संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1278, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * | १२४९ ---|---
पूर्वकालमें चण्डीदेवीने भगवान् दण्डपाणिकी स्थापना की थी। तत्पश्चात् मेरे गण चण्डने उस लिंगकी आराधना की और वहाँ बड़ी कठोर तपस्या की। इस कारण पृथ्वीपर वह चण्डेश्वर लिंगके नामसे विख्यात हुआ। चण्डेश्वरको दूध, दही, मधु, घृत तथा ईखके रससे स्नान कराये और उनके श्रीअंगमें कुंकुमका लेप करे। फिर कपूर, खस और कस्तूरी मिलाया हुआ सुगन्धित चन्दन लगाये। तदनन्तर फूलोंसे उनका पूजन करे। इसके बाद धूप तथा अगुरु निवेदन करके अपने वैभवके अनुसार वस्त्रोंसे पूजन करे। उत्तम नैवेद्य लगाके दीपमाला जलाकर रखे और ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा दे। यों करनेसे पितर कल्पपर्यन्त तृप्त रहते हैं।
पार्वती! सोमनाथसे पश्चिम सात धनुषकी दूरीपर आदित्येश्वर नामक शिवलिंगके समीप जाय, जिसकी स्थापना साक्षात् भगवान् सूर्यने की है और जो समस्त पातकोंका नाश करनेवाला है। त्रेतायुगमें महात्मा समुद्रने दस हजार वर्षोंतक रत्नोंद्वारा आदित्येश्वरका पूजन किया था। इससे पृथ्वीपर इनका नाम रत्नेश्वर प्रसिद्ध हुआ। रत्नेश्वरको पंचामृतसे नहलाकर पंचरत्नोंद्वारा उनकी पूजा की जाती है। इसके बाद भाँति-भाँतिके उपचारोंसे विधिपूर्वक उनकी अर्चना करनी चाहिये। यों करनेपर मनुष्य मेरुपर्वतके दानका फल पाता है। उसे सब तीर्थोंके सेवनका फल मिल जाता है और वह अपने पितृकुल और मातृकुल दोनोंका उद्धार कर देता है। रत्नेश्वरका दर्शन करके मनुष्य अपने सब पाप धो डालता है। जो विधिपूर्वक रत्नेश्वर लिंगकी पूजा करके शतरुद्रियका जप करता है, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता।
महादेवि! वहाँसे परम उत्तम अंगारेश्वरके समीप जाय, जिसकी स्थापना भूमिपुत्र मंगलने की है। वह स्थान सोमनाथसे ईशानकोणमें है। पूर्वकालमें मंगलने प्रभासक्षेत्रमें आकर बाल्यावस्थासे ही तपस्याद्वारा मेरी आराधना की। तब मैंने सन्तुष्ट होकर उन्हें वर माँगनेके लिये कहा। मंगल बोले—'सर्वेश्वर! मुझे ग्रहका पद प्रदान कीजिये।' मैंने 'तथास्तु' कहकर मंगलको यह बताया कि 'जो मनुष्य वहाँ आकर भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करेगा, उसे कभी तुम्हारे द्वारा दी हुई पीड़ा नहीं भोगनी पड़ेगी।' यों कहकर मैं वही अन्तर्हित हो गया। मंगलदेव ग्रहोंके मध्यमें विमानपर विराज रहे हैं।
अंगारेश्वरसे उत्तर दिशामें महाप्रभावशाली बुधेश्वर विद्यमान हैं। उनका स्थान वहाँसे अधिक दूर नहीं, दो ही धनुषके अन्तरपर है। वे दर्शनमात्रसे ही सब पाप हर लेते हैं। देवेश्वरि! बुधने पूर्वकालमें वहाँ बड़ी भारी तपस्या की और निर्मल शिवलिंग स्थापित किया। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने बुधको ग्रहत्व प्रदान किया है। बुधवार और अष्टमीके योगमें बुधद्वारा स्थापित शिवलिंगकी विधिवत् पूजा करके मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है। बुधेश्वरके प्रसादसे उसके कुलमें दुःख और दुर्भाग्य प्रवेश नहीं करते।
उमा-मन्दिरके पूर्वभागमें सिद्धेश्वरसे आग्नेय कोणमें बृहस्पतिद्वारा स्थापित महालिंग है। बृहस्पतिजीने भक्तिभावसे उसकी आराधना करके मुझ देवेश्वर शिवको सन्तुष्ट किया। इससे उन्होंने सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्राप्त कर लिये। मुझसे ज्ञान पाकर वे देवताओंके पूजनीय गुरु हो गये और ग्रहके पदपर प्रतिष्ठित हो इस समय स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं। बृहस्पतीश्वरका भक्तिभावसे दर्शन करके मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। उसे बृहस्पतिकी ओरसे पीड़ा नहीं प्राप्त होती। शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तथा गुरुवारके योगमें पंचोपचारसे विधिपूर्वक उक्त लिंगकी पूजा करके मानव परम पदको प्राप्त कर लेता है।
तदनन्तर विभूतिश्वरसे पश्चिम थोड़ी ही दूरपर शुक्राचार्यके द्वारा स्थापित शिवलिंग है; जहाँ शुक्रने शुक्रेश्वर शिवके प्रभावसे मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की थी। जो मनुष्य स्थिरचित्त होकर उस शिवलिंगकी आराधना करता है और एक लाख मृत्युंजय मन्त्रको जपता है, वह अपने