भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1256, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1256
  • प्रभासखण्ड * १२२७

दातुनसे पुत्रलाभ होता है। मदारकी दातुनसे नेत्रोंको सुख मिलता है। बेरकी दातुनसे प्रवचनकी शक्ति प्राप्त होती है। बृहती (भटकटैया)-की दातुन करनेसे मनुष्य दुष्टोंपर विजय पाता है। बेल और खैरकी दातुनसे निश्चय ही ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। कदम्बसे रोगोंका नाश होता है। अतिमुक्तक (कुन्दका एक भेद)-से धन लाभ होता है। आटरूषक (अड़ूसा)-की दातुनसे सर्वत्र गौरवकी प्राप्ति होती है। जाती (चमेली)-की दातुनसे जातिमें प्रधानता होती है। पीपल यश देता है। शिरीषकी दातुनका सेवन करनेसे सब प्रकारकी सम्पत्ति प्राप्त होती है। चीरी हुई दातुन नहीं करनी चाहिये। जिसमें कीड़े लगे हों, जो आधी सूखी या टेढ़ी हो तथा जिसमें छिलका न हो—ऐसी दातुन कभी न करे। एक बित्तेकी दातुन काममें लेनी चाहिये। इससे बड़ी या छोटी हो तो त्याग दे। पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके मौनभावसे सुखपूर्वक बैठ जाय और मनोवांछित कामना मनमें रखकर निम्नांकित मन्त्रसे दातुनको अभिमन्त्रित करे—

वरदं त्वाभिजानामि कामं यच्छ वनस्पते।
सिद्धिं प्रयच्छ मे नित्यं दन्तकाष्ठ नमोऽस्तु ते॥

‘वनस्पते ! मैं तुम्हें जानता हूँ; तुम वर देनेवाले हो। मेरा मनोरथ पूर्ण करो। मुझे प्रतिदिन सिद्धि प्रदान करो। दन्तकाष्ठ ! तुम्हें नमस्कार है।'

इस प्रकार तीन बार जप करके दातुन करे। इसके बाद उस दातुनको धोकर किसी पवित्र स्थानमें फेंक दे। पार्वती ! बिना चीरी हुई दातुनसे जीभको न साफ करे। यदि उससे जीभ साफ करनी हो तो उसे चीरकर अलग-अलग कर लेना चाहिये। प्रतिदिन सबेरे बासी हो जानेके कारण मुख अशुद्ध रहता है। अतः उसकी शुद्धिके लिये सूखी या गीली दातुन अवश्य करे। जिस दिन दातुनका निषेध हो, उस दिन सोलह कुल्ला कर ले अथवा उन-उन वृक्षोंके पत्तों या सुगन्धित मंजन आदिके द्वारा मुखकी शुद्धि करनी चाहिये।

तदनन्तर शास्त्रोक्त विधिसे स्नान करके स्नानांगतर्पण एवं सन्ध्यावन्दन करे। उसके बाद विद्वान् पुरुष सूर्यदेवको जलकी अंजलि दे और पूर्वाभिमुख होकर त्र्यक्षर मन्त्रका जप करे। इस प्रकार पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर ताँबेके पात्रमें कनेरके फूल रखे, फिर उसमें तिल, चावल, कुशा, गन्धयुक्त जल, लाल चन्दन तथा धूप डाले। इस प्रकार अर्घ्य तैयार करके उस पात्रको अपने मस्तकपर रखे और धरतीपर दोनों घुटने टेककर मूलमन्त्रका उच्चारण करते हुए सूर्यदेवको अर्घ्य दे। जो इस प्रकार अर्घ्य निवेदन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। दीक्षा और मन्त्रसे रहित पुरुष भी यदि भक्तिपूर्वक एक वर्षतक इस प्रकार अर्घ्य दे—तो उसके फलको अवश्य प्राप्त करता है। इस जन्ममें वह स्त्रीसहित सुखका भागी होता है और अन्तमें भगवान् सूर्यनारायणमें लीन हो जाता है।

'आप्यायस्व०' इस मन्त्रसे चन्द्रमाकी पूजा करे। 'अग्निर्मूर्धा०' इस मन्त्रसे मंगलकी, 'उद्बुध्यस्व०' इत्यादि मन्त्रसे बुधकी अर्चना करे। 'बृहस्पते०' इस मन्त्रसे बृहस्पतिकी, 'शुक्रः०' इत्यादि मन्त्रसे शुक्रकी, 'शन्नोदेवी०' इस मन्त्रसे शनैश्चरकी, 'कयानश्चित्र०' इत्यादि मन्त्रसे राहुकी तथा 'केतुं कृण्वन्नकेतवे०' इत्यादि मन्त्रसे केतुकी पूजा करे। मण्डलसे बाहर पूर्व दिशामें इन्द्रका, दक्षिणमें यमका, पश्चिममें वरुणका, उत्तरमें कुबेरका, ईशान कोणमें शिवका, आग्नेय कोणमें अग्निका, नैर्ऋत्य कोणमें विरूपाक्षका तथा वायव्य कोणमें वायुदेवका पूजन करे। 'तमुष्टवाम०' इत्यादि मन्त्रसे इन्द्रकी, 'उदीरतामवर०' इत्यादि मन्त्रसे यमकी, 'तत्त्वायामि०' इस मन्त्रसे वरुणकी, 'इन्द्रासोमावत०' इत्यादि मन्त्रसे कुबेरकी, 'अग्निमीळे पुरोहितम्०' इत्यादि मन्त्रसे अग्निकी, 'रक्षोहणं वाजिन०' इत्यादि मन्त्रसे विरूपाक्षकी तथा 'वायवायाहि०' इत्यादि मन्त्रसे वायुदेवकी पूजा करे। देवि! इन सब देवताओंका क्रमशः पूजन करना चाहिये।

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