संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1254, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* प्रभासखण्ड * १२२५
महाप्रभ, पापसंहार, सर्वकामदप्रद, मोक्षमार्ग, सुदर्शन, धर्मगर्भ तथा पापनाशन प्रभास। इसके बाद इसका नाम 'उत्पलावर्तिका' होगा। इस प्रकार ये क्षेत्रके मध्यवर्ती गर्भगृहके क्रमशः नाम बताये गये। इन सभी नामों तथा क्षेत्रकी महिमाको सुनकर मनुष्यको मनोवांछित सिद्धि प्राप्त होती है। जो तीनों समय इन नामोंका कीर्तन करता है, उसे महान् ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है तथा दिन, रात एवं सन्ध्याकालमें किये हुए पापोंका नाश हो जाता है। देवि! केदार क्षेत्रमें तथा महालयतीर्थमें जो लिंग है, वह और मध्यमेश्वर, पाशुपतेश्वर, शंकुकर्णेश्वर, भद्रेश्वर, सोमेश्वर, एकाम्रेश्वर, कालेश्वर, अजेश्वर, भैरवेश्वर, ईशानेश्वर, कायावरोहणेश्वर, चापटेश्वर, बदरिकाश्रम, रुद्रकोटि, महाकोटि, श्रीपर्वत, कपाली, देवदेवेश्वर, करवीरेश्वर, ॐकारेश्वर, वसिष्ठाश्रम तथा भूतलपर दूसरे-दूसरे जो मेरे पुण्यदायक स्थान हैं, वे सभी प्रयागतीर्थके साथ प्रभासक्षेत्रमें आकर निवास करते हैं। इस तीर्थके उत्तरमें सूर्यपुत्री और दक्षिणमें समुद्र है, यही इसके उत्तर-दक्षिणकी सीमाएँ हैं। इसी सीमाके भीतर पातालसे लेकर ब्रह्माण्डकटाहपर्यन्त जितने तीर्थ हैं, सभी निवास करते हैं।
प्रभासमें सूर्यदेव, सिद्धेश्वरलिंग तथा सिद्धलिंगकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—देवि! दक्षिणमें समुद्रसे लेकर उत्तरमें (सूर्यपुत्री) कौरवेश्वरी नदीतकका जो क्षेत्र है, उसके भीतर मैं ही क्षेत्रज्ञरूपसे निवास करता हूँ। मेरा गृहरूप यह तीर्थ सूर्यनारायणकी किरणोंसे प्रभासित होता है, इसलिये इस कल्पमें प्रभास नामसे विख्यात हुआ है। जो श्रेष्ठ मनुष्य वहाँ अर्क (पूज्य)-रूप सूर्यका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। उसने मानो सब तीर्थोंमें स्नान कर लिया, समस्त बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा यजन किया, सभी दान दे दिये और सम्पूर्ण गुरुजनोंको सन्तुष्ट कर लिया। उसी सूर्यदेवके समीप अग्निकोणमें थोड़ी ही दूरीपर सिद्धेश्वर शिव विराजमान हैं। उनका त्रैलोक्यपूजित लिंग सब प्रकारकी सिद्धियोंका दाता है। प्राचीन सत्ययुगमें उसका नाम जैगीषव्येश्वर था। वही कलियुगमें सिद्धेश्वर नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ। देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य सब सिद्धियोंको प्राप्त कर लेता है। सूर्यके दक्षिण एवं नैर्ऋत्य कोणमें थोड़ी ही दूरपर एक पातालविवर है। वहींपर पूर्वकालमें मन्देह तथा शालकटंकट नामक राक्षस सूर्यनारायणके तेजसे दग्ध हो पातालमें भाग गये थे। वहाँपर योगिनियाँ तथा ब्राह्मी आदि मातृकाएँ रक्षा करती हैं।
पूर्वकल्पमें महोदय नामसे प्रसिद्ध एक शिवलिंग स्वतः प्रकट हुआ। महात्मा जैगीषव्य उसका पूजन करने लगे। वे अपने सब अंगोंमें भस्म लगाते और भस्मपर ही सोते थे। उन्होंने जप, तप, वृषके समान नाद तथा नृत्य और गीतोंके द्वारा महोदय शिवको सन्तुष्ट कर लिया। तब वे प्रसन्न होकर जैगीषव्यमुनिके समीप आये और बोले—'महामते! तुम दिव्य दृष्टिसे मेरी ओर देखो, तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे कहो।' जैगीषव्यने त्रिनेत्रधारी शिवको अपने सामने उपस्थित देख उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'देवदेवेश्वर! मुझे संसारबन्धनका नाश करनेवाला ज्ञान प्रदान कीजिये। आपमें, देवी पार्वतीमें, स्कन्दजीमें तथा गणेशजीमें सदा मेरी भक्ति बनी रहे तथा मुझमें निरहंकारता, क्षमा, शम और दम आदिकी वृद्धि हो।'
तब उन महादेवजीने कहा—तुम अजर, अमर, सब शोकोंसे रहित, महान् योगी, अत्यन्त शक्तिशाली तथा योगके ऐश्वर्यसे युक्त होओगे।