भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1283
१२५४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आराधनाका फल मिल जाता है। काम, क्रोध, लोभ, राग और मात्सर्य छोड़कर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए इन्द्रियसंयमपूर्वक एक बार अवश्य कुमारेश्वरका पूजन करना चाहिये।

दैत्यसूदनके स्थानसे वायव्यकोणमें तीस धनुषपर शाकल्यके द्वारा पूजित शाकल्येश्वर नामक लिंग है। राजर्षि शाकल्यने वहाँ बड़ी भारी तपस्या और आराधना करके मुझ महादेवका प्रत्यक्ष दर्शन पाया तथा प्रसन्न हुए मुझ महेश्वरको उस लिंगमें उतारा है। पार्वती! शाकल्येश्वरके दर्शनसे मानवोंके सात जन्मोंका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। अष्टमी और चतुर्दशी तिथियोंको वहाँ दूधसे शाकल्येश्वरको स्नान कराये और क्रमशः गन्ध-पुष्प आदिके द्वारा विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। तीर्थयात्राका उत्तम फल चाहनेवाले पुरुषोंको वहाँ सुवर्ण दान करना चाहिये। सत्ययुगमें उनका नाम 'भैरवेश्वर' कहा गया है। फिर त्रेतामें 'सावर्णिकेश्वर' हुआ। द्वापर आनेपर उन्हें 'गालवेश्वर' नाम प्राप्त हुआ और अब कलियुगमें उनका चौथा नाम 'शाकल्येश्वर' हुआ है। इस प्रकार उस लिंगके चारों युगोंमें प्रसिद्ध नाम बताये गये। इनका कीर्तन करनेपर ये पापोंका नाश, पुण्यकी वृद्धि तथा संपूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करते हैं। इनका मण्डल सब ओरसे अठारह धनुषका है। वह लिंग उस क्षेत्रमें निवास करनेवाले प्राणियोंके महान् पापोंको भी हर लेता है। वहाँ जो कृमि, कीट, पतंग और पशु-पक्षी हैं, उनको भी वह मोक्ष प्रदान करता है। उस स्थानपर जो कूप आदि हैं, उनमें सरस्वतीजीका जल है। उस लिंगके दर्शनसे मनुष्य सहस्र अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञोंका फल पाता है। जो बुद्धिमान् पुरुष चन्द्रग्रहणके अवसरपर घृतकी आहुति देते हुए वहाँ लिंगके समीप अघोर-मन्त्रका जप करता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है। यहाँ रहनेवाले महापातकी और उपपातकी मनुष्य भी स्वर्गमें जाते और उत्तम सिद्धि पाते हैं। शाकल्येश्वर लिंग 'कामिक' कहा गया है। वह इच्छानुसार फल देनेवाला है।


कलकलेश्वर, उत्तंकेश्वर, वैश्वानरेश्वर तथा गौतमेश्वरकी महिमा

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! शाकल्येश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें साठ धनुष दूर कलकलेश्वर लिंग है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। भिन्न-भिन्न युगोंमें उसके भिन्न-भिन्न नाम माने गये हैं। पहले सत्ययुगमें उसका नाम कामेश्वर था, फिर त्रेतामें पुलहेश्वर, द्वापरमें सिद्धनाथ और कलियुगमें नारदेश्वर हुआ। उसीको कलकलेश्वर भी कहते हैं। जिस समय सरस्वती नदी समुद्रमें मिलनेके लिये आयी, उस समय उसके जलके शब्दसे, महासागरकी गर्जनासे तथा देवता, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारणोंने जो हर्ष-ध्वनि की उसके शब्दसे महान् कलकल नाद हुआ। उस कलकल ध्वनिसे मेरा लिंगमय स्वरूप प्रकट हुआ। इसीलिये उसे कलकलेश्वर कहा गया। द्वापरकी सन्धिमें जब कलियुगका प्रवेश हुआ, उस समय देवर्षि नारदने उस लिंगके समीप उग्र तपस्या की और देवाधिदेव महादेवजीकी प्रसन्नताके लिये पौण्डरीक नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञके पूर्ण होनेपर प्रभासक्षेत्रके निवासी सहस्रों ब्राह्मण दक्षिणाके लिये आये। नारदजीने वहाँ भूमिपर रत्नों और सुवर्णकी वर्षा कर दी। सब ब्राह्मण उसे लेनेके लिये महान् कोलाहल करने लगे। इस कारण भी उस शिवलिंगका नाम कलकलेश्वर हुआ। जो मनुष्य उस शिवलिंगको भक्तिपूर्वक स्नान कराकर उसकी तीन बार प्रदक्षिणा करता है, वह मेरे प्रसादसे निश्चय ही रुद्रलोकमें जाता है। जो मानव वहाँ ब्राह्मणोंको सुवर्णदान करके भक्तिपूर्वक गन्ध, पुष्प और चन्दन आदिसे कलकलेश्वरकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है।