संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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सभी मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। शुक्रेश्वरका दर्शन और स्पर्श करके मनुष्य जन्मसे लेकर मृत्युतकके सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है। सुगन्धित पुष्पोंद्वारा उनकी पूजा करनेसे शुक्रकी पीड़ा नहीं प्राप्त होती।
बुधेश्वरसे पश्चिम और अजादेवीसे अग्निकोणमें समीप ही पाँच धनुषकी दूरीपर शनैश्चरेश्वरका स्थान है। छायानन्दन शनैश्चरने अत्यन्त कठिन तपस्या करके उस लिंगमें मुझ अनादि, अनन्त शिवको उतारा है। उन्होंने भक्ति तथा मेरे प्रसादसे ग्रहका पद प्राप्त किया है। शनैश्चरके दिन शमीके पत्तोंसे शनैश्चरेश्वरका पूजन करके तिल, उड़द, गुड़ और भातसे ब्राह्मणको तृप्त करे। उसे काले रंगका बैल दान करे। तत्पश्चात् सब प्रकारकी पीड़ाओंका निवारण करनेके लिये अनेकानेक स्तोत्रोंद्वारा शनैश्चरेश्वर देवकी स्तुति करनी चाहिये। जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिभावसे शनैश्चरेश्वरका स्मरण करता है, उसके ऊपर सूर्यनन्दन शनैश्चर प्रसन्न होते हैं।
शनैश्चरेश्वरसे वायव्यकोणमें राहुद्वारा स्थापित शिवलिंग है, जहाँ विप्रचित्तिके पुत्र राहुने एक सहस्र वर्षतक तपस्या की है। जो उनके द्वारा स्थापित शिवका भक्तिपूर्वक पूजन और दर्शन करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है।
राहीश्वरसे उत्तर और अंगारेश्वरसे दक्षिण एक ही धनुषके अन्तरपर महाप्रकाशमय केतुलिंग है। वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। केतुने मुझ शिवके प्रति भक्ति रखकर देवताओंके मानसे सौ वर्षोंतक वहाँ उग्र तपस्या की थी। इससे संतुष्ट होकर मैंने उन्हें ग्रहत्व प्रदान किया। भयंकर ग्रहपीड़ा होनेपर पुष्प, गन्ध, धूप तथा भाँति-भाँतिके शुभ नैवेद्योंद्वारा केत्वीश्वरकी पूजा करके उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। इससे सब पीड़ा शान्त हो जाती है। जो पूर्वोक्त चौदह देवस्थानोंको भक्तिभावसे जानता है, वह क्षेत्रके फलका भागी होता है।
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प्रभासक्षेत्रकी त्रिविध शक्तियों तथा दूतीशक्तियोंके दर्शन-पूजनका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—सोमेश्वरसे ईशानकोणमें वरारोहा देवीसे पूर्वभागमें परम उत्तम सर्वेश्वर देव विराजमान हैं। उनके समीप भक्तिपूर्वक जाकर मनुष्य अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त करता है। सर्वेश्वरकी स्थापना सिद्धोंने की है। जो मानव भक्तिपूर्वक उनका दर्शन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो सिद्धलोकमें जाता है। काम, क्रोध, भय, लोभ, राग, मात्सर्य, ईर्ष्या, दम्भ, आलस्य, निद्रा, मोह, अहंकार—ये सिद्धिमें विघ्न डालनेवाले दोष हैं। सिद्धेश्वरके पूजनसे इन सब दोषोंका नाश हो जाता है। यों जानकर प्रयत्नपूर्वक वहाँकी यात्रा करे।
सिद्धेश्वरके पूर्वभागमें थोड़ी ही दूरपर कपिलेश्वर लिंग प्रतिष्ठित है, जिसके दर्शनमात्रसे सब पापोंका नाश हो जाता है। प्राचीन कालमें कपिल नामसे प्रसिद्ध एक राजर्षि हो गये हैं। उन्होंने वहाँ बड़ी भारी तपस्या करके उत्तम सिद्धि प्राप्त की और शिवलिंगकी स्थापना करके मेरी समीपता पायी है। उस लिंगमें मैं सब लोगोंके हितके लिये सदा निवास करता हूँ। जो शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें सात बार सोमेश-कपिलेश्वरका दर्शन करता है, वह गोदानका फल पाता है। जो वहाँ तिलमयी धेनु दान करता है, वह एक-एक तिलकी संख्याके बराबर युगोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है।
दण्डपाणीश्वरसे निकट ही गन्धर्वेश्वर नामसे प्रसिद्ध उत्तम शिवलिंग है। गन्धर्वराज धनवाहनने वहाँ कठोर तपस्या करके उस शिवलिंगको स्थापित किया है। उसकी पुत्री गन्धर्वसेनाने भी वहाँ शिवलिंगकी स्थापना की है। जो मनुष्य