संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * १२५१
पवित्र होकर यत्नपूर्वक गन्धर्वेश्वरका पूजन और दर्शन करता है, वह गन्धर्वलोकमें जाता है। जो उत्तरायण आनेपर अग्नितीर्थमें स्नान करके गन्धर्वपूजित उस शिवलिंगका पूजन करता है, वह मोक्षको प्राप्त होता है। इस माहात्म्यका श्रवण और अभिनन्दन करके भी मनुष्य महान् भयसे मुक्त हो जाता है।
गन्धर्वेश्वरके पूर्वभागमें गौरीजीके समीप विमलेश्वर नामक लिंग प्रतिष्ठित है। जिसका शरीर क्षयरोगसे आक्रान्त है, वह भक्तिपूर्वक विमलेश्वरका दर्शन करके सब दुःखोंका अन्त कर देता और निर्मल पदको प्राप्त होता है। वहीं रोगग्रस्त गन्धर्वसेना रोगसे मुक्त हो विमल स्वरूपको प्राप्त हुई थी, इसलिये पृथ्वीपर वह लिंग विमलेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ।
ब्रह्माजीके स्थानसे नैर्ऋत्यकोणमें सोलह धनुषकी दूरीपर धनदेश्वर लिंग है। यह राहुलिंगसे वायव्यकोणमें स्थित है। कुबेरने वहाँ बड़ी भारी तपस्या करके धनदका पद प्राप्त किया है। वे विधिपूर्वक शिवलिंगकी स्थापना और पूजा करके अलकापुरीके स्वामी हुए हैं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक धनदेश्वरका दर्शन करके पंचोपचारसे उनकी पूजा करता है, उसके कुलमें दरिद्रताका कभी नाम भी नहीं सुना जाता।
मेरी तीन शक्तियाँ हैं—इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति। पहले जो चौदह और पाँच शिवलिंग बताये गये हैं, उनमेंसे यथाशक्ति चार, तीन या एककी पूजा करके फिर पूर्वोक्त तीन शक्तियोंका पूजन करना चाहिये। सोमेश्वरसे ईशानकोणमें जो वरारोहा देवी कही गयी हैं, वे चन्द्रमाकी अमा नामक कला हैं। वे ही भगवती उमाकी भी कला मानी गयी हैं। उन्हींको मेरी इच्छाशक्ति जानना चाहिये। वरारोहा देवी भूमण्डलके समस्त प्राणियोंका हित करनेके लिये प्रभासक्षेत्रमें विराजमान हैं।
सोमेश्वरसे वायव्यकोणमें साठ धनुषकी दूरीपर क्रियाशक्तिरूपा दूसरी महादेवी स्थित हैं। वहीं योगिनीवन्दित पीठ है। उसी स्थानपर पातालको जानेवाला एक बहुत बड़ा विवर है। पहले उन महादेवीका नाम भैरवी था। फिर इस वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाईसवें चतुर्युगमें राजा आजापालके द्वारा आराधित होनेके कारण वे अजापालेश्वरीक नामसे विख्यात हुई हैं। जो मनुष्य लौकिक सुखभोगकी इच्छा रखता है, उसे गन्ध, धूप, अलंकार, वस्त्र तथा अन्य उपचारोंद्वारा उन महादेवीका पूजन करना चाहिये।
प्रभासक्षेत्रके मध्यभागमें दरिद्रताका विनाश करनेवाली तीसरी अजादेवी हैं, जिन्हें ज्ञानसक्ति माना गया है। उनका स्थान राहीश्वरसे दक्षिणभागमें है। अघासुरके साथ जब मेरा भयंकर युद्ध चल रहा था, उस समय मेरे क्रोधसे अजा नामकी देवी प्रकट हुईं। उनके साथ करोड़ों देवियाँ और थीं। वे सिंहपर सवार थीं। उनका रूप बड़ा सुन्दर था। उन्होंने ढाल और तलवार लेकर बड़े-बड़े दैत्योंका संहार किया। उनके भयसे बहुत-से दैत्य समुद्रकी ओर भागे। देवी सिंहवाहिनी और उनके गणोंने उन सबका पीछा किया। वे दैत्य इधर-उधर भागते हुए महासागरके समीप प्रभासक्षेत्रमें आ पहुँचे। वहाँ कुछ तो मार डाले गये और कुछ पातालमें समा गये। सब दैत्योंको मारा गया देख तथा इस क्षेत्रको परम पवित्र जानकर सिंहवाहिनी देवी यहीं सोमेश्वरके ईशानकोणमें और गौरीश्वरसे उत्तर दिशामें स्थित हुईं। जो स्त्री या पुरुष वहाँ उनका दर्शन करते हैं, वे सात जन्मोंतक पूर्णतः सौभाग्यशाली होते हैं। जो मानव वहाँ गीत, वाद्य तथा नृत्य करता है, उसके वंशमें देवीके प्रसादसे कोई दुर्भाग्यवान् नहीं होता। जो स्त्री वहाँ लाल रंगकी बत्तीसे युक्त, दीपकको घीसे जलाकर देवीको अर्पण करती है, उस बत्तीमें जितने सूत होते हैं, उतने जन्मोंतक वह सौभाग्य प्राप्त करती है। जो तृतीयाको इस माहात्म्यका पाठ करता है अथवा जो भक्तिपूर्वक इसे सुनता है, वह सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है।