भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1282
  • प्रभासखण्ड * १२५३

और विशालाक्षीसे दक्षिण वाडवद्वारा स्थापित अत्यन्त प्रभावशाली वाडवेश्वरलिंग विराजमान है। उसको दधिसे स्नान कराकर विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। जो मानव वहाँ वेदज्ञ ब्राह्मणको दहीका दान करता है, वह तेजस्वी लोकोंमें जाता और यात्राका उत्तम फल पाता है। विशालाक्षीसे उत्तर थोड़ी ही दूरपर देवताओं और गन्धर्वोंसे पूजित अध्यैश्वरलिंग प्रतिष्ठित है। जो पंचामृतसे स्नान कराकर अध्यैश्वरका पूजन करता है, वह सात जन्मोंतक विद्वान्, शास्त्रवक्ता और सब संदेहोंका निवारण करनेवाला होता है।

महादेवि! दैत्यसूदनके पश्चिमभागमें सात धनुषकी दूरीपर कामेश्वर नामक महान् लिंग है, वह सब पापोंको हरनेवाला तथा संपूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाला है। इस प्रकार पंचवक्त्रलिंग बताये गये। सोमेश्वरसे पूर्व साठ धनुषकी दूरीपर अर्थेश्वरलिंग है। जो मनुष्य उसे पंचामृतसे नहलाकर विधिपूर्वक पूजन करता है, वह सात जन्मोंतक पूर्ण विद्या पाता है और शास्त्रोंका उत्तम वक्ता होता है। जो पुत्रहीना स्त्री वहाँ नारियल चढ़ाती है, वह शीघ्र ही सबल एवं सुन्दर पुत्र पाती है। जो नारी वहाँ लाल बत्तीसे युक्त दीपकको घीसे जलाकर अर्पण करती है, उसके दीपककी बत्तीमें जितने तार होते हैं, उतने जन्मोंतक वह सदैव सौभाग्यवती होती है। जो पराभक्तिके साथ वहाँ नृत्य करती है, वह दीर्घकालतक आरोग्य, सुख और सौभाग्यसे युक्त होती है। वहाँ स्वच्छ जलसे भरा हुआ एक महान् कुण्ड है। जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सब पातकोंसे छूट जाता है। जो भक्तिपूर्वक पितरोंके उद्देश्यसे वहाँ श्राद्ध करता है, वह पुण्यात्मा अपने पितरोंके साथ परमपदको प्राप्त होता है। इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके वहाँ श्राद्ध करना चाहिये। रात्रिमें गीत, वाद्य और नृत्य आदिके आयोजनद्वारा वहाँ जागरण करना उचित है। वहाँ ब्राह्मण-दम्पतिको पहननेके लिये वस्त्र और दक्षिणा देनी चाहिये।

देवि ! प्रभासक्षेत्रमें जो यह तपोवन है, यह गौरी तपोवनके नामसे विख्यात है। यह सब ओर पचास-पचास धनुषतक फैला हुआ है। इसके मध्यभागमें सतीदेवी एक पैरसे खड़ी होकर तपस्यामें लगी थीं। उस स्थानसे चार धनुष दूर ईशानकोणमें गौरीश्वरलिंग है, जो पापभयको दूर करनेवाला है। जो मनुष्य सदा ही—विशेषतः कृष्णपक्षकी अष्टमीको श्रद्धापूर्वक गौरीश्वरका पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। यहाँ सब पापोंकी शान्तिके लिये गोदान और अन्नदान श्रेष्ठ कहा गया है। गौरीश्वरलिंगके दर्शनसे गोघाती, ब्रह्महत्यारे तथा अन्यान्य पापी भी सब पापोंसे छूट जाते हैं। गौरीतपोवनसे अग्निकोणमें बीस धनुष दूर वरुणजीके द्वारा स्थापित वरुणेश्वरलिंग है। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य सब तीर्थोंका फल पा लेता है। अष्टमी और चतुर्दशीको यदि उन्हें दहीसे नहलाया जाय तो वह ब्राह्मण चारों वेदोंका ज्ञाता है। पार्वती ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, गूँगे, बहरे, बालक, स्त्री और नपुंसक भी वरुणेश्वरका दर्शन करके धर्मपरायण हो स्वर्गलोकमें चले जाते हैं। जो उस स्थानमें स्नान, जप, होम और पूजन करता है, उसका वह सब शुभकर्म अक्षय हो जाता है।

वरुणेश्वरसे दक्षिण तीन धनुषके अन्तरपर ईषेश्वरलिंग है। पतिके दुःखसे घिरी हुई वरुणपत्नी ईषाने उस सिद्धिदायक महालिंगकी स्थापना की थी। जो मनुष्य पापनाशक ईषेश्वरका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। ईषेश्वरलिंग स्त्रियोंके लिये सौभाग्यदाता एवं दुःख दुर्भाग्यका नाशक है।

वरुणेश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें तीस धनुष दूर पश्चिम मुखवाला कुमारेश्वरलिंग प्रतिष्ठित है। कुमार कार्तिकेयने बड़ी भारी तपस्या करके यहाँ उस महालिंगकी स्थापना की थी, इसीसे उसका नाम कुमारेश्वर हुआ। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक कुमारेश्वरकी पूजा करता है, उसे एक ही दिनमें छः मासकी