भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1257, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1257
१२२८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मण्डलके मध्यभागमें वेदीके ऊपर विराजमान सूर्यदेवका ध्यान करके नित्य उनकी पूजा करनी चाहिये। उनके शरीरका रंग लाल है। वे महातेजस्वी हैं। श्वेत कमलके ऊपर बैठे हैं। समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित तथा सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके दो भुजाएँ और एक मुख है। उन्होंने अपने हाथमें सुन्दर कमल धारण कर रखा है। उनका मण्डल गोल है। वे तेजके केन्द्र हैं तथा उन्होंने लाल रंगका वस्त्र धारण कर रखा है। यही भगवान् आदित्यका सर्वलोकपूजित रूप है।

भगवान् सूर्यकी प्रतिमाका इस प्रकार पूजन करे—'ईशे त्वा०' इत्यादि मन्त्रसे उनके मस्तककी पूजा करे। 'अग्निमीळे०' इस मन्त्रके द्वारा उनके दाहिने हाथका पूजन करे। 'अग्न आयाहि०' इस मन्त्रसे सूर्यदेवके दोनों चरणोंकी पूजा करे। 'आजिघ्र०' इत्यादि मन्त्रसे पुष्पमाला पहनाये तथा 'योगे योग०' इस मन्त्रसे पुष्पांजलि छोड़े। इस तरह सामान्य पूजा करके उनकी विशेष पूजा प्रारम्भ करे। 'समुद्रागच्छ०' अथवा 'इमं मे गङ्गे' इत्यादि मन्त्रसे भगवान् सूर्यको स्नान करावे। 'समुद्रज्या०' इस मन्त्रसे विधिपूर्वक सूर्यदेवके अंगोंका प्रक्षालन करे। 'शिनीवाली०' इस मन्त्रद्वारा शंखके जलसे स्नान करावे। 'यज्ञं यज्ञ०' इस मन्त्रसे आँवला आदिके द्वारा उबटन लगावे। 'आप्यायस्व०' इस मन्त्रको पढ़कर दूधसे स्नान करावे। 'दधिक्राव्णो०' इस मन्त्रद्वारा दहीसे नहलावे। 'समुद्रज्या०' अथवा 'इमं मे गङ्गे यमुने०' इस मन्त्रसे ओषधियोंद्वारा स्नान करावे। फिर 'द्विपदाभिः०' मन्त्रोंद्वारा सूर्यदेवका उद्वर्तन करके 'मानस्तोके०' इत्यादि मन्त्रोंसे एक बार स्नान करावे। उसके बाद 'विष्णुरराटमसि०' इस मन्त्रसे गन्धयुक्त जलद्वारा स्नान करावे। तत्पश्चात् सौवर्णमन्त्रसे पाद्य निवेदन करे। 'इदं विष्णुर्विचक्रमे०' इस मन्त्रसे अर्घ्य दे। 'वेदोसि०' इस मन्त्रसे यज्ञोपवीत पहनावे। 'बृहस्पते०' इस मन्त्रसे वस्त्र दे। 'येन श्रियं प्रकुर्वाण०' इस मन्त्रसे फूलकी माला धारण करावे। 'धूरसि०' इस मन्त्रसे गुग्गुलसहित धूप दे। 'समिद्धोऽञ्जन०' इत्यादि मन्त्रसे अंजन दे। 'युञ्जान०' इत्यादि मन्त्रसे सूर्यदेवको गोरोचनका तिलक लगावे। तत्पश्चात् 'दीर्घायुत्वाय०' इत्यादि मन्त्रसे आरती करे। 'सहस्त्रशीर्षा पुरुषः' इत्यादि मन्त्रसे सूर्यदेवके मस्तकपर पूजा करे। 'नमः शम्भवाय०' इत्यादि मन्त्रसे भगवान् सूर्यके नेत्रोंका स्पर्श करे। 'विश्वतश्चक्षुः' इस मन्त्रको पढ़कर सूर्यदेवके समस्त विग्रहका स्पर्श करे। तदनन्तर 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च०' इत्यादि मन्त्रसे सूर्य-प्रतिमाके सब अंगोंमें पूजन करे।

इस प्रकार तीनों समय आदरपूर्वक भगवान् सूर्यका पूजन करे। उनकी पूजा समस्त कामनाओं तथा फलोंको देनेवाली है। सूर्यकी पूजाके लिये सब प्रकारके विलेपनोंमें रोली और लाल चन्दन उत्तम है। फूलोंमें कनेरके फूल श्रेष्ठ माने गये हैं। कुंकुम, चमेली, कमल तथा अगुरुसे बढ़कर सूर्यदेवको तृप्त करनेवाली दूसरी कोई वस्तु नहीं है। जो इन सभी वस्तुओंसे भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, उसका संसारमें कौन-सा मनोरथ सिद्ध नहीं होता? इस विधिसे सूर्यदेवका पूजन करके परिक्रमा करे और अर्कस्थलको मस्तकसे प्रणाम करके सूर्यके सम्मुख सुखपूर्वक स्थित होकर उनका दर्शन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष कोटि यात्राका फल पाता है। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, अग्नि और कुबेर आदि सब देवता भगवान् सूर्यके आश्रित रहकर द्युलोकमें आनन्दित होते हैं। इसलिये मैं सूर्यके समान दूसरे किसी देवताको नहीं देखता। महादेवि! सूर्यकी स्तुति करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उनकी सात बार परिक्रमा करनी चाहिये। 'तमुष्टवाम' यह ऋग्वेदिय मन्त्र पहली परिक्रमाके लिये बताया गया है। 'एतोन्विन्द्रस्तवाम' इस मन्त्रसे दूसरी परिक्रमा कही गयी है। 'इन्द्र शुद्धो न आगहि' इस मन्त्रसे तीसरी परिक्रमा करनी चाहिये। 'इन्द्रं शुद्धोमि नो रयिं' इत्यादि मन्त्रसे चौथी परिक्रमा बतायी गयी है। 'अस्य

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