संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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व्रत करनेका निश्चित विचार हुआ। मैंने सोचा 'अन्नका अभाव होनेके कारण उपवास तो मुझे विवश होकर करना ही है। अतः क्षार समुद्र पद्मकतीर्थमें स्नान करके इन कमलके फूलोंसे भगवान् महेश्वरकी पूजा करूँ।' तब मैंने स्त्रीसहित स्नान करके भक्तिभावसे कमलके फूलोंद्वारा भगवान् रुद्रेश्वरका पूजन किया। पत्नीके साथ रातभर वहाँ जागता रहा। सबेरा होनेपर वेश्याने मुझसे कहा—'अपने फूलोंका मूल्य तीन भर सोना ले लो।' परंतु मैंने सात्त्विकभावका आश्रय लेकर उसका दिया हुआ मूल्य स्वीकार नहीं किया। भिक्षा माँगकर जीवननिर्वाह करने लगा। दीर्घकालके पश्चात् मेरी मृत्यु हुई। उस समय यह मेरी प्राणप्यारी पत्नी मेरे शरीरको लेकर चिताकी आगमें प्रवेश कर गयी। उस पूजन और जागरणके प्रभावसे मैं पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाले चक्रवर्ती राजा हुआ। एक बार संयोगवश यह व्रत किया था, जिसका यह महान् फल प्राप्त हुआ। अब मैं भक्तिभावसे यथावत् सामग्रीके साथ जो इस व्रतका पालन करता हूँ, इसका भविष्यमें क्या फल होगा—यह मैं नहीं जानता।
यह सुनकर उन ब्राह्मणोंके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। उन्होंने 'साधु-साधु' कहकर राजाकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने स्वयं भी उस स्वयम्भू-लिंगका पूजन किया। राजा शशिविन्दु उस केदारलिंगके प्रसादसे देवदुर्लभ उत्तम सिद्धिको प्राप्त हुए। अनंगवती वेश्या शिवरात्रि-व्रत तथा केदार लिंगके प्रभावसे रम्भा नामक अप्सरा हुई। इसलिये जो विद्वान् पुरुष धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी इच्छा रखता हो, उसे प्रयत्नपूर्वक उक्त शिवलिंगका पूजन करना चाहिये।
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श्वेतकेत्वीश्वर आदि विभिन्न शिवलिंगोंका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—महादेवि! पूर्वकालमें जब स्वायम्भुव मन्वन्तरका त्रेतायुग चल रहा था, उस समय श्वेतकेतु नामके एक राजर्षि थे। वे बड़े भारी तपस्वी थे। उन्होंने प्रभासक्षेत्रमें आकर समुद्रके तटपर शिवलिंगकी स्थापना करके महान् तप प्रारम्भ किया। तपस्या और नियमका पालन करते हुए उनके चौदह वर्ष बीत गये। तब मैंने उन्हें दर्शन देकर कहा—'सुव्रत! वर माँगो।' श्वेतकेतु बोले—'प्रभो! मुझे अपनी अविचल भक्ति दीजिये और इस स्थानपर सदा निवास कीजिये।' 'एवमस्तु' कहकर मैं वहाँसे अन्तर्धान हो गया। कुछ कालके पश्चात् राजा श्वेतकेतुने उस लिंगकी आराधना करके महान् अभ्युदययुक्त स्थान प्राप्त किया। इसलिये उस शिवलिंगका नाम श्वेतकेत्वीश्वर हो गया। तदनन्तर कलियुग आनेपर पवनपुत्र भीमसेन अपने भाइयोंके साथ तीर्थयात्राके प्रसंगसे प्रभास-क्षेत्रमें आये। उन्होंने रात्रिमें जागरण करके समुद्रके समीप श्वेतकेत्वीश्वर लिंगका पूजन किया। तबसे उसका नाम भीमेश्वरलिंग हुआ। श्वेतकेत्वीश्वरलिंगका एक बार दर्शनमात्र कर लेनेसे अन्य जन्मोंके किये हुए तथा इस जन्मके भी बहुत-से पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। भीमेश्वरसे पूर्व और सोमनाथसे अग्निकोणमें सरस्वतीद्वारा स्थापित महाप्रभावशाली रवेश्वरलिंग है। मनुष्यको चाहिये कि वह सरस्वती देवी तथा भैरवेश्वरलिंगका विधिपूर्वक पूजन करे। जो महानवमीको विधिवत् स्नान करके सरस्वती देवीका पूजन करता वह वाणीजनित समस्त दोषोंसे मुक्त हो जाता है। जो अघोर-मन्त्रसे दूधके द्वारा उस लिंगको नहलाकर उसकी पूजा करता है, वह यात्राके उत्तम फलको पाता है।
वहाँसे चण्डीश्वरदेवके पास जाय, वह स्थान सोमनाथके दक्षिण सात धनुषकी दूरीपर स्थित है।