भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1252, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1252
  • प्रभासखण्ड * १२२३

भैरव हैं, 'कालाग्निरुद्रनाथ' जिनका नामान्तर सुना गया है, उनमें मैं स्वयं ही भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये निवास करता हूँ। उस सोमेश्वर लिंगमें स्थित हो मैं मनुष्योंके सब पापोंको भक्षण कर लेता हूँ। देहधारियोंके देहमें विचरण करनेवाला जो प्राण है, उसीके समान जो सबका प्राण है, यह ब्रह्माण्ड जिसके भीतर स्थित है तथा जो एक होकर भी अनेक रूपोंमें व्यक्त है, वही शिवस्वरूप मैं भक्तोंपर कृपा करनेके लिये सोमनाथ लिंगमें निवास करता हूँ। सम्पूर्ण वेद और महर्षिगण जिनकी प्रशंसा करते हैं तथा जिनके द्वारा परब्रह्मके स्वरूपकी प्राप्ति होती है, वे ही ये सोमनाथ महादेव प्रभासतीर्थमें विराजमान हैं। जैसे घरमें छिपे हुए रत्नको कोई नहीं पाता, उसी प्रकार मेरे प्रभासरूपी घरमें रत्नके समान स्थित इस सोमेश्वरलिंगके यथार्थ स्वरूपको कोई नहीं जानता। पूर्वकल्पमें यह शिवलिंग सप्त पातालका भेदन करनेवाला था, तथा कोटि-कोटि सूर्यों तथा प्रलयाग्निके समान तेजस्वी था। इसीलिये पूर्वकालमें सोमनाथको 'कालाग्निरुद्र' कहा जाता था। देवि ! इस प्रकार संक्षेपसे मैंने तुम्हें सोमेश्वरदेवका माहात्म्य बताया है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है।


प्रभासमें भगवान् शिवका स्वरूप, पार्वतीद्वारा उनकी स्तुति तथा प्रभासक्षेत्रमें भगवान् विष्णुकी स्थितिका कारण

महादेवजी कहते हैं—देवि ! मैं प्रभासक्षेत्रमें रुद्राक्षकी माला धारण किये शान्त भावसे स्थित हूँ। मेरा आदि, मध्य और अन्त कहीं नहीं है। मैं कमलके आसनपर बैठा हुआ सबको वर देनेके लिये उद्यत हूँ। हिम, कुन्द और चन्द्रमाके सदृश मेरा गौर वर्ण है। मेरे वाम भागमें विष्णु तथा दक्षिण भागमें ब्रह्माजी विराज रहे हैं। मेरे उदरमें चारों वेद और हृदयमें सनातन ब्रह्म स्थित हैं। नेत्रोंमें अग्नि, चन्द्रमा और सूर्यका निवास है। महादेवि ! ऐसे स्वरूपसे मैं प्रभासक्षेत्रमें रहता हूँ।

यह सुनकर पार्वती देवीने हर्षगद्गद वाणीमें देवदेवेश्वर शिवका भक्तिपूर्वक स्तवन किया—देव ! महादेव ! सर्वभावन ! ईश्वर ! आपको नमस्कार है। आप समस्त देवताओंके स्वामी हैं, आपको नमस्कार है। आप परमेश्वरको नमस्कार है। आप अनादि हैं, सम्पूर्ण सृष्टिके विधाता हैं; आपको नमस्कार है। आप सर्वत्र व्यापक ईश्वर हैं, आपको नमस्कार है। आप सबमें स्थित हैं, आपको नमस्कार है। आप धाम (तेज)-के भी धाम (प्रकाशक या आश्रय) हैं, आपको नमस्कार है। आप सृष्टिदाताको नमस्कार है। मोक्षदाता परमेश्वर ! आपको नमस्कार है।

पार्वतीके इस प्रकार स्तवन करनेपर भगवान् शिवने सन्तुष्ट होकर कहा—महाप्राज्ञे ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम अभीष्ट वरदान माँगो।

पार्वतीने कहा—देवेश्वर ! प्रभासक्षेत्रका माहात्म्य फिरसे कहिये। भगवान् विष्णु द्वारकापुरी छोड़कर किस कारण प्रभासक्षेत्रमें निवास करते हैं? जिन्होंने पूर्वकालमें वाराहरूप धारण करके पर्वत, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीका उद्धार किया तथा नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुका संहार किया; वेद जिन्हें प्रत्येक युगमें सहस्रों चरण, सहस्रों नेत्र तथा सहस्रों मस्तकवाले कहकर उनकी स्तुति करते हैं; ब्रह्माजीका निवासभूत पद्म जिनकी नाभिसे प्रकट हुआ है, जो क्षीरसमुद्रके उत्तर भागमें शाश्वत योगका आश्रय लेकर शयन करते हैं, जो युगान्तका भी अन्त करनेवाले तथा लोकान्तकारी अन्तकके भी अन्तक हैं, लोक-मर्यादाओंकी रक्षा करनेवाले सेतु हैं, वेदवेत्ताओंके भी ज्ञाता हैं और उत्पन्न

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