भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1250
  • प्रभासखण्ड * १२२१

सोमेश्वरदेवका नाम 'कृत्तिवास' था। छठे ब्रह्माका नाम 'हेमगर्भ' था। उनके समयमें सोमनाथका नाम 'भैरवनाथ' रखा गया था। ये जो सातवें ब्रह्मा हैं, 'शतानन्द' कहलाते हैं; इस समय मेरे इस लिंगका नाम 'सोमनाथ' प्रसिद्ध हुआ है। इसके बाद आगामी कल्पमें आठवें ब्रह्मा 'चतुर्मुख' नामसे विख्यात होंगे। उस समय सोमेश्वरदेवका नाम 'प्राणनाथ' होगा। इस तरह जो-जो ब्रह्मा बीत जाते हैं और प्रलयके पश्चात् पुनः जो नये ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, उनकी आठ वर्षकी आयु होनेतक 'सोमेश्वरदेवका' एक नाम रहता है। उसके बाद वह बदल जाता है। इस प्रकार संक्षेपमें मैंने तुम्हें 'सोमनाथ' के नाम बताये हैं।

पार्वतीदेवी बोलीं— देवदेवेश्वर! मनुष्योंके ऊपर दया करनेके लिये मैं भी आपके साथ बार-बार प्रकट हुई हूँ। उस समय मेरे कौन-कौन-से नाम हुए हैं, यह भी बताइये।

महादेवजीने कहा— आदिकल्पमें तुम्हारा नाम 'जगन्माता' था। दूसरेमें 'जगद्योनि', तीसरेमें 'शाम्भवी', चौथेमें 'विश्वरूपिणी', पाँचवेंमें 'नन्दिनी', छठेमें 'गणाम्बिका', तथा सातवेंमें तुम्हारा नाम 'विभूति' हुआ है। इसी प्रकार आठवेंमें 'सुभू' नवेंमें 'आनन्दा', दसवेंमें 'वामलोचना', ग्यारहवेंमें 'वरारोहा', बारहवेंमें 'सुमंगला', तेरहवेंमें 'महामाया', चौदहवेंमें 'अनन्ता', पंद्रहवेंमें 'भूतमाता', सोलहवेंमें 'उत्तमा' तथा सत्रहवें कल्पमें तुम्हारा नाम 'पितृकल्पा' प्रसिद्ध हुआ है। तत्पश्चात् तुम दक्षकन्या सतीके नामसे प्रसिद्ध हुई। उस समय दक्षद्वारा अपमानित होनेसे तुमने अपना शरीर त्याग दिया। तदनन्तर वाराहकल्प आनेपर पुनः हिमवान्ने तुम्हारी आराधना करके तुम्हें पुत्रीरूपमें प्राप्त किया। उसके बाद अत्यन्त दुष्कर एवं अद्भुत तपस्या करके तुमने मुझे पतिरूपमें पाया और 'पार्वती' नामसे प्रसिद्ध हुई। सुमुखि! जबतक इस कल्पका अन्त होगा, तबतक मैं तुम्हारे साथ कैलास पर्वतपर क्रीडा करूँगा। द्वापरमें महिषासुरका वध करनेके लिये तुम भगवान् विष्णुके साथ 'कृष्णपिंगला' नामसे प्रकट हुईं। तबसे 'कात्यायनी' और 'दुर्गा' आदि विविध नामोंसे तुम नवकोटि भेदके साथ वसुधातुलपर प्रकट हुईं। सुन्दरि! पूर्वकालमें जो तुम्हारे कल्पानुसार नाम थे तथा जो भूत, भविष्य एवं वर्तमानमें तुम्हारे नाम थे, होंगे और हैं, वे सब नाम मैंने बता दिये। उन्हें इसी प्रकार जानना चाहिये।

शतानन्द नामसे विख्यात जो ये ब्रह्माजी हैं, उनके आठवें वर्षमें जो पहले मनु हुए थे और उस मन्वन्तरमें जो प्रथम चन्द्रमा थे, वे लक्ष्मी और कौस्तुभमणि आदिके साथ समुद्रसे प्रकट हुए। उन्होंने कालभैरव नामसे इस सोमेश्वर लिंगकी आराधना की और बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न हो चौदह युग व्यतीत किये। सुन्दरि! उनकी वह अद्भुत तपस्या देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ और बोला—'चन्द्रदेव! वर माँगो।' शुभे! तब उन्होंने अपने भक्तिभावसे मुझे संतुष्ट करके कहा—'प्रभो! ये ब्रह्माजी जबतक रहें, तबतक आपका नाम 'सोमनाथ' के रूपमें प्रसिद्ध हो।' मन्वन्तर समाप्त होनेपर जो कोई भी दूसरे-दूसरे चन्द्रमा हों, उन सबके ये सोमनाथजी कुलदेवता हों। तब मैं 'तथास्तु' कहकर पुनः उस शिवलिंगमें ही लीन हो गया। यह मैंने सोमनाथके गुणोंको संक्षेपसे सूचित किया है। समुद्रके रत्नोंकी भाँति सोमेश्वरके गुणोंका विस्तार अचिन्त्य है। उनकी महिमाका चिन्तन भक्तोंकी बुद्धिको बढ़ानेवाला है। मदमोहित मूढ़ मानव उनके स्वरूपको नहीं देख पाते।

पार्वतीदेवीने पूछा— भगवन्! जिस तेजोमय लिंगका ऐसा माहात्म्य है, उसकी इस प्रभास-क्षेत्रमें कहाँ स्थिति है?

महादेवजीने कहा— देवि! सुनो—वज्रिणी नदीके पूर्व न्यंकुमती नदीतक चार योजन चौड़ा और पाँच योजन लम्बा मेरा गर्भगृह है; इसको मैं कभी नहीं छोड़ता। पश्चिम दिशामें समुद्रके