भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1276
  • प्रभासखण्ड * | १२४७ ---|--- हो गये, इसीलिये इसका नाम 'केदार' हो गया। जो मनुष्य आहारको जीतकर माघमासमें रुद्रेशके दक्षिणभागमें दस धनुषकी दूरीपर समुद्रमें स्थित पद्मकेतुनामक महाकुण्डमें नहाकर विधिपूर्वक रुद्रेश्वरकी पूजा करेगा, उसे केदार-यात्राका पूर्ण फल प्राप्त होगा। उनके पूजनसे ब्रह्महत्या आदि महापापोंका नाश होता है।<br><br>प्राचीन कालमें शशिविन्दु नामसे विख्यात एक चक्रवर्ती राजा थे। उनकी पतिव्रता स्त्री उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। राजाके पास एक सुन्दर सुवर्णमय आकाशगामी विमान था, जिसके द्वारा वे अपनी इच्छाके अनुसार सम्पूर्ण लोकोंमें घूमते रहते थे। एक समय फाल्गुन कृष्णपक्षकी चतुर्दशीका पर्व आनेपर राजा शशिविन्दु उत्तम प्रभासक्षेत्रमें आये। वहाँ उन्होंने बहुतसे महर्षियोंको देखा, जो जपमें और होममें तत्पर हो रात्रिमें जागरण करनेके लिये श्रीसोमनाथजीके सम्मुख बैठे हुए थे। राजाने भी सोमनाथका दर्शन और प्रणाम करके विधिपूर्वक पूजन किया और क्रमशः भक्तिभावसे उन सभी ऋषि-मुनियोंका स्वागत-सत्कार करके वे केदारलिंगके पास चले आये। वहाँ विचित्र पुष्पमालाओं, नैवेद्यों तथा मनोहर वस्त्राभूषणोंसे केदारेश्वरकी पूजा की और वहीं एकाग्रचित्त हो जागरण किया। तब वे सब मुनि कौतूहलवश राजाके समीप गये और इस प्रकार बोले—'राजन्! तुम सोमेश्वर देवको छोड़कर केदारजीके आगे जो जागरण और पूजन करते हो, इसका क्या कारण है?'<br><br>राजाने कहा—विप्रवरो! आपलोग सुनें, यह मेरे पूर्वजन्मका वृत्तान्त है। पहले जन्ममें मैं ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाला शूद्र था। मेरी जन्मभूमि सौराष्ट्र देशमें थी। एक समय वहाँ भयंकर अनावृष्टि हुई। उस समय मैं भूखसे व्याकुल होकर प्रभासक्षेत्रमें चला आया। वहाँ आनेपर हरिणीके मूलभागमें स्थित एक सुन्दर सरोवरपर मेरी दृष्टि पड़ी जो रामसरोवरके नामसे प्रसिद्ध | है। वह तड़ाग कमलसमूहसे सुशोभित था। मैं थका माँदा तो था ही। उस सरोवरको देखकर मैंने उसमें स्नान किया तथा देवताओं और पितरोंका तर्पण करके उसके स्वच्छ जलको पीया। तत्पश्चात् मेरी स्त्रीने कहा—'इन कमल-पुष्पोंको ले लीजिये। यहाँसे निकट ही एक सुन्दर स्थान दिखायी देता है। वहाँ चलकर इन फूलोंको बेचेंगे, जिससे कुछ भोजनकी व्यवस्था हो सकेगी।' पत्नीके यों कहनेपर मैं जलके भीतर उतरा और बहुत-से कमलके फूल लेकर नगरकी ओर चला। वहाँ पहुँचकर सड़कों, चौराहों और तिमुहानियोंपर घूमता रहा; परंतु किसीने भी मेरे फूल नहीं लिये। इतनेमें दिन डूब गया और मैं अपनी पत्नीके साथ एक मन्दिरमें आकर सो रहा। वहाँ स्त्रीसहित मुझे भूख अधिक पीड़ा देने लगी। इतनेमें ही मैंने देखा किसी देवालयमें होम और जागरण हो रहा है। तब मैं भी उठकर वहाँ गया और रुद्रेश्वरनामक वृद्धिलिंगका दर्शन किया। उस समय वहाँ अनंगवती नामक एक वेश्या शिवरात्रि-व्रतमें संलग्न हो नृत्य, गीत और उत्सव आदिके द्वारा भगवान्के सामने जागरण कर रही थी। मैंने एक मनुष्यसे पूछा—'भाई! यहाँ रात्रिमें जागरण किसलिये होता है? यह नाच, गान और उत्सवमें लगी हुई कौन स्त्री दिखायी दे रही है?' उसने बताया—'आज शिवधर्मोत्तरपुराणमें प्रतिपादित शिवरात्रि है। यह धर्मपरायणा स्त्री अनंगवती नामकी वेश्या है, जो कल्याणमय शिवरात्रि-व्रत करके जागरण कर रही है। जो कोई मनुष्य शिवरात्रि-व्रत करता है, उसे दुःख-दारिद्र्य और बन्धनकी प्राप्ति नहीं होती। दुष्ट ग्रह, अरिष्टयोग, रोग अथवा भय भी उसके पास नहीं आता। वह उत्तम कुलमें उत्पन्न हो सुख और सौभाग्यसे युक्त होता है। तेजस्वी यशस्वी तथा पूर्णतः कल्याणका भागी होता है।'<br><br>उस मनुष्यकी बात सुनकर मेरे मनमें वह