संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रभासक्षेत्रमें तीन दूती शक्तियाँ हैं—पहलीका नाम मंगला देवी है, दूसरीको विशालाक्षी देवी कहते हैं और तीसरी चत्वर देवीके नामसे प्रसिद्ध हैं। प्रभासक्षेत्रकी यात्राका पूरा-पूरा फल चाहनेवाले मनुष्यको क्रमशः इन तीनों शक्तियोंका पूजन करना चाहिये। मंगलादेवी ब्रह्माजीकी शक्ति कही गयी हैं, विशालाक्षी विष्णुशक्ति मानी गयी हैं तथा चत्वरप्रिया देवी मेरी शक्ति हैं। पहले मंगला देवीकी पूजा करनी चाहिये। वे अजादेवीके उत्तरभागमें निवास करती हैं। राह्लीशके दक्षिणभागमें थोड़ी ही दूरपर उनका स्थान है। सोमनाथकी प्रतिष्ठाके लिये जब सोमने यज्ञ प्रारम्भ किया, उस समय उसे देखनेके लिये वहाँ आये हुए ब्रह्मादि देवताओंका उसी देवीने मंगल किया था। इसीलिये उसका नाम मंगला हुआ। जो नारी तृतीयाको मंगला देवीकी पूजा करेगी, उसके अमंगल और दुःख पूर्णतः नष्ट हो जायेंगे। भगवान् दैत्यसूदनसे पूर्वभागमें वैष्णवी क्षेत्र दूती महादेवी विशालाक्षी हैं। योगेश्वरीसे ईशानकोणमें सौ धनुषकी दूरीपर उसका स्थान है। जो लोग महान् दुर्भाग्यकी आगमें जल रहे हैं, उनका दाह शान्त करनेके लिये विशालाक्षी देवी ओषधिके समान हैं। चाक्षुष मन्वन्तरमें जब सब दैत्य भगवान् विष्णुकी मार खाकर दक्षिण दिशामें भाग गये, उस समय उनको मारना दुष्कर जानकर भगवान् विष्णुने अत्यन्त प्रभावशालिनी भैरवी शक्ति महामायाका स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही अत्यन्त प्रकाशमयी महामाया वहाँ आ गयी। भगवान् विष्णुके दर्शनसे उसके नेत्र आनन्दसे खिल उठे। उसने बड़ी-बड़ी आँखें करके भगवान्को देखा। इससे उसका नाम विशालाक्षी हुआ। इस कल्पमें उसे ललितोमा कहते हैं। जो माघमासमें तृतीया तिथिको विधिपूर्वक उसका पूजन करता है, उसके वंशमें कोई भी सन्तानहीन नहीं होता। जो मानव भक्तिभावसे उसका दर्शन करता है, वह दीर्घकालतक नीरोग, सुखी और सौभाग्यशाली होता है।
ललितासे उत्तर दिशामें दस धनुषकी दूरीपर तीसरी शक्ति चत्वरप्रियाका निवास है। मेरी प्रेरणासे वह इस क्षेत्रकी रक्षामें संलग्न रहती है। चबूतरों, चौराहों, पुराने घरों, बगीचों तथा महलोंकी अटारियोंपर एवं मार्गमें वह रातको घूमती रहती है। जो स्त्री अथवा पुरुष महानवमीके दिन नाना प्रकारके उपहारों और फूलोंसे उस कल्याणमयी देवीकी विधिपूर्वक पूजा करता है, उसके ऊपर प्रसन्न हो वह सम्पूर्ण लोक प्रदान करती है। यात्राके उत्तम फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको वहाँ भोजन देना चाहिये।
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भैरवेश्वर आदि विविध लिंगोंका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! योगेश्वरीसे दक्षिण थोड़ी ही दूरपर उत्तम भैरवेश्वरका स्थान है। प्राचीन कालमें देवीने जब दैत्योंके विनाशके लिये उद्योग किया, तब मेरे स्वरूपभूत भैरवको बुलाकर दूतके कार्यपर नियुक्त किया। इसलिये उस समय उनका नाम 'शिवदूती' हुआ। उसके बाद वे ही योगेश्वरी नामसे विख्यात हुईं। उन्होंने भैरवको दूत बनाया था, इसलिये उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगका भैरवेश्वर नाम हुआ। जो मनुष्य कार्तिककी पूर्णिमाको उस शिवलिंगकी पूजा करता है अथवा जो छः महीनेतक निरन्तर उसकी पूजामें संलग्न रहता है, वह मनोवांछित फलको प्राप्त कर लेता है।
भैरवेश्वरसे पूर्वदिशामें पाँच धनुषकी दूरीपर लक्ष्मीश्वर नामसे प्रसिद्ध शिवलिंग है, जो दरिद्रताका नाश करनेवाला है। जो श्रीपंचमीको विधिपूर्वक भक्तिभावसे लक्ष्मीश्वरका पूजन करता है, उसको लक्ष्मी कभी नहीं छोड़तीं। लक्ष्मीश्वरसे उत्तर