संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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योगाचार्यके रूपमें तुम्हारी प्रसिद्धि होगी। जो तुम्हारे द्वारा पूजित इस शिवलिंगका पूजन करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त हो दिव्य योगको प्राप्त होगा। जो द्विज योगके लिये जैगीषव्यगुहाका आश्रय लेगा, वह सात रातमें योगयुक्त हो संसारसे तर जायगा। एक मासके बाद उसे पूर्वजन्मका ज्ञान हो जायगा। एक रातमें उसे शुद्ध गति प्राप्त होगी। दूसरी रातमें वह पितरोंको तार देगा और तीन रातमें वह समस्त पितरोंको तारनेकी शक्ति प्राप्त कर लेगा।
इस प्रकार वरदान दे भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये। देवि! इस युगमें द्वापर आनेपर जब कलियुगका प्रवेश हुआ, उस समय बालखिल्य नामवाले महर्षियोंने प्रभासक्षेत्रमें सूर्यस्थलके समीप आकर जैगीषव्यगुहामें निवास करनेवाले देवेश्वर शिवकी आराधना की। वे अठासी हजार ऊर्ध्वरेता ऋषि दस हजार वर्षोंतक तपस्या करके प्रमोदमयी सिद्धिको प्राप्त हुए। तबसे वह जैगीषव्येश्वर लिंग 'सिद्धेश्वर' नामसे विख्यात हुआ। जब सोमवारके साथ कृष्णपक्षकी शिवचतुर्दशी आती है, उस समय सिद्धेश्वरदेवका दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है।
देवेश्वरि! सिद्धेश्वर लिंगके आगे तीन धनुषकी दूरीपर सूर्यसारथि अरुणके द्वारा स्थापित एक सिद्धलिंग है, जो कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। चैत्रमासकी शुक्लपक्षीय त्रयोदशीको जो भक्तिभावसे विधिपूर्वक उस लिंगका पूजन करता है, उसे पुण्डरीक-यज्ञका फल प्राप्त होता है।
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अर्कस्थलका माहात्म्य, आदित्यकी महिमा, दन्तधावनकी विधि तथा सूर्यदेवकी आराधनापूजाका विधान
महादेवजी कहते हैं—देवि! कृतस्मरसे लेकर अर्कस्थलतक दोनों देवताओंके मध्यभागमें सूर्यक्षेत्र कहा गया है, इसीमें आठ सिद्धियाँ निवास करती हैं। वह सूर्यदेवके तेजका मध्यभाग है, जो सब-का-सब सुवर्णमय है। यह क्षेत्र भगवान् सूर्यको सदैव प्रिय है। सूर्यग्रहणका पर्व आनेपर यह कुरुक्षेत्रसे भी अधिक पुण्यदायक होता है। ब्राह्मी (सरस्वती), हिरण्या तथा समुद्र—इन तीनोंका संगम कोटि तीर्थोंका फल देनेवाला है। वहीं देवमाता हैं, वहीं भंगीश्वर विराजमान हैं तथा नागस्थान भी वहीं हैं। इस प्रकार संक्षेपसे ही यहाँ अर्कस्थलका माहात्म्य बताया गया है। वहाँ एक विवर आज भी प्रत्यक्ष प्रकट देखा जाता है। उसका नाम श्रीमुखद्वार है। प्रिये! मातृकाएँ उस द्वारकी रक्षा करती हैं। जो एक वर्षतक नियमसे वहाँ मातृकागणों तथा सुनन्द आदि देवोंकी विधिपूर्वक पूजा करता है उसे सिद्धि प्राप्त होती है। इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके वहाँ अर्कस्थलके समीप समस्त मातृकाओंका पूजन करे। ये मातृकाएँ प्रभास क्षेत्रमें सुनन्दागणके नामसे विख्यात हैं।
भगवान् आदित्य (सूर्य) सब देवताओंके आदि कहे गये हैं। वे आदिकर्ता हैं, इसलिये 'आदित्य' कहलाते हैं। सूर्यके बिना न तो दिन होता है, न रात्रि होती है, न तर्पण होता है, न धर्मानुष्ठान होता है और न सम्पूर्ण चराचर जगत्की सत्ता ही रह सकती है। आदित्य ही सदा सबकी सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। इस कारण ये त्रयीमय हैं—तीनों लोक इनके स्वरूप हैं। अब मैं मन्त्रोंद्वारा महात्मा भास्करके पूजनका विधान बताता हूँ। पहले मुखकी शुद्धि करके विशेषरूपसे स्नान करे; फिर वस्त्रशुद्धिके पश्चात् सन्ध्योपासनाद्वारा मनकी शुद्धि करे। उसके बाद श्रीसूर्यदेवकी मूर्ति अथवा किरणका स्पर्श करे। मुखकी शुद्धि दातुनसे होती है; इसलिये पहले उसीकी विधि कहता हूँ। महुआकी