भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1253, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1253
१२२४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

होनेवाले सभी प्राणियोंके स्वामी हैं, जो मनुष्योंके आदिप्रवर्तक मनु तथा तपस्वीजनोंके तप हैं, तेजस्वी पुरुषोंके तेज और गतिमानोंकी गति हैं, वे श्रीहरि द्वारका छोड़कर प्रभासतीर्थमें कैसे चले आये?

महादेवजीने कहा—देवि! पृथ्वीपर अनेक क्षेत्र हैं, करोड़ों तीर्थ हैं और उन सबमें असंख्य प्रभाव हैं; परंतु प्रभासतीर्थका प्रभाव उन सबसे बढ़कर है। ब्रह्मतत्त्व, विष्णुतत्त्व तथा रुद्रतत्त्व—इन तीनोंकी प्रभासमें ही एकत्र उपलब्धि होती है। अन्यत्र ऐसा सुयोग दुर्लभ है। प्रभासमें लोकपितामह ब्रह्माजी चौबीस तत्त्वोंके साथ रहते हैं। दैत्योंके संहारक देवाग्रगण्य भगवान् विष्णु पचीस तत्त्वोंके अधिपति होकर इस तीर्थमें स्थित हैं और मैं छत्तीस तत्त्वोंसे संयुक्त होकर तुम्हारे साथ प्रभासमें निवास करता हूँ। शुभे! इस प्रकार तुम केवल प्रभासतीर्थको ही तत्त्वमय एवं सर्वतीर्थमय समझो। स्त्री, म्लेच्छ, शूद्र, पशु, पक्षी और मृग—जो भी प्रभासक्षेत्रमें मरते हैं, सभी शिवके लोकमें जाते हैं।

प्रभासके पार्थिवभागमें ब्रह्मा, जलभागमें विष्णु, तैजसभागमें रुद्र, वायुभागमें कुबेर तथा आकाशभागमें साक्षात् सदाशिवरूप हम स्थित हैं। अमरेश, प्रभास, नैमिष, पुष्कर, आषाढि, दण्ड, भारभूति और लांगलि—ये आठ आदिगुह्य हैं, जो जलके आवरणमें स्थित हैं। हरिश्चन्द्र, श्रीशैल, जालेश्वर, प्रीतिकेश्वर, महाकाल, मध्यम, केदार तथा भैरव—ये आठ अति गुह्य क्षेत्र हैं, जो तेजस्तत्त्वमें प्रतिष्ठित हैं। गया, काशी, कुरुक्षेत्र, कनखलतीर्थ, विमलतीर्थ, अट्टहास, महेन्द्र और भीम—ये आठ गुह्याद्गुह्यतर क्षेत्र हैं, जो वायु तत्त्वमें स्थित हैं। वस्त्रापथ, रुद्रकोटि, ज्येष्ठेश्वर, महालय, गोकर्ण, रुद्रकर्ण, कर्णाक्ष और स्थाप—ये आठ पवित्राष्टक कहलाते हैं; इनकी स्थिति आकाशतत्त्वमें है। छागल, वुडसुड, माकोट्ट, अचलेश्वर, कालञ्जरवन, शंकुकर्ण, स्थलेश्वर तथा शूलेश्वर—ये आठ पृथ्वीतत्त्वमें स्थित हैं। जो देवता जिस तत्त्वमें स्थित है, वह उसीके माहात्म्यको सूचित करता है। जलीय महातत्त्व भगवान् महाविष्णुको अत्यन्त प्रिय है। इसी कारण भगवान् नारायणको जलशायी कहते हैं। जलतत्त्वमें जितने तीर्थ मैंने बताये हैं, वे निश्चय ही भगवान् नारायणको प्रिय हैं। जलतत्त्वमें भी जो सारभूत तत्त्व है, उसमें ही प्रभासतीर्थकी स्थिति है; अतः श्रीहरि प्रत्येक अवतारके समय जलतत्त्वरूपी प्रभासमें ही लय (अन्तर्धान)-को प्राप्त होते हैं। वे भगवान् वासुदेव सूक्ष्म स्वरूप तथा परात्पर पदमें प्रतिष्ठित हैं। वे ही पर-व्योमस्वरूप, शिव आदि अन्तसे रहित एवं व्यापक हैं। सम्पूर्ण शास्त्रों, सिद्धान्तभूत आगमों तथा विशेषतः दर्शनोंमें भी उनसे भिन्न या बढ़कर कोई वस्तु नहीं बतायी गयी है। पार्वती! उन्हीं शास्त्रोंमें यह भी कहा गया है कि ‘वे मुझसे भिन्न नहीं हैं।’ प्रभासतीर्थमें चार शिवलिंगोंसे संयुक्त श्रीहरि प्रत्यक्ष रूपसे विराजमान हैं, किंतु यह बात किसीको ज्ञात नहीं है। प्रत्येक मासकी अष्टमी और चतुर्दशीको सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणके समय तथा कार्तिककी पूर्णिमाको मैं स्वयं प्रभासतीर्थमें स्थित शिवलिंगोंका पूजन करता हूँ। प्रत्येक माघमासकी पूर्णिमाको सभी तीर्थ सरस्वती और समुद्रके संगममें स्नान करनेके लिये प्रभासतीर्थमें आते हैं। उस तीर्थके नामका स्मरण करने, कीर्तन करने अथवा मृत्युकालमें वहाँ उपस्थित होनेसे भी मनुष्य अपने पूर्वकृत सभी पापोंको त्याग देता है। आनर्तसार, सौम्य, भुवनभूषण, दिव्य, पांचनद, आदिगुह्य, महोदय, सिद्धरत्नाकर, समुद्रावरण धर्माधार, कलाधार, शिवगर्भगृह, सर्वदेवनिवास तथा सर्वपातकनाशन—ये इस क्षेत्रके नाम हैं। जो एक-एक कल्पमें पृथक्-पृथक् प्रसिद्ध हुए हैं। अब गर्भगृहके नाम सुनो। आदिकल्पमें उसका नाम प्रमोदन था, उसके बाद क्रमशः नन्दन, शिव, उग्र, भद्रक, समिन्धन, कामद, सिद्धिद, धर्मज्ञ, वैश्वरूप, मुक्तिद, पद्मनाभ, श्रीवत्स,

संक्षिप्त स्कन्द पुराण · पृष्ठ 1253, कुल 1406 में से · BharatKosha