह्माजी हैं, उनके आठवें वर्षमें जो पहले मनु हुए थे और उस मन्वन्तरमें जो प्रथम चन्द्रमा थे, वे लक्ष्मी और कौस्तुभमणि आदिके साथ समुद्रसे प्रकट हुए। उन्होंने कालभैरव नामसे इस सोमेश्वर लिंगकी आराधना की और बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न हो चौदह युग व्यतीत किये। सुन्दरि! उनकी वह अद्भुत तपस्या देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ और बोला—'चन्द्रदेव! वर माँगो।' शुभे! तब उन्होंने अपने भक्तिभावसे मुझे संतुष्ट करके कहा—'प्रभो! ये ब्रह्माजी जबतक रहें, तबतक आपका नाम 'सोमनाथ' के रूपमें प्रसिद्ध हो।' मन्वन्तर समाप्त होनेपर जो कोई भी दूसरे-दूसरे चन्द्रमा हों, उन सबके ये सोमनाथजी कुलदेवता हों। तब मैं 'तथास्तु' कहकर पुनः उस शिवलिंगमें ही लीन हो गया। यह मैंने सोमनाथके गुणोंको संक्षेपसे सूचित किया है। समुद्रके रत्नोंकी भाँति सोमेश्वरके गुणोंका विस्तार अचिन्त्य है। उनकी महिमाका चिन्तन भक्तोंकी बुद्धिको बढ़ानेवाला है। मदमोहित मूढ़ मानव उनके स्वरूपको नहीं देख पाते।

पार्वतीदेवीने पूछा— भगवन्! जिस तेजोमय लिंगका ऐसा माहात्म्य है, उसकी इस प्रभास-क्षेत्रमें कहाँ स्थिति है?

महादेवजीने कहा— देवि! सुनो—वज्रिणी नदीके पूर्व न्यंकुमती नदीतक चार योजन चौड़ा और पाँच योजन लम्बा मेरा गर्भगृह है; इसको मैं कभी नहीं छोड़ता। पश्चिम दिशामें समुद्रके

१२२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


समीप कृतस्मरके आगे सौ धनुषकी दूरीपर मेरा महाप्रभावशाली स्वयम्भू लिंग स्थित है; उसमें साक्षात् परमेश्वर भगवान् शंकररूप मैं निवास करता हूँ। इसीके बीचमें सोमेश्वरके समीप चारों ओर चौदह भागोंमें दो-दो सौ धनुषकी गोलाकार कर्णिका है, जो मुझे बहुत प्रिय है। उसमें जो प्राणी निवास करते हैं, वे सब पातकोंसे शुद्ध हो मेरे लोकमें जाते हैं। जो मनुष्य सैकड़ों विघ्नोंसे घिरकर या बँधकर भी प्रतिज्ञापूर्वक जीवनभर इस क्षेत्रमें निवास करता है, वह उस परमधाममें जाता है, जहाँ जाकर कोई भी शोक नहीं करता। जो प्रभासक्षेत्रमें मरता है, वह यमलोकमें नहीं जाता है। भयंकर कलिकालका आगमन जानकर मैंने यहाँ रक्षाके लिये विघ्नराज गणेशजीको स्थापित किया है। ब्रह्मघाती, पातकी, ब्राह्मणद्वेषी, शिवभक्तोंकी निन्दा करनेवाले, कृतघ्न, शठ, लोकशत्रु, गुरुद्रोही, तीर्थों और मन्दिरोंके लिये कण्टकरूप तथा पापपरायण निन्दित मनुष्य यदि इस क्षेत्रमें प्राणत्याग करते हैं, तो वे दस हजार दिव्य वर्षोंतक दासीपुत्र होते हैं। उसके बाद ब्रह्मराक्षस होते हैं। तदनन्तर हीन योनि (अथवा पक्षियोंकी योनि)-में जन्म लेते हैं। अतः पूर्ण प्रयत्न करके वहाँ कभी पाप न करे। अन्य-अन्य स्थानोंका पाप इस क्षेत्रमें नष्ट होता है, परंतु यहाँका किया हुआ पाप पिशाचयोनि एवं नरकमें डालनेवाला होता है। जो मनुष्य अपने चित्तको एकाग्र एवं संयत रखकर इन्द्रियोंको वशमें करके मेरा ध्यान करते हुए यहाँ शतरुद्रियका जप करते हैं, वे निःसन्देह सिद्ध होते हैं। यदि कोई मनुष्य उत्तम प्रभासक्षेत्रको जाय तो उसे ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे वह फिर वहाँसे बाहर न जाय। भूलोकमें जो लिंग हैं, उन सबमें सोमनाथ मुझे विशेष प्रिय है। देवि! इस दिव्य लिंगमें जो गुण हैं, वे मुझे ही ज्ञात हैं; उन्हें मैं ही जानता हूँ। दूसरा कोई किसी प्रकार भी नहीं जानता।

जिस समय न ब्रह्मा थे न भूमि थी, न सूर्य थे और न यह सम्पूर्ण जगत् ही था, उस समय ब्रह्माजीके प्रलयकालमें यह दिव्य लिंग भाविनीवृत्तिका आश्रय ले (अर्थात् भविष्यमें मुझे यहाँ प्रकट होना है, ऐसी भावना रखकर) इस स्थानकी रक्षा करता रहा। प्रभासमें निवास करनेवाले वे मानव धन्य हैं, जो संसारका भय दूर करनेवाले भगवान् सोमनाथका दर्शन करते हैं। देवि! जो मनुष्य शुद्धचित्त होकर सोमनाथका स्मरण करेंगे, उनके सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जायगा। यह पवित्र क्षेत्र मुझे सदैव अत्यन्त प्रिय है। पार्वती! देव, मनुष्य आदि सब लोग तभीतक संसारमें भ्रमण करते हैं जबतक कि मेरे स्वरूपभूत सोमनाथको नहीं प्राप्त होते। यह प्रभासक्षेत्र मोक्षधाम कहा गया है। इस प्रकार मैंने तुम्हारी जानकारीके लिये सोमनाथके महान् भावका वर्णन किया है। जो मनुष्य सदा इसका पाठ करेंगे, वे मुझ चन्द्रमौलि शिवके धाममें जायँगे। देवि! जो भक्त जन सोमेश्वरदेवकी शरणमें जाते हैं, वे इस भयंकर संसार-चक्रमें फिर नहीं भटकते।


सोमनाथकी महिमा

महादेवजी कहते हैं— देवि! जितने भी ग्रहदोष और भूतदोष हैं तथा जो भी डाकिनियाँ, प्रेत, वेताल, राक्षस, ग्रह, पूतनाएँ, पिशाच, यातुधान, मातृकाएँ, नवजात शिशुओंका अपहरण करनेवाली राक्षसियाँ, बालग्रह, वृद्धग्रह, ज्वररूपी ग्रह, अतिसार, भगन्दर, पथरी रोग, मूत्रकृच्छ्र, अन्य सहस्रों रोग, दुर्नामिका (बवासीर), कोढ़ तथा अन्यान्य रोग-व्याधियाँ हैं, वे सभी सोमनाथके समीप जाकर उनका दर्शन करनेसे उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे जलती आगमें डाला हुआ ईंधन तत्काल जलकर भस्म हो जाता है। देवेश्वरि! सोमेश्वर नामसे प्रसिद्ध ये जो पश्चिम

  • प्रभासखण्ड * १२२३

भैरव हैं, 'कालाग्निरुद्रनाथ' जिनका नामान्तर सुना गया है, उनमें मैं स्वयं ही भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये निवास करता हूँ। उस सोमेश्वर लिंगमें स्थित हो मैं मनुष्योंके सब पापोंको भक्षण कर लेता हूँ। देहधारियोंके देहमें विचरण करनेवाला जो प्राण है, उसीके समान जो सबका प्राण है, यह ब्रह्माण्ड जिसके भीतर स्थित है तथा जो एक होकर भी अनेक रूपोंमें व्यक्त है, वही शिवस्वरूप मैं भक्तोंपर कृपा करनेके लिये सोमनाथ लिंगमें निवास करता हूँ। सम्पूर्ण वेद और महर्षिगण जिनकी प्रशंसा करते हैं तथा जिनके द्वारा परब्रह्मके स्वरूपकी प्राप्ति होती है, वे ही ये सोमनाथ महादेव प्रभासतीर्थमें विराजमान हैं। जैसे घरमें छिपे हुए रत्नको कोई नहीं पाता, उसी प्रकार मेरे प्रभासरूपी घरमें रत्नके समान स्थित इस सोमेश्वरलिंगके यथार्थ स्वरूपको कोई नहीं जानता। पूर्वकल्पमें यह शिवलिंग सप्त पातालका भेदन करनेवाला था, तथा कोटि-कोटि सूर्यों तथा प्रलयाग्निके समान तेजस्वी था। इसीलिये पूर्वकालमें सोमनाथको 'कालाग्निरुद्र' कहा जाता था। देवि ! इस प्रकार संक्षेपसे मैंने तुम्हें सोमेश्वरदेवका माहात्म्य बताया है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है।


प्रभासमें भगवान् शिवका स्वरूप, पार्वतीद्वारा उनकी स्तुति तथा प्रभासक्षेत्रमें भगवान् विष्णुकी स्थितिका कारण

महादेवजी कहते हैं—देवि ! मैं प्रभासक्षेत्रमें रुद्राक्षकी माला धारण किये शान्त भावसे स्थित हूँ। मेरा आदि, मध्य और अन्त कहीं नहीं है। मैं कमलके आसनपर बैठा हुआ सबको वर देनेके लिये उद्यत हूँ। हिम, कुन्द और चन्द्रमाके सदृश मेरा गौर वर्ण है। मेरे वाम भागमें विष्णु तथा दक्षिण भागमें ब्रह्माजी विराज रहे हैं। मेरे उदरमें चारों वेद और हृदयमें सनातन ब्रह्म स्थित हैं। नेत्रोंमें अग्नि, चन्द्रमा और सूर्यका निवास है। महादेवि ! ऐसे स्वरूपसे मैं प्रभासक्षेत्रमें रहता हूँ।

यह सुनकर पार्वती देवीने हर्षगद्गद वाणीमें देवदेवेश्वर शिवका भक्तिपूर्वक स्तवन किया—देव ! महादेव ! सर्वभावन ! ईश्वर ! आपको नमस्कार है। आप समस्त देवताओंके स्वामी हैं, आपको नमस्कार है। आप परमेश्वरको नमस्कार है। आप अनादि हैं, सम्पूर्ण सृष्टिके विधाता हैं; आपको नमस्कार है। आप सर्वत्र व्यापक ईश्वर हैं, आपको नमस्कार है। आप सबमें स्थित हैं, आपको नमस्कार है। आप धाम (तेज)-के भी धाम (प्रकाशक या आश्रय) हैं, आपको नमस्कार है। आप सृष्टिदाताको नमस्कार है। मोक्षदाता परमेश्वर ! आपको नमस्कार है।

पार्वतीके इस प्रकार स्तवन करनेपर भगवान् शिवने सन्तुष्ट होकर कहा—महाप्राज्ञे ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम अभीष्ट वरदान माँगो।

पार्वतीने कहा—देवेश्वर ! प्रभासक्षेत्रका माहात्म्य फिरसे कहिये। भगवान् विष्णु द्वारकापुरी छोड़कर किस कारण प्रभासक्षेत्रमें निवास करते हैं? जिन्होंने पूर्वकालमें वाराहरूप धारण करके पर्वत, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीका उद्धार किया तथा नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुका संहार किया; वेद जिन्हें प्रत्येक युगमें सहस्रों चरण, सहस्रों नेत्र तथा सहस्रों मस्तकवाले कहकर उनकी स्तुति करते हैं; ब्रह्माजीका निवासभूत पद्म जिनकी नाभिसे प्रकट हुआ है, जो क्षीरसमुद्रके उत्तर भागमें शाश्वत योगका आश्रय लेकर शयन करते हैं, जो युगान्तका भी अन्त करनेवाले तथा लोकान्तकारी अन्तकके भी अन्तक हैं, लोक-मर्यादाओंकी रक्षा करनेवाले सेतु हैं, वेदवेत्ताओंके भी ज्ञाता हैं और उत्पन्न

१२२४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

होनेवाले सभी प्राणियोंके स्वामी हैं, जो मनुष्योंके आदिप्रवर्तक मनु तथा तपस्वीजनोंके तप हैं, तेजस्वी पुरुषोंके तेज और गतिमानोंकी गति हैं, वे श्रीहरि द्वारका छोड़कर प्रभासतीर्थमें कैसे चले आये?

महादेवजीने कहा—देवि! पृथ्वीपर अनेक क्षेत्र हैं, करोड़ों तीर्थ हैं और उन सबमें असंख्य प्रभाव हैं; परंतु प्रभासतीर्थका प्रभाव उन सबसे बढ़कर है। ब्रह्मतत्त्व, विष्णुतत्त्व तथा रुद्रतत्त्व—इन तीनोंकी प्रभासमें ही एकत्र उपलब्धि होती है। अन्यत्र ऐसा सुयोग दुर्लभ है। प्रभासमें लोकपितामह ब्रह्माजी चौबीस तत्त्वोंके साथ रहते हैं। दैत्योंके संहारक देवाग्रगण्य भगवान् विष्णु पचीस तत्त्वोंके अधिपति होकर इस तीर्थमें स्थित हैं और मैं छत्तीस तत्त्वोंसे संयुक्त होकर तुम्हारे साथ प्रभासमें निवास करता हूँ। शुभे! इस प्रकार तुम केवल प्रभासतीर्थको ही तत्त्वमय एवं सर्वतीर्थमय समझो। स्त्री, म्लेच्छ, शूद्र, पशु, पक्षी और मृग—जो भी प्रभासक्षेत्रमें मरते हैं, सभी शिवके लोकमें जाते हैं।

प्रभासके पार्थिवभागमें ब्रह्मा, जलभागमें विष्णु, तैजसभागमें रुद्र, वायुभागमें कुबेर तथा आकाशभागमें साक्षात् सदाशिवरूप हम स्थित हैं। अमरेश, प्रभास, नैमिष, पुष्कर, आषाढि, दण्ड, भारभूति और लांगलि—ये आठ आदिगुह्य हैं, जो जलके आवरणमें स्थित हैं। हरिश्चन्द्र, श्रीशैल, जालेश्वर, प्रीतिकेश्वर, महाकाल, मध्यम, केदार तथा भैरव—ये आठ अति गुह्य क्षेत्र हैं, जो तेजस्तत्त्वमें प्रतिष्ठित हैं। गया, काशी, कुरुक्षेत्र, कनखलतीर्थ, विमलतीर्थ, अट्टहास, महेन्द्र और भीम—ये आठ गुह्याद्गुह्यतर क्षेत्र हैं, जो वायु तत्त्वमें स्थित हैं। वस्त्रापथ, रुद्रकोटि, ज्येष्ठेश्वर, महालय, गोकर्ण, रुद्रकर्ण, कर्णाक्ष और स्थाप—ये आठ पवित्राष्टक कहलाते हैं; इनकी स्थिति आकाशतत्त्वमें है। छागल, वुडसुड, माकोट्ट, अचलेश्वर, कालञ्जरवन, शंकुकर्ण, स्थलेश्वर तथा शूलेश्वर—ये आठ पृथ्वीतत्त्वमें स्थित हैं। जो देवता जिस तत्त्वमें स्थित है, वह उसीके माहात्म्यको सूचित करता है। जलीय महातत्त्व भगवान् महाविष्णुको अत्यन्त प्रिय है। इसी कारण भगवान् नारायणको जलशायी कहते हैं। जलतत्त्वमें जितने तीर्थ मैंने बताये हैं, वे निश्चय ही भगवान् नारायणको प्रिय हैं। जलतत्त्वमें भी जो सारभूत तत्त्व है, उसमें ही प्रभासतीर्थकी स्थिति है; अतः श्रीहरि प्रत्येक अवतारके समय जलतत्त्वरूपी प्रभासमें ही लय (अन्तर्धान)-को प्राप्त होते हैं। वे भगवान् वासुदेव सूक्ष्म स्वरूप तथा परात्पर पदमें प्रतिष्ठित हैं। वे ही पर-व्योमस्वरूप, शिव आदि अन्तसे रहित एवं व्यापक हैं। सम्पूर्ण शास्त्रों, सिद्धान्तभूत आगमों तथा विशेषतः दर्शनोंमें भी उनसे भिन्न या बढ़कर कोई वस्तु नहीं बतायी गयी है। पार्वती! उन्हीं शास्त्रोंमें यह भी कहा गया है कि ‘वे मुझसे भिन्न नहीं हैं।’ प्रभासतीर्थमें चार शिवलिंगोंसे संयुक्त श्रीहरि प्रत्यक्ष रूपसे विराजमान हैं, किंतु यह बात किसीको ज्ञात नहीं है। प्रत्येक मासकी अष्टमी और चतुर्दशीको सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणके समय तथा कार्तिककी पूर्णिमाको मैं स्वयं प्रभासतीर्थमें स्थित शिवलिंगोंका पूजन करता हूँ। प्रत्येक माघमासकी पूर्णिमाको सभी तीर्थ सरस्वती और समुद्रके संगममें स्नान करनेके लिये प्रभासतीर्थमें आते हैं। उस तीर्थके नामका स्मरण करने, कीर्तन करने अथवा मृत्युकालमें वहाँ उपस्थित होनेसे भी मनुष्य अपने पूर्वकृत सभी पापोंको त्याग देता है। आनर्तसार, सौम्य, भुवनभूषण, दिव्य, पांचनद, आदिगुह्य, महोदय, सिद्धरत्नाकर, समुद्रावरण धर्माधार, कलाधार, शिवगर्भगृह, सर्वदेवनिवास तथा सर्वपातकनाशन—ये इस क्षेत्रके नाम हैं। जो एक-एक कल्पमें पृथक्-पृथक् प्रसिद्ध हुए हैं। अब गर्भगृहके नाम सुनो। आदिकल्पमें उसका नाम प्रमोदन था, उसके बाद क्रमशः नन्दन, शिव, उग्र, भद्रक, समिन्धन, कामद, सिद्धिद, धर्मज्ञ, वैश्वरूप, मुक्तिद, पद्मनाभ, श्रीवत्स,

* प्रभासखण्ड * १२२५


महाप्रभ, पापसंहार, सर्वकामदप्रद, मोक्षमार्ग, सुदर्शन, धर्मगर्भ तथा पापनाशन प्रभास। इसके बाद इसका नाम 'उत्पलावर्तिका' होगा। इस प्रकार ये क्षेत्रके मध्यवर्ती गर्भगृहके क्रमशः नाम बताये गये। इन सभी नामों तथा क्षेत्रकी महिमाको सुनकर मनुष्यको मनोवांछित सिद्धि प्राप्त होती है। जो तीनों समय इन नामोंका कीर्तन करता है, उसे महान् ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है तथा दिन, रात एवं सन्ध्याकालमें किये हुए पापोंका नाश हो जाता है। देवि! केदार क्षेत्रमें तथा महालयतीर्थमें जो लिंग है, वह और मध्यमेश्वर, पाशुपतेश्वर, शंकुकर्णेश्वर, भद्रेश्वर, सोमेश्वर, एकाम्रेश्वर, कालेश्वर, अजेश्वर, भैरवेश्वर, ईशानेश्वर, कायावरोहणेश्वर, चापटेश्वर, बदरिकाश्रम, रुद्रकोटि, महाकोटि, श्रीपर्वत, कपाली, देवदेवेश्वर, करवीरेश्वर, ॐकारेश्वर, वसिष्ठाश्रम तथा भूतलपर दूसरे-दूसरे जो मेरे पुण्यदायक स्थान हैं, वे सभी प्रयागतीर्थके साथ प्रभासक्षेत्रमें आकर निवास करते हैं। इस तीर्थके उत्तरमें सूर्यपुत्री और दक्षिणमें समुद्र है, यही इसके उत्तर-दक्षिणकी सीमाएँ हैं। इसी सीमाके भीतर पातालसे लेकर ब्रह्माण्डकटाहपर्यन्त जितने तीर्थ हैं, सभी निवास करते हैं।


प्रभासमें सूर्यदेव, सिद्धेश्वरलिंग तथा सिद्धलिंगकी महिमा

महादेवजी कहते हैं—देवि! दक्षिणमें समुद्रसे लेकर उत्तरमें (सूर्यपुत्री) कौरवेश्वरी नदीतकका जो क्षेत्र है, उसके भीतर मैं ही क्षेत्रज्ञरूपसे निवास करता हूँ। मेरा गृहरूप यह तीर्थ सूर्यनारायणकी किरणोंसे प्रभासित होता है, इसलिये इस कल्पमें प्रभास नामसे विख्यात हुआ है। जो श्रेष्ठ मनुष्य वहाँ अर्क (पूज्य)-रूप सूर्यका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। उसने मानो सब तीर्थोंमें स्नान कर लिया, समस्त बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा यजन किया, सभी दान दे दिये और सम्पूर्ण गुरुजनोंको सन्तुष्ट कर लिया। उसी सूर्यदेवके समीप अग्निकोणमें थोड़ी ही दूरीपर सिद्धेश्वर शिव विराजमान हैं। उनका त्रैलोक्यपूजित लिंग सब प्रकारकी सिद्धियोंका दाता है। प्राचीन सत्ययुगमें उसका नाम जैगीषव्येश्वर था। वही कलियुगमें सिद्धेश्वर नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ। देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य सब सिद्धियोंको प्राप्त कर लेता है। सूर्यके दक्षिण एवं नैर्ऋत्य कोणमें थोड़ी ही दूरपर एक पातालविवर है। वहींपर पूर्वकालमें मन्देह तथा शालकटंकट नामक राक्षस सूर्यनारायणके तेजसे दग्ध हो पातालमें भाग गये थे। वहाँपर योगिनियाँ तथा ब्राह्मी आदि मातृकाएँ रक्षा करती हैं।

पूर्वकल्पमें महोदय नामसे प्रसिद्ध एक शिवलिंग स्वतः प्रकट हुआ। महात्मा जैगीषव्य उसका पूजन करने लगे। वे अपने सब अंगोंमें भस्म लगाते और भस्मपर ही सोते थे। उन्होंने जप, तप, वृषके समान नाद तथा नृत्य और गीतोंके द्वारा महोदय शिवको सन्तुष्ट कर लिया। तब वे प्रसन्न होकर जैगीषव्यमुनिके समीप आये और बोले—'महामते! तुम दिव्य दृष्टिसे मेरी ओर देखो, तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे कहो।' जैगीषव्यने त्रिनेत्रधारी शिवको अपने सामने उपस्थित देख उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'देवदेवेश्वर! मुझे संसारबन्धनका नाश करनेवाला ज्ञान प्रदान कीजिये। आपमें, देवी पार्वतीमें, स्कन्दजीमें तथा गणेशजीमें सदा मेरी भक्ति बनी रहे तथा मुझमें निरहंकारता, क्षमा, शम और दम आदिकी वृद्धि हो।'

तब उन महादेवजीने कहा—तुम अजर, अमर, सब शोकोंसे रहित, महान् योगी, अत्यन्त शक्तिशाली तथा योगके ऐश्वर्यसे युक्त होओगे।

१२२६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

योगाचार्यके रूपमें तुम्हारी प्रसिद्धि होगी। जो तुम्हारे द्वारा पूजित इस शिवलिंगका पूजन करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त हो दिव्य योगको प्राप्त होगा। जो द्विज योगके लिये जैगीषव्यगुहाका आश्रय लेगा, वह सात रातमें योगयुक्त हो संसारसे तर जायगा। एक मासके बाद उसे पूर्वजन्मका ज्ञान हो जायगा। एक रातमें उसे शुद्ध गति प्राप्त होगी। दूसरी रातमें वह पितरोंको तार देगा और तीन रातमें वह समस्त पितरोंको तारनेकी शक्ति प्राप्त कर लेगा।

इस प्रकार वरदान दे भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये। देवि! इस युगमें द्वापर आनेपर जब कलियुगका प्रवेश हुआ, उस समय बालखिल्य नामवाले महर्षियोंने प्रभासक्षेत्रमें सूर्यस्थलके समीप आकर जैगीषव्यगुहामें निवास करनेवाले देवेश्वर शिवकी आराधना की। वे अठासी हजार ऊर्ध्वरेता ऋषि दस हजार वर्षोंतक तपस्या करके प्रमोदमयी सिद्धिको प्राप्त हुए। तबसे वह जैगीषव्येश्वर लिंग 'सिद्धेश्वर' नामसे विख्यात हुआ। जब सोमवारके साथ कृष्णपक्षकी शिवचतुर्दशी आती है, उस समय सिद्धेश्वरदेवका दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है।

देवेश्वरि! सिद्धेश्वर लिंगके आगे तीन धनुषकी दूरीपर सूर्यसारथि अरुणके द्वारा स्थापित एक सिद्धलिंग है, जो कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। चैत्रमासकी शुक्लपक्षीय त्रयोदशीको जो भक्तिभावसे विधिपूर्वक उस लिंगका पूजन करता है, उसे पुण्डरीक-यज्ञका फल प्राप्त होता है।

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अर्कस्थलका माहात्म्य, आदित्यकी महिमा, दन्तधावनकी विधि तथा सूर्यदेवकी आराधनापूजाका विधान

महादेवजी कहते हैं—देवि! कृतस्मरसे लेकर अर्कस्थलतक दोनों देवताओंके मध्यभागमें सूर्यक्षेत्र कहा गया है, इसीमें आठ सिद्धियाँ निवास करती हैं। वह सूर्यदेवके तेजका मध्यभाग है, जो सब-का-सब सुवर्णमय है। यह क्षेत्र भगवान् सूर्यको सदैव प्रिय है। सूर्यग्रहणका पर्व आनेपर यह कुरुक्षेत्रसे भी अधिक पुण्यदायक होता है। ब्राह्मी (सरस्वती), हिरण्या तथा समुद्र—इन तीनोंका संगम कोटि तीर्थोंका फल देनेवाला है। वहीं देवमाता हैं, वहीं भंगीश्वर विराजमान हैं तथा नागस्थान भी वहीं हैं। इस प्रकार संक्षेपसे ही यहाँ अर्कस्थलका माहात्म्य बताया गया है। वहाँ एक विवर आज भी प्रत्यक्ष प्रकट देखा जाता है। उसका नाम श्रीमुखद्वार है। प्रिये! मातृकाएँ उस द्वारकी रक्षा करती हैं। जो एक वर्षतक नियमसे वहाँ मातृकागणों तथा सुनन्द आदि देवोंकी विधिपूर्वक पूजा करता है उसे सिद्धि प्राप्त होती है। इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके वहाँ अर्कस्थलके समीप समस्त मातृकाओंका पूजन करे। ये मातृकाएँ प्रभास क्षेत्रमें सुनन्दागणके नामसे विख्यात हैं।

भगवान् आदित्य (सूर्य) सब देवताओंके आदि कहे गये हैं। वे आदिकर्ता हैं, इसलिये 'आदित्य' कहलाते हैं। सूर्यके बिना न तो दिन होता है, न रात्रि होती है, न तर्पण होता है, न धर्मानुष्ठान होता है और न सम्पूर्ण चराचर जगत्की सत्ता ही रह सकती है। आदित्य ही सदा सबकी सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। इस कारण ये त्रयीमय हैं—तीनों लोक इनके स्वरूप हैं। अब मैं मन्त्रोंद्वारा महात्मा भास्करके पूजनका विधान बताता हूँ। पहले मुखकी शुद्धि करके विशेषरूपसे स्नान करे; फिर वस्त्रशुद्धिके पश्चात् सन्ध्योपासनाद्वारा मनकी शुद्धि करे। उसके बाद श्रीसूर्यदेवकी मूर्ति अथवा किरणका स्पर्श करे। मुखकी शुद्धि दातुनसे होती है; इसलिये पहले उसीकी विधि कहता हूँ। महुआकी

  • प्रभासखण्ड * १२२७

दातुनसे पुत्रलाभ होता है। मदारकी दातुनसे नेत्रोंको सुख मिलता है। बेरकी दातुनसे प्रवचनकी शक्ति प्राप्त होती है। बृहती (भटकटैया)-की दातुन करनेसे मनुष्य दुष्टोंपर विजय पाता है। बेल और खैरकी दातुनसे निश्चय ही ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। कदम्बसे रोगोंका नाश होता है। अतिमुक्तक (कुन्दका एक भेद)-से धन लाभ होता है। आटरूषक (अड़ूसा)-की दातुनसे सर्वत्र गौरवकी प्राप्ति होती है। जाती (चमेली)-की दातुनसे जातिमें प्रधानता होती है। पीपल यश देता है। शिरीषकी दातुनका सेवन करनेसे सब प्रकारकी सम्पत्ति प्राप्त होती है। चीरी हुई दातुन नहीं करनी चाहिये। जिसमें कीड़े लगे हों, जो आधी सूखी या टेढ़ी हो तथा जिसमें छिलका न हो—ऐसी दातुन कभी न करे। एक बित्तेकी दातुन काममें लेनी चाहिये। इससे बड़ी या छोटी हो तो त्याग दे। पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके मौनभावसे सुखपूर्वक बैठ जाय और मनोवांछित कामना मनमें रखकर निम्नांकित मन्त्रसे दातुनको अभिमन्त्रित करे—

वरदं त्वाभिजानामि कामं यच्छ वनस्पते।
सिद्धिं प्रयच्छ मे नित्यं दन्तकाष्ठ नमोऽस्तु ते॥

‘वनस्पते ! मैं तुम्हें जानता हूँ; तुम वर देनेवाले हो। मेरा मनोरथ पूर्ण करो। मुझे प्रतिदिन सिद्धि प्रदान करो। दन्तकाष्ठ ! तुम्हें नमस्कार है।'

इस प्रकार तीन बार जप करके दातुन करे। इसके बाद उस दातुनको धोकर किसी पवित्र स्थानमें फेंक दे। पार्वती ! बिना चीरी हुई दातुनसे जीभको न साफ करे। यदि उससे जीभ साफ करनी हो तो उसे चीरकर अलग-अलग कर लेना चाहिये। प्रतिदिन सबेरे बासी हो जानेके कारण मुख अशुद्ध रहता है। अतः उसकी शुद्धिके लिये सूखी या गीली दातुन अवश्य करे। जिस दिन दातुनका निषेध हो, उस दिन सोलह कुल्ला कर ले अथवा उन-उन वृक्षोंके पत्तों या सुगन्धित मंजन आदिके द्वारा मुखकी शुद्धि करनी चाहिये।

तदनन्तर शास्त्रोक्त विधिसे स्नान करके स्नानांगतर्पण एवं सन्ध्यावन्दन करे। उसके बाद विद्वान् पुरुष सूर्यदेवको जलकी अंजलि दे और पूर्वाभिमुख होकर त्र्यक्षर मन्त्रका जप करे। इस प्रकार पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर ताँबेके पात्रमें कनेरके फूल रखे, फिर उसमें तिल, चावल, कुशा, गन्धयुक्त जल, लाल चन्दन तथा धूप डाले। इस प्रकार अर्घ्य तैयार करके उस पात्रको अपने मस्तकपर रखे और धरतीपर दोनों घुटने टेककर मूलमन्त्रका उच्चारण करते हुए सूर्यदेवको अर्घ्य दे। जो इस प्रकार अर्घ्य निवेदन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। दीक्षा और मन्त्रसे रहित पुरुष भी यदि भक्तिपूर्वक एक वर्षतक इस प्रकार अर्घ्य दे—तो उसके फलको अवश्य प्राप्त करता है। इस जन्ममें वह स्त्रीसहित सुखका भागी होता है और अन्तमें भगवान् सूर्यनारायणमें लीन हो जाता है।

'आप्यायस्व०' इस मन्त्रसे चन्द्रमाकी पूजा करे। 'अग्निर्मूर्धा०' इस मन्त्रसे मंगलकी, 'उद्बुध्यस्व०' इत्यादि मन्त्रसे बुधकी अर्चना करे। 'बृहस्पते०' इस मन्त्रसे बृहस्पतिकी, 'शुक्रः०' इत्यादि मन्त्रसे शुक्रकी, 'शन्नोदेवी०' इस मन्त्रसे शनैश्चरकी, 'कयानश्चित्र०' इत्यादि मन्त्रसे राहुकी तथा 'केतुं कृण्वन्नकेतवे०' इत्यादि मन्त्रसे केतुकी पूजा करे। मण्डलसे बाहर पूर्व दिशामें इन्द्रका, दक्षिणमें यमका, पश्चिममें वरुणका, उत्तरमें कुबेरका, ईशान कोणमें शिवका, आग्नेय कोणमें अग्निका, नैर्ऋत्य कोणमें विरूपाक्षका तथा वायव्य कोणमें वायुदेवका पूजन करे। 'तमुष्टवाम०' इत्यादि मन्त्रसे इन्द्रकी, 'उदीरतामवर०' इत्यादि मन्त्रसे यमकी, 'तत्त्वायामि०' इस मन्त्रसे वरुणकी, 'इन्द्रासोमावत०' इत्यादि मन्त्रसे कुबेरकी, 'अग्निमीळे पुरोहितम्०' इत्यादि मन्त्रसे अग्निकी, 'रक्षोहणं वाजिन०' इत्यादि मन्त्रसे विरूपाक्षकी तथा 'वायवायाहि०' इत्यादि मन्त्रसे वायुदेवकी पूजा करे। देवि! इन सब देवताओंका क्रमशः पूजन करना चाहिये।

१२२८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मण्डलके मध्यभागमें वेदीके ऊपर विराजमान सूर्यदेवका ध्यान करके नित्य उनकी पूजा करनी चाहिये। उनके शरीरका रंग लाल है। वे महातेजस्वी हैं। श्वेत कमलके ऊपर बैठे हैं। समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित तथा सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके दो भुजाएँ और एक मुख है। उन्होंने अपने हाथमें सुन्दर कमल धारण कर रखा है। उनका मण्डल गोल है। वे तेजके केन्द्र हैं तथा उन्होंने लाल रंगका वस्त्र धारण कर रखा है। यही भगवान् आदित्यका सर्वलोकपूजित रूप है।

भगवान् सूर्यकी प्रतिमाका इस प्रकार पूजन करे—'ईशे त्वा०' इत्यादि मन्त्रसे उनके मस्तककी पूजा करे। 'अग्निमीळे०' इस मन्त्रके द्वारा उनके दाहिने हाथका पूजन करे। 'अग्न आयाहि०' इस मन्त्रसे सूर्यदेवके दोनों चरणोंकी पूजा करे। 'आजिघ्र०' इत्यादि मन्त्रसे पुष्पमाला पहनाये तथा 'योगे योग०' इस मन्त्रसे पुष्पांजलि छोड़े। इस तरह सामान्य पूजा करके उनकी विशेष पूजा प्रारम्भ करे। 'समुद्रागच्छ०' अथवा 'इमं मे गङ्गे' इत्यादि मन्त्रसे भगवान् सूर्यको स्नान करावे। 'समुद्रज्या०' इस मन्त्रसे विधिपूर्वक सूर्यदेवके अंगोंका प्रक्षालन करे। 'शिनीवाली०' इस मन्त्रद्वारा शंखके जलसे स्नान करावे। 'यज्ञं यज्ञ०' इस मन्त्रसे आँवला आदिके द्वारा उबटन लगावे। 'आप्यायस्व०' इस मन्त्रको पढ़कर दूधसे स्नान करावे। 'दधिक्राव्णो०' इस मन्त्रद्वारा दहीसे नहलावे। 'समुद्रज्या०' अथवा 'इमं मे गङ्गे यमुने०' इस मन्त्रसे ओषधियोंद्वारा स्नान करावे। फिर 'द्विपदाभिः०' मन्त्रोंद्वारा सूर्यदेवका उद्वर्तन करके 'मानस्तोके०' इत्यादि मन्त्रोंसे एक बार स्नान करावे। उसके बाद 'विष्णुरराटमसि०' इस मन्त्रसे गन्धयुक्त जलद्वारा स्नान करावे। तत्पश्चात् सौवर्णमन्त्रसे पाद्य निवेदन करे। 'इदं विष्णुर्विचक्रमे०' इस मन्त्रसे अर्घ्य दे। 'वेदोसि०' इस मन्त्रसे यज्ञोपवीत पहनावे। 'बृहस्पते०' इस मन्त्रसे वस्त्र दे। 'येन श्रियं प्रकुर्वाण०' इस मन्त्रसे फूलकी माला धारण करावे। 'धूरसि०' इस मन्त्रसे गुग्गुलसहित धूप दे। 'समिद्धोऽञ्जन०' इत्यादि मन्त्रसे अंजन दे। 'युञ्जान०' इत्यादि मन्त्रसे सूर्यदेवको गोरोचनका तिलक लगावे। तत्पश्चात् 'दीर्घायुत्वाय०' इत्यादि मन्त्रसे आरती करे। 'सहस्त्रशीर्षा पुरुषः' इत्यादि मन्त्रसे सूर्यदेवके मस्तकपर पूजा करे। 'नमः शम्भवाय०' इत्यादि मन्त्रसे भगवान् सूर्यके नेत्रोंका स्पर्श करे। 'विश्वतश्चक्षुः' इस मन्त्रको पढ़कर सूर्यदेवके समस्त विग्रहका स्पर्श करे। तदनन्तर 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च०' इत्यादि मन्त्रसे सूर्य-प्रतिमाके सब अंगोंमें पूजन करे।

इस प्रकार तीनों समय आदरपूर्वक भगवान् सूर्यका पूजन करे। उनकी पूजा समस्त कामनाओं तथा फलोंको देनेवाली है। सूर्यकी पूजाके लिये सब प्रकारके विलेपनोंमें रोली और लाल चन्दन उत्तम है। फूलोंमें कनेरके फूल श्रेष्ठ माने गये हैं। कुंकुम, चमेली, कमल तथा अगुरुसे बढ़कर सूर्यदेवको तृप्त करनेवाली दूसरी कोई वस्तु नहीं है। जो इन सभी वस्तुओंसे भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, उसका संसारमें कौन-सा मनोरथ सिद्ध नहीं होता? इस विधिसे सूर्यदेवका पूजन करके परिक्रमा करे और अर्कस्थलको मस्तकसे प्रणाम करके सूर्यके सम्मुख सुखपूर्वक स्थित होकर उनका दर्शन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष कोटि यात्राका फल पाता है। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, अग्नि और कुबेर आदि सब देवता भगवान् सूर्यके आश्रित रहकर द्युलोकमें आनन्दित होते हैं। इसलिये मैं सूर्यके समान दूसरे किसी देवताको नहीं देखता। महादेवि! सूर्यकी स्तुति करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उनकी सात बार परिक्रमा करनी चाहिये। 'तमुष्टवाम' यह ऋग्वेदिय मन्त्र पहली परिक्रमाके लिये बताया गया है। 'एतोन्विन्द्रस्तवाम' इस मन्त्रसे दूसरी परिक्रमा कही गयी है। 'इन्द्र शुद्धो न आगहि' इस मन्त्रसे तीसरी परिक्रमा करनी चाहिये। 'इन्द्रं शुद्धोमि नो रयिं' इत्यादि मन्त्रसे चौथी परिक्रमा बतायी गयी है। 'अस्य

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वामस्य०' इत्यादि मन्त्रसे पाँचवीं परिक्रमा करनी चाहिये। 'त्रिभिष्टवं देव०' इस मन्त्रसे छठी परिक्रमाका विधान है। तथा सामगान करनेवाले मनीषी पुरुषोंने जो दस प्रकारके सामगान किये हैं, उनके द्वारा सातवीं परिक्रमा करनी चाहिये। हिंकार, प्रणव, उद्गीथ, प्रस्ताव, प्रहर, आरण्यक और निधन—ये सात प्रकारके साम कहे गये हैं। हिंकार और प्रणव न रहनेपर पाँच प्रकारका साम बताया गया है। पूर्वोक्त सात प्रकारके सामके अतिरिक्त साध्य नामक आठवाँ साम है। नवाँ वामदेव साम है और दसवाँ ज्येष्ठ साम कहा गया है, जो ब्रह्माजीको परम प्रिय एवं उत्तम प्रतीत होता है। इन सब सामोंका विधिपूर्वक जप करना चाहिये। जो निष्कामभावसे भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, वह इस क्षेत्रके माहात्म्यसे तथा अर्क—सूर्यके प्रभावसे निश्चय ही मोक्षको प्राप्त होता है। दूसरे स्थानोंमें एक करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे जो फल होता है, वही अर्कस्थलमें एक ब्राह्मणको भोजन करानेसे प्राप्त होता है। सूर्यग्रहणमें जो स्नान, दान, जप और होम किया जाता है, वह सब यहाँ अर्कस्थलके प्रभावसे कोटिगुना हो जाता है। जो मनुष्य माघमासके कृष्ण पक्षमें रविवारयुक्त सप्तमीको अर्कस्थलके समीप जागरण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। उस क्षेत्रमें निवास करनेवाले सभी मनुष्योंके लिये अर्कस्थल पूजनीय हैं। कल्याणकामी पुरुषको चाहिये कि वह भगवान् सूर्यपर जलमें पैदा हुआ या मुरझाया हुआ अथवा किसी दोषसे दूषित या बासी फूल न चढ़ावे।

पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! सूर्यदेवको राहु कैसे ग्रस लेता है?

महादेवजीने कहा—देवि! मैं ग्रहणका कारण बतलाता हूँ, सुनो। विशेष समय आनेपर सूर्यदेव अपनी किरणोंसे अमृतकी धारा बहाते हैं। उस समय अमृतकी इच्छा रखनेवाला राहु अपने विमानपर बैठकर सूर्यबिम्बके नीचे आ जाता है। उसके बिम्बसे सूर्यका बिम्ब छिप जाता है। इसीको सूर्यग्रहण कहते हैं। वास्तवमें कोई भी सूर्यदेवको ग्रस नहीं सकता। वे निश्चय ही ग्रसनेवालेको जलाकर भस्म कर देंगे।

पूर्वकालमें उस क्षेत्रके भीतर लोकपाल, महर्षि, सिद्ध, विद्याधर, यक्ष, गन्धर्व तथा मुनिलोग सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। कुबेर, भीष्म, ययाति, गालव तथा साम्बने भी यहाँ उत्तम सिद्धि प्राप्त की है। यह माहात्म्यकथा नास्तिक, श्रद्धाहीन, क्रूर, दोषदर्शी एवं शठ मनुष्यसे न कहे। अपने पुत्र, शिष्य, धर्मिष्ठ, ज्ञानी तथा भगवान् सूर्यके भक्तको ही यह प्रसंग सुनाना चाहिये। जो तेजका सनातन आश्रय, जलकी गति, दिशाओंका अविनाशी दीपक, सिद्धिका खुला हुआ द्वार, जगत्‌का सामान्य नेत्र, आकाशरूपी सरोवरका सुवर्णमय कमल, दिगंगनाओंका देदीप्यमान कुण्डल तथा काल-गणनाका एकमात्र मापक यन्त्र है, वह भगवान् सूर्यका बिम्ब आप सब लोगोंकी रक्षा करे।

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चन्द्रमाकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा ओषधि आदिका पोषण

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! भगवान् शिवके इस प्रकार कहनेपर यशस्विनी देवी पार्वतीने इस प्रकार पूछा—'देव! आपके मस्तकपर जो ये चन्द्रमा विराजमान हैं, किसके पुत्र हैं? कब और किस प्रकार इनकी उत्पत्ति हुई है?'

महादेवजीने कहा—देवि! देवताओं और दानवोंने मिलकर जब क्षीरसागरका मन्थन किया, तब उसमेंसे चौदह रत्न निकले। उन्हीं रत्नोंमें ये महातेजस्वी चन्द्रमा भी थे। इनकी उत्पत्ति अमृतसे हुई है। इसीलिये विषपान करनेके पश्चात् इन्हें मैं आजतक सिरपर धारण करता हूँ। पूर्वकालमें मैंने चन्द्रमाको अपना शिरोभूषण बनाया है, इसीलिये लोग मुझे चन्द्रभूषण कहते हैं।