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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
१२२८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मण्डलके मध्यभागमें वेदीके ऊपर विराजमान सूर्यदेवका ध्यान करके नित्य उनकी पूजा करनी चाहिये। उनके शरीरका रंग लाल है। वे महातेजस्वी हैं। श्वेत कमलके ऊपर बैठे हैं। समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित तथा सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके दो भुजाएँ और एक मुख है। उन्होंने अपने हाथमें सुन्दर कमल धारण कर रखा है। उनका मण्डल गोल है। वे तेजके केन्द्र हैं तथा उन्होंने लाल रंगका वस्त्र धारण कर रखा है। यही भगवान् आदित्यका सर्वलोकपूजित रूप है।

भगवान् सूर्यकी प्रतिमाका इस प्रकार पूजन करे—'ईशे त्वा०' इत्यादि मन्त्रसे उनके मस्तककी पूजा करे। 'अग्निमीळे०' इस मन्त्रके द्वारा उनके दाहिने हाथका पूजन करे। 'अग्न आयाहि०' इस मन्त्रसे सूर्यदेवके दोनों चरणोंकी पूजा करे। 'आजिघ्र०' इत्यादि मन्त्रसे पुष्पमाला पहनाये तथा 'योगे योग०' इस मन्त्रसे पुष्पांजलि छोड़े। इस तरह सामान्य पूजा करके उनकी विशेष पूजा प्रारम्भ करे। 'समुद्रागच्छ०' अथवा 'इमं मे गङ्गे' इत्यादि मन्त्रसे भगवान् सूर्यको स्नान करावे। 'समुद्रज्या०' इस मन्त्रसे विधिपूर्वक सूर्यदेवके अंगोंका प्रक्षालन करे। 'शिनीवाली०' इस मन्त्रद्वारा शंखके जलसे स्नान करावे। 'यज्ञं यज्ञ०' इस मन्त्रसे आँवला आदिके द्वारा उबटन लगावे। 'आप्यायस्व०' इस मन्त्रको पढ़कर दूधसे स्नान करावे। 'दधिक्राव्णो०' इस मन्त्रद्वारा दहीसे नहलावे। 'समुद्रज्या०' अथवा 'इमं मे गङ्गे यमुने०' इस मन्त्रसे ओषधियोंद्वारा स्नान करावे। फिर 'द्विपदाभिः०' मन्त्रोंद्वारा सूर्यदेवका उद्वर्तन करके 'मानस्तोके०' इत्यादि मन्त्रोंसे एक बार स्नान करावे। उसके बाद 'विष्णुरराटमसि०' इस मन्त्रसे गन्धयुक्त जलद्वारा स्नान करावे। तत्पश्चात् सौवर्णमन्त्रसे पाद्य निवेदन करे। 'इदं विष्णुर्विचक्रमे०' इस मन्त्रसे अर्घ्य दे। 'वेदोसि०' इस मन्त्रसे यज्ञोपवीत पहनावे। 'बृहस्पते०' इस मन्त्रसे वस्त्र दे। 'येन श्रियं प्रकुर्वाण०' इस मन्त्रसे फूलकी माला धारण करावे। 'धूरसि०' इस मन्त्रसे गुग्गुलसहित धूप दे। 'समिद्धोऽञ्जन०' इत्यादि मन्त्रसे अंजन दे। 'युञ्जान०' इत्यादि मन्त्रसे सूर्यदेवको गोरोचनका तिलक लगावे। तत्पश्चात् 'दीर्घायुत्वाय०' इत्यादि मन्त्रसे आरती करे। 'सहस्त्रशीर्षा पुरुषः' इत्यादि मन्त्रसे सूर्यदेवके मस्तकपर पूजा करे। 'नमः शम्भवाय०' इत्यादि मन्त्रसे भगवान् सूर्यके नेत्रोंका स्पर्श करे। 'विश्वतश्चक्षुः' इस मन्त्रको पढ़कर सूर्यदेवके समस्त विग्रहका स्पर्श करे। तदनन्तर 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च०' इत्यादि मन्त्रसे सूर्य-प्रतिमाके सब अंगोंमें पूजन करे।

इस प्रकार तीनों समय आदरपूर्वक भगवान् सूर्यका पूजन करे। उनकी पूजा समस्त कामनाओं तथा फलोंको देनेवाली है। सूर्यकी पूजाके लिये सब प्रकारके विलेपनोंमें रोली और लाल चन्दन उत्तम है। फूलोंमें कनेरके फूल श्रेष्ठ माने गये हैं। कुंकुम, चमेली, कमल तथा अगुरुसे बढ़कर सूर्यदेवको तृप्त करनेवाली दूसरी कोई वस्तु नहीं है। जो इन सभी वस्तुओंसे भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, उसका संसारमें कौन-सा मनोरथ सिद्ध नहीं होता? इस विधिसे सूर्यदेवका पूजन करके परिक्रमा करे और अर्कस्थलको मस्तकसे प्रणाम करके सूर्यके सम्मुख सुखपूर्वक स्थित होकर उनका दर्शन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष कोटि यात्राका फल पाता है। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, अग्नि और कुबेर आदि सब देवता भगवान् सूर्यके आश्रित रहकर द्युलोकमें आनन्दित होते हैं। इसलिये मैं सूर्यके समान दूसरे किसी देवताको नहीं देखता। महादेवि! सूर्यकी स्तुति करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उनकी सात बार परिक्रमा करनी चाहिये। 'तमुष्टवाम' यह ऋग्वेदिय मन्त्र पहली परिक्रमाके लिये बताया गया है। 'एतोन्विन्द्रस्तवाम' इस मन्त्रसे दूसरी परिक्रमा कही गयी है। 'इन्द्र शुद्धो न आगहि' इस मन्त्रसे तीसरी परिक्रमा करनी चाहिये। 'इन्द्रं शुद्धोमि नो रयिं' इत्यादि मन्त्रसे चौथी परिक्रमा बतायी गयी है। 'अस्य

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वामस्य०' इत्यादि मन्त्रसे पाँचवीं परिक्रमा करनी चाहिये। 'त्रिभिष्टवं देव०' इस मन्त्रसे छठी परिक्रमाका विधान है। तथा सामगान करनेवाले मनीषी पुरुषोंने जो दस प्रकारके सामगान किये हैं, उनके द्वारा सातवीं परिक्रमा करनी चाहिये। हिंकार, प्रणव, उद्गीथ, प्रस्ताव, प्रहर, आरण्यक और निधन—ये सात प्रकारके साम कहे गये हैं। हिंकार और प्रणव न रहनेपर पाँच प्रकारका साम बताया गया है। पूर्वोक्त सात प्रकारके सामके अतिरिक्त साध्य नामक आठवाँ साम है। नवाँ वामदेव साम है और दसवाँ ज्येष्ठ साम कहा गया है, जो ब्रह्माजीको परम प्रिय एवं उत्तम प्रतीत होता है। इन सब सामोंका विधिपूर्वक जप करना चाहिये। जो निष्कामभावसे भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, वह इस क्षेत्रके माहात्म्यसे तथा अर्क—सूर्यके प्रभावसे निश्चय ही मोक्षको प्राप्त होता है। दूसरे स्थानोंमें एक करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे जो फल होता है, वही अर्कस्थलमें एक ब्राह्मणको भोजन करानेसे प्राप्त होता है। सूर्यग्रहणमें जो स्नान, दान, जप और होम किया जाता है, वह सब यहाँ अर्कस्थलके प्रभावसे कोटिगुना हो जाता है। जो मनुष्य माघमासके कृष्ण पक्षमें रविवारयुक्त सप्तमीको अर्कस्थलके समीप जागरण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। उस क्षेत्रमें निवास करनेवाले सभी मनुष्योंके लिये अर्कस्थल पूजनीय हैं। कल्याणकामी पुरुषको चाहिये कि वह भगवान् सूर्यपर जलमें पैदा हुआ या मुरझाया हुआ अथवा किसी दोषसे दूषित या बासी फूल न चढ़ावे।

पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! सूर्यदेवको राहु कैसे ग्रस लेता है?

महादेवजीने कहा—देवि! मैं ग्रहणका कारण बतलाता हूँ, सुनो। विशेष समय आनेपर सूर्यदेव अपनी किरणोंसे अमृतकी धारा बहाते हैं। उस समय अमृतकी इच्छा रखनेवाला राहु अपने विमानपर बैठकर सूर्यबिम्बके नीचे आ जाता है। उसके बिम्बसे सूर्यका बिम्ब छिप जाता है। इसीको सूर्यग्रहण कहते हैं। वास्तवमें कोई भी सूर्यदेवको ग्रस नहीं सकता। वे निश्चय ही ग्रसनेवालेको जलाकर भस्म कर देंगे।

पूर्वकालमें उस क्षेत्रके भीतर लोकपाल, महर्षि, सिद्ध, विद्याधर, यक्ष, गन्धर्व तथा मुनिलोग सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। कुबेर, भीष्म, ययाति, गालव तथा साम्बने भी यहाँ उत्तम सिद्धि प्राप्त की है। यह माहात्म्यकथा नास्तिक, श्रद्धाहीन, क्रूर, दोषदर्शी एवं शठ मनुष्यसे न कहे। अपने पुत्र, शिष्य, धर्मिष्ठ, ज्ञानी तथा भगवान् सूर्यके भक्तको ही यह प्रसंग सुनाना चाहिये। जो तेजका सनातन आश्रय, जलकी गति, दिशाओंका अविनाशी दीपक, सिद्धिका खुला हुआ द्वार, जगत्‌का सामान्य नेत्र, आकाशरूपी सरोवरका सुवर्णमय कमल, दिगंगनाओंका देदीप्यमान कुण्डल तथा काल-गणनाका एकमात्र मापक यन्त्र है, वह भगवान् सूर्यका बिम्ब आप सब लोगोंकी रक्षा करे।

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चन्द्रमाकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा ओषधि आदिका पोषण

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! भगवान् शिवके इस प्रकार कहनेपर यशस्विनी देवी पार्वतीने इस प्रकार पूछा—'देव! आपके मस्तकपर जो ये चन्द्रमा विराजमान हैं, किसके पुत्र हैं? कब और किस प्रकार इनकी उत्पत्ति हुई है?'

महादेवजीने कहा—देवि! देवताओं और दानवोंने मिलकर जब क्षीरसागरका मन्थन किया, तब उसमेंसे चौदह रत्न निकले। उन्हीं रत्नोंमें ये महातेजस्वी चन्द्रमा भी थे। इनकी उत्पत्ति अमृतसे हुई है। इसीलिये विषपान करनेके पश्चात् इन्हें मैं आजतक सिरपर धारण करता हूँ। पूर्वकालमें मैंने चन्द्रमाको अपना शिरोभूषण बनाया है, इसीलिये लोग मुझे चन्द्रभूषण कहते हैं।

१२३०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पार्वती! मैं ही सृष्टि, पालन और संहारका कर्ता हूँ। सृष्टिकालमें मैं रजोगुणसे संयुक्त होता हूँ। पालनके समय सत्त्वगुणमें स्थित रहता हूँ और संहारकालमें तमोगुणसे युक्त हो जाता हूँ। मैं ही तीन रूपोंमें स्थित हूँ। अतः ब्रह्मा भी मुझ महेश्वरके ही अंश हैं। ब्रह्माका स्वामी मैं ही हूँ। विष्णु और ब्रह्मा दोनों ही मुझ सदाशिवसे अभिन्न हैं; क्योंकि मैं सर्वात्मक हूँ। शिव ही सम्पूर्ण जगत्‌का पालन करनेवाले विष्णु हैं। मेरे द्वारा निर्मित ब्रह्माण्डमें ये लोक हैं। इसीके भीतर सम्पूर्ण चराचर जगत् है। इस ब्रह्माण्डमें अबतक कितने चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण बीत गये और कितने अभी होंगे, इसकी गणना असम्भव है।

चन्द्रमाका जो तेज पृथ्वीपर प्राप्त हुआ, उससे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करनेवाली ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। उन्हीं ओषधियोंके द्वारा सम्पूर्ण लोक तथा चार प्रकारके प्रजा वर्ग जीवन धारण करते हैं। फल लगनेपर जिनका अन्त हो जाता है, ऐसी ओषधियाँ शण कहलाती हैं। वे सोलह प्रकारकी हैं—धान, जौ, गेहूँ, अणु, तिल, मोठ, कँगनी, कोदो, चीना, उड़द, मूँग, मसूर, निष्पाव, कुलथी, अरहर और चना—ये सोलह प्रकारके शण हैं। ये ग्रामीण ओषधियोंकी जातियाँ बतायी गयी हैं। ग्राम और वनमें उत्पन्न होनेवाली चौदह प्रकारकी ओषधियाँ यज्ञके काममें आती हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—धान, जौ, गेहूँ, अणु, तिल, कँगनी, कुलथी, साँवा, तिल्ली, बनतिल, गवेधु, उड़द, मकई और वेणुयव (बाँसधान)। तृण, गुल्म, लता, वीरुथ तथा गुच्छ आदि करोड़ों प्रकारके औषध और तृणोंके स्वामी चन्द्रमा हैं। वे ही सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करते हैं। भगवान् सोम जगत्‌का हित करनेकी इच्छासे सबको धारण करते हैं, इसलिये ब्रह्माजीने उन्हें बीज, ओषधि, ब्राह्मण तथा मन्त्रोंका राज्य प्रदान किया है। राजाके पदपर अभिषिक्त हो महातेजस्वी सोमने अपने प्रकाशसे तीनों लोकोंको पुष्ट किया है।


सृष्टि-कथा—दक्षकन्याओं तथा धर्म एवं कश्यपजीकी सन्ततिका संक्षिप्त वर्णन

महादेवजी कहते हैं—देवि! प्राचीन कालमें ब्रह्माजीसे दक्ष नामक पुत्र हुआ। ब्रह्माजीने दक्षको सृष्टि करनेकी आज्ञा दी। तब दक्षने अपनी पत्नी वीरिणीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे दसको तो उन्होंने धर्मके साथ ब्याह दिया। तेरह कश्यपजीको दीं। सत्ताईस कन्याओंका विवाह चन्द्रमाके साथ किया। चार कन्याएँ अरिष्टनेमिको, दो भृगुपुत्रको, दो बुद्धिमान् कृशाश्वको तथा दो अंगिरा मुनिको ब्याह दी। मरुत्वती, वसु, जामी, लंबा, भानु, अरुन्धती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या, विश्वा—ये धर्मराजकी स्त्रियोंके नाम हैं। अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू, त्विषा और वसु—ये कश्यपजीकी स्त्रियाँ हैं। अब इनके पुत्रोंके नाम सुनो—विश्वाके विश्वेदेव हुए। साध्याने साध्य देवताओंको जन्म दिया। भानुके भानु और मुहूर्ताके मुहूर्त नामक पुत्र हुए। लम्बाके पुत्रोंकी घोष नामसे प्रसिद्धि हुई। जामीसे नागवीथी नामकी कन्या हुई। संकल्पासे संकल्प नामक पुत्रका जन्म हुआ। मरुत्वतीसे मरुत्वान् नामवाले देवताओंकी उत्पत्ति हुई। अरुन्धतीके गर्भसे पृथ्वीपर होनेवाले समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। वसुसे आठों वसुओंका जन्म हुआ। आप, ध्रुव, सोम, वर, अनल, अनिल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं। आपके पुत्र—देव, भ्रम, शान्त और ध्वनि हुए।

* प्रभासखण्ड *१२३१

लोकोंको अपना ग्रास बनानेवाले भगवान् काल ध्रुवके पुत्र हैं। सोमके पुत्रोंके नाम वर्चा और बुध हैं। धरके हुत, हव्यवह और द्रविण—ये तीन पुत्र हुए। अनलके कई पुत्र हुए, जो अग्निके समान गुणवाले ही हैं। अनिलके दो पुत्र हुए—मनोजव और अविज्ञातगति। प्रत्यूषके पुत्र योगी देवल हुए। बृहस्पतिकी बहिन ब्रह्मवादिनी आठवें वसु प्रभासकी पत्नी हुई। उसीके पुत्र शिल्पकर्म करनेवाले प्रजापति विश्वकर्मा हुए। मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, पान, नेमि, यम, नृप, हंस, नारायण, विभु तथा प्रभु—ये बारह साध्य (या तुषित) देवता कहे गये हैं।

अब कश्यपकी सन्तानोंका वर्णन करता हूँ। अंश, धाता, भव, त्वष्टा, मित्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् तथा विष्णु—ये सहस्र किरणोंवाले बारह आदित्य (अदितिके पुत्र) हैं। अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रेवत, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सवित्र, जयन्त, पिनाकी तथा अपराजित—ये ग्यारह रुद्रगण हैं; जो असंख्य रुद्रगणोंके स्वामी हैं (इन्हें सुरभिकी सन्तान कहा जाता है)। बलपर गर्व रखनेवाली दितिने दो पुत्र प्राप्त किये—ज्येष्ठका नाम हिरण्यकशिपु और छोटेका नाम हिरण्याक्ष था। हिरण्यकशिपुके चार महाबली पुत्र हुए, जिनमें प्रह्लाद ज्येष्ठ थे, उनसे छोटेका नाम अनुह्लाद था। अनुह्लादसे छोटे क्रमशः ह्लाद और ह्रद थे। ह्रदके दो पुत्र हुए—सुन्द और उपसुन्द। ह्लादके एक ही पुत्र हुआ, जो मूक नामसे विख्यात था। सुन्दका पुत्र मारीच था, जो ताड़काके गर्भसे उत्पन्न हुआ था। उसे महाबली श्रीरामचन्द्रजीने दण्डकारण्यमें मार डाला। मूक भी सव्यसाची अर्जुनके द्वारा किरात प्रदेशमें मारा गया। संह्लादके कुलमें निवातकवच नामक दैत्य उत्पन्न हुए, जिनकी संख्या तीन करोड़ बतायी गयी है। वे सभी अर्जुनके द्वारा मारे गये। गवेष्ठी, कालनेमि, जम्भ, बल्वल, शम्भु तथा विरोचन—ये प्रह्लादके पुत्र माने गये हैं। शम्भुके दो पुत्र हुए—धेनुक और सोमलोमा। विरोचनके एक ही पुत्र प्रतापी बलि हुए। हिरण्याक्षके पाँच पुत्र हुए जो बड़े पराक्रमी और महाबली थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—अन्धक, शकुनि, कालनाभ, महानाभ तथा भूतसन्तापन। इनकी लाखों सन्तानें हुईं। ये सभी तारकामय संग्राममें मारे गये। इस प्रकार संक्षेपसे कश्यपजीकी सन्तानोंका वर्णन किया गया, जिनके द्वारा देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है।

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चन्द्रमाके द्वारा प्रभासक्षेत्रमें शिवकी आराधना, वरदान-प्राप्ति, सोमनाथके मन्दिरका निर्माण तथा ब्राह्मणोंको उनकी आराधनामें लगाना

देवी पार्वती ने पूछा— जगदीश्वर ! प्रभासक्षेत्रमें किस समय सोमनाथ लिंगकी स्थापना हुई है? रोहिणीवल्लभ चन्द्रमाने कृतार्थ होकर किस प्रकार उसकी आराधना की।

महादेवजीने कहा— प्रिये! वैवस्वत मन्वन्तरके दसवें त्रेतायुगमें दुर्वासासहित चन्द्रदेव उत्पन्न हुए। उस समय चन्द्रमाने सहस्रों वर्षोंतक तपस्या करके भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन किया और लोककर्ता ब्रह्माजीके द्वारा शिवलिंगकी स्थापना करायी। तत्पश्चात् पुनः सहस्र वर्षोंतक मुझ शंकरकी आराधना की। विधिपूर्वक मेरी पूजा करनेके अनन्तर अपने कार्यों और मनोरथोंकी सिद्धिके लिये निशानाथने मेरा स्तवन किया।

चन्द्रमा बोले— शिवके समान दूसरा कोई देवता नहीं है। रणभूमिमें शिवजीके समान कोई रक्षक नहीं है। संसारमें शिवके सदृश शरणागतवत्सल नहीं है तथा शिवके समान दूसरी कोई गति

१२३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नहीं है। सांख्यवादी जिन्हें प्रधान और पुरुष कहते हैं, योगी जिनका परम प्रधान एवं परम पुरुषरूपसे चिन्तन करते हैं, उन ज्ञेयस्वरूप सदाशिवको नमस्कार है। विद्वान् पुरुष जिन्हें देवता, असुर और मनुष्योंकी सृष्टि तथा संहारका कारण मानते हैं, उन सर्वात्माको नमस्कार है। जो अविनाशी, अनादि, अनन्त, नित्य, सनातन, ध्रुव, कलातीत एवं परम ब्रह्मस्वरूप हैं, उन योगात्मा शिवको नमस्कार है। जो आदिदेव महेश्वर पवित्र वस्तुओंमें सबसे अधिक पवित्र हैं तथा दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देते हैं, उन तीर्थात्मा शिवको नमस्कार है। जिनसे सबकी उत्पत्ति होती है, जिनमें सबका लय होता है तथा जो सम्पूर्ण जगत्‌का पालन करते हैं, उन सर्वात्माको नमस्कार है। ब्राह्मणलोग पूर्ण दक्षिणायुक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञोंके द्वारा जिनका यजन करते हैं, उन यज्ञात्माको नमस्कार है।

पार्वती! इस प्रकार जब चन्द्रमाने दिन-रात मेरा स्तवन किया, तब मैंने प्रसन्न होकर कहा—'वत्स! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे पूर्णतः सन्तुष्ट हूँ। तुम अपनी इच्छाके अनुसार वर माँगो।'

चन्द्रमाने कहा—प्रभो आप इस शिवलिंगमें सदैव निवास कीजिये। जो लोग अत्यन्त भक्तिपूर्वक यहाँ आपका दर्शन करें, उन्हें आपके प्रसादसे उत्तम सिद्धि प्राप्त हो।

मैंने कहा—चन्द्रदेव! इस लिंगमें मेरा निवास तो पहलेसे ही है, अब तुम्हारी निरन्तर भक्तिके कारण मैं इसमें विशेष रूपसे उमासहित निवास करूँगा। इस क्षेत्रमें मेरे प्रसादसे तुमने अपनी प्रभा प्राप्त की है, इस कारण इसका नाम प्रभास होगा। सोम! तुमने मेरे इस शुभ लिंगकी प्रतिष्ठा की है, इसलिये यहाँ मेरा नाम 'सोमनाथ' प्रसिद्ध होगा। जो मनुष्य मेरी भक्तिमें तत्पर हो यहाँ मेरा दर्शन करेंगे, उन्हें मेरे प्रभावसे रोग, दरिद्रता, दुर्गति तथा इष्टजनोंका वियोग नहीं होगा। मेरे दर्शनकी इच्छा रखनेवाले जो लोग भक्तिभावसे यहाँकी यात्रा करेंगे, उन्हें पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होगा। निशाकर! एक पुरुष तो जीवनभर ब्रह्मचारी रहे और दूसरा एक बार यहाँ मेरा दर्शन करे, उन दोनोंके लिये समान फल बतलाया गया है। एक मनुष्य ब्राह्मणको सब प्रकारके दान देता है और एक यहाँ आकर मेरा दर्शन करता है, उन दोनोंके लिये समान फल बताया गया है। सोमवारको चन्द्रग्रहण प्राप्त होनेपर जो भक्तिपूर्वक मेरा दर्शन करता है, उसे पूर्वोक्त सभी पुण्यकर्मोंका फल प्राप्त होता है। सरस्वती, समुद्र, सोमवार, सोमग्रहण और सोमनाथजीका दर्शन—इन पाँच सकारोंका योग दुर्लभ है। चार मासतक विधिपूर्वक शिवकी पूजा करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वही कार्तिककी पूर्णिमामें पूजन करनेपर यहाँ एक ही दिनमें प्राप्त हो जाता है। वही पुण्य चैत्रकी पूर्णिमाको दूना बताया गया है। फाल्गुन और आषाढ़की पूर्णिमाके दिन दर्शन-पूजनका भी यही पुण्य है। जो मनुष्य जीवनपर्यन्त प्रति माघमासमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराता है और जो एक बार इस शिवलिंगका दर्शन करता है, उन दोनोंको समान फल प्राप्त होता है; इसमें संशय नहीं है। नागकेशर, चम्पा, श्वेतकमल और धतूरके फूल शिवकी पूजाके लिये उत्तम माने गये हैं। केतकी, अतिमुक्त (मरुआ), कुन्द, जूही, सिरस, शाल और जामुनके फूलोंको शिवकी पूजामें त्याग देना चाहिये। धतूर और कदम्बके फूल रातमें शिवके ऊपर चढ़ाने चाहिये। शेष जो फूल बताये गये हैं, उनका उपयोग दिनको करना चाहिये। मल्लिका अर्थात् बेलाका फूल दिन और रात दोनोंमें चढ़ाना चाहिये। जिसमें कीड़े और केश आदि पड़ गये हों, जो रातके तोड़े हुए होनेसे बासी हो गये हों, जो अपने-आप टूटकर गिरे हुए अथवा कुचल गये हों—ऐसे फूलोंको त्याग देना चाहिये। तुलसी, कमल, गान्धार और दवनासे सोमनाथकी सदा पूजा करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य यहाँकी यात्राका पूरा फल पाता है और स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

* प्रभासखण्ड * १२३३


ऐसा कहकर सोमेश्वर शिव वहीं अन्तर्धान हो गये। चन्द्रमाको यक्ष्मारोगसे छुटकारा मिला। उन्होंने विश्वकर्माको बुलाकर सोमनाथके लिये एक मन्दिर बनवाया, जो शुद्ध स्फटिक तथा गोदुग्धके समान उज्ज्वल था। उसके चारों ओर अन्य चौदह मन्दिर बनवाये गये। ब्रह्मा आदि समीपवर्ती देवताओंके लिये भी दस मन्दिर निर्माण किये गये। वैवस्वत मन्वन्तरके दसवें त्रेतामें मण्डप बनवाकर विधिपूर्वक सोमेश्वर शिवकी प्रतिष्ठा करके दीनों और अनाथोंके लिये सैकड़ों और हजारों वापी, कूप, तड़ाग और गृह आदि बनवाये। सब कुछ बनवाकर पृथक्-पृथक् ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक दान दिया। सोमेश्वरके समीप नगर बसाकर चन्द्रमाने ब्राह्मणोंका पूजन किया और कहा—'ब्रह्माजीकी कृपासे मैं यद्यपि आपलोगोंका राजा हूँ, तथापि विनय और भक्तिसे ही कुछ निवेदन करता हूँ। धन, सुवर्ण, रत्न, धान, जौ आदि अन्न, गाय-भैंस आदि पशु, भाँति-भाँतिके वस्त्र, केला और नारियलके फल, पान और सुपारी तथा मनोहर उद्यान आपलोगोंके लिये सब ओर उपस्थित हैं। जम्बूद्वीपके सब मनुष्य आपके अधीन होकर आपकी आज्ञाका पालन करेंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा वर्णसंकर लोग भी आपको गुरु मानकर तीर्थयात्रा करेंगे। विप्रवरो! आपलोग यहाँ रहकर पवित्र उपचारोंसे मेरे द्वारा स्थापित सोमनाथजीकी सब समय पूजा करें। आपलोग स्मृतियोंके सदाचारका पालन करनेमें कुशल हैं। यहाँ रहकर सबके व्यवहारोंको देखिये और स्वयं भी श्रुति-स्मृति एवं पुराणोंमें प्रतिपादित धर्मोंका आचरण कीजिये।'

यह सुनकर उन ब्राह्मणोंने कहा—चन्द्रदेव! आप हम ब्राह्मणोंके राजा हैं। आपने हमें सर्वथा उत्तम उपदेश दिया है। हम आपकी सब आज्ञाका पालन करेंगे। परन्तु जो लोग किसीके द्वारा नियुक्त होकर—वेतन लेकर पूजा करते हैं, अथवा शिवनिर्माल्यका सेवन करते हैं, वे पतित हो जाते हैं। अतः ऐसा करनेपर हम भी पतित हो सकते हैं। यह पातित्य श्रुतियों और स्मृतियोंद्वारा निन्दित है। श्रुति और स्मृति दोनों ही शिवजीकी आज्ञाएँ हैं, अतः कौन ऐसा मूढ़ होगा जो प्राणोंके कण्ठतक आ जानेपर भी शिवकी आज्ञाओंका उल्लंघन करेगा। अष्टमूर्ति शिवकी एक मूर्ति अग्निदेव हैं। वे ही देवताओंके मुख हैं। हम अग्निमें यज्ञ कराते हुए सत्स्वरूपसे सम्पूर्ण जगत्को तृप्त करते हैं। यह जगत् भगवान् शिवका रूप है। जगत्में परस्पर भेद होते हुए भी यह जगदीश्वर शिवसे अभिन्न है। अग्निमें विधिपूर्वक दी हुई आहुति सूर्यदेवको प्राप्त होती है। सूर्यसे वृष्टि होती है, वृष्टिसे अन्न होता है और अन्नसे प्रजा जीवन धारण करती है*। हम सदा श्रुति, स्मृति और पुराणोंके अभ्यासमें संलग्न रहनेवाले हैं। उसके अर्थका विचार करनेमें ही तत्पर रहते हैं और उनमें बताये हुए सभी सत्कर्मोंका अनुष्ठान किया करते हैं; अतः हमें शिवलिंग-पूजनके लिये बहुत कम अवसर मिल सकता है। तथापि हम रुद्रका जप और पंच महायज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए ही यथासमय और यथावकाश सोमेश्वर लिंगका भी पूजन करते रहेंगे।

एक समय पार्वतीजीने शिवजीसे पूछा—देव! दैत्यलोग आपका प्रसाद पाकर तीनों लोकोंमें उत्पात करते और इन्द्र आदि देवताओंको भी अपने स्थानसे भगा देते हैं। ऐसे दुष्टात्माओंको आप वर क्यों देते हैं और भगवान् विष्णु उन्हें क्यों मारते हैं। उनके द्वारा मारे हुए दैत्योंकी क्या गति होती है?

महादेवजीने कहा—सात्त्विक, राजस और


* अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठति। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः॥ (स्क० पु०, प्रभास० २२।८८-८९)

१२३४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


तामस तीन प्रकारके प्राणी होते हैं। उनमेंसे ये दैत्यगण प्रायः तमोगुणी और दुर्धर्ष होते हैं। देवताओंके साथ ये सदा लाग-डाँट रखते हैं और संसारका संहार कर देनेके लिये उद्यत होकर तामसिक तपस्याओंके द्वारा मोहवश मेरा भजन करते हैं। मैं जो उन्हें वरदान देता हूँ, उसमें केवल उनकी भक्ति ही कारण है। मैं भक्तिसे भलीभाँति वशमें हो जानेवाला हूँ। तपस्याके अनुसार वर पाकर वे पापात्मा दैत्य जो विष्णुके द्वारा मारे जाते हैं, उसका रहस्य मुझसे सुनो। मैं और विष्णु जो भिन्न प्रतीत होते हैं, उसमें गुणभाग कारण है। वास्तवमें हम दोनों अभिन्न हैं। हममें आराध्य और आराधक आदिका भेद भी सामान्य ही है—हम उनके आराध्य हैं और वे हमारे। श्रीविष्णुके चरणोंके अग्रभागसे निकली हुई गंगाजीको मैं भक्तिपूर्वक मस्तकपर धारण करता हूँ। तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये उद्यत हुए श्रीविष्णुने भी चिरकालतक मेरी उपासना करके दुष्ट दैत्योंका नाश करनेवाला चक्र प्राप्त किया। त्रिभुवनकी उत्पत्तिके कारणभूत श्रीहरिकी मैं भक्तिपूर्वक आराधना करता हूँ। इसी प्रकार श्रीहरि भी मेरी आज्ञा शिरोधार्य करके अजन्मा होते हुए भी जन्म लेकर सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करते हैं। हिरण्यकशिपु दैत्यका वध करनेके लिये नृसिंह-शरीर धारण करनेवाले श्रीहरिको मैंने ही शान्त किया। इसी प्रकार बाणासुरकी रक्षाके लिये त्रिशूल उठानेवाले मुझ शंकरको मनुष्य-अवतारमें स्थित होते हुए भी श्रीहरिने लीलापूर्वक स्तब्ध कर दिया था। मेरी महिमा और प्रभावको बढ़ाते हुए मेरे प्रभु भगवान् विष्णु नित्य मेरी सेवा करते हैं तथा मैं भी अनादि, अनन्त परमात्मा श्रीहरिका ध्यानयोग और समाधिमें चिन्तन करता हूँ। इस प्रकार उनका और मेरा भेद वास्तविक नहीं है। मूढ़ मनुष्य ही हम दोनोंमें भेद और न्यूनता-अधिकताका आरोप करते हैं। मैं ही विष्णुरूप धारण करके दुष्टोंका संहार करता हूँ। वे दैत्य हम दोनोंके प्रभावसे निष्पाप होकर मुक्तिके लिये ब्रह्मर्षियोंके कुलमें जन्म लेते हैं। ब्रह्मचर्यके पश्चात् पाशुपत योगका आश्रय ले पूर्वजन्मके संस्कारसे वे फिर मेरी उपासना करते हैं। मेरे लिंगोंका पूजन करते हैं। सदा एकमात्र मुझमें ही चित्त लगाये हुए मेरे ध्यानमें दृढ़तापूर्वक स्थित रहते हैं। जो सम्पूर्ण जगत्की अधीश्वरी तुम पार्वतीकी भी वन्दना करते हैं, उन्हें देहत्यागके पश्चात् मैं सारूप्य तथा सालोक्य मुक्ति देता हूँ। धर्मशास्त्रके अनुकूल आचारके कारण वे साधुपुरुषों और मुनियोंद्वारा निन्दित नहीं होते। तीर्थयात्राके प्रसंगसे वे ब्राह्मण लोग जब यहाँ आते हैं, तब मैं उन्हें अपने स्थानपर ले आता हूँ और तुम उन भोजनार्थी तपस्वीजनोंको नाना प्रकारके उपहारोंसे तृप्त करती हो। फिर वे सब धर्मोंमें तत्पर होकर श्रीसोमेश्वरदेवकी पूजा करते हैं और शरीरका अन्त होनेपर परम दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।

ब्राह्मणलोग कहते हैं— चन्द्रदेव ! पार्वतीजीके पूछनेपर भगवान् शिवने यही कहा था। वहीं देवर्षि नारदने दोनोंका वह सब संवाद सुना और कथा-गोष्ठीमें हमारे पूछनेपर वह सब वृत्तान्त बतलाया।

ब्राह्मणोंके यों कहनेपर सोमदेव प्रसन्न होकर अपने लोकको चले गये। और उनकी आज्ञासे वे ब्राह्मण भी सोमेश्वरदेवकी यथावत् पूजा करते हैं। जिस मनुष्यने सोमवारसे लेकर आठ दिनोंतक सोमेश्वरदेवका पूजन किया है, उसने सब प्रकारके दान और सम्पूर्ण महाव्रतोंका अनुष्ठान कर लिया।

  • प्रभासखण्ड * १२३५

सोमवारव्रतकी विधि और महिमा, गन्धर्वसेनाकी रोगनिवृत्ति

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! कैलासके उत्तर निषधपर्वतके शिखरपर स्वयम्प्रभा नामक एक विशाल पुरी है। उसमें धनवाहन नामके एक गन्धर्वराज रहते थे। उनकी स्त्री बड़ी मनोहर थी। उसके साथ रहकर वे वहाँ दिव्य भोगोंका उपभोग करते थे। समयानुसार उनके आठ पुत्र हुए। पुत्रोंके बाद एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम गन्धर्वसेना था। वह पिताकी आज्ञासे बहुत-सी कन्याओंके साथ भाँति-भाँतिके वृक्षों, लताओं, फलों और फूलोंसे सुशोभित सुन्दर उद्यानमें खेला करती थी। एक दिन खेलती हुई उस कन्याको देखकर उसकी माताने पतिसे कहा—'स्वामिन्! बन्धु-बान्धवोंसहित आपका तथा मेरा भी जीवन व्यर्थ है, जिनके घरमें इतनी बड़ी कन्या अभीतक अविवाहिता है।' पत्नीके यों कहनेपर गन्धर्वराजने कहा—'देवि! मैं पुत्रीके लिये सुन्दर वरकी खोज करता हूँ।' यों कहकर धनवाहनने पुत्रीको पुकारा। माता-पिताके बुलानेपर गन्धर्वसेना तुरंत वहाँ आयी और उनके चरणोंमें प्रणाम करके बोली—'पिताजी! क्या आज्ञा है?' धनवाहनने प्रसन्न होकर कहा—'बेटी! तुम्हें जो कोई वर पसंद हो, उसे बताओ। मैं उसी गन्धर्वशिरोमणिके साथ तुम्हारा विवाह कर दूँगा।' पिताके यों कहनेपर कन्याने कहा—'क्या तीनों लोकोंमें मेरे रूपके करोड़वें अंशकी भी बराबरी करनेवाला कोई है?' उसकी यह अद्भुत बात सुनकर पिता-माता भौंचक्के-से रह गये और आपसमें बोले—'पुत्रीने यह अच्छी बात नहीं कही।' गन्धर्वसेना उस विशाल उद्यानमें पूर्ववत् सखियोंके साथ खेलने लगी। वसन्तका समय था, वह झूला झूल रही थी। उसी समय गणनायक शिखण्डी दिव्य विमानपर बैठा हुआ वहाँ आ निकला। उसने आकाशसे ही उस कन्याको देखा। मध्याह्न-संध्याका समय था। वह विमानसे उतरा और उसी उद्यानमें ठहर गया। उसी समय उसने गन्धर्वकन्याके मुखसे यह वचन सुना—'संसारमें कोई देवता अथवा दानव मेरे रूपके करोड़वें अंशके भी बराबर नहीं है।' तब गणनायकने अहंकारमें भरी हुई उस कन्याको शाप दे दिया—'तुम रूपके अभिमानमें गन्धर्वों और देवताओंका तिरस्कार करती हो, अतः तुम्हारे शरीरमें कोढ़ हो जायगी।' यह शाप सुनकर वह कन्या भयभीत हो गयी और साष्टांग प्रणाम करके दयाकी भीख माँगने लगी। उसकी विनयसे गणनायकको दया आ गयी और उसने कहा—'यह तुम्हारे गर्वका फल है, इसलिये गर्व कभी नहीं करना चाहिये। हिमालयके वनमें गोशृंग नामके एक श्रेष्ठ मुनि रहते हैं। वे तुम्हारा उपकार करेंगे।' यों कहकर गणनायक चला गया। गन्धर्वसेना उस सुन्दर वनको छोड़कर पिताके समीप आयी और कुष्ठ होनेका सब कारण कह सुनाया। सुनकर उसके माता-पिता शोकसे सन्तप्त हो उठे और पुत्रीको साथ ले तुरंत ही हिमालय पर्वतपर आये। वहाँ उन्होंने गोशृंग ऋषिके आश्रमको देखा। मुनिवर गोशृंग आश्रमके भीतर बैठे थे। उनका दर्शन करके स्तुति-प्रणाम करनेके अनन्तर वे दोनों गन्धर्व-दम्पति उनके आगे भूमिपर बैठे। मुनिके पूछनेपर गन्धर्वराजने कहा—'मेरी कन्याका शरीर कुष्ठरोगसे पीड़ित है। जिससे उसकी शान्ति हो, वह उपाय करें।'

गोशृंगजी बोले—भारतवर्षमें समुद्रके समीप सर्वदेववन्दित भगवान् सोमनाथ विराजमान हैं। वहाँ जाकर मनुष्योंको एक समय भोजन करते हुए सब रोगोंके नाशके लिये सोमनाथकी पूजा करनी चाहिये। तुम सोमवारव्रतके द्वारा भगवान् शंकरकी आराधना करो। यों करनेसे तुम्हारी पुत्रीका रोग नष्ट हो जायगा।

महर्षिका यह वचन सुनकर गन्धर्वराजने वहाँ

१२३६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

जानेका विचार किया और गोशृंग मुनिसे पूछा—'भगवन्! सोमवारव्रत कैसे करना चाहिये? किस समय उसका अनुष्ठान उचित है?'

गोशृंगजीने कहा—महाप्राज्ञ! पहले ब्रह्मवेलामें उठकर शौच आदिसे निवृत्त हो दन्तधावन करे, फिर स्नान करके स्वधर्मके अनुसार नित्यकर्म करे। उसके बाद सुन्दर समतल एवं शुद्ध स्थानमें उत्तम कलश स्थापित करे, जिसमें आमका पल्लव डाला गया हो और जिसपर चन्दनसे भाँति-भाँतिके चित्र बनाये गये हों। कलशके ऊपर पात्र रखे और उस पात्रमें जटा-मुकुटमण्डित सर्वाभूषण-भूषित श्वेतवस्त्रधारी अर्द्धनारीश्वर शिवकी प्रतिमा स्थापित करे। तत्पश्चात् उमासहित महेश्वरकी श्वेत वस्त्रों और भाँति-भाँतिके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंद्वारा पूजन करे। बिजौरा नीबू अर्पण करे। निम्नांकित मन्त्रसे सब पूजा करनी चाहिये—

ॐ नमः पञ्चवक्त्राय दशबाहुत्रिनेत्रिणे।
देव श्वेतवृषारूढ श्वेताभरणभूषित ॥
उमादेहार्द्धसंयुक्त नमस्ते सर्वमूर्तये ।

'महादेव! आप श्वेत वृषभपर आरूढ़, श्वेत आभूषणोंसे भूषित तथा आधे शरीरमें भगवती उमासे संयुक्त हैं। आपके पाँच मुख, दस भुजाएँ तथा प्रत्येक मुखके साथ तीन-तीन नेत्र हैं। आपको नमस्कार है। आप सर्वस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।'

इसी मन्त्रसे पूजन और स्तुति करके रात्रिमें भोजन करे। सोमनाथ महादेवजीका ध्यान करते हुए कुशकी चटाईपर सोये। यों करनेपर अठारह प्रकारके कुष्ठ रोगोंका नाश होता है। दूसरे सोमवारको करंजका दन्तधावन करे और ज्येष्ठा-शक्तिसे संयुक्त शिवका कमलके फूलोंसे पूजन करके विधिपूर्वक मधुर भोजन करे। भगवान्‌को नारंगी चढ़ाये। शेष सब विधि पूर्ववत् करे। दूसरे सोमवारको यों करनेसे लाख गोदानका फल प्राप्त होता है। तीसरे सोमवारको अपामार्गकी दातुन करके शिवजीका पूजन करे। अनारके फलका भोग लगाये तथा चमेलीके फूलोंसे पूजा करे। रातमें अगुरु भोजन करे। उस दिन सिद्धि नामक शक्तिके साथ शिवकी पूजा करनी चाहिये। चौथे सोमवारको गूलरकी दातुन करनेका विधान है। उस दिन सोमासहित गौरीपतिकी पूजा करे। नारियलका फल चढ़ाये और दवनेके पत्तेसे पूजा करे। रातमें चीनी खाय और जागरण करे। पाँचवें सोमवारको विभूतिसहित गणेश्वरकी कुन्दके फूलोंसे पूजा करे। पीपलकी दातुन करे और मुनक्काके साथ अर्घ्य दे। रातको मौक्तिक तंदुल (सफेद मक्का) भोजन करे। यों करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। छठे सोमवारको भद्रासहित स्वरूपनामक शिवका पूजन करे। चमेलीकी दातुन करे और धतूरके फलसे अर्घ्य दे। उस दिन बेलाके फूलोंसे परम भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। रातमें कपूर भोजन करे। सातवें सोमवारको बेलाकी दातुन करे और दीप्ताशक्तिके साथ सर्वज्ञ शिवकी पूजा करे। जँभीरी नीबूका फल अर्पण करे और चमेलीके फूलोंसे पूजा। रातको लौंग खाय। यों करनेसे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है। आठवें सोमवारको केलेके फल और मरूआके फूलोंसे अमोघा शक्तिसहित जगदीश्वर शिवका पूजन करे। रातमें दूध पिये। इससे अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है। करोड़ बार गंगास्नान करनेसे और सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें वेदवेत्ता ब्राह्मणको दस हजार स्वर्णमुद्रा दान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही सोमवारव्रत करनेपर कोटिगुना होकर मिलता है। नवाँ सोमवार प्राप्त होनेपर व्रतका उद्यापन करे। ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित गोल मण्डप और कुण्ड बनाये। चार दरवाजे बनाकर मण्डपके मध्यमें चौकोर वेदीका निर्माण करे। उसपर मण्डल बनाकर बीचमें कमल बनाये। आठों दिशाओंमें पृथक्-पृथक् सुवर्णसहित कलश स्थापित करके पूर्वसे लेकर वामादि शक्तियोंकी भी स्थापना करे। कर्णिकामें परम प्रकाशमय श्रीसोमनाथजीको विराजमान करे।

* प्रभासखण्ड * । १२३७


सोमनाथजीकी सुवर्णमयी प्रतिमा मनोमती नामक शक्तिके सहित स्वर्ण-शय्यापर स्थापित करनी चाहिये। सुवर्ण अथवा रजत आदिके पात्रको शहदसे भरकर उसे स्वर्ण शय्यापर आच्छादित करके रख दे और उसीपर शिव-प्रतिमाका पूजन करे। फिर वस्त्र, आभूषण, ताम्बूल, छत्र, चवँर, दर्पण, दीप, घण्टा, चाँदोवा, शय्या और गद्दा आदि वस्तुएँ सोमनाथकी प्रीतिके उद्देश्यसे पुराणवेत्ता आचार्यको दान करे। वहीं होम कराये। पूजन करके रातमें वहीं जागरण करे। अपने हृदयमें सोमनाथजीका ध्यान करते हुए पंचगव्य पीकर रहे। प्रातःकाल स्नान करके विधिपूर्वक सोमदेवका ध्यान करे। तत्पश्चात् दूध और खाँड़ आदिसे बने हुए अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंद्वारा नौ ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराये। दो वस्त्र और एक गोदान करके विसर्जन करे। इस प्रकार सोमवारव्रतका पालन करनेवाला पुरुष अक्षय पुण्यका भागी होता है। धन-धान्यसे सम्पन्न तथा स्त्री-पुत्र आदिसे सुशोभित होता है। उसके कुलमें कोई दरिद्र अथवा दुःखी नहीं होता। इस प्रकार विधिपूर्वक व्रत करनेपर मनुष्य देहत्यागके पश्चात् शिवलोकमें जाता है। महाभाग ! जहाँ भगवान् सोमनाथ विराजमान हैं, वहाँ शीघ्र जाओ।

महादेवजी कहते हैं—गोशृंग मुनिके यों कहनेपर गन्धर्वराज धनवाहन अपनी पुत्रीके साथ सब उपहार लेकर प्रभासक्षेत्रमें आये। वे सोमनाथका दर्शन करके आनन्दमें मग्न हो गये। यात्राके क्रमसे सोमनाथजीका पूजन करके उन्होंने कन्यासहित सोमवारव्रत किया। इससे उनके ऊपर सोमनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने उनकी कन्याके रोगोंका नाश करके समस्त कामनाओंकी सिद्धि देनेवाला गन्धर्वदेशका राज्य तथा अपनी भक्ति दी।

महादेवजीसे वरदान पाकर धनवाहन गन्धर्व कृतार्थ हो गये। उन्होंने सोमनाथजीके उत्तर भागमें दण्डपाणिके समीप भक्तिपूर्वक गन्धर्वेश्वर शिवकी स्थापना की। ये वरदासे पश्चिम पाँच धनुषकी दूरीपर स्थित हैं। पंचमी तिथिमें उनकी पूजा करके मनुष्य कभी दुःखी नहीं होता। धनवाहनकी पुत्री गन्धर्वसेनाने भी वहीं गौरीजीके समीप पूर्वभागमें तीन धनुषकी दूरीपर विमलेश्वर नामक शिवलिंगकी प्रतिष्ठा की, जो सब रोगोंका नाश करनेवाला है। तृतीयाको विमलेश्वरकी पूजा करके प्रत्येक स्त्री दुर्भाग्य-दोषसे मुक्त हो जाती, घरमें सम्मानित होती तथा पुत्र एवं संपूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेती है।


सोमनाथकी यात्राविधि

**पार्वती बोलीं—**देव ! अब आप सोमनाथजीकी महिमाका यथावत् वर्णन करें।

**महादेवजीने कहा—**भामिनि ! हेमन्त, शिशिर एवं वसन्त-ऋतुओंमें सोमनाथकी यात्रा करनी चाहिये। अथवा जब कभी भी आपके पास धन हो, मनमें यात्राके लिये उत्साह हो एवं कोई पर्व आया हो, तभी वहाँ यात्रा की जा सकती है। श्रद्धा-भक्ति ही यात्राका मुख्य हेतु है। अपने घरमें कोई नियम लेकर मन-ही-मन भगवान् शिवको प्रणाम करे। फिर विधिपूर्वक श्राद्ध करके अपने ग्रामकी परिक्रमा करे। तत्पश्चात् मौन एवं एकाग्रचित्त हो मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए यात्राके लिये निकले। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मात्सर्य और चपलताका त्याग करके मनुष्योंको वहाँकी यात्रा करनी चाहिये। तीर्थयात्रामें यज्ञोंसे भी बढ़कर पुण्य होता है। महादेवि ! सोमनाथजीकी यात्राके सिवा दूसरे किसी उपायद्वारा सुगमतासे स्वर्गलोककी प्राप्ति नहीं होती। जो मनुष्य पवित्र श्रद्धाभावसे युक्त हो सोमेश्वरकी यात्रा करते हैं, वे मनुष्य कलियुगमें धन्य हैं। जैसे

१२३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


समुद्रके समान दूसरा कोई जलाशय नहीं है, उसी प्रकार प्रभासक्षेत्रके सदृश अन्य कोई तीर्थ नहीं है। जिसके हाथ, पैर और मन भलीभाँति वशमें हों, जो विद्या, तप और कीर्तिसे युक्त हो, वह तीर्थके फलका भागी होता है। जो नियमसे रहे, नियमित भोजन करे, स्नान और जपमें तत्पर रहे तथा व्रत एवं उपवास करे, वह तीर्थके फलका पूर्णतः भागी होता है। जो क्रोधरहित, सत्यवादी, दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाला तथा संपूर्ण प्राणियोंके प्रति आत्मभाव रखनेवाला है, वह तीर्थके फलका भागी होता है। जो दरिद्र एवं धनहीन मनुष्य तीर्थयात्रामें तत्पर होते हैं, उन्हें विशेष नियमोंके बिना ही यज्ञफलकी प्राप्ति होती है। सभी वर्णों और आश्रमोंके लोगोंको तीर्थयात्रा फल देनेवाली है। जो दूसरे किसी कार्यसे तीर्थमें जाता है और वहाँ स्नान करता है, उसके लिये मुनियोंने स्नानके आधे फलकी प्राप्ति बतायी है। इस लोकमें पैदल तीर्थयात्रा करनेको उत्तम तप बताया गया है। किसी सवारीसे यात्रा करनेपर तीर्थमें स्नान-मात्रका ही फल मिलता है, यात्राका नहीं। देवि! जो मनुष्य अपने ही धन और अपने ही पैरोंसे तीर्थयात्रा सम्पन्न करते हैं, उन्हें चौगुने पुण्यकी प्राप्ति होती है। १ इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए भिक्षान्न-भोजनपूर्वक जो तीर्थयात्रा करते हैं, वे दसगुना पुण्य-फल पाते हैं। छाता और जूता धारण न करके भिक्षान्न-भोजन एवं इन्द्रियसंयमपूर्वक तीर्थयात्रा करनेवाला ब्राह्मण भयंकर पापोंसे मुक्त हो जाता है। प्रतिग्रह (दान-ग्रहण) न करनेवाले मनुष्यकी यात्रा दसगुना पुण्य देनेवाली होती है। जो ब्राह्मण लोभवश क्षेत्रमें दानकी रुचि रखता है, उस दूषित हृदयवालेके लिये न तो यह लोक सुखद होता है न परलोक ही। यदि शूद्र ब्राह्मणका वेष धारण करके तीर्थमें दान ग्रहण करता है तो वह तत्काल तृण और काष्ठके समान भस्म हो जाता है और नरकमें गिरता है। अतः औरोंकी तो बात ही क्या है, ब्राह्मणोंको भी थोड़ा भी प्रतिग्रह नहीं स्वीकार करना चाहिये।

तीर्थ दो प्रकारके होते हैं—कृत और अकृत। जो स्वकीयभावसे युक्त है अर्थात् जो अपने ही धन एवं पैरोंसे यात्रा करता और अपने हृदयमें उत्तम भाव रखता है, वही इन दोनों प्रकारके तीर्थोंका संपूर्ण फल पाता है। जो मनुष्य दूसरेके अन्नसे जीविका चलाते हुए यात्रा करता है, वह उस तीर्थ-यात्राके संपूर्ण फलका सोलहवाँ भाग पाता है। असमर्थ, अन्ध, पंगु तथा यायावर, २ जो दूसरोंसे अन्न लेनेके लिये विवश हैं, उनका प्रतिग्रह दोषरहित माना गया है। जो तीर्थसेवी मनुष्य ब्राह्मणोंको स्नानकी सुविधा (व्यय आदि) तथा खान-पान आदि देता है, वह तीर्थजनित संपूर्ण फलको पाता है। इष्ट देव, गुरु और माता-पिताको स्वेच्छानुसार पुण्य प्रदान करनेवाला पुरुष आठगुने फलका भागी होता है। स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय, देवपूजा आदि पुण्य-कर्मका ही सर्वत्र दान होता है; पाप कर्मका नहीं। तीर्थमें जाकर पिता, माता, भाई, सुहृद् तथा गुरु—जिसके उद्देश्यसे भी मनुष्य गोता लगाता है, वह उस तीर्थ-स्नानके पुण्यका द्वादशांश प्राप्त कर लेता है। अतः वेदके बलका भरोसा करके प्रतिग्रह (दान लेने)-में रुचि न रखे। वेद बेचनेवाले पुरुषका स्पर्श कर लेनेपर स्नान करनेका ही विधान है। राजाके दरबारमें तथा विशेषतः तीर्थ और महातीर्थमें रहनेवाले विद्वान्‌को वेद-विक्रय कदापि नहीं करना चाहिये। जो तीर्थसेवी ब्राह्मण देनेपर भी दान न ले, वही वास्तवमें तीर्थ करता और अपने पूर्वजोंको भी पवित्र कर देता है। अन्यत्र किया हुआ पाप


१- तीर्थानुगमनं पद्भ्यां तपः परमिहोच्यते। तदेव कृत्वा यानेन स्नानमात्रं फलं लभेत् ॥
ये चान्ये कुर्वते शक्त्या तीर्थयात्रां तथेश्वरि। स्वकीयद्रव्यपादाभ्यां तेषां पुण्यं चतुर्गुणम् ॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २६। २४-२५)

२- जो एक-एक गाँवमें एक रात डेरा डालते हुए सदा विचरता रहता है, उस साधु अथवा मुनिको 'यायावर' कहते हैं।

  • प्रभासखण्ड * १२३९

तीर्थमें क्षीण हो जाता है, परन्तु तीर्थमें किया गया पाप अन्य स्थानोंमें कभी नष्ट नहीं होता है। तीर्थसेवन करनेवाला जो ब्राह्मण अत्यन्त क्लेशग्रस्त होनेपर भी किसीसे दान नहीं लेता, सत्य बोलता और चित्त-वृत्तियोंको रोककर ध्यानस्थ रहता है, उसीके लिये तीर्थ उपकारक होता है। सत्ययुगमें पुष्कर, त्रेतामें नैमिषारण्य, द्वापरमें कुरुक्षेत्र तथा कलियुगमें प्रभासक्षेत्र मुख्य माना गया है। एक मनुष्य सहस्र युगोंतक एक पैरसे खड़ा होकर तपस्या करता है और दूसरा केवल प्रभास-तीर्थकी यात्रा करता है; दोनोंका फल समान है। प्रभास-तीर्थमें पहुँचकर मनुष्य सवारी छोड़ दे और अपने ही चरणोंसे पैदल चले। नाचते, हँसते, गाते और कीर्तन करते हुए सोमेश्वरदेवके समीप जाय; वहाँ सबसे पहले जटाजूटधारी भगवान् शिवका दर्शन करे। सोमनाथके सम्मुख स्थित हुए उस पुरुषको देखकर पितर सदैव संतुष्ट होते हैं, पितामह हर्षध्वनि करते हैं और कहते हैं—'हमारे वंशका सुपुत्र हमें तारनेके लिये प्रस्थित हुआ है।' सोमनाथजीके समीप जाकर पहले क्षौर कराये, तीर्थमें उपवास करे। गंगाके समान कोई तीर्थ नहीं है, कृष्णके समान दूसरी गति नहीं है, गायत्रीके सदृश दूसरा जपनीय मन्त्र नहीं है, व्याहृति-होमके समान होम नहीं है, जलके भीतर अघमर्षण-जपके समान दूसरा कोई पापनाशक कर्म नहीं है; तथा तीर्थमें उपवास करनेसे बढ़कर और कोई ऐसा उपाय नहीं है, जो पापियोंके सब पापोंको शान्त करनेवाला तथा सत्पुरुषोंको उनके अभीष्ट मनोरथोंको देनेवाला हो। देवस्थानमें उपवास करनेका विशेष विधान है। उपवास ही ब्राह्मणका श्रेष्ठ तप कहा गया है। छठे समय भोजन करना शूद्रोंके लिये महान् तप है। वर्णसंकरोंके लिये एक दिनका उपवास ही श्रेष्ठ तप है। यदि शूद्र छठे कालसे अधिक उपवास करे अर्थात् वह तीन दिनसे अधिक समयतक बिना भोजन किये तप करता रहे तो राष्ट्रकी हानि होती है तथा राजाके लिये महान् उपद्रव प्राप्त होता है। शूद्रको चाहिये कि वह कुशा न उखाड़े, कपिला गौका दूध न पिये, पीपलके पत्तेपर भोजन न करे, ॐकारका उच्चारण न करे, यज्ञका पुरोडाश न खाय, यज्ञोपवीत न पहने और वेद न पढ़े। शूद्रके कर्म केवल देवता-आदिको नमस्कार करनेमात्रसे सिद्ध हो जाते हैं (मन्त्रयुक्त प्रार्थनाकी आवश्यकता नहीं रहती)। शूद्रके लिये जिन कर्मोंका निषेध किया गया है, उन्हें यदि वह करता है तो वह अपने पितरोंके साथ नरकमें डूबता है। जिसने अपनी ग्यारह इन्द्रियोंको वशमें कर लिया है, वही तीर्थका फल पाता है; दूसरे अजितेन्द्रिय मनुष्य केवल क्लेशके भागी होते हैं। जो मानव तीर्थमें पितरोंका श्राद्ध और स्नान करता है तथा सब प्राणियोंके हितमें संलग्न रहता है, वह तीर्थके पूर्ण फलको पाता है। जो पाखण्डी, लोभी और परस्त्रीपरायण होकर तीर्थयात्रा करता है, वह केवल पापका भागी होता है।

महादेवि! यों जानकर मनुष्य विधिपूर्वक तीर्थयात्रा करे। पहले तीर्थमें उपवास करके श्रद्धायुक्त हो दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करे, उसके बाद वहाँ भोजन करे। ब्राह्मणको उस दिन कहीं भी पराया अन्न नहीं खाना चाहिये। भोजन देनेवालेको सौगुना पुण्य मिलता है; अतः व्रती, तीर्थयात्री एवं विशेषतः विधवाको चाहिये कि वह तीर्थमें उपवास करे और यथासंभव दूसरेको अन्न दे। पराया अन्न भोजन करनेपर जिसका अन्न खाया जाता है, उसीको पुण्य-फल प्राप्त होता है।

अब मैं विधवा स्त्रीके लिये तीर्थयात्राकी विधि बतलाता हूँ। विधवाको उचित है कि वह रोली, चन्दन, पान, पुष्पमाला, रंगीन वस्त्र, शय्या आदि बिछावन, अशिष्ट मनुष्योंसे वार्तालाप, दुबारा भोजन, पुरुषकी ओर देखना और हँसना छोड़ दे। जोर-जोरसे बोलना, जूते पहनना, नृत्य और गीतको त्याग दे। केश रखना, आँखोंमें काजल लगाना, उबटन लगवाना, कुलटा स्त्रियोंसे

१२४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

बात करना और पण्डिताई दिखाना छोड़ दे।* यति, ब्रह्मचारी और विधवा-ये नित्य स्नान और श्वेत वस्त्र धारण करें।

सत्ययुगमें तप उत्तम है, त्रेतामें ध्यान, द्वापरमें यज्ञ और कलियुगमें केवल दान श्रेष्ठ धर्म है। मुनिलोग प्रभासमें पहुँचकर कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि तप करते हैं और दूसरे लोग कलियुगमें प्रभासक्षेत्रमें जाकर ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक दान देते हैं; किंतु वे उस दानसे ही तपस्याका फल पा लेते हैं। धान्य, रत्न, गुड, सुवर्ण, तिल, रुई, शक्कर, घी, नमक और चाँदी - ये दस पर्वत कहे गये हैं (अर्थात् धान्य-पर्वत, रत्नमय पर्वत आदि रूपसे इन वस्तुओंके पर्वत (ढेरी)-का दान करना चाहिये)। गुड़, घी, दही, मधु, जल, रुई, तिल, कम्बल, रत्न तथा नमक-ये दस प्रकारकी वस्तुएँ धेनु मानी गयी हैं (इनकी धेनुका दान किया जाता है) इन दानोंमेंसे कोई-न-कोई एक दान विभिन्न तीर्थोंमें अवश्य करना चाहिये। महादेवि ! सरस्वती समुद्रसंगममें विद्वान् ब्राह्मणके लिये गृहस्थोपयोगी वस्तु एवं सर्वस्व दान करना चाहिये। बहुत हो या थोड़ा, ब्राह्मणोंको प्रिय वस्तुओंका ही दान करना चाहिये। जिस तीर्थमें शिवलिंग तथा निर्मल जलवाला जलाशय हो, वहाँ पहले अग्निहोत्र करके विशिष्ट दान देना चाहिये। प्रत्येक तीर्थमें देवताओं और पितरोंका तर्पण, श्राद्ध, दक्षिणासहित दान तथा गोदान करना चाहिये। यह आवश्यक विधि है। देवताओंको स्नान कराकर चन्दन लगाये और उनकी पूजा करे। पृथ्वीका भी भक्तिपूर्वक पूजन और लेपन करे। देवमन्दिरमें चूना लगाकर उसे सफेद करे। यदि मन्दिर पुराना हो गया हो तो उसका जीर्णोद्धार करे। देवसेवाके लिये फुलवाड़ी लगाये। निर्मल जलका कुआँ बनवाये तथा वन-उपवनका निर्माण कराये। ब्राह्मणोंको प्रचुर दान दे और देव-पूजन करे। सर्वत्र देवयात्राके लिये यह विधि नियत की गयी है। प्रसिद्ध तीर्थमें महादान और मध्यममें मध्यम श्रेणीका दान करे। गोदान तो सभी तीर्थोंमें करनेयोग्य है। इस प्रकार भक्तिपूर्वक दान करके मनुष्य अपने जन्मका फल पा लेता है।

पार्वतीजीने पूछा- प्रभो! जो मनुष्य प्रभासक्षेत्रमें आकर भी भक्ति, दान, स्नान और मन्त्रसे विहीन हैं, उन्हें क्या फल मिलता है? यह बतायें।

महादेवजीने कहा- देवि ! धनी हों या निर्धन, मन्त्रज्ञ हों या मन्त्ररहित, जो प्रभासमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे सभी शिवलोकको जाते हैं। प्रिये ! जो मन्त्रहीन और निर्धन मनुष्य वहाँ देह-त्याग करते हैं, उन्हें मैं एक बड़ा भारी विमान देता हूँ। वे स्नान-दानके अनुरूप परम पदको प्राप्त होते हैं। कोई स्नानके प्रभावसे, कोई दानसे, कोई सोमेश्वरलिंगके प्रभावसे, कोई लिंगपूजासे, कोई ध्यानके प्रभावसे, कोई योगकी महिमासे, कोई मन्त्र-जपसे, कोई तपसे, कोई तीर्थसंन्याससे तथा कोई भक्तिभावके अनुसार वहाँ परमपदको प्राप्त होते हैं। ये तथा और भी बहुत-से उत्तम, मध्यम और अधम श्रेणीके लोग सूर्यसदृश तेजस्वी विमानोंद्वारा शिवलोकमें जाते हैं।

पहले प्रणवका उच्चारण करके तीर्थके पवित्र जलका स्पर्श करे। तदनन्तर भीतर प्रवेश करके मन्त्रपाठपूर्वक स्नान करे। मन्त्र इस प्रकार है-

ॐ नमो देवदेवाय शितिकण्ठाय दण्डिने।
रुद्राय वामहस्ताय चक्रिणे वेधसे नमः ॥


* विधवा चैव या नारी तस्या यात्राविधिं ब्रुवे। कुंकुमं चन्दनं चैव ताम्बूलं च रजस्तथा ॥
रक्तवस्त्राणि सर्वाणि शय्याद्यास्तरणानि च। अशिष्टैः सह संभाशां द्विवारं भोजनं तथा ॥
पुंसां प्रदर्शनं चैव हासं चैव विवर्जयेत्। सशब्दोपानहौ चैव नृत्यगीतं च वर्जयेत् ॥
धारणं चैव केशानामञ्जनं च विलेपनम्। असतीजनसंसर्गं पाण्डित्यं च परित्यजेत् ॥
(स्क० पु०, प्रभा० ख० २६। ७८-८१)

* प्रभासखण्ड * १२४१

सरस्वती च सावित्री देवमाता विभावरी।
सन्निधाने भवत्वत्र तीर्थे पापप्रणाशने॥
जो सच्चिदानन्दस्वरूप, देवताओंके भी देवता, कण्ठमें नीला चिह्न धारण करनेवाले, दण्डधारी, सुन्दर हाथवाले, चक्रधारी तथा विश्वके उत्पादक हैं, उन भगवान् रुद्रको नमस्कार है, नमस्कार है। इस पापनाशक तीर्थमें आकर सरस्वती, सावित्री तथा देवमाता विभावरी निवास करें, हमें अपना सामीप्य दें।
सभी तीर्थोंके लिये यह मन्त्र बताया गया है। इसका उच्चारण करके विधिपूर्वक नमस्कार एवं स्नान करे। उस दिन उपवास भी करे। वर्षमें एक बार उस तिथिपर अवश्य उपवास करना चाहिये।


समुद्रमें स्नानकी विधि और महिमा

महादेवजी कहते हैं—सोमनाथके दक्षिणभागमें त्रिभुवनविख्यात पद्मक नामक तीर्थ है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। पहले सोमेश्वरके समीप क्षौर कराकर मन-ही-मन मेरा चिन्तन करते हुए उस तीर्थमें अपने केश डाल दे। उसके बाद पुनः स्नान करे। मनुष्य जो कुछ भी पाप करता है, वह सब केशोंमें स्थित होता है; अतः केशोंको अवश्य ही तीर्थमें फेंक देना चाहिये। सौभाग्यवती स्त्रियोंको चाहिये कि वे सब केशोंको हाथसे पकड़कर अग्रभागकी ओरसे दो अंगुल कटवा दें (उनके लिये मुण्डनकी विधि नहीं है)। मुण्डन और स्नानके पश्चात् देवताओं और पितरोंका तर्पण करे। सभी तीर्थोंमें मुण्डन और उपवासकी विधि है। जो पर्वका दिन छोड़कर और किसी समय प्रभासक्षेत्रमें बिना मन्त्रके स्नान करता है, वह उसका पुण्य-फल नहीं पाता। बिना मन्त्रके, बिना पर्वके और बिना क्षौरकर्म किये समुद्र-जलका स्पर्श नहीं करना चाहिये। निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करके सागरके जलका स्पर्श करना उचित है—

ॐ नमो विष्णुगुप्ताय विष्णुरूपाय ते नमः।
सान्निध्ये भव देवेश सागरे लवणाम्भसि॥

'समुद्रदेव! तुम भगवान् विष्णुसे सुरक्षित हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम साक्षात् विष्णुके स्वरूप हो, तुम्हें नमस्कार है। देवेश्वर! विष्णो! आप इस क्षीरसागरके जलमें मेरे समीप स्थित हों।'

यों कहकर तीर्थसेवी मानव नदीपति समुद्रके जलमें स्नान करे। फिर श्रद्धायुक्त होकर तिलमिश्रित जलसे देवता, मनुष्य और पितरोंका तर्पण करे। सहस्रों जन्मोंमें मनुष्य जो पाप करता है, उसे एक बार समुद्रके जलमें नहाकर नष्ट कर देता है। ब्रह्माजीने समुद्रसे कहा है—'सागर! जबतक लोकमें तुम्हारी स्थिति रहेगी, जबतक आकाशमें सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र बने रहेंगे, तबतक पूर्वज तुम्हारे खारे जलके अमृतसे तृप्त होंगे। जो मनुष्य शुद्धचित्त होकर प्रतिमास तुम्हारे जलमें स्नान करेगा, उसे प्रतिदिन पुण्डरीक यज्ञका फल मिलेगा। श्रीसोमनाथ तथा समुद्रके बीचकी भूमिमें जिनकी मृत्यु होगी, वे पापी रहे हों तो भी निष्पाप होकर स्वर्गलोकमें जायँगे। महादेवि! समुद्रके भीतर पाँच करोड़ शिवलिंग हैं, जिन्हें समुद्रने इस मन्वन्तरमें अदृश्य कर दिया है। इसी प्रकार वहाँ अग्निकुण्ड तथा पद्म-सरोवर भी हैं, जो इस मन्वन्तरमें समुद्रजलसे आवृत हो गये हैं। दक्षिण ओर चक्र तथा मैनाकके मध्यभागमें सौ धनुष लंबा-चौड़ा सुवर्णमय कुण्ड है; सोमनाथसे दक्षिण सौ धनुषकी दूरीपर वह स्थान है। उत्तर मानससे पूर्व जहाँ कृतस्मरदेव हैं; वहाँतक उसकी सीमा है; यह गुप्त स्थान है।'

१२४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सोमनाथके दर्शन-पूजनकी महिमा और पंचस्रोता सरस्वतीका आविर्भाव तथा माहात्म्य; बडवानलका समुद्रमें वास

महादेवजी कहते हैं—देवि! इस प्रकार विधिपूर्वक स्नान करके समुद्रको अर्घ्य दे; गन्ध, पुष्प, वस्त्र और चन्दन आदिसे उनकी पूजा करे; तत्पश्चात् तर्पण करके भगवान् कपर्दीके समीप जाय। उनकी भी पुष्प, धूप, गन्ध तथा वस्त्रद्वारा भक्तिपूर्वक पूजा करे। 'गणानां त्वां' इत्यादि मन्त्र पढ़कर उन्हें अर्घ्य निवेदन करे। शूद्रोंको अष्टाक्षर मन्त्र (गं गणपतये नमः)-का उच्चारण करके अर्घ्य देना चाहिये। तदनन्तर सोमनाथजीके समीप जाय। उन्हें विधिसे स्नान कराकर शतरुद्रियका जप (पाठ) करे। रुद्रपंचांगोंका तथा अन्यान्य रुद्रसंहिताओंका भी जप करना चाहिये। दूध, दही, घी, मधु तथा इक्षुरससे सोमेश्वरको नहलाकर उनके अंगोंमें कुंकुमका लेप करे। उसमें कपूर, खस और कस्तूरीको भी मिलाये रखना चाहिये। इसके बाद सुगन्धयुक्त चन्दन और फूलोंसे पूजा करे। नाना प्रकारके धूप निवेदन करके उन्हें वस्त्रसे आवेष्टित करे। तत्पश्चात् उत्तम नैवेद्य अर्पण करे और इच्छानुसार स्तुति करे। साष्टांग प्रणाम करके गीतवाद्य आदिका आयोजन करे। धर्म-कथा सुने और भगवान्‌की परिक्रमा करे। तदनन्तर ब्राह्मणों, तपस्वियों, दीनों, अन्धों, कंगालों तथा भिक्षुओंको अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। उस दिन उपवास करना चाहिये। जिस दिन पहले-पहल मनुष्य सोमनाथका दर्शन करे; उस तिथिको एक वर्षतक भक्तिपूर्वक उपवास करे। यों करके मनुष्य अपने जन्मका फल पा लेता है। पिता और माताके कुलका उद्धार कर देता है। सोमनाथका दर्शन करनेसे सब पापोंका नाश हो जाता है; अतः सात जन्मोंतक कभी दुःख, दारिद्र्य और दुर्भाग्यकी प्राप्ति नहीं होती। सोमनाथके प्रति भक्ति बढ़ती है। पहले दूधसे स्नान कराकर फिर जलसे स्नान कराना चाहिये। जो मनुष्य मध्याह्नकालमें और सन्ध्याके समय सोमेश्वर शिवकी आरतीका दर्शन करते हैं, वे फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते।

पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! प्रभासक्षेत्रमें सरस्वती नदी कहाँसे आयी है।

महादेवजीने कहा—देवि! सुनो। हरिणी, वज्रिणी, न्यंकु, कपिला तथा सरस्वती—इन पाँच स्रोतोंसे युक्त सरस्वती नदी इस क्षेत्रमें प्रवाहित होती है। एक समय देवाधिदेव भगवान् विष्णुने सरस्वतीसे कहा—'कल्याणि! तुम पश्चिम दिशामें क्षारसमुद्रके समीप जाओ और बडवानलको वहीं ले जाकर डाल दो। इससे सब देवता निर्भय हो जायँगे।' तब सरस्वती बोलीं—'मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। मेरे पिता विद्यमान हैं, मैं उनकी आज्ञाकारिणी पुत्री हूँ। ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाली कुमारी हूँ। पिताकी आज्ञाके बिना एक पग भी कहीं नहीं जाऊँगी।'

तब भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीके समीप जाकर कहा—'देवेश्वर! आप देवताओंका यह कार्य सिद्ध कीजिये।' उनके यों कहनेपर ब्रह्माजी अपनी कुमारी कन्यासे बोले—'देवि! तुम भयसे व्याकुल हुए उन सब देवताओंकी रक्षा करो।'

सरस्वती बोलीं—पिताजी! आपकी आज्ञासे मैं निश्चय ही वहाँ जानेके लिये उद्यत हूँ। परंतु यह भयंकर बडवानल मेरे शरीरको जला देगा। इसके सिवा इस समय भूतलपर कलियुग आया है। अतः कलियुगके पापाचारी मनुष्य मेरा स्पर्श करेंगे।

ब्रह्माजीने कहा—बेटी! यदि तुम पापी जनोंसे भरी हुई इस पृथ्वीका स्पर्श करना नहीं चाहतीं, तो पातालमें स्थित होकर इस बडवानलको समुद्रमें ले जाओ। जब बडवानलका ताप अधिक हो जाय, तब पृथ्वी फोड़कर प्रत्यक्ष हो जाना

  • प्रभासखण्ड * १२४३

और पूर्ववाहिनी होकर प्राची सरस्वतीके नामसे विख्यात होना।

महादेवजी कहते हैं—ब्रह्माजीका यह आदेश पाकर सरस्वती अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करती हुई चलीं। उस समय अपने पीछे-पीछे आती हुई गंगाजीसे सरस्वतीने कहा—'सखी! अब मैं पुनः कहाँ तुम्हारा दर्शन करूँगी?' गंगाजीने स्नेहभरी वाणीमें उत्तर दिया—'सुव्रते! पश्चिम जाती हुई तुम जब-जब पूर्वदिशाकी ओर मुँह करके देखोगी, तब-तब मुझे अपने समीप खड़ी हुई पाओगी। वहाँ मैं सब देवताओंके साथ तुम्हें दर्शन दूँगी।' तब उन्होंने गंगाजीसे विदा लेकर कहा—'भद्रे! अब तुम अपने स्थानको जाओ, मुझे पुनः तुम्हारा दर्शन प्राप्त हो।' इसी प्रकार सरस्वतीने यमुना, गायत्री और सावित्री आदि सखियोंको भी विदा किया। तदनन्तर हिमालय पर्वतपर आकर वे एक पाकड़के वृक्षसे नदीरूपमें प्रकट हुई और पृथ्वीपर उतरीं। उस समय पुण्यसलिला सरस्वतीदेवीकी ब्रह्मर्षिगण स्तुति कर रहे थे। बडवानलको लेकर वह नदी बड़े वेगसे चली और पृथ्वी फोड़कर पातालमें प्रवेश कर गयी। कहीं-कहीं मर्त्यलोकमें भी प्रत्यक्ष हो जाती थी। इस प्रकार पातालमार्गसे समुद्रके निकट गयी। खदिरामोद नामक वनमें पहुँचकर सरस्वतीने समुद्रको देखा और बडवानलको लेकर उसके समीप जानेका विचार किया। जब वह दक्षिणकी ओर मुख करके प्रस्थित हुई, उसी समय वेदोंके पारंगत विद्वान् चार महर्षि प्रभासक्षेत्रमें आये। उनके नाम इस प्रकार हैं—हिरण्य, वज्र, न्यंकु और कपिल। वे चारों तपस्वी थे। उन्होंने अलग-अलग स्नान करनेके लिये सरस्वतीका आवाहन किया। इतनेमें ही समुद्र भी सहसा सरस्वतीके सम्मुख उपस्थित हुआ। तब सरस्वतीने पाँच धाराओंमें विभक्त होकर उन सबको सन्तुष्ट किया। इससे इस पृथ्वीपर उसके पाँच नाम विख्यात हुए—हरिणी, वज्रिणी, न्यंकु, कपिला और सरस्वती। यह पंचस्रोता सरस्वती अपने भीतर जलपान और स्नान करनेसे मनुष्योंके पाँच महापातकोंका नाश करती है। एक सप्ताहतक वहाँ उपवास, जप, होम, स्नान और जलपान करनेसे वह सब पापोंका नाश कर देती है। सरस्वती अपने भीतर आचमन और स्नान करनेपर मनुष्योंकी घोर ब्रह्महत्याका तथा कपिला मदिरापानरूप महापातकका नाश करती है। न्यंकु नदीमें स्नान करके पुरुष चोरीके महापातकसे मुक्त हो जाता है। वज्रिणी नदीका जल पीनेसे गुरुपत्नीगमनरूप महापातकका नाश होता है। हरिणी नदी सात दिनोंतक स्नान करनेसे संसर्गजनित महापातकका अपहरण करनेवाली है। इस तरह पाँच धाराओंमें विभक्त सरस्वती नदी सब पातकोंका निश्चय ही नाश कर देती है। तदनन्तर पुनः बडवानलको लेकर सरस्वती समुद्रके समीप स्थित हुईं। बडवानलने उठती हुई तरंगोंसे युक्त समुद्रको देखकर सरस्वतीसे पूछा—'भद्रे! यह क्या है? क्षारसमुद्र मुझसे डरता क्यों है?' सरस्वतीने हँसकर कहा—'अग्ने! तुमसे कौन भयभीत न होगा।' बडवानल बोला—'भद्रे! मैं तुम्हें वर दूँगा, इच्छानुसार वर माँगो।' तब सरस्वतीने भगवान् विष्णुका स्मरण किया। भगवान्‌ने हृदयमें प्रकट होकर उसे दर्शन दिया। सरस्वतीने पूछा—'भगवन्! बडवानल मुझे वरदान देता है; बताइये, मैं इससे क्या माँगूँ?' हृदयस्थित भगवान्‌ने कहा—'कल्याणी! तुम उससे कहो कि वह अपना मुँह सूईके समान बना ले।' तब सरस्वतीदेवीने उससे कहा—'बडवानल! तुम सुईके समान मुँह बनाकर समुद्रका जल पीते रहो।' उसके यों कहनेपर बडवानलने सूईके छिद्रके समान अपना मुँह कर लिया। जैसे घटीसूचक पात्रमें धीरे-धीरे जल प्रवेश करता है, उसी प्रकार वह भी जल पीने लगा।

महादेवजी कहते हैं—तदनन्तर सरस्वतीने समुद्रको बुलाकर कहा—'तुम सब देवताओंके आदि तथा प्राणियोंके प्राण हो, भगवान् विष्णुकी आज्ञासे यहाँ आकर इस बडवानलको ग्रहण

१२४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करो।' समुद्रने कहा—'देवि! लाओ, बडवानलको मुझे दे दो।' तब सरस्वतीने बडवानलसे कहा—'जैसे अग्निदेव घीकी आहुति ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार तुम भी जल भक्षण करो।' यों कहकर उसने वह बडवानल समुद्रको समर्पित कर दिया। इसके बाद सरस्वती पुनः नदी होकर नारदेश्वरके मार्गसे समुद्रमें मिल गयी। वह स्वरूपसे ही परम पवित्र थी, फिर प्रभासक्षेत्र और समुद्रके सम्पर्कसे अत्यन्त पुण्यमयी हो गयी। महाबली बडवानल समुद्रमें रहकर अपने मुखसे उसका जल पीने लगा। उसके उच्छ्वासकी वायुसे उठा हुआ जल ज्वारके रूपमें समुद्रसे बाहरतक दौड़ जाता है। इस प्रकार समस्त पातकोंका नाश करनेवाली सरस्वती ब्रह्मलोकसे उत्तम प्रभासक्षेत्रमें आयी है। समुद्रके समीप सोमनाथके दक्षिण एवं आग्नेय दिशामें सरस्वतीकी स्थिति है। पहले अग्नितीर्थमें स्नान करके मनुष्य विधिपूर्वक सरस्वतीका पूजन करे। वहाँ ब्राह्मणदम्पतिको भोजन कराकर उन्हें पहननेके लिये वस्त्र दे। उसके बाद कपर्दीश्वरकी पूजा करे। पार्वती! इस प्रकार यह सरस्वती नदीके प्रकट होनेका वृत्तान्त तुमसे कहा गया है।


सरस्वती नदीकी महिमा तथा वहाँ स्नान, दान और श्राद्धका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—प्रभासक्षेत्रमें सरस्वती नदी स्वर्गलोककी सीढ़ीके समान स्थित हैं। प्राची सरस्वती सर्वत्र दुर्लभ हैं; परंतु प्रभास, कुरुक्षेत्र और पुष्करमें उनका दर्शन विशेष दुर्लभ है। अग्नितीर्थके समीप सरस्वती बहती हैं। जो पहले उनका पूजन करता है, वह तीर्थके फलका भागी होता है। सागर तीर्थ भी पापोंका नाश और पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है। उसके दर्शनसे ही महायज्ञका फल होता है। अग्नितीर्थमें स्नान करके क्रमशः सरस्वती-कपर्दीश्वर, केदारेश्वर, भीमेश्वर तथा सोमेश्वरदेवका विधिपूर्वक पूजन करके बालरूपधारी ब्रह्माजीकी पूजा करे। इस प्रकार शैवी यात्रा बतायी गयी है।

जो मनुष्य भोजन करके या बिना भोजन किये, दिनमें अथवा रातमें चन्द्रभागा, गंगा और सरस्वती—इन तीन नदियोंका जल पीते हैं, वे देवताके समान हैं। जहाँ प्राची सरस्वती बहती हैं, वहाँ काल, अग्नि और यमराजका भय नहीं है। जैसे कामदा गौएँ हर समय फल देनेवाली होती हैं, वैसे ही प्राची सरस्वती भी हैं। जहाँ चिन्तामणिके समान प्राची सरस्वती हैं, वहाँ स्वर्ग और मोक्ष दोनों सुलभ हैं। अठासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनि जहाँ संन्यास आश्रममें स्थित हैं, उस सरस्वतीसे बढ़कर और कौन-सा तीर्थ है। पार्वती! प्रभास नामक महाक्षेत्रमें सरस्वतीके उत्तर तटपर जो अपने शरीरका त्याग करता है, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो मनुष्य इस तीर्थमें श्राद्ध करेंगे, वे अपनी इक्कीस पीढ़ियोंके साथ स्वर्गलोकमें चले जायँगे। यहाँ कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको सदा ही स्नानकी विधि है। यहाँ श्राद्ध करनेसे पितरोंको अक्षय तृप्ति मिलती है। जो यहाँ अधिक अन्न दान करते हैं, वे मोक्ष मार्गको प्राप्त होते हैं। जो पुरुष ब्राह्मणको यहाँ सुन्दर दही देता है, वह गोलोकमें जाकर उत्तम भोग भोगता है। जो भक्तिपूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणको ऊनी चद्दर दान करता है, उसे उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है। जो भक्तिपूर्वक इस तीर्थमें स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें पूजित होता है।

  • प्रभासखण्ड * | १२४५

'कपर्दी' की अग्रपूजाका हेतु और महिमा

पार्वतीजीने पूछा—भगवान्! आपने जो यह कहा है कि पहले 'कपर्दी' का दर्शन करे, इसका क्या कारण है? क्योंकि वह तो आपका सेवक है। स्वामीके पश्चात् ही सेवकका पूजन हो, यह सनातन धर्म है।

महादेवजी कहते हैं—प्रभासक्षेत्रमें सोमेश्वर देवके रूपमें जो लिंगरूपधारी सदाशिव विराजमान हैं, वे इन्द्रियातीत पुरुषोंद्वारा चिन्तन करने योग्य हैं। उनके वामभागमें वाराहरूपधारी भगवान् विष्णु और दक्षिणभागमें प्रजापति ब्रह्माजी विराजमान हैं। द्वापरकी सन्धिमें कलियुग प्राप्त होनेपर स्त्री, म्लेच्छ, शूद्र तथा अन्य पापाचारी मनुष्य भी भगवान् सोमनाथका दर्शन करके शीघ्र ही स्वर्गलोकको चले जाते थे। बालक और वृद्ध सभी उत्तम गतिको प्राप्त होते थे। यह देख इन्द्र आदि देवता मेरी शरणमें आये और हाथ जोड़कर बोले—'भगवान्! आपके प्रसादसे यह सम्पूर्ण स्वर्ग मनुष्योंसे भर गया है, अतः अब हमारे रहनेके लिये कोई दूसरा स्थान दीजिये। जिनके लिये भयंकर कुम्भीपाक सजाया गया, रौरव तथा शाल्मलि आदि नरकोंका निर्माण किया गया, उन्हें स्वर्गमें स्थित देखकर यमराजने अपना व्यापार ही छोड़ दिया है।'

मैंने कहा—देवताओ! मैंने चन्द्रमाकी भक्तिसे संतुष्ट होकर उनसे यह प्रतिज्ञा की है कि प्रभासक्षेत्रमें सदा मेरा निवास होगा। मैं अपनी कही हुई बात किसी प्रकार पलट नहीं सकता। जो लोग वहाँ मेरा दर्शन करेंगे, वे निश्चय ही स्वर्गलोकमें जायँगे।

पार्वती! यह सुनकर देवता भयसे व्याकुल हो गये और तुम्हें वहाँ खड़ी देख हाथ जोड़कर बोले—'माता! तुम्हीं हमें आश्रय दो।' यों कहकर वे तुम्हारी स्तुति करने लगे।

देवता बोले—देवेश्वरी! तुम्हें नमस्कार है। जगदम्बा! तुम्हें नमस्कार है। कमलके समान नेत्रोंवाली देवी! तुम्हें नमस्कार है। सुवर्णके सदृश गौर आकृति धारण करनेवाली गौरी! तुम्हें नमस्कार है। जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाली महेश्वरि! तुम्हें नमस्कार है। शंकर प्रिये! तुम्हें नमस्कार है। कालका भी नाश करनेवाली कालरात्रि! तुम्हें नमस्कार है। गिरिराजकुमारी! तुम्हें नमस्कार है। आर्ये! भद्रे! विशालाक्षि! त्रिलोकसुन्दरि! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं रति, धृति, श्री, स्वाहा, स्वधा, सती, दुर्गा, मति, मेधा, पृथ्वी तथा सर्वस्वरूपा हो। तुमने इस सम्पूर्ण चराचर त्रिलोकीको व्याप्त कर रखा है। नदियों, पर्वत-शिखरों, समुद्रों, गुफाओं, वनों, मन्दिरों तथा मुनियोंके आश्रमोंमें भी तुम विराज रही हो। देवि! तीनों लोकोंमें ऐसा कोई स्थान मैं नहीं देखता, जहाँ तुम विद्यमान न हो। विशाल नेत्रोंवाली शिवे! हमारी यह प्रार्थना सुनकर महान् भयसे हमें बचाओ।

पार्वती! इन्द्र आदि देवताओंके इस प्रकार स्तवन करनेपर तुम करुणाके वशीभूत हो हाथ मलने लगीं। इससे गजराजके-से मुखवाला एक मनोहर कुमार प्रकट हुआ, जिसके चार भुजाएँ थीं। तब तुमने देवताओंसे कहा—'देवगण! मैंने तुम्हारे हितके लिये इस बालकको उत्पन्न किया है। यह मनुष्योंके समक्ष सब प्रकारके विघ्न उपस्थित करेगा, जिससे मोहग्रस्त होकर वे सोमनाथका दर्शन नहीं करेंगे और अपने पापोंके कारण नरकमें जायँगे।'

इसके बाद गजाननने तुमसे विनयपूर्वक पूछा—'माँ! मुझे आज्ञा दो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ?' तुमने कहा—'बेटा! तुम प्रभासक्षेत्रमें जाओ, जहाँ सोमेश्वरलिंगके रूपमें महादेवजी सदैव निवास करते हैं। वहाँ रहकर सोमनाथकी रक्षा करो, जिससे मनुष्योंको उनका दर्शन न होने

१२४६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पाये।' तुम्हारे इस आदेशसे गजानन वहाँ गये और सदा वहीं स्थित रहकर मनुष्योंके सम्मुख विघ्न उपस्थित करते हैं। जब किसी मनुष्यको वे सोमनाथके प्रति आते देखते हैं, तब उसके मार्गमें स्त्री, पुत्र, गृह, क्षेत्र, धन, धान्य आदिका महान् मोह लाकर रखते हैं और इस प्रकार उसके सामने बड़ा भारी विघ्न डालते हैं, जिससे वे मानव सोमेश्वर शिवका दर्शन नहीं कर पाते। अथवा गलगण्ड आदि रोग पैदा कर देते हैं, जिससे पीड़ित होकर मनुष्य सोमेश्वरके दर्शनसे वंचित रह जाता है। वे गजानन ही लोकपूजित कपर्दी हैं। अतः सोमेश्वरकी प्राप्तिके लिये प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक कपर्दीकी पूजा करनी चाहिये। उन प्रभासक्षेत्रके रक्षक गणेशका निम्नांकित स्तोत्रद्वारा स्तवन करना चाहिये। महादेवि! मैं कपर्दीका वह विघ्ननाशक स्तोत्र कहता हूँ, सावधान होकर सुनो— | करनेवाले तथा हविष्यके प्रेमी हैं एवं पूजित न होनेपर जो मनुष्योंके सब कार्योंमें विघ्न डालते हैं, उन महाभयंकर पार्वतीनन्दन गणेशको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनके गण्डस्थलसे मदकी धारा बहती है, नेत्र भयंकर हैं और मुख हाथीके समान है, जिनकी कान्ति सदा एक-सी रहती है, जो ध्रुव, निश्चल और शान्त हैं, उन विनायकको मैं प्रणाम करता हूँ। भगवन्! आप सबसे पहले प्रकट हुए हैं, आपने प्राचीन देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये हाथीका रूप धारण करके समस्त दानवोंको भयभीत किया और अपनेको ऋषियों तथा देवताओंका स्वामी सिद्ध कर दिखाया। ॐ विघ्नराजको नमस्कार है, कपर्दीको नमस्कार है। अत्यन्त भयंकर दाढ़वाले प्रभासक्षेत्रनिवासी गणेशको नमस्कार है। सोमनाथकी यात्राके निर्विघ्नतापूर्वक पूर्ण होनेके लिये कपर्दीको नमस्कार करके मैं सिद्धि-बुद्धि-प्रियतम मंगलकारी विघ्नराजकी स्तुति करता हूँ। जो महागणपति शूरवीर, किसीसे भी पराजित न होनेवाले, जयकी वृद्धि करनेवाले, एक-दो तथा चार दाँतवाले, चार भुजावाले, त्रिनेत्रधारी, हाथमें त्रिशूल रखनेवाले, लाल नेत्रोंवाले, वरदायक, अजेय, शंकुकर्ण, प्रचण्ड, दण्डनायक, लोहदण्डधारी, मुखसे हविष्य ग्रहण | इस प्रकार पूर्वकालमें देवताओंने शिवपुत्र गणेशका स्तवन करके अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये रक्तचन्दनमिश्रित जल और लाल फूलोंसे उनका पूजन किया। जो चतुर्थीको लाल वस्त्र धारण करके एक या दोनों समय पूर्वोक्तरूपसे गणेशजीकी पूजा करता है और नियमसे रहते हुए नियमित भोजन करता है, वह सबको अपने वशमें कर लेता है। सम्पूर्ण तीर्थों और समस्त यज्ञोंसे जो फल प्राप्त होता है, उसीको गणेशजीकी स्तुति करके मनुष्य पा लेता है। उसे कभी विघ्नका भय नहीं होता और वह अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेवाला होता है। जो प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह छः महीनेमें ही इसका फल पाता है। वर्षभरमें उसे सिद्धि प्राप्ति होती है और भगवान् सोमनाथ कृपापूर्वक उसे दर्शन देते हैं।


केदारलिंगकी महिमा, राजा शशिविन्दुके पूर्वजन्मका वृत्तान्त

महादेवजी कहते हैं—महादेवि! कपर्दीका पूजन करनेके पश्चात् मनुष्य केदारलिंगके समीप जाय। कपर्दीसे अग्निकोणमें भीमेश्वरके समीप केदारेश्वरनामक स्वयम्भू-लिंग स्थित है। वह कल्पपर्यन्त स्थिर रहनेवाला लिंग मुझे बहुत ही प्रिय है। उस महाप्रकाशमय लिंगको वृद्धिलिंग | भी कहते हैं। देवि! स्वयं मैंने भी उनकी पूजा की है। जो चतुर्दशी (शिवरात्रि)-को वहाँ निराहार रहकर जागरण करता है, उसे सनातन लोक प्राप्त होते हैं। प्राचीन युगमें केदारेश्वरका नाम रुद्रेश्वर था। इस कलियुगमें म्लेच्छोंके स्पर्शके भयसे केदारजी समुद्रके समीप इसी लिंगमें लीन

  • प्रभासखण्ड * | १२४७ ---|--- हो गये, इसीलिये इसका नाम 'केदार' हो गया। जो मनुष्य आहारको जीतकर माघमासमें रुद्रेशके दक्षिणभागमें दस धनुषकी दूरीपर समुद्रमें स्थित पद्मकेतुनामक महाकुण्डमें नहाकर विधिपूर्वक रुद्रेश्वरकी पूजा करेगा, उसे केदार-यात्राका पूर्ण फल प्राप्त होगा। उनके पूजनसे ब्रह्महत्या आदि महापापोंका नाश होता है।<br><br>प्राचीन कालमें शशिविन्दु नामसे विख्यात एक चक्रवर्ती राजा थे। उनकी पतिव्रता स्त्री उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। राजाके पास एक सुन्दर सुवर्णमय आकाशगामी विमान था, जिसके द्वारा वे अपनी इच्छाके अनुसार सम्पूर्ण लोकोंमें घूमते रहते थे। एक समय फाल्गुन कृष्णपक्षकी चतुर्दशीका पर्व आनेपर राजा शशिविन्दु उत्तम प्रभासक्षेत्रमें आये। वहाँ उन्होंने बहुतसे महर्षियोंको देखा, जो जपमें और होममें तत्पर हो रात्रिमें जागरण करनेके लिये श्रीसोमनाथजीके सम्मुख बैठे हुए थे। राजाने भी सोमनाथका दर्शन और प्रणाम करके विधिपूर्वक पूजन किया और क्रमशः भक्तिभावसे उन सभी ऋषि-मुनियोंका स्वागत-सत्कार करके वे केदारलिंगके पास चले आये। वहाँ विचित्र पुष्पमालाओं, नैवेद्यों तथा मनोहर वस्त्राभूषणोंसे केदारेश्वरकी पूजा की और वहीं एकाग्रचित्त हो जागरण किया। तब वे सब मुनि कौतूहलवश राजाके समीप गये और इस प्रकार बोले—'राजन्! तुम सोमेश्वर देवको छोड़कर केदारजीके आगे जो जागरण और पूजन करते हो, इसका क्या कारण है?'<br><br>राजाने कहा—विप्रवरो! आपलोग सुनें, यह मेरे पूर्वजन्मका वृत्तान्त है। पहले जन्ममें मैं ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाला शूद्र था। मेरी जन्मभूमि सौराष्ट्र देशमें थी। एक समय वहाँ भयंकर अनावृष्टि हुई। उस समय मैं भूखसे व्याकुल होकर प्रभासक्षेत्रमें चला आया। वहाँ आनेपर हरिणीके मूलभागमें स्थित एक सुन्दर सरोवरपर मेरी दृष्टि पड़ी जो रामसरोवरके नामसे प्रसिद्ध | है। वह तड़ाग कमलसमूहसे सुशोभित था। मैं थका माँदा तो था ही। उस सरोवरको देखकर मैंने उसमें स्नान किया तथा देवताओं और पितरोंका तर्पण करके उसके स्वच्छ जलको पीया। तत्पश्चात् मेरी स्त्रीने कहा—'इन कमल-पुष्पोंको ले लीजिये। यहाँसे निकट ही एक सुन्दर स्थान दिखायी देता है। वहाँ चलकर इन फूलोंको बेचेंगे, जिससे कुछ भोजनकी व्यवस्था हो सकेगी।' पत्नीके यों कहनेपर मैं जलके भीतर उतरा और बहुत-से कमलके फूल लेकर नगरकी ओर चला। वहाँ पहुँचकर सड़कों, चौराहों और तिमुहानियोंपर घूमता रहा; परंतु किसीने भी मेरे फूल नहीं लिये। इतनेमें दिन डूब गया और मैं अपनी पत्नीके साथ एक मन्दिरमें आकर सो रहा। वहाँ स्त्रीसहित मुझे भूख अधिक पीड़ा देने लगी। इतनेमें ही मैंने देखा किसी देवालयमें होम और जागरण हो रहा है। तब मैं भी उठकर वहाँ गया और रुद्रेश्वरनामक वृद्धिलिंगका दर्शन किया। उस समय वहाँ अनंगवती नामक एक वेश्या शिवरात्रि-व्रतमें संलग्न हो नृत्य, गीत और उत्सव आदिके द्वारा भगवान्के सामने जागरण कर रही थी। मैंने एक मनुष्यसे पूछा—'भाई! यहाँ रात्रिमें जागरण किसलिये होता है? यह नाच, गान और उत्सवमें लगी हुई कौन स्त्री दिखायी दे रही है?' उसने बताया—'आज शिवधर्मोत्तरपुराणमें प्रतिपादित शिवरात्रि है। यह धर्मपरायणा स्त्री अनंगवती नामकी वेश्या है, जो कल्याणमय शिवरात्रि-व्रत करके जागरण कर रही है। जो कोई मनुष्य शिवरात्रि-व्रत करता है, उसे दुःख-दारिद्र्य और बन्धनकी प्राप्ति नहीं होती। दुष्ट ग्रह, अरिष्टयोग, रोग अथवा भय भी उसके पास नहीं आता। वह उत्तम कुलमें उत्पन्न हो सुख और सौभाग्यसे युक्त होता है। तेजस्वी यशस्वी तथा पूर्णतः कल्याणका भागी होता है।'<br><br>उस मनुष्यकी बात सुनकर मेरे मनमें वह