भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1275
१२४६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पाये।' तुम्हारे इस आदेशसे गजानन वहाँ गये और सदा वहीं स्थित रहकर मनुष्योंके सम्मुख विघ्न उपस्थित करते हैं। जब किसी मनुष्यको वे सोमनाथके प्रति आते देखते हैं, तब उसके मार्गमें स्त्री, पुत्र, गृह, क्षेत्र, धन, धान्य आदिका महान् मोह लाकर रखते हैं और इस प्रकार उसके सामने बड़ा भारी विघ्न डालते हैं, जिससे वे मानव सोमेश्वर शिवका दर्शन नहीं कर पाते। अथवा गलगण्ड आदि रोग पैदा कर देते हैं, जिससे पीड़ित होकर मनुष्य सोमेश्वरके दर्शनसे वंचित रह जाता है। वे गजानन ही लोकपूजित कपर्दी हैं। अतः सोमेश्वरकी प्राप्तिके लिये प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक कपर्दीकी पूजा करनी चाहिये। उन प्रभासक्षेत्रके रक्षक गणेशका निम्नांकित स्तोत्रद्वारा स्तवन करना चाहिये। महादेवि! मैं कपर्दीका वह विघ्ननाशक स्तोत्र कहता हूँ, सावधान होकर सुनो— | करनेवाले तथा हविष्यके प्रेमी हैं एवं पूजित न होनेपर जो मनुष्योंके सब कार्योंमें विघ्न डालते हैं, उन महाभयंकर पार्वतीनन्दन गणेशको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनके गण्डस्थलसे मदकी धारा बहती है, नेत्र भयंकर हैं और मुख हाथीके समान है, जिनकी कान्ति सदा एक-सी रहती है, जो ध्रुव, निश्चल और शान्त हैं, उन विनायकको मैं प्रणाम करता हूँ। भगवन्! आप सबसे पहले प्रकट हुए हैं, आपने प्राचीन देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये हाथीका रूप धारण करके समस्त दानवोंको भयभीत किया और अपनेको ऋषियों तथा देवताओंका स्वामी सिद्ध कर दिखाया। ॐ विघ्नराजको नमस्कार है, कपर्दीको नमस्कार है। अत्यन्त भयंकर दाढ़वाले प्रभासक्षेत्रनिवासी गणेशको नमस्कार है। सोमनाथकी यात्राके निर्विघ्नतापूर्वक पूर्ण होनेके लिये कपर्दीको नमस्कार करके मैं सिद्धि-बुद्धि-प्रियतम मंगलकारी विघ्नराजकी स्तुति करता हूँ। जो महागणपति शूरवीर, किसीसे भी पराजित न होनेवाले, जयकी वृद्धि करनेवाले, एक-दो तथा चार दाँतवाले, चार भुजावाले, त्रिनेत्रधारी, हाथमें त्रिशूल रखनेवाले, लाल नेत्रोंवाले, वरदायक, अजेय, शंकुकर्ण, प्रचण्ड, दण्डनायक, लोहदण्डधारी, मुखसे हविष्य ग्रहण | इस प्रकार पूर्वकालमें देवताओंने शिवपुत्र गणेशका स्तवन करके अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये रक्तचन्दनमिश्रित जल और लाल फूलोंसे उनका पूजन किया। जो चतुर्थीको लाल वस्त्र धारण करके एक या दोनों समय पूर्वोक्तरूपसे गणेशजीकी पूजा करता है और नियमसे रहते हुए नियमित भोजन करता है, वह सबको अपने वशमें कर लेता है। सम्पूर्ण तीर्थों और समस्त यज्ञोंसे जो फल प्राप्त होता है, उसीको गणेशजीकी स्तुति करके मनुष्य पा लेता है। उसे कभी विघ्नका भय नहीं होता और वह अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेवाला होता है। जो प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह छः महीनेमें ही इसका फल पाता है। वर्षभरमें उसे सिद्धि प्राप्ति होती है और भगवान् सोमनाथ कृपापूर्वक उसे दर्शन देते हैं।


केदारलिंगकी महिमा, राजा शशिविन्दुके पूर्वजन्मका वृत्तान्त

महादेवजी कहते हैं—महादेवि! कपर्दीका पूजन करनेके पश्चात् मनुष्य केदारलिंगके समीप जाय। कपर्दीसे अग्निकोणमें भीमेश्वरके समीप केदारेश्वरनामक स्वयम्भू-लिंग स्थित है। वह कल्पपर्यन्त स्थिर रहनेवाला लिंग मुझे बहुत ही प्रिय है। उस महाप्रकाशमय लिंगको वृद्धिलिंग | भी कहते हैं। देवि! स्वयं मैंने भी उनकी पूजा की है। जो चतुर्दशी (शिवरात्रि)-को वहाँ निराहार रहकर जागरण करता है, उसे सनातन लोक प्राप्त होते हैं। प्राचीन युगमें केदारेश्वरका नाम रुद्रेश्वर था। इस कलियुगमें म्लेच्छोंके स्पर्शके भयसे केदारजी समुद्रके समीप इसी लिंगमें लीन