संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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समीप कृतस्मरके आगे सौ धनुषकी दूरीपर मेरा महाप्रभावशाली स्वयम्भू लिंग स्थित है; उसमें साक्षात् परमेश्वर भगवान् शंकररूप मैं निवास करता हूँ। इसीके बीचमें सोमेश्वरके समीप चारों ओर चौदह भागोंमें दो-दो सौ धनुषकी गोलाकार कर्णिका है, जो मुझे बहुत प्रिय है। उसमें जो प्राणी निवास करते हैं, वे सब पातकोंसे शुद्ध हो मेरे लोकमें जाते हैं। जो मनुष्य सैकड़ों विघ्नोंसे घिरकर या बँधकर भी प्रतिज्ञापूर्वक जीवनभर इस क्षेत्रमें निवास करता है, वह उस परमधाममें जाता है, जहाँ जाकर कोई भी शोक नहीं करता। जो प्रभासक्षेत्रमें मरता है, वह यमलोकमें नहीं जाता है। भयंकर कलिकालका आगमन जानकर मैंने यहाँ रक्षाके लिये विघ्नराज गणेशजीको स्थापित किया है। ब्रह्मघाती, पातकी, ब्राह्मणद्वेषी, शिवभक्तोंकी निन्दा करनेवाले, कृतघ्न, शठ, लोकशत्रु, गुरुद्रोही, तीर्थों और मन्दिरोंके लिये कण्टकरूप तथा पापपरायण निन्दित मनुष्य यदि इस क्षेत्रमें प्राणत्याग करते हैं, तो वे दस हजार दिव्य वर्षोंतक दासीपुत्र होते हैं। उसके बाद ब्रह्मराक्षस होते हैं। तदनन्तर हीन योनि (अथवा पक्षियोंकी योनि)-में जन्म लेते हैं। अतः पूर्ण प्रयत्न करके वहाँ कभी पाप न करे। अन्य-अन्य स्थानोंका पाप इस क्षेत्रमें नष्ट होता है, परंतु यहाँका किया हुआ पाप पिशाचयोनि एवं नरकमें डालनेवाला होता है। जो मनुष्य अपने चित्तको एकाग्र एवं संयत रखकर इन्द्रियोंको वशमें करके मेरा ध्यान करते हुए यहाँ शतरुद्रियका जप करते हैं, वे निःसन्देह सिद्ध होते हैं। यदि कोई मनुष्य उत्तम प्रभासक्षेत्रको जाय तो उसे ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे वह फिर वहाँसे बाहर न जाय। भूलोकमें जो लिंग हैं, उन सबमें सोमनाथ मुझे विशेष प्रिय है। देवि! इस दिव्य लिंगमें जो गुण हैं, वे मुझे ही ज्ञात हैं; उन्हें मैं ही जानता हूँ। दूसरा कोई किसी प्रकार भी नहीं जानता।
जिस समय न ब्रह्मा थे न भूमि थी, न सूर्य थे और न यह सम्पूर्ण जगत् ही था, उस समय ब्रह्माजीके प्रलयकालमें यह दिव्य लिंग भाविनीवृत्तिका आश्रय ले (अर्थात् भविष्यमें मुझे यहाँ प्रकट होना है, ऐसी भावना रखकर) इस स्थानकी रक्षा करता रहा। प्रभासमें निवास करनेवाले वे मानव धन्य हैं, जो संसारका भय दूर करनेवाले भगवान् सोमनाथका दर्शन करते हैं। देवि! जो मनुष्य शुद्धचित्त होकर सोमनाथका स्मरण करेंगे, उनके सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जायगा। यह पवित्र क्षेत्र मुझे सदैव अत्यन्त प्रिय है। पार्वती! देव, मनुष्य आदि सब लोग तभीतक संसारमें भ्रमण करते हैं जबतक कि मेरे स्वरूपभूत सोमनाथको नहीं प्राप्त होते। यह प्रभासक्षेत्र मोक्षधाम कहा गया है। इस प्रकार मैंने तुम्हारी जानकारीके लिये सोमनाथके महान् भावका वर्णन किया है। जो मनुष्य सदा इसका पाठ करेंगे, वे मुझ चन्द्रमौलि शिवके धाममें जायँगे। देवि! जो भक्त जन सोमेश्वरदेवकी शरणमें जाते हैं, वे इस भयंकर संसार-चक्रमें फिर नहीं भटकते।
सोमनाथकी महिमा
महादेवजी कहते हैं— देवि! जितने भी ग्रहदोष और भूतदोष हैं तथा जो भी डाकिनियाँ, प्रेत, वेताल, राक्षस, ग्रह, पूतनाएँ, पिशाच, यातुधान, मातृकाएँ, नवजात शिशुओंका अपहरण करनेवाली राक्षसियाँ, बालग्रह, वृद्धग्रह, ज्वररूपी ग्रह, अतिसार, भगन्दर, पथरी रोग, मूत्रकृच्छ्र, अन्य सहस्रों रोग, दुर्नामिका (बवासीर), कोढ़ तथा अन्यान्य रोग-व्याधियाँ हैं, वे सभी सोमनाथके समीप जाकर उनका दर्शन करनेसे उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे जलती आगमें डाला हुआ ईंधन तत्काल जलकर भस्म हो जाता है। देवेश्वरि! सोमेश्वर नामसे प्रसिद्ध ये जो पश्चिम