संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| १२५४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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आराधनाका फल मिल जाता है। काम, क्रोध, लोभ, राग और मात्सर्य छोड़कर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए इन्द्रियसंयमपूर्वक एक बार अवश्य कुमारेश्वरका पूजन करना चाहिये।
दैत्यसूदनके स्थानसे वायव्यकोणमें तीस धनुषपर शाकल्यके द्वारा पूजित शाकल्येश्वर नामक लिंग है। राजर्षि शाकल्यने वहाँ बड़ी भारी तपस्या और आराधना करके मुझ महादेवका प्रत्यक्ष दर्शन पाया तथा प्रसन्न हुए मुझ महेश्वरको उस लिंगमें उतारा है। पार्वती! शाकल्येश्वरके दर्शनसे मानवोंके सात जन्मोंका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। अष्टमी और चतुर्दशी तिथियोंको वहाँ दूधसे शाकल्येश्वरको स्नान कराये और क्रमशः गन्ध-पुष्प आदिके द्वारा विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। तीर्थयात्राका उत्तम फल चाहनेवाले पुरुषोंको वहाँ सुवर्ण दान करना चाहिये। सत्ययुगमें उनका नाम 'भैरवेश्वर' कहा गया है। फिर त्रेतामें 'सावर्णिकेश्वर' हुआ। द्वापर आनेपर उन्हें 'गालवेश्वर' नाम प्राप्त हुआ और अब कलियुगमें उनका चौथा नाम 'शाकल्येश्वर' हुआ है। इस प्रकार उस लिंगके चारों युगोंमें प्रसिद्ध नाम बताये गये। इनका कीर्तन करनेपर ये पापोंका नाश, पुण्यकी वृद्धि तथा संपूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करते हैं। इनका मण्डल सब ओरसे अठारह धनुषका है। वह लिंग उस क्षेत्रमें निवास करनेवाले प्राणियोंके महान् पापोंको भी हर लेता है। वहाँ जो कृमि, कीट, पतंग और पशु-पक्षी हैं, उनको भी वह मोक्ष प्रदान करता है। उस स्थानपर जो कूप आदि हैं, उनमें सरस्वतीजीका जल है। उस लिंगके दर्शनसे मनुष्य सहस्र अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञोंका फल पाता है। जो बुद्धिमान् पुरुष चन्द्रग्रहणके अवसरपर घृतकी आहुति देते हुए वहाँ लिंगके समीप अघोर-मन्त्रका जप करता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है। यहाँ रहनेवाले महापातकी और उपपातकी मनुष्य भी स्वर्गमें जाते और उत्तम सिद्धि पाते हैं। शाकल्येश्वर लिंग 'कामिक' कहा गया है। वह इच्छानुसार फल देनेवाला है।
कलकलेश्वर, उत्तंकेश्वर, वैश्वानरेश्वर तथा गौतमेश्वरकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! शाकल्येश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें साठ धनुष दूर कलकलेश्वर लिंग है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। भिन्न-भिन्न युगोंमें उसके भिन्न-भिन्न नाम माने गये हैं। पहले सत्ययुगमें उसका नाम कामेश्वर था, फिर त्रेतामें पुलहेश्वर, द्वापरमें सिद्धनाथ और कलियुगमें नारदेश्वर हुआ। उसीको कलकलेश्वर भी कहते हैं। जिस समय सरस्वती नदी समुद्रमें मिलनेके लिये आयी, उस समय उसके जलके शब्दसे, महासागरकी गर्जनासे तथा देवता, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारणोंने जो हर्ष-ध्वनि की उसके शब्दसे महान् कलकल नाद हुआ। उस कलकल ध्वनिसे मेरा लिंगमय स्वरूप प्रकट हुआ। इसीलिये उसे कलकलेश्वर कहा गया। द्वापरकी सन्धिमें जब कलियुगका प्रवेश हुआ, उस समय देवर्षि नारदने उस लिंगके समीप उग्र तपस्या की और देवाधिदेव महादेवजीकी प्रसन्नताके लिये पौण्डरीक नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञके पूर्ण होनेपर प्रभासक्षेत्रके निवासी सहस्रों ब्राह्मण दक्षिणाके लिये आये। नारदजीने वहाँ भूमिपर रत्नों और सुवर्णकी वर्षा कर दी। सब ब्राह्मण उसे लेनेके लिये महान् कोलाहल करने लगे। इस कारण भी उस शिवलिंगका नाम कलकलेश्वर हुआ। जो मनुष्य उस शिवलिंगको भक्तिपूर्वक स्नान कराकर उसकी तीन बार प्रदक्षिणा करता है, वह मेरे प्रसादसे निश्चय ही रुद्रलोकमें जाता है। जो मानव वहाँ ब्राह्मणोंको सुवर्णदान करके भक्तिपूर्वक गन्ध, पुष्प और चन्दन आदिसे कलकलेश्वरकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है।
* प्रभासखण्ड * १२५५
| कलकलेश्वरके समीप ही नकुलीश तथा दो परम पुण्यमय लिंग हैं। जो मनुष्य भादोंमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको उपवास करके उनके समीप जागरण करता है और नकुलीश तथा उन दोनों लिंगोंकी पृथक्-पृथक् पूजा करता है, वह मुझ महेश्वरके परम धामको जाता है।<br><br>महादेवि ! वहाँसे दक्षिण थोड़ी ही दूरपर उतंककेश्वर लिंग है, जिसे महात्मा उतंकने स्वयं ही भक्तिपूर्वक स्थापित किया है। जो उसका दर्शन, स्पर्श और भक्तिभावसे विधिवत् पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। उस स्थानसे अग्निकोणमें पाँच धनुषकी दूरीपर वैश्वानरेश्वर देव विराजमान हैं। प्राचीन कालमें वहाँ किसी तोतेने मन्दिरके भीतर सुन्दर घोंसला बना रखा था। उसमें अपनी स्त्रीके साथ रहकर उसने दीर्घकालतक तपस्या की। घोंसलेमें आने जानेके कारण वे दोनों दम्पति प्रतिदिन वैश्वानरेश्वरकी परिक्रमा कर लेते थे। दीर्घकालके पश्चात् उन दोनोंकी मृत्यु हो गयी। उसीके प्रभावसे वे दोनों इस पृथ्वीपर अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण रखनेवाले ब्राह्मण-दम्पति हुए। स्त्रीका नाम लोपामुद्रा और पुरुषका नाम अगस्त्य हुआ। उन दोनोंने परम सिद्धि प्राप्त की। अपने पूर्व शरीरके वृत्तान्तको याद करके महात्मा अगस्त्यने कहा है कि 'जो मनुष्य वह्नीश्वरकी | परिक्रमा करके उनका दर्शन करता है, वह निश्चय ही सिद्धिको प्राप्त होता है। जो मानव श्रद्धापूर्वक अग्नीश्वरको घृतसे नहलाकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करता है और श्रेष्ठ ब्राह्मणको सुवर्ण देता है, वह अग्निलोकमें जाकर अनन्त कालतक आनन्द भोगता है।'<br><br>वैश्वानरेश्वरसे पश्चिम सात धनुषकी दूरीपर लकुलीश्वर विराजमान हैं। जो मनुष्य सदा उनका पूजन करता है, विशेषतः कार्तिककी पूर्णिमाको और उत्तरायण आरम्भ होनेके दिन उनकी आराधना करता और बुद्धिमान् ब्राह्मणको विद्यादान देता है, वह सात जन्मोंतक धनाढ्य ब्राह्मणोंके उत्तम कुलमें जन्म ले बुद्धिमान् तथा लक्ष्मीवान् होता है।<br><br>उस स्थानसे पूर्व दिशामें दैत्यसूदनके पश्चिम पाँच धनुषके अन्तरपर गौतमेश्वर लिंग प्रतिष्ठित है, जो संपूर्ण इच्छित फलोंको देनेवाला है। मद्रदेशके राजा शल्यने उसकी आराधना की थी। जो मनुष्य चैत्र शुक्ला चतुर्दशीके दिन गौतमेश्वरको दूधसे स्नान कराता है और चन्दन, जल तथा फूलोंसे विधिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। गौतमेश्वरके दर्शनसे मन, वाणी और क्रिया द्वारा किये हुए सब पाप नष्ट हो जाते हैं। |
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वैष्णवक्षेत्रमें भगवान् दैत्यसूदनकी महिमा
| महादेवजी कहते हैं— महादेवि! गौतमेश्वरके स्थानसे देवेश्वर भगवान् दैत्यसूदनके समीप जाना चाहिये, जो प्रभासक्षेत्रमें निवास करनेवाले सब प्राणियोंके पापोंका नाश करते हैं। भगवान् दैत्यसूदन सबके कार्योंकी सिद्धि करनेवाले हैं। भयंकर भवसागरमें पड़े हुए प्राणियोंको पार उतारनेके लिये वे सुदृढ़ जहाजकी भाँति स्थित हैं। पार्वती ! वटवृक्ष, कल्पवृक्ष, वैदूर्यपर्वत, भगवान् दैत्यसूदन तथा महामुनि मार्कण्डेय—इनका सात कल्पोंतक क्षय अथवा विनाश नहीं होता। | दैत्यसूदनसे बढ़कर दूसरा कोई देवता इस पृथ्वीपर नहीं है। उनका क्षेत्र यवाकार है, वह सब पातकोंका नाश करनेवाला, ऋषि-मुनियोंसे सेवित तथा यक्ष, विद्याधर और नागगणका आश्रय है। उस वैष्णवक्षेत्रकी सीमा इस प्रकार है—पूर्वमें यमेश्वरतक, पश्चिममें सोमेश्वरतक, उत्तरमें विशालाक्षीतक और दक्षिणमें समुद्रतक वह फैला हुआ है। जो मनुष्य इस क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे सब स्वर्गलोकमें जाते हैं। वहाँ जो कुछ दान, होम, जप और तप किया जाता |
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है, वह सात कल्पोंतक अक्षय बना रहता है। जो वहाँ भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये विधिपूर्वक एक ब्राह्मणको भी भोजन करायेगा, उसे एक करोड़ ब्राह्मण-भोजन करानेका फल होगा। जो मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक उपवास करता है, उसे एक ही उपवाससे दस हजार उपवासोंका फल मिलता है। जो मानव कार्तिकमासकी द्वादशीको चक्रतीर्थमें स्नान करके इन्द्रियसंयमपूर्वक उपवास एवं विधिवत् भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।
पार्वतीजीने पूछा— भगवन्! श्रीविष्णुका दैत्य-सूदन नाम किस समय और किस प्रकार हुआ?
महादेवजीने कहा— देवि! भगवान् दैत्यसूदन विष्णुके नाम अनादि और अनन्त हैं। प्रत्येक कल्पमें उनके नये-नये नाम प्रसिद्ध होते हैं। पूर्वकल्पमें उनका नाम श्रियावृत था, दूसरे कल्पमें वामन हुआ, तीसरेमें वे वज्रांग कहलाये, चौथेमें कमलाप्रिय नाम हुआ, पाँचवेंमें दुःखहर्ता, छठेमें पुरुषोत्तम और सातवें कल्पमें वे दैत्यसूदन नामसे प्रसिद्ध हुए।
पूर्वकालमें देवताओं और असुरोंमें बड़ा भारी युद्ध हुआ। उसमें देवकण्टक दानवोंसे पराजित होकर सब देवता क्षीरसागरमें निवास करनेवाले श्रीहरिकी शरणमें गये और प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे।
देवता बोले— देव! जगन्नाथ! आपकी जय हो। आप दैत्यों और असुरोंका मान मर्दन करनेवाले हैं। आपने ही वाराहरूप धारण करके इस पृथ्वीका उद्धार किया था। मत्स्यरूपसे आपने ही समुद्रके जलसे वेदोंका उद्धार किया है। जब क्षीरसागरका मन्थन हो रहा था, उस समय कूर्मरूप धारण करके आपने अपनी पीठपर मन्दराचल उठाया और लक्ष्मीजीका उद्धार किया; आपको नमस्कार है। आप लक्ष्मीपति हैं; लक्ष्मीजीने आपका आश्रय लिया है। देव! आप पीड़ितोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले हैं। आपने वामनरूप धारण करके बलिको बाँधा है और वाराहरूपसे महादैत्य हिरण्याक्षका वध किया है। आपने ही नृसिंहरूपसे हिरण्यकशिपुको आकाशमें धारण करके मारा है। आप ही सम्पूर्ण देवताओंके मूल हैं। प्रभो! महादेव! आपने ही समस्त संसारका उद्धार किया है।
पार्वती! यह स्तोत्र सुनकर कमलनयन भगवान् विष्णुने ब्रह्मा आदि देवताओंसे कहा—‘देवगण! तुम दानवोंका भय छोड़ दो, मैं शीघ्र ही उनका संहार करूँगा?’ यो कहकर श्रीविष्णु देवताओंके साथ वहाँ आये और चक्रद्वारा पृथक्-पृथक् सब दानवोंका संहार आरम्भ किया। यह देख सब दानव भयसे विकल हो भागने लगे। प्रभासक्षेत्रमें आकर उन्होंने समुद्रकी शरण ली। भगवान्ने अपने चक्रसे सब दैत्योंका सफाया कर डाला। उनके मारे जानेपर देवताओं, ब्राह्मणों तथा तपस्वी जनोंका कल्याण हुआ। संसारकी व्याकुलता दूर हुई और सबका चित्त स्वस्थ हुआ। तभीसे भगवान् विष्णुका नाम ‘दैत्यसूदन’ हुआ। उनका दर्शन करके मनुष्य सात जन्मोंतक जड, अन्ध, दरिद्र और दुःखी नहीं होता। श्रवण नक्षत्रमें द्वादशीका योग पुण्यदायक है तथा रोहिणी नक्षत्रमें अष्टमीका संयोग शुभ है। उस समय भगवान् दैत्यसूदनके शयन और उत्थापनका उत्सव होता है। उस अवसरपर दैत्यसूदनके समीप एक-एक उपवासका दस-दस उपवासके बराबर फल होता है। चाण्डाल, श्वपच और पशु-पक्षी भी वहाँ प्राण त्याग करनेपर वैकुण्ठधाममें जाते हैं। कार्तिक और वैशाखमासमें वहाँ श्रद्धापूर्वक एक मासतक उपवास करे। उस समय एक-एक उपवासका कोटि-कोटि उपवासके बराबर फल होता है। विष्णुक्षेत्रका ऐसा ही प्रभाव है। जो वहाँ एक मास या एक पक्षतक दीपदान करता है, उसे कोटिगुने फलकी प्राप्ति होती है। जो आषाढ़ शुक्ला एकादशीको निराहार रहकर भगवान् दैत्यसूदनको पंचामृतसे नहलाकर पूजा करे और नियमपूर्वक उनके समीप रहकर चातुर्मास्य व्यतीत करे, उसके ऊपर भगवान् विष्णु संतुष्ट होते हैं।
* प्रभासखण्ड * १२५७
जो मनुष्य एकादशी तिथिको वहाँ गीत, नृत्य, वाद्य तथा दृश्य-अभिनय आदिके द्वारा रातमें जागरण करता है, वह भगवान् विष्णुके उस परम धाममें जाता है, जहाँसे पुनः इस संसारमें आना नहीं होता। जिनकी निद्रा दैत्यसूदनके समीप जागरणमें बीत जाती है। वे स्वप्नमें भी यममार्ग, यमपुरी, यमदूत तथा असिपत्रवन आदि नरकोंका दर्शन नहीं करते। जो एकादशीको उपवास करके द्वादशीके दिन वहाँ नैवेद्य, तुलसीपत्र भक्षण करता है, उसकी कोटि-कोटि हत्याओंका नाश हो जाता है। पार्वती! सब पातकोंका नाश करनेवाले चक्रतीर्थमें स्नान करके भगवान् दैत्यसूदनकी सेवाके लिये पीले वस्त्र, गौ तथा सुवर्णका दान करना चाहिये।
योगेश्वरी देवीकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! दैत्योंका संहार करनेके पश्चात् भगवान् विष्णुने जहाँ अपने चक्रको धोया, वहीं आठ करोड़ तीर्थोंको लाकर स्थापित किया। उसमें सुदर्शनको शुद्ध करके उन्होंने उस तीर्थका चक्रतीर्थ नाम रख दिया। चक्रतीर्थमें कुल आठ करोड़, असी हजार तीर्थ हैं। जो मानव एकाग्रचित्त होकर वहाँ स्नान करता है, वह सब तीर्थोंमें स्नान करनेका पूरा फल पा लेता है। एकादशीको या विशेषतः चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणके अवसरपर जो उसमें स्नान करता है, वह कोटि यज्ञोंका फल पाता है। पूर्व कल्पमें इसका नाम कोटितीर्थ था। दूसरे कल्पमें श्रीनिधान, तीसरेमें शतधार और चौथेमें चक्रतीर्थके नामसे इसकी प्रसिद्धि हुई। उस वैष्णव क्षेत्रका प्रमाण आधा कोस बताया गया है। उसमें ब्रह्महत्या नहीं प्रवेश कर पाती। उस क्षेत्रमें जाकर जो मासोपवासी, अग्निहोत्री, पतिव्रता स्त्री एवं स्वाध्यायपरायण तथा यज्ञशील मानव चान्द्रायण आदि तप, तिल-जलसे पितरोंका तर्पण, श्राद्ध, एकरात्रव्रत, द्विरात्रव्रत, त्रिरात्रव्रत, कृच्छ्र, सान्तपन, मासोपवास या अन्य कोई पुण्य-कर्म करते हैं, वह अन्य क्षेत्रोंकी अपेक्षा कोटिगुना पुण्यदायक होता है।
चक्रतीर्थसे पूर्व दिशामें महादेवी योगेश्वरीका स्थान है। पूर्वकालमें महिषासुर नामक एक बड़ा भयंकर दैत्य हो गया है। वह इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला था और तीनों लोकोंको अपने वशमें करके सुखसे रहता था। एक समय ब्रह्माजीने एक मनोमयी कन्या उत्पन्न की। वह पृथ्वीपर अप्रतिम सुन्दरी थी। उस रूपवती कन्याने बड़ी घोर तपस्या की। एक दिन देवर्षि नारदजीने उस कन्याको देखा और महिषासुरके समीप गये। महिषासुरने मुनिका बड़ा स्वागत-सत्कार किया और कुशल-मंगल पूछते हुए कहा—'नारदजी! यहाँ पधारनेका क्या कारण है? बताइये।' मुनि बोले—'महादैत्य ! जम्बूद्वीपमें एक अनुपम सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई है। उसके जैसा रूप मैंने स्वर्ग, मर्त्यलोक और पातालमें भी न तो देखा है और न सुना ही है।'
मुनिकी यह बात सुनकर महिषासुर बड़ी भारी सेनाके साथ प्रभासक्षेत्रमें गया, जहाँ वह कन्या तप करती थी। वहाँ उस असुरने उससे इस प्रकार प्रार्थना की—'भीरु ! तुम मेरी स्त्री हो जाओ। यह तपस्या तुम्हारी जवानीके विरुद्ध है।' उसकी बात सुनकर वह तपस्विनी हँस पड़ी। हँसते समय उसके मुखसे सहस्रों भयंकर स्त्रियाँ हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये निकलीं। उन सबने महिषासुरकी सारी सेनाका संहार कर डाला। यह देख वह दैत्य कुपित हो अपने तीखे सींग हिलाता हुआ शीघ्र ही उस देवीके सम्मुख गया। उसके साथ बड़ा
१२५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
भारी युद्ध करके अन्तमें वह महिष पकड़ा गया। देवी सींग पकड़कर उसके ऊपर चढ़ गयी और पैरोंसे दबाकर उसे त्रिशूलसे मार डाला। फिर तलवारसे उसका मस्तक काट लिया। महिषासुरको मारा गया देख इन्द्र आदि देवताओंने प्रसन्नचित्त होकर देवीका स्तवन किया।
देवता बोले— महान् सौभाग्यशालिनी देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम गम्भीर स्वभाववाली हो। तुम्हारी दृष्टि बड़ी भयंकर है। तुम सदा न्यायके पथपर स्थित रहती हो, उत्तम सिद्धोंकी अधीश्वरी हो; तुम्हारे तीन नेत्र हैं और सब ओर मुख हैं। विद्या और अविद्या तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जया (विजयशक्ति) और जपनीय मन्त्रस्वरूपा हो। महिषासुरका मर्दन करनेवाली देवि! तुम सर्वत्र व्यापक, समस्त विद्याओंकी स्वामिनी और विश्वरूपा हो। तुम्हें नमस्कार है। तुम शोकसे परे और ध्रुवस्वरूपा हो। पद्मपत्रके समान विशाल नेत्रोंवाली देवि! तुम शुद्ध सत्त्वगुणोंमें स्थित हो, व्रतपरायण हो; तुम्हीं प्रचण्ड रूप धारण करनेवाली विभावरी (रात्रि) हो, तुम्हें नमस्कार है। ऋद्धि-सिद्धि देनेवाली देवि! तुम कालमृत्यु (प्रलयताण्डव) करनेवाली हो। धृति (धैर्य) तुम्हें विशेष प्रिय है। तुम्हीं शांकरी, ब्राह्मणी और ब्राह्मी हो। सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारे हाथोंमें घण्टा और शूल शोभा पाते हैं। तुम महामहिष दानवका मर्दन करनेवाली हो, तुम्हारा रूप बड़ा भयंकर और नेत्र भयानक हैं। महामाये! तुम अमृतस्वरूपा और कल्याणमयी हो, तुम्हें नमस्कार है। सर्वत्र व्याप्त रहकर सब कुछ देनेवाली देवि! समस्त सात्त्विक वस्तुओंका उदय तुम्हींसे होता है। तुम्हीं विद्या, पुराण और शिल्पकलाकी जननी हो। सब भूतोंको धारण करनेवाली हो। सम्पूर्ण देव-रहस्योंका आश्रय तथा समस्त सत्त्वगुणी प्राणियोंको शरण देनेवाली हो। शुभे! तुम्हीं विद्या-अविद्या, प्रिया तथा अप्रिया हो।
देवताओंके इस प्रकार स्तवन करनेपर देवीने मुसकराते हुए कहा—'उत्तम वर माँगो।'
देवता बोले— देवि! जो श्रेष्ठ मानव यहाँ इस स्तोत्रके द्वारा तुम्हारा स्तवन करें, वे पूर्णकाम हों। इस क्षेत्रमें तुम सदा निवास करो।
'एवमस्तु' कहकर देवीने देवताओं और महर्षियोंको विदा किया और स्वयं वहीं रहने लगीं। जो मनुष्य आश्विन शुक्ला नवमीको उपवास करके भक्ति-भावसे योगेश्वरीदेवीका दर्शन करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है। जो मानव प्रातःकाल उठकर इस स्तोत्रको पढ़ता है, उसे जीवनभर भयका सामना नहीं करना पड़ता। आश्विन शुक्ला अष्टमी यदि मूल नक्षत्रसे युक्त हो तो महाष्टमी मानी गयी है। वह तीनों लोकोंमें अत्यन्त दुर्लभ है। उस दिन जगदम्बाका पूजन करके मनुष्य अपने शत्रुओंपर विजय पाता है।
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आदिनारायणका माहात्म्य
**महादेवजी कहते हैं—**पार्वती! योगेश्वरीसे पूर्व दिशामें आदिनारायण भगवान् विष्णु विराजमान हैं। ये पादुकापर खड़े हैं तथा सब दैत्योंका विनाश करनेवाले हैं। पहले सत्ययुगमें मेघवाहन नामसे प्रसिद्ध एक दैत्य हो गया है; उसे ब्रह्माजीने वरदान दिया था कि 'जब भगवान् विष्णु युद्धभूमिमें तुम्हें पादुकासे मारेंगे, तभी तुम्हारी मृत्यु होगी, अन्यथा नहीं।' इस प्रकार वर पाकर वह दैत्य देवता, असुर और मनुष्योंसहित समस्त भूमण्डलको संताप देने लगा। कोटि युगोंतक सबको नाना प्रकारके कष्ट देकर वह दक्षिण समुद्रके तटपर आया और वहाँ ऋषियोंके आश्रमोंका विध्वंस करने लगा। तब ऋषियोंने उसे अजेय समझकर
- प्रभासखण्ड * १२५९
भगवान् गरुडध्वजका स्तवन किया।
ऋषि बोले— परमकल्याण ! आपको नमस्कार है। आप कल्याणस्वरूप आत्मयोगीको नमस्कार है। आप जनार्दन, श्रीधर और वेधा (सृष्टिकर्ता) हैं। देव! आपको नमस्कार है। कमल-केसरके समान सुवर्णमय मुकुट धारण करनेवाले केशवको नमस्कार है। आप अत्यन्त सूक्ष्म तथा अतिशय महान् शरीरवाले हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। आपकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, आपको नमस्कार है। आप ही श्रीहरि तथा हरिवेधा हैं, आपको नमस्कार है। आप ही सम्पूर्ण जगत्के कारणभूत हिरण्यगर्भ हैं, आपको नमस्कार है। आप अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले तथा उन्नत (सर्वोच्च पदमें स्थित) हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। मायाके परदेसे ढके हुए आप जगदाधार परमात्माको नमस्कार है। संसारसागरसे पार उतारनेवाले प्रभो! आप ज्ञाननौका प्रदान करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है। आपकी बुद्धि कभी कुण्ठित नहीं होती, आप धाता एवं संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आपका वासुदेव नाम सब पातकोंका नाश करनेवाला है, इस सत्यके प्रभावसे यह मेघवाहन दैत्य नष्ट हो जाय। भगवान् विष्णुके भक्तोंमें पाप नहीं ठहरता, भगवान् विष्णु स्मरण करते ही सब पापोंका नाश कर देते हैं—यह सत्य है तो यह पापात्मा मेघवाहन दैत्य नष्ट हो जाय। परमेश्वरके जगदाधार वासुदेव नामका भक्तिपूर्वक स्मरण करनेसे सबका कल्याण हो और समस्त संसारके सभी दोष नष्ट हो जायँ।
ऋषियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर आदिनारायण भगवान् श्रीहरिने पादुकापर आरूढ़ हो उन सबको दर्शन दिया और कहा—'आपलोगोंके मनमें कौन-सा कार्य उपस्थित हुआ है? बताइये, मैं उसे पूर्ण करूँगा। आपके द्वारा की हुई इस स्तुतिसे मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ।'
ऋषि बोले— देव! आप सब कुछ जानते हैं, आपसे कुछ भी छिपा नहीं है। इस महाबली दैत्य मेघवाहनका संहार कीजिये, जिससे सारा विश्व निर्भय हो।
उनके यों कहनेपर भगवान् विष्णुने उस दैत्यको युद्धके लिये ललकारा और अपनी पादुकासे उसकी छातीमें प्रहार किया। उसकी चोट खाकर दैत्यके प्राण-पखेरू उड़ गये और वह समुद्रमें गिर पड़ा। उस श्रेष्ठ दैत्यका वध करके भगवान् विष्णु उसी स्थानपर स्थित हो गये। आज भी वे वहीं पादुकाके आसनपर खड़े हैं। जो श्रेष्ठ मनुष्य एकादशी तिथिको भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाकर स्वर्गमें आनन्दित होता है। जिनके हृदयमें भगवान् आदिनारायण विराजमान हैं, उनके लिये कलियुगमें भी सत्ययुग है।
# पाण्डवेश्वरलिंग तथा ग्यारह रुद्रोंका माहात्म्य
**महादेवजी कहते हैं—** आदिनारायणसे तीन धनुष पश्चिम महानदी सन्निहिता विराज रही है। जब जरासन्धके आक्रमणके भयसे बाल, वृद्ध, वणिग्जन तथा अपने परिजनोंसहित सब यादवोंको साथ ले भगवान् श्रीकृष्ण मथुराको सूनी करके चले, तब प्रभासक्षेत्रमें आये। वहाँ उन्होंने रहनेके लिये समुद्रसे स्थान माँगा। इसी समय सूर्यग्रहण लगा। तब भगवान् जनार्दनने यादवोंसे कहा—'मैं परम पवित्र सन्निहित नामक सरोवरको यहाँ लाऊँगा।' उनके इतना कहते ही धरती फोड़कर शुभ जलका प्रवाह प्रकट हुआ। यह देख बलरामजी तथा साम्ब आदि सभी यादवोंने उसमें ग्रहणस्नान किया। उसमें स्नान करनेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है। वहाँ एक-एक आहुति देनेसे कोटि होमका फल होता है। उस स्थानमें रहकर यदि
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कोई मन्त्रजप करता है तो उसे एक-एक जपका कोटि-कोटिगुना फल मिलता है।
सन्निहिताके दक्षिण तटपर पाण्डवेश्वरलिंग है, जिसकी स्थापना पाँचों पाण्डवोंने की है। वनवासी पाण्डव जब अज्ञातवासमें थे, तब तीर्थयात्राके प्रसंगसे प्रभासक्षेत्रमें आये। उस समय चन्द्रग्रहणका पर्व था। उसी अवसरपर उन सबने सन्निहिताके किनारे पाण्डवेश्वरकी स्थापना की। मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको ऋत्विज् बनाकर उन्होंने वैदिक मन्त्रोंसे मुझ शिवका अभिषेक कराया। ऋषियोंने उस लिंगका माहात्म्य बताते हुए कहा—'जो लोग इस पाण्डव-पूजित लिंगकी अर्चना करेंगे, वे देवता, दानव तथा राक्षसोंके लिये भी पूजनीय होंगे। श्रद्धापूर्वक इसका पूजन करनेसे उन्हें अश्वमेध यज्ञका फल होगा। जो पूरे माघभर सन्निहिता कुण्डमें नहाकर पाण्डवेश्वरकी पूजा करता है, वह साक्षात् पुरुषोत्तम होता है। इस लिंगके दर्शनसे भी पापके सहस्रों टुकड़े हो जाते हैं।'
पार्वती! इस प्रकार श्रद्धापूर्वक यात्रा करके मनुष्य प्रभासक्षेत्रके ग्यारह रुद्रोंके समीप जाय। मनुष्योंसे जो ग्यारह इन्द्रियोंद्वारा ग्यारह प्रकारके पाप बन जाते हैं, उन सबका यहाँ ग्यारह रुद्रोंके पूजनसे नाश हो जाता है। संक्रान्ति, अयन, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा अन्यान्य पुण्य तिथियोंमें भक्तिभावसे क्रमशः ग्यारह रुद्रोंका पूजन करना चाहिये। कलिमें इन ग्यारह रुद्रोंके नाम इस प्रकार हैं— भूतेश, नीलरुद्र, कपाली, वृषवाहन, त्र्यम्बक, घोरनामा, महाकाल, भैरव, मृत्युंजय, कामेश और योगेश। पार्वती! ये जो ग्यारह रुद्र बताये गये हैं, इनका रहस्य सुनो। इनमें दस तो दस प्राणवायु हैं और एक आत्मा है। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय—ये ही दस प्राणवायु कहे गये हैं।
रुद्रोंमें आदिदेव सोमेश्वर भी हैं, उनकी भूतेश्वर नामसे विधिवत् पूजा करनी चाहिये। उन्हें पंचामृतसे स्नान कराकर 'सद्योजात' मन्त्रसे मनोहर पुष्पोंद्वारा पूजन करना चाहिये। भक्तिपूर्वक सदाशिवका ध्यान करते हुए तीन बार प्रदक्षिणा और साष्टांग प्रणाम करे। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त जो पचीस भूतगण बताये गये हैं, उन सबके ईश्वर होनेसे इन शिवको 'भूतेश्वर' कहते हैं। भूतेश्वरका पूजन करके मनुष्य अविनाशी मोक्षको प्राप्त होता है।
भूतेश्वरसे उत्तरभागमें सोलह धनुषपर द्वितीय रुद्र नीलरुद्रके नामसे प्रसिद्ध हैं। उनको विधिपूर्वक स्नान कराकर ईश-मन्त्रद्वारा पूजा करे। कुमुद, उत्पल और कह्लार (लाल कमल) चढ़ाये। प्रदक्षिणा और नमस्कार करे। यों करनेसे मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है। पूर्वकालमें नीले अंजनके समान रंगवाला अन्धकासुर उनके द्वारा मारा गया था, इसलिये वे नीलरुद्र कहलाये।
नीलरुद्रसे पूर्व और बुधेश्वरसे पश्चिम सात धनुष दूर कपालेश्वर विराजमान हैं। 'तत्पुरुष' मन्त्रद्वारा उनकी पूजा करे। उनके दर्शनसे जन्मभरका पाप नष्ट हो जाता है।
बालरूपधारी ब्रह्माजीसे उत्तर तीन धनुषपर वृषभेश्वर नामक चौथे रुद्र हैं। वे आदिलिंग हैं। पुण्यहीन मनुष्य उनको नहीं जानता। जो उन वृषभवाहन शिवका पूजन करता है, वह सात जन्मोंके पातकोंसे मुक्त हो जाता है। उनके चारों ओर तीस-तीस धनुषतक उन्हींका क्षेत्र है। जो उस तीर्थमें स्नान, जप, बलि, होम, पूजा, स्तोत्रपाठ आदि करता है, उसका वह सब कर्म अक्षय हो जाता है। जो एक रात उपवास करके ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक वृषभेश्वरदेवके समीप जागरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो वहाँ भाँति-भाँतिके भोज्य पदार्थोंसे ब्राह्मणोंको तृप्त करता है, उसे एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर कोटि ब्राह्मणोंके भोजन करानेका फल होता है। भैरव, केदार, पुष्कर, कुरुजांगल, कुरुक्षेत्र, काशी, महाकाल और नैमिष—ये आठ तीर्थ वृषभेश्वरलिंगमें प्रतिष्ठित हैं। जो माघकृष्णा चतुर्दशीकी रात्रिमें वहाँ जागता है, वह विधिपूर्वक उस लिंगकी
- प्रभासखण्ड * १२६१
पूजा करके उक्त आठों तीर्थोंके सेवनका फल पाता है। जो मनुष्य अमावास्याको वहाँ रुद्रके समीप पिण्डदान करता है, उसके पितर ब्रह्माजीके दिन (एक कल्प)-तक तृप्त रहते हैं। दही, दूध, घी, पंचगव्य, कुशोदक, कुंकुम, अगुरु तथा कपूर—इन सबको अघोरमन्त्रसे अभिमन्त्रित करके रातमें इनके द्वारा मेरा ध्यान करते हुए वृषभेश्वरका पूजन करे। यों करनेसे मनुष्य पाँच महापातकोंसे मुक्त हो जाता है। यदि उन्हें दूधसे नहलाये तो पूर्वजन्म और इस जन्मके पापका नाश हो जाता है। जो मनुष्य पंचगव्यसे वृषभेश्वरको स्नान कराता है, वह अपने सब पातकोंको जला देता है। उस लिंगकी पूजाके लिये उद्यत होते ही मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है। जो मानव पूरे कार्तिकभर ब्रह्मेश्वर महालिंगका पूजन करता है, उसे सब प्रकारके पातकोंसे छुटकारा मिल जाता है। इस प्रकार वृषभेश्वर शिवका देवपूजित माहात्म्य बताया गया।
वहाँसे अविनाशी त्र्यम्बकेश्वरलिंगके समीप जाय। त्र्यम्बकेश्वरजी पाँचवें रुद्र माने गये हैं। इनका स्थान कपिलेश्वर लिंगसे ईशानकोणमें सोलह धनुषकी दूरीपर है। ये सबके ऊपर दया करनेवाले तथा सब वांछित फलोंको देनेवाले हैं। इनके दर्शनसे भी पातकोंके सहस्रों टुकड़े हो जाते हैं। जो भक्तिभावसे कामदेव मन्त्रद्वारा इनका विधिवत् पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो चैत्र शुक्ला चतुर्दशीकी रातमें वहाँ जागरण करता है और पूजा, स्तुति एवं कथा-वार्तामें समय बिताता है, वह मनोवांछित फल पाता है।
इसके बाद छठे रुद्र अघोरेश्वरलिंगके समीप जाय। इनका स्थान त्र्यम्बकेश्वरसे वायव्यकोणमें पाँच धनुषके अन्तरपर है। ये सम्पूर्ण अभीष्टफलोंके दाता तथा कलियुगके पापोंका नाश करनेवाले हैं। जो मानव स्नान-पूजन आदिके क्रममें इनकी आराधना करता है, उसे सुवर्णमय मेरुगिरिके दानका फल प्राप्त होता है। अघोरेश्वरदेवके लिये जो कुछ दिया जाता है, वह सब अक्षय होता है। जो मनुष्य अघोरेश्वरके दक्षिण भागमें श्राद्ध करता है, उसके पितर कल्पपर्यन्त तृप्त रहते हैं।
अघोरेश्वरसे उत्तर कुछ-कुछ वायव्यकोणकी ओर तीस धनुषकी दूरीपर महाकालेश्वरका स्थान है। वह लिंग सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसके भीतर मैं कालरूपसे प्रतिष्ठित हूँ। वह कल्पपर्यन्त स्थिर रहनेवाला और मेरा विशेष प्रिय है। जो षडक्षर मन्त्रद्वारा उसकी पूजा करता है, वह उसी क्षण मृत्युको जीत लेता है। जो कृष्णपक्षकी अष्टमीमें रातके समय विधिपूर्वक पूजा करके घृतमिश्रित गुग्गुलका धूप देता है, उसके सहस्रों अपराध भैरवजी क्षमा कर देते हैं। महर्षिलोग उस स्थानपर गोदानकी महिमा बतलाते हैं। वहाँ गोदान करनेवाले पुरुष अपने आगे-पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देते हैं। जो महाकालेश्वरके दक्षिणभागमें रुद्रियका जप करता है, वह मातृकुल और पितृकुल दोनोंको तारता है।
महाकालेश्वरसे अग्निकोणमें बीस धनुष दूर भैरवेश्वरका स्थान है। भैरवेश्वरलिंग सब वांछित फलोंका देनेवाला तथा दरिद्रताका नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें चण्ड नामक मेरे पार्षदने एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक उसकी आराधना की थी, इससे उसका नाम चण्डेश्वर हुआ। जो एकाग्रचित्त हो देवाधिदेव चण्डेश्वरका दर्शन और स्पर्श करता है, वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। भाद्रपदमासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथिको उपवास करके जो भैरवेश्वरके समीप जागरण करता है, वह मेरे परम धामको जाता है। भैरवेश्वरके दर्शनसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यात्राके उत्तम फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको अपने सब पापोंका नाश करनेके लिये वहाँ तिल, सुवर्ण और वस्त्रका दान करना चाहिये। कल्पके अन्तमें वे रुद्रदेव भैरव (भयानक)
१२६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
आकार धारण करके सम्पूर्ण विश्वका संहार करते हैं, इसलिये भैरव कहलाते हैं।
भैरवेश्वरसे अग्निकोणमें दस धनुषकी दूरीपर मृत्युंजयेश्वरलिंग स्थित है। सागरादित्यसे पश्चिम चार धनुषपर वह स्थान है। वह लिंग दर्शन और स्पर्श करनेपर सब प्राणियोंके पापोंका नाश करनेवाला है। मेरे पार्षद नन्दीने उस महालिंगकी स्थापना करके नित्य पूजनमें तत्पर हो लाख करोड़ महामृत्युंजयका जप किया है। इससे प्रसन्न होकर मैंने उसे अपने गणोंका आधिपत्य और सामीप्य मुक्ति प्रदान की है। मृत्युंजयमन्त्रसे प्रसन्न होकर वहाँ मेरे स्वरूपभूत रुद्र प्रकट हुए, इसलिये उनका नाम मृत्युंजयेश्वर हुआ। जो मनुष्य भक्तिभावसे मृत्युंजयेश्वरका पूजन अथवा दर्शन करता है, उसके सात जन्मोंका पाप वे नष्ट कर देते हैं।
मृत्युंजयेश्वरसे उत्तर दिशामें तीन धनुषपर कामेश्वरलिंग स्थित है, जिसके दर्शन और पूजनसे सात जन्मोंका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है और सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है। जो मानव कामेश्वरलिंगका पूजन करेंगे, वे उत्तम गतिको प्राप्त होंगे। इस लिंगके प्रसादसे उनके सब मनोरथोंकी सिद्धि होगी। जो चैत्र शुक्ला त्रयोदशीको कामेश्वरजीका पूजन करता है, वह मनुष्योंमें पुत्र और सौभाग्यसे सम्पन्न एवं पूर्णकाम होता है।
कामेश्वरसे वायव्यकोणमें सात धनुष दूर योगेश्वरलिंग है। वहाँ मेरे असंख्य पार्षदोंने योगनिष्ठ होकर सहस्रों वर्षोंतक घोर तपस्या की थी। तब मैंने प्रसन्न होकर उन्हें सालोक्य मुक्ति प्रदान की थी। उनके षडंगयोगसे सन्तुष्ट होकर शिवलिंगका प्रादुर्भाव हुआ था। इसलिये उसका नाम योगेश्वर हुआ। जो मानव विधिपूर्वक भक्तिभावसे उसकी पूजा करता है, उसे योगसिद्धि प्राप्त होती है। जो प्रभासक्षेत्रमें स्थित इन ग्यारह रुद्रोंको नहीं जानता, वह उस क्षेत्रके बीचमें रहकर भी नहींके समान है। उसे पशु माना गया है। इन ग्यारह रुद्रोंमेंसे सबका अथवा एकमात्र सोमेश्वरका पूजन करके जो शतरुद्रियका जप करता है, उसे सब रुद्रोंके पूजनका फल प्राप्त हो जाता है। पार्वती! ग्यारह रुद्रोंका यह गुप्त माहात्म्य तुम्हें बताया गया।
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चन्द्रेश्वर, चक्रपाणि, दण्डपाणि तथा साम्बादित्यकी महिमा
**महादेवजी कहते हैं—**सोमेश्वरसे वायव्यकोणमें साठ धनुषकी दूरीपर चन्द्रेश्वरलिंग है। वह दिव्य लिंग सब पातकोंका नाश करनेवाला है। चन्द्रेश्वरका दर्शन करके मनुष्य सात जन्मोंके समस्त पापोंसे मुक्त एवं कृतकृत्य हो जाता है। प्राचीन कालमें यह पृथ्वी दैत्योंके भारसे पीड़ित हो गौका रूप धारण करके प्रभासक्षेत्रमें आयी और उसने भक्तिभावसे उत्तम शिवलिंगकी स्थापना की। इससे मैं प्रसन्न हुआ और उससे बोला—'भूदेवी! भगवान् विष्णुके हाथसे मारे जाकर सब दैत्य नष्ट हो जायेंगे और तुम्हारा भार उतर जायगा। तुमने जो यह परम सुन्दर शिवलिंग स्थापित किया है, यह संसारमें धरित्रीश्वरके नामसे विख्यात होगा। मैं इस लिंगमें सदैव निवास करूँगा। भादोंके कृष्णपक्षकी तृतीयाको जो मनुष्य इस शिवलिंगका पूजन करेगा, वह निश्चय ही अश्वमेध यज्ञका फल पायेगा। केवल इस लिंगके पूजनसे सब तीर्थोंमें स्नानका और सब प्रकारके दानोंका फल मिल जायगा। इसके चारों ओर सोलह धनुषतक इसीका क्षेत्र होगा और यह क्षेत्र समस्त प्राणियोंको मोक्ष प्रदान करेगा। इस क्षेत्रमें मरनेवाले प्राणी उत्तम गतिको प्राप्त होंगे।'
यों कहकर मैं वहाँसे अन्तर्धान हो गया। तदनन्तर वाराहकल्पमें किसी समय दक्षके शापसे चन्द्रमा राजयक्ष्मासे पीड़ित हो क्षीण होने लगे। तब वे समुद्रके निकट प्रभासक्षेत्रमें आये और इस पृथ्वीश्वरलिंगका दर्शन करके इसके प्रभावको
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जानकर इसीकी आराधनामें तत्पर हो गये। इसके माहात्म्यसे चन्द्रमाका पापजनित रोग दूर हुआ। तबसे इसका नाम 'चन्द्रेश्वर' हो गया।
तदनन्तर जहाँ चक्रधर विष्णु तथा दण्डपाणि गणेश दोनों एक स्थानपर स्थित हैं, वहाँकी यात्रा करे। जो मानव भक्तिभावसे क्रमशः उन दोनोंका पूजन करता है, वह पापसे मुक्त हो मेरे लोकमें जाता है। जो माघमासकी चतुर्दशी और कृष्णपक्षकी अष्टमीको गन्ध, पुष्प, धूप आदि उपचारोंसे दण्डनायककी पूजा करता है, उसे कभी विघ्न नहीं प्राप्त होता। जो एकादशी तिथिको निराहार रहकर चक्रपाणिका पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है।
इस प्रकार यहाँ संक्षेपसे चक्रपाणि और दण्डपाणिका माहात्म्य बताया गया।
इन दोनोंके उत्तर और बालरूपधारी ब्रह्मासे वायव्यकोणमें साम्बके द्वारा स्थापित देवश्रेष्ठ साम्बादित्यका स्थान है। प्रभासक्षेत्रमें जो साम्बनामक पुर है, वही सूर्यनारायणका द्वितीय स्थान है। वहाँ भगवान् सूर्य बारह स्वरूपोंमें विभक्त हो सदा सबके कल्याणके लिये निवास करते हैं और भक्तोंद्वारा दी हुई पूजाको ग्रहण करते हैं। जो मनुष्य वहाँ बारह नामोंवाले सूर्यदेवकी स्तुति करेगा, उसकी सात जन्मोंकी दरिद्रता नष्ट हो जायगी। आदित्य, सविता, सूर्य, मिहिर, अर्क, प्रतापन, मार्तण्ड, भास्कर, भानु, चित्रभानु, दिवाकर तथा रवि—ये सूर्यदेवके सामान्य नाम हैं। विष्णु, धाता, भग, पूषा, मैत्र, इन्द्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, अंशुमान्, त्वष्टा तथा पर्जन्य—ये बारह स्वरूपोंके विशेष नाम हैं। ये सभी क्रमशः बारह महीनोंमें सूर्यमण्डलमें तपते हैं। चैत्रमें विष्णु, वैशाखमें अर्यमा, ज्येष्ठमें विवस्वान्, आषाढ़में अंशुमान्, श्रावणमें पर्जन्य, भाद्रपदमें वरुण, आश्विनमें इन्द्र, कार्तिकमें धाता, अगहनमें मित्र, पौषमें पूषा, माघमें भग और फाल्गुनमें त्वष्टा तपते हैं। इस प्रकार प्रभासक्षेत्रमें द्वादश मूर्तिवाले सूर्यदेव विराजमान हैं। माघशुक्ला पंचमीको एकभक्तव्रत, षष्ठीको नक्तव्रत और सप्तमीको साम्बादित्यके समीप उपवास-व्रत करके व्रती मनुष्य लाल-चन्दन मिश्रित कनेरके फूलोंसे सूर्यनारायणके लिये अर्घ्य और धूप देकर पूजा करे। शक्तिके अनुसार ब्राह्मण-भोजन भी कराये। जो इस प्रकार साम्बादित्यका पूजन करता है, वह उस लोकमें समस्त मनोवांछित फलोंको पा लेता है।
बालरूपधारी ब्रह्माकी महिमा, ब्रह्माजीकी आयुका मान तथा त्रिदेवोंकी एकता
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! साम्बादित्यसे उत्तर दिशामें कपालेश्वर विराजमान हैं। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है और पूर्वजन्मके पातकोंसे मुक्त हो जाता है।
उससे उत्तर कोटीश्वरलिंग है, जो सबके पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ कोटि ऋषियोंने सिद्धि प्राप्त की है, इसलिये उनका नाम कोटीश्वर है। जो मानव भक्तिभावसे कोटीश्वरका पूजन करता है, उसे एक करोड़ मन्त्र-जपका फल प्राप्त होता है। कोटीश्वरके निकट वेदवेत्ता ब्राह्मणको सुवर्ण देना चाहिये।
सोमेश्वर, दैत्यसूदन, बालरूपधारी ब्रह्मा, अर्कस्थल, सूर्य तथा शशिभूषण—ये छः प्रभासक्षेत्रके श्रेष्ठ देवता हैं। इनके दर्शनमात्रसे मनुष्य कृतार्थ हो जाता है और जन्मसे लेकर मृत्युतकके भयंकर पापोंसे छूट जाता है।
पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! अन्य सब स्थानोंमें तो वृद्धरूपी ब्रह्मा हैं, यहाँ वे बालरूपी कैसे हुए?
महादेवजीने कहा—देवि! मनुष्य इस संसारमें
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तभीतक दुःख, शोक और भयके समुद्रमें डूबे रहते हैं, जबतक कि ब्रह्माजीके प्रति उनकी भक्ति नहीं होती। जीवका चित्त जैसे विषयोंमें लगा है, यदि उसी प्रकार ब्रह्माजीमें भी लग जाय, तो कौन बन्धनसे मुक्त न होगा। सोमनाथसे ईशानकोणमें और साम्बादित्यसे अग्निकोणमें ब्रह्माजीका उत्तम स्थान है। वहाँ बालरूपधारी ब्रह्माजी विराजमान हैं। जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, सब लोकोंके स्रष्टा और महान् तेजस्वी हैं, वे ही इस प्रभासक्षेत्रमें आठ वर्षकी आयुमें आये हैं। उन्होंने ही सोमनाथ-लिंगकी स्थापना करके ब्राह्मणोंको बहुत-सी दक्षिणा दी। प्रभासक्षेत्रमें रहते हुए बालरूपधारी ब्रह्माजीके बयालीस वर्ष बीत गये हैं। इस प्रकार उनकी आयुका एक परार्ध व्यतीत हो गया।
पार्वतीजीने कहा— प्रभो! ब्रह्माजीके दिन, मास और वर्षका परिमाण बताइये।
महादेवजीने कहा— देवि! ब्रह्माजीकी जो परम आयु है, उसका एक परार्ध बीत गया है। अब दूसरा परार्ध चल रहा है। आठ वर्षकी आयुमें यहाँ आये थे, इसीलिये उन्हें बालरूपी कहते हैं। प्रभासक्षेत्रको छोड़कर अन्य सब तीर्थोंमें वे वृद्धरूपी ही हैं। प्रथम कल्पमें इनका नाम स्वयम्भू था। दूसरेमें पद्मभू, तीसरेमें विश्वकर्ता और चौथेमें बालरूपी कहे गये हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन इन नामोंको स्मरण करता है, वह दीर्घायु होता है। चन्द्र, सूर्य आदि सभी ग्रह, देवता, असुर, दानव तथा समस्त त्रिलोकी—ये सब ब्रह्माजीकी रात आनेपर नष्ट हो जाते हैं। फिर दिन आनेपर जब ब्रह्माजी जगते हैं, तब पूर्ववत् सृष्टि करने लगते हैं।
पलक गिरनेमें जितना समय लगता है, उसके एक चौथाई भागको त्रुटि कहते हैं। दो त्रुटिका एक निमेष होता है। पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है। तीस काष्ठाओंकी एक कला, तीस कलाओंका मुहूर्त और पंद्रह मुहूर्तोंका एक दिन होता है। दिनके बराबर ही रातका भी मान है। दिन तथा रात दोनोंको एक 'अहोरात्र' कहते हैं। पंद्रह दिन-रातोंका पक्ष और दो पक्षोंका मास होता है। छः मासोंका एक अयन और दो अयनोंका एक वर्ष होता है। तैंतालीस लाख बीस हजार सौर वर्षोंका एक चतुर्युग होता है। इकहत्तर चतुर्युगोंका मन्वन्तर कहा गया है। यही संक्षेपसे इन्द्र देवताकी आयु बतायी गयी है। ब्रह्माजीके एक दिनमें चौदह मनु और चौदह इन्द्र नष्ट होते हैं। विश्ववक्ता, विपश्चित्, स्वचिति, शिवि, विभु, मनोभुव, ओजस्वी, बलि, अद्भुत, शान्ति, वृषा, शतधामा, दिवस्पति, शुचि—ये चौदह इन्द्र हैं। ब्रह्माजीका दिन जितना बड़ा होता है, उनकी रात भी उतनी ही होती है। यह कल्पका मान बताया गया। पहला श्वेत कल्प है। दूसरे कल्पका नाम नीललोहित, तीसरेका वामदेव, चौथेका रथन्तर, पाँचवेंका रौरव, छठेका प्राण, सातवेंका बृहत्कल्प, आठवेंका कन्दर्प, नवेंका सद्यःकल्प, दसवेंका ईशान, ग्यारहवेंका ध्यान, बारहवेंका शाश्वत, तेरहवेंका उदान, चौदहवेंका गरुड, पंद्रहवेंका कूर्म, सोलहवेंका नारसिंह, सत्रहवेंका समाधि, अठारहवेंका आत्रेय, उन्नीसवेंका सोम, बीसवेंका भावन, इक्कीसवेंका तत्पुरुष, बाइसवेंका वैकुण्ठ, तेइसवेंका अर्चित, चौबीसवेंका रुद्र, पचीसवेंका लक्ष्मी, छब्बीसवेंका सारस्वत, सत्ताईसवेंका वैराज, अट्ठाइसवेंका गौरी-कल्प, उन्तीसवेंका माहेश्वरकल्प और तीसवेंका नाम पितृकल्प है। यही ब्रह्माजीकी अमावास्या है। ब्रह्माजीके महीनेके ये तीस कल्प बताये गये। व्यतीत हुए सभी कल्पोंके नाम बताये जा चुके हैं। इस समय वाराहकल्प चल रहा है। यही ब्रह्माजीकी प्रतिपदा है, जिसमें भगवान् वाराहने रसातलसे पृथ्वीका उद्धार किया। तीस कल्पोंका ब्रह्माजीका एक मास माना गया है। ऐसे बारह मासोंका एक वर्ष होता है। ऐसे वर्षमानसे जब ब्रह्माजी आठ वर्षके थे, तब सोमदेव उन्हें प्रभासक्षेत्रमें ले आये और उन्हींके द्वारा सोमनाथकी प्रतिष्ठाका कार्य सम्पन्न हुआ। इस प्रकार प्रभासक्षेत्रमें
* प्रभासखण्ड * १२६५
निवास करते हुए ब्रह्माजीका एक परार्ध व्यतीत हो गया और अब दूसरा चल रहा है। इस तरह बचपनसे ही उनका इस क्षेत्रमें निवास होता है। मनीषी पुरुषोंके द्वारा वे बारंबार वन्दनीय हैं। यात्राका उत्तम फल चाहनेवाले पुरुषोंको पहले उन्हींकी पूजा करनी चाहिये। जो भक्तिपूर्वक ब्रह्माजीकी पूजा करता है, वह निश्चय ही मेरा पूजन करता है। जो उनसे द्वेष करता है, वह मुझीसे द्वेष करता है और जो उनका पुजारी है, वह मेरा ही पूजक है। ब्रह्माजीकी पूजा करनेवाले पुरुषोंके द्वारा मैं और भगवान् विष्णु दोनों ही पूजित होते हैं। विष्णु सत्त्वगुणी हैं, ब्रह्माजी रजोगुणी हैं और मैं तमोगुणसे युक्त हूँ। ब्रह्माजी वायु, रुद्रदेव अग्नि तथा भगवान् विष्णु जलरूप हैं। मैं सामवेदका आश्रय हूँ। ब्रह्माजी ऋग्वेद धारण करते हैं तथा भगवान् विष्णु यजुर्वेदके स्वरूप एवं अथर्वकी कलाके आधार हैं। मुझे दक्षिणाग्नि, विष्णुको गार्हपत्याग्नि तथा ब्रह्माजीको आहवनीयाग्नि जानना चाहिये। ब्रह्माजी नाभिमें, विष्णु हृदयमें तथा सब भूतोंका आधारभूत मैं चक्र (मूलाधारसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रतक)-में स्थित हूँ। हम लोगोंके रूपमें शक्तिविशेषसे साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही स्थित हैं। ॐकार परब्रह्म है और गायत्री उत्तम प्रकृति है। इन दोनोंको जानकर मनुष्य पुरुषयोनिसे वियुक्त नहीं होता। पार्वती! इस प्रकार जो द्वैतरहित परब्रह्मको जानता है, वह सब कुछ जानता है। जो भेददर्शी है, वह नहीं जानता। परब्रह्म तो वास्तवमें एकरूप ही है, तथापि कार्यरूपसे वह पृथक्-सा प्रतीत होता है। जो उससे द्वेष करता है, वह ब्रह्मद्वेषी कहलाता है। मेरे दाहिने अंगमें ब्रह्मा और बायें अंगमें विष्णु विराजमान हैं; जो इन दोनोंसे द्वेष करता है, वह मेरा ही द्वेषी है। सुन्दरि! ऐसा जानकर मनमें भेदभाव न रखते हुए ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रकी एकरूपसे ही पूजा करनी चाहिये।
ब्राह्मणोंकी महिमा, क्षेत्रवासी ब्राह्मणोंके भेद
महादेवजी कहते हैं—देवि! पृथ्वीपर जो ब्राह्मण हैं, वे मेरे प्रत्यक्ष स्वरूप हैं। स्वर्गके देवता तो परोक्ष हैं, ब्राह्मण ही प्रत्यक्ष देवता हैं। ब्राह्मण मुझे प्रिय हैं। जो भक्तिभावसे उनकी पूजा करता है, वह सदा मेरी ही पूजा करता है। जो भक्तिद्वारा उन्हें संतुष्ट करता है, वह मुझे संतुष्ट कर लेता है। जो ब्राह्मण हैं, वह मैं हूँ। उनके साथ जिसका वैर है, वह मेरा भी वैरी है। प्रिये! पृथ्वीपर जितने भी ब्राह्मण हैं, उनमेंसे जिन्होंने वेदव्रतका पालन किया है, वे तो पूज्य हैं ही; जिन्होंने वेदोक्त व्रतोंका पालन नहीं किया है, वे भी पूजनीय हैं। ब्राह्मण जातिसे ही पवित्र हैं, वेदाभ्याससे उनकी पवित्रता और भी बढ़ जाती है। अतः हव्य और कव्य (यज्ञ और श्राद्ध)-में कहीं भी ब्राह्मण निन्दाके योग्य नहीं हैं। काने, कुबड़े, कोढ़ी, रोगी तथा दरिद्र ब्राह्मणोंका भी विद्वान् पुरुष अपमान न करे; क्योंकि वे मेरे स्वरूप कहे गये हैं। बहुत-से अज्ञानी मनुष्य इस बातको नहीं जानते। जो मेरे स्वरूपभूत ब्राह्मणोंको मारते हैं, उनसे शास्त्रविपरीत कर्म करवाते हैं, जहाँ नहीं भेजना चाहिये, वहाँ उन्हें भेजते हैं तथा उनसे दासता (सेवा-टहल) कराते हैं, वे जब मरते हैं, तब यमदूत उनके माथेपर आरा रखकर उससे उन्हें चीरते हैं—ठीक वैसे ही, जैसे बढ़ई लकड़ी चीरते हैं। जो ब्राह्मणको अंगभंग करता और उनके प्राण लेता है, उसे ब्रह्महत्यारा जानना चाहिये; उसके उद्धारके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है। वह पचास करोड़ नरकोंमेंसे प्रत्येकमें क्रमशः सहस्रों वर्षोंतक बहुत पीड़ित किया जाता है। इसलिये मानवोंको चाहिये कि वे ब्राह्मणोंको
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सदा नमस्कार करें, अन्न-पान देकर सदैव उनकी पूजामें संलग्न रहें। सभी ब्राह्मण सब प्रकारके दान लेनेके अधिकारी हैं। दूसरा कोई दान लेनेमें समर्थ नहीं है। यदि लोभवश कोई दान ग्रहण करता है तो वह अधम गतिको प्राप्त होता है। तपस्यासे पवित्र हुआ ब्राह्मण पापरहित होता है। अतः प्रतिग्रह लेकर वह कष्टमें नहीं पड़ता और न उसे कोई पाप लगता है। जो हृदयमें सदा पवित्रभाव रखते हुए नित्य-निरन्तर ध्यानमें लगा रहता है, उस ब्राह्मणको दोषका सम्पर्क नहीं प्राप्त होता। ब्राह्मण जन्मसे ही महान् है। लोक और लोकेश्वर भी ब्राह्मणोंके पूजक हैं। ब्राह्मण यदि कुपित हों तो अपराधीको नष्ट कर सकते हैं, उसे अपने तेजसे जला सकते हैं। ये ही स्वर्गलोकमें पहुँचानेवाले सनातन देवदेव हैं। ब्राह्मण पूजनीय हैं, वन्दनीय हैं; उन्हींमें सब कुछ प्रतिष्ठित है। वे ही इन सब लोकोंका परस्पर पालन करते हैं। अपने स्वाध्याय और तपको प्रकट न करनेवाले ब्राह्मण उत्तम व्रतवाले हैं। जो विद्या और व्रतमें स्नात हैं, दूसरेके आश्रित न रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं, वे ब्राह्मण कुपित होनेपर कालसर्प बन जाते हैं; अतः उनका पूजन करना चाहिये, उन्हें कुपित नहीं करना चाहिये। अध्यात्मस्वरूपका चिन्तन करनेवाले ब्राह्मण ही सब प्राणियोंकी गति हैं। ब्राह्मण यदि विपत्तिमें पड़ा हो तो उसकी सब उपायोंसे रक्षा करे। ये ब्राह्मण मनुष्योंद्वारा सर्वत्र पूजा पाने योग्य हैं। फिर जो अपने चित्तको संयममें रखनेवाले तथा विशेषतः पुण्यक्षेत्रके निवासी हैं, उनके विषयमें तो कहना ही क्या है। जो द्विज विधिपूर्वक क्षेत्र-संन्यास तथा वृत्तिभेदके क्रम जानते हैं, वे क्षेत्रके पूर्ण फलके भागी होते हैं। प्राजापत्य, महीपाल, कपोत, ग्रन्थिक, कुटिक, वेताल, पद्म, हंस, धृतराष्ट्र, वक, कंक, गोपाल, त्रुटिक, प्रवर, गुटिक तथा दण्डिक—ये क्षेत्रवासी ब्राह्मणोंके भेद हैं।
अहिंसा, गुरु-शुश्रूषा, स्वाध्याय, शौच, संयम, सत्य तथा अस्तेय (चोरीका अभाव)—यह प्राजापत्योंका व्रत कहा गया है। शान्ति-पुष्टि आदि कर्मोंद्वारा जो इस मही (पृथ्वी)-का पालन करते हैं, वे महीपाल हैं। जो धरतीपर गिरे हुए अन्नके दानोंको कपोतकी भाँति चुनते हैं और इस तरह उञ्छवृत्तिसे जीविका चलाते हैं, वे साधु पुरुष कपोत कहलाते हैं। जो घर बनाकर रहते हैं, वे सद्ग्रन्थ या ग्रन्थिक हैं। जो सहसा घर त्याग देते हैं, वे शिवाराधनमें तत्पर रहनेवाले साधक कुटिक कहे गये हैं। जिनका तीर्थसेवनमें अनुराग है तथा जो पत्नीके साथ रहते हुए जो कुछ मिल जाय उसीपर संतोष करते हैं, वे महान् साहस (धैर्य)-से युक्त साधक वेताल कहलाते हैं। जो इन्द्रियोंको संयममें रखते हैं, परंतु कामनाओंमें आसक्त हैं, राज्य और धनकी इच्छासे साधनरत हो रहे हैं, वे 'पद्म' कहलाते हैं और सदा भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करते हैं। जो ज्ञानयोगसे युक्त हैं, जिनके केवल व्यवहारमें ही द्वैत है, वे साधक 'हंस' कहे गये हैं। जिन्होंने ब्रह्मचर्य, सत्त्वगुण तथा निर्लोभता आदि गुणोंसे सम्पूर्ण जगत्को जीत लिया है और जो सबका धारण-पोषण करते हैं, वे 'धृतराष्ट्र' माने गये हैं। जो सदा एकमात्र स्वार्थमें ही स्थित होकर ज्ञान, व्रत अथवा धर्मका आचरण करते हैं, उन्हें 'वक' कहते हैं। जो उत्कृष्ट सिद्धि प्राप्त करनेके लिये जलाशयका आश्रय ले कमलकी नाल और सिंघाड़ा आदि खाकर रहते हैं, वे साधक 'कंक' माने गये हैं। जो गौओंके साथ चलते, गोशालामें निवास करते तथा पंचगव्य रसका सेवन करते हैं, वे साधक 'गोपाल' माने गये हैं। जो कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि व्रतोंके द्वारा अपने शरीरको क्षीण करते हैं तथा त्रुटिकाल (आधे निमेष)-में ही भोजन कर लेते हैं, वे साधक त्रुटिक माने गये हैं। जो कुशकी पत्नी बनाकर मठमें स्थापित करते और गृहस्थ-धर्मका पालन करते हुए भिक्षावृत्तिसे जीवन-निर्वाह करते हैं, वे साधक 'प्रवर' या 'मठर' कहलाते हैं। जो
- प्रभासखण्ड * १२६७
ब्राह्मण कन्द अथवा मूल-फलकी एक-एक ग्रासकी आठ गुटिकाएँ बनाकर उन्हींका आहार करते हैं, वे 'गुटिक' कहलाते हैं। जो रातमें वीरासनसे बैठकर अपने शरीरको ही दण्ड देनेमें संलग्न हैं, वे 'दण्डी' कहे गये हैं। प्रभासक्षेत्रमें रहनेवाले जो ब्राह्मण इस प्रकारकी वृत्तियोंसे जीविका चलाते हैं, उनके द्वारा बालरूपधारी भगवान् ब्रह्मा सदैव पूजनीय हैं। जो महापातकी हैं और जिन्हें ब्राह्मणोंने अपनी पंक्तिसे बाहर कर दिया है, वे बालरूपधारी ब्रह्माजीका स्पर्श न करें। जो दीर्घजीवी होना चाहता है, वह ब्रह्मचारी, शान्त और जितेन्द्रिय ब्राह्मणका कभी अपमान न करे।
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ब्रह्माजीके प्रति भक्तिके भेद, रथयात्रा, ब्रह्माके एक सौ आठ नाम तथा कार्तिकपूर्णिमाको उनके दर्शनका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—भक्तिके तीन भेद हैं—लौकिकी, वैदिकी और आध्यात्मिकी। गन्ध, माला, शीतल जल, घी, गुग्गुल, धूप, काला, अगुरु, सुगन्धित पदार्थ, सुवर्ण, रत्न आदि आभूषण, विचित्र हार, न्यास, स्तोत्र, ऊँची-ऊँची पताका, नृत्य-वाद्य, गान, सब प्रकारकी वस्तुओंके उपहार तथा भक्ष्य, भोज्य, अन्न, पान आदि सामग्रियोंसे मनुष्योंद्वारा जो ब्रह्माजीकी पूजा की जाती है, वह लौकिकी भक्ति मानी गयी है। वेदमन्त्र और हविष्यभागके द्वारा जो यज्ञक्रिया की जाती है, वह वैदिकी भक्ति है। अमावास्या और पूर्णिमाको किया जानेवाला अग्निहोत्र, संस्रवप्राशन, दक्षिणादान, पुरोडाश, इष्टि, धृति, सोमपान, सब प्रकारके यज्ञकर्म, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदके मन्त्रोंका जप तथा संहिताभागका स्वाध्याय—ये सब कर्म जो ब्राह्मणोंद्वारा किये जाते हैं, वे वैदिकी भक्तिके अन्तर्गत हैं। जो प्रतिदिन इन्द्रियसंयमपूर्वक प्राणायाम एवं ध्यानमें संलग्न रहता है, भिक्षान्नसे जीवननिर्वाह करता है, व्रतके पालनमें स्थित रहता है, समस्त इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे समेटकर उन्हें हृदयमें स्थापित करके प्रजापति ब्रह्माजीका ध्यान करता है, वह आध्यात्मिकी भक्तिसे युक्त 'ब्रह्मभक्त' कहलाता है। ब्रह्माजीका ध्यान इस प्रकार करे—हृदयकमलकी कर्णिकाके आसनपर ब्रह्माजी विराजमान हैं, उनके शरीरका वर्ण लाल है, नेत्र बड़े सुन्दर हैं, मुख दिव्य तेजसे प्रकाशित है, उनके चार भुजाएँ हैं और हाथोंमें वरद एवं अभयकी मुद्राएँ हैं।'
जो ममता और अहंकारसे रहित, अनासक्त, परिग्रहशून्य, चारों पुरुषार्थोंके प्रति भी स्नेह न रखनेवाले, ढेला, पत्थर और सुवर्णको समान दृष्टिसे देखनेवाले, समस्त प्राणियोंके हितके लिये धर्मानुष्ठानमें तत्पर, सांख्ययोगकी विधिके ज्ञाता, धर्मके विषयमें संशयरहित तथा प्रतिदिन ब्रह्माजीकी पूजामें संलग्न रहनेवाले हैं, वे ही ब्राह्मण प्रभासक्षेत्रके श्रेष्ठ निवासी हैं।
गायत्री उत्तम मन्त्र है। जो पूर्णिमामें उपवास करके गायत्रीके अक्षरतत्त्वोंद्वारा ब्रह्माजीकी पूजा करता है, वह परम पदको प्राप्त होता है। यदि ब्राह्मण भयंकर संसार-सागरके पार उतरना चाहे तो प्रभासमें पूरे कार्तिकमासभर ब्रह्माजीके पूजनमें तत्पर रहे। जिनके दर्शनमात्रसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है, प्रभासक्षेत्रमें उन बालरूपधारी ब्रह्माजीकी कौन विद्वान् पूजा नहीं करेगा? जिनके एक दिनका अन्त होते ही देवता, असुर और मनुष्य आदि सब प्राणी विनाशको प्राप्त होते हैं, उनका पूजन कौन नहीं करेगा। रुद्र और विष्णुके रूपमें भी वे लोकनाथ ब्रह्माजी ही पूजित होते हैं। जो पूर्णिमाको उपवास करके जगत्पति ब्रह्माका विधिपूर्वक पूजन करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। कार्तिककी पूर्णिमाको सावित्रीसहित चतुर्मुख ब्रह्माजीको गाजे-बाजेके साथ नगरमें घुमाये। तत्पश्चात् उन्हें विश्राम-स्थानपर स्थापित करे। फिर ब्राह्मणोंको
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भोजन कराकर शाण्डिलेयकी पूजा करे। उसके बाद मंगलमय वाद्योंकी ध्वनिके साथ ब्रह्माजीको पुनः रथपर बिठाये। रथके आगे शाण्डिली-पुत्रकी विधिवत् पूजा करके ब्राह्मणोंसे पुण्याहवाचन कराये। रथपर चढ़ानेके बाद रातमें जागरण करे। ब्रह्माजीके दाहिने पार्श्वमें सावित्रीदेवीको स्थापित करे और भोजनको बायें पार्श्वमें। ब्रह्माजीके आगे एक कमल रख दे, फिर वाद्यों और शंखोंकी तुमुल ध्वनिके साथ समूचे नगरकी प्रदक्षिणा करते हुए रथको घुमाये और अपने स्थानपर आकर ब्रह्माजीकी आरती करके फिर उन्हें यथास्थान विराजमान करे। जो इस प्रकार यात्रा करता है, जो उस यात्राको देखता है अथवा ब्रह्माजीके रथको खींचता है, वह ब्रह्मधाममें जाता है। जो ब्रह्माजीके रथके पीछे दीप धारण करता है, वह पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका महान् फल पाता है। राजाको चाहिये कि वह ब्रह्माजीकी रथयात्रा अवश्य कराये। प्रतिपदाको ब्राह्मणभोजन कराना चाहिये और उन ब्राह्मणोंका नवीन वस्त्र, गन्ध, माला और अनुलेपन आदिके द्वारा पूजन करना चाहिये। जो कार्तिककी अमावास्याको ब्रह्माजीके मन्दिरमें दीप जलाता है, वह परम पदको प्राप्त होता है। सभी उत्सवोंके अवसरपर इन जगत्पति ब्रह्माजीकी पूजा करनी चाहिये।
पार्वती! अब मैं ब्रह्माजीके एक सौ आठ नाम कहता हूँ; उनका अष्टोत्तरशतनामस्तोत्र परम दिव्य, गोपनीय तथा पापनाशक है। वेदोंके ज्ञाता महात्मा ब्राह्मणको इसका उपदेश देना चाहिये। पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने पूछा—'देवदेव पितामह! आप किन-किन स्थानोंमें किस-किस नामसे निवास करते हैं? यह स्मरण करके बताइये।'
ब्रह्माजीने कहा—मैं पुष्करमें सुरश्रेष्ठ, गयामें प्रपितामह, कान्यकुब्जमें वेदगर्भ, भृगुकच्छमें चतुर्मुख, कौबेरीमें सृष्टिकर्ता, नन्दिपुरीमें बृहस्पति, प्रभासमें बालरूपी, वाराणसीमें सुरप्रिय, द्वारावतीमें चक्रदेव, वैदिशमें भुवनाधिप, पौण्ड्रकमें पुण्डरीकाक्ष, हस्तिनापुरमें पीताक्ष, जयन्तीमें विजय, पुरुषोत्तममें जयन्त, वाडमें पद्महस्त, तमोलिप्तमें तमोनुद, आहिच्छत्रीमें जनानन्द, कांचीपुरीमें जनप्रिय, कर्नाटकमें ब्रह्मा, ऋषिकुण्डमें मुनि, श्रीकण्ठमें श्रीनिवास, कामरूपमें शुभंकर, उड्डीयानमें देवकर्ता, जालन्धरमें स्रष्टा, मल्लिकामें विष्णु, महेन्द्रपर्वतपर भार्गव, गोमदमें स्थविराकार, उज्जयिनीमें पितामह, कौशाम्बीमें महादेव, अयोध्यामें राघव, चित्रकूटमें विरंचि, विन्ध्याचलमें वाराह, हरिद्वारमें सुरश्रेष्ठ, हिमवान् पर्वतपर शंकर, देहिकामें स्रुचाहस्त, अर्बुदमें पद्महस्त, वृन्दावनमें पद्मनेत्र, नैमिषारण्यमें कुशहस्त, गोपक्षेत्रमें गोविन्द, यमुनातटपर सुरेन्द्र, भागीरथीमें पद्मतनु, जनस्थलमें जनानन्द, कोंकणमें मध्वक्ष, काम्पिल्यमें कनकप्रभ, खेटकमें अन्नदाता, क्रतुस्थलमें शम्भु, लंकामें पौलस्त्य, काश्मीरमें हंसवाहन, अर्बुदमें वसिष्ठ, उत्पलावनमें नारद, मेधकर्मे श्रुतिदाता, प्रयागमें यजुष्पति, शिवलिंगमें सामवेद, मार्कण्डस्थानमें मधुप्रिय, गोमन्तमें नारायण, विदर्भमें द्विजप्रिय, अंकुलकमें ब्रह्मगर्भ, ब्रह्मवाहमें सुतप्रिय, इन्द्रप्रस्थमें दुरधर्ष, पम्पामें सुदर्शन, विरजामें महारूप, राष्ट्रवर्धनमें सुरूप, कदम्बकमें जनाध्यक्ष, समस्थलमें देवाध्यक्ष, रुद्रपीठमें गंगाधर, सुपीठमें जलद, त्र्यम्बकमें त्रिपुरारि, श्रीशैलमें त्रिलोचन, प्लक्षपुरमें महादेव, कपालमें वेधनाशन, शृंगवेरपुरमें शौरि, निमिषक्षेत्रमें चक्रधारक, नन्दिपुरीमें विरूपाक्ष, प्लक्षपादपमें गौतम, हस्तिनाथमें माल्यवान्, वाचिकमें द्विजेन्द्र, इन्द्रपुरीमें दिवानाथ, भूतिकामें पुरन्दर, चन्द्रामें हंसबाहु, चम्पामें गरुडप्रिय, महोदयमें महायक्ष, पूतक वनमें सुयज्ञ, सिद्धेश्वरमें शुक्लवर्ण, विभामें पद्मबोधक, देवदारुवनमें लिंगी, उदकमें उमापति, मातृस्थानमें विनायक, अलकामें धनाधिप, त्रिकूटमें गोविन्द, पातालमें वासुकि, कोविदारमें युगाध्यक्ष, स्त्रीराज्यमें सुरप्रिय, पूर्णगिरिमें सुभोग, शाल्मलिमें तक्षक, अमरमें पापहा, अम्बिकामें सुदर्शन, नरवापीमें महावीर, कान्तारमें दुर्गनाशन, पद्मावतीमें पद्मगृह तथा गगनमें मृगलाञ्छन नामसे
- प्रभासखण्ड * १२६९
रहता हूँ। मधुसूदन ! जो इन एक सौ आठमेंसे एकमात्र बालरूपी ब्रह्माका भी दर्शन कर लेता है, उसे पूर्वोक्त सभी ब्रह्मविग्रहोंके दर्शनका पुण्य-फल प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण ! जो प्रभासमें इन नामोंद्वारा मेरा स्तवन करता है, वह मेरे धामको पाकर आनन्द भोगता है। मेरे इस स्तोत्रके पाठसे या श्रवणसे मानसिक, वाचिक और शारीरिक सभी पाप छूट जाते हैं। कार्तिककी पूर्णिमाको जब कृत्तिका नक्षत्र हो, तब प्रभासक्षेत्रमें वह तिथि मुझे बहुत प्रिय है। और यदि उसी तिथिमें रोहिणी नक्षत्र आ जाय तो वह पुण्यमयी महा कार्तिकी कहलाती है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। शनैश्चर, रविवार अथवा बृहस्पतिवार तथा कृत्तिका नक्षत्रके योगसे युक्त यदि कार्तिक-मासकी पूर्णिमा हो तो उसमें बालरूपी ब्रह्माजीका दर्शन करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। विशाखा नक्षत्रके सूर्य और कृत्तिका नक्षत्रके चन्द्रमा हों तो वह पद्मकयोग प्रभासक्षेत्रमें दुर्लभ है। करोड़ों पापोंसे युक्त मनुष्य भी उक्त योगमें प्रभासक्षेत्रके भीतर यदि बालरूपधारी ब्रह्माजीका दर्शन कर ले तो उसे यमलोक नहीं देखना पड़ता।
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प्रत्यूषेश्वर, अनिलेश्वर, प्रभासेश्वर, रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, कुण्डेश्वरीदेवी तथा भूतेश्वरका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—तदनन्तर सोमेश्वरसे ईशानकोणमें पचास धनुषके अन्तरपर प्रत्यूषेश्वर नामक लिंग है। उसके दर्शनसे सात जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है। धर्मराजसे उनकी पत्नी विश्वाने आठ पुत्रोंको जन्म दिया, जो आठ 'वसु' कहलाये। उनके नाम इस प्रकार हैं—आप, भव, सोम, धर, अनल, अनिल, प्रत्यूष और प्रभास। इनमें सातवें वसु प्रत्यूष पुत्रकी इच्छासे प्रभासक्षेत्रमें आये और शिवलिंगकी स्थापना करके मेरा ध्यान करते हुए उन्होंने शान्तचित्तसे दिव्य सौ वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। उनकी भक्तिसे मैं प्रसन्न हुआ और मैंने उन्हें पुत्र दिया। योगियोंमें श्रेष्ठ देवल ही उनके पुत्र हैं। प्रत्यूषके द्वारा स्थापित और पूजित होनेसे उस लिंगका नाम 'प्रत्यूषेश्वर' हुआ। जो सन्तानहीन पुरुष उनकी आराधना करता है, उसके कुलमें कभी सन्ततिका नाश नहीं होता। जो भक्तिभावसे इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए सदा उनकी पूजा करता है, उसका महापाप भी नष्ट हो जाता है। माघ कृष्णा चतुर्दशीकी रात्रिमें वहाँ जागरण करना चाहिये। जागरण करनेसे मनुष्य सब दानों और यज्ञोंका फल पा लेता है।
वहाँसे उत्तर और ईशान दिशामें तीन धनुषकी दूरीपर अनिलेश्वरलिंग है, उनका बड़ा प्रभाव है। वह दर्शनमात्रसे सब पापोंका नाश करनेवाला है। पूर्वोक्त आठ वसुओंमेंसे अनिलने मेरी आराधना करके मेरा प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किया और शिवलिंगकी स्थापना की। इससे उन्हें मनोजव नामक पुत्र प्राप्त हुआ। अनिलेश्वरका दर्शन करके मनुष्य कभी अन्धा, बहरा, गूँगा, रोगी और निर्धन नहीं होता। जो उस लिंगपर एक फूल भी चढ़ा देता है, वह सदा सुख-सौभाग्यसे सम्पन्न तथा रूपवान् होता है।
गौरी-तपोवनसे पश्चिम सात धनुषकी दूरीपर प्रभासेश्वर नामक महान् शिवलिंग है, जिसकी स्थापना शिवपूजनपरायण आठवें वसु प्रभासने की है। प्रभासने वहाँ सौ वर्षोंतक तपस्या की। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने उन्हें मनोवांछित वर दिया। प्रभासके पुत्र विश्वकर्मा हुए। माघमासकी चतुर्दशीको समुद्रसंगममें स्नान करके मनुष्य भूमिशयन और उपवासका नियम ले शतरुद्रियका जप करे तथा पंचामृतसे प्रभासेश्वरको स्नान कराकर विधिपूर्वक
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उनकी पूजा करे। यों करनेसे वह सब पापोंसे मुक्त और सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न होता है।
प्रभासेश्वरसे ईशानकोणमें साठ धनुषकी दूरीपर पुष्करारण्य है। वहीं ज्येष्ठपुष्कर नामक कुण्ड है। वह समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। पुण्यहीन पुरुषोंके लिये वह दुर्लभ है। पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् श्रीरामने वहाँ रामेश्वरलिंगकी स्थापना की थी। उसकी पूजा करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है।
चौबीसवें त्रेतायुगकी बात है, पुरोहित वसिष्ठजीके द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ कराये जानेपर राजा दशरथके चार पुत्र हुए। उनमेंसे श्रीरामचन्द्रजी सीता और लक्ष्मणके साथ वनवासके लिये गये। उसी समय यात्रा-प्रसंगसे वे प्रभासक्षेत्रमें भी आये। ज्येष्ठपुष्करके समीप आकर वे विश्रामके लिये बैठे। सूर्यास्त हो जानेपर उन्होंने पृथ्वीपर पत्ते बिछाये और सो गये। कुछ रात बाकी रहनेपर स्वप्नमें उन्हें अपने पिता दशरथजीका दर्शन हुआ। प्रातःकाल उठकर उन्होंने ब्राह्मणोंसे यह सब बात कही।
तब ब्राह्मणोंने कहा—रघुनन्दन ! पितर आपका अभ्युदय चाहते हैं; जब वे वर देनेको उद्यत होते हैं, तभी स्वप्नमें अपने वंशजोंको दर्शन देते हैं। यह परम पुण्यमय स्थान भगवान् विष्णुका गुप्त तीर्थ है। प्रभासक्षेत्रमें इसकी पुष्कर नामसे प्रसिद्धि है। अतः यहाँ पितरोंका श्राद्ध कीजिये। निश्चय ही राजा दशरथ इस तीर्थमें आपके द्वारा दिया हुआ शुभ पिण्ड प्राप्त करना चाहते हैं। इसीलिये उन्होंने दर्शन दिया है।
उनकी बात सुनकर कमलनयन श्रीरामने श्राद्धके लिये ब्राह्मणोंको निमन्त्रित किया और लक्ष्मणजीसे कहा—'सुमित्रानन्दन ! तुम श्राद्धके लिये फल लेनेको जाओ।' 'बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मणजी गये और अनेक प्रकारके उत्तम फल ले आये। जानकीजीने उन फलोंको शीघ्र ही पकाकर तैयार किया। फिर कुतप काल (मध्याह्नके समय)-में नहा-धोकर पवित्र हो वल्कल धारण किये हुए श्रीरामचन्द्रजी श्राद्धके योग्य ब्राह्मणोंको बुला ले आये। गालव, देवल, रैभ्य, यवक्रीत, पर्वत, भारद्वाज, वसिष्ठ, जाबालि, गौतम, भृगु तथा अन्य बहुत-से वेदज्ञ ब्राह्मण श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा किये जानेवाले श्राद्धको सम्पन्न करनेके लिये आये। इसी समय श्रीरामचन्द्रजीने सीतासे कहा—'विदेहनन्दिनि ! आओ, ब्राह्मणोंके लिये पाद्य और अर्घ्य दो।' यह सुनकर सीताजी वृक्षोंके बीचमें चली गयीं और लताकुंजमें अपनेको छिपाकर श्रीरामचन्द्रजीकी दृष्टिसे ओझल हो गयीं। इधर श्रीरामचन्द्रजी 'सीते ! सीते !' कहकर पुकारने लगे। तब लक्ष्मणजीने ही ब्राह्मणोंको अर्घ्य देनेका कार्य किया। जब ब्राह्मणलोग भोजन कर चुके और पिण्डदानका कार्य समाप्त हो गया, तब जनकनन्दिनी सीता श्रीरामचन्द्रजीके पास आयीं। उन्हें देखकर श्रीरामने पूछा—'श्राद्धकाल उपस्थित होनेपर तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली गयी थीं?'
सीताजीने हाथ जोड़कर कहा—प्रभो! आज मैंने आपके पिता, पितामह, प्रपितामह तथा मातामह आदिको भी देखा है। वे पृथक्-पृथक् ब्राह्मणोंके अंगोंमें स्थित थे। अतः उनके सामने जानेमें मुझे लज्जा हुई। श्वशुरवर्गको उपस्थित देखकर मैं लज्जासे ही छिप गयी थी।
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने पुष्करके समीप ही वहाँसे एक धनुष दक्षिण हटकर रामेश्वरलिंगकी स्थापना की। जो मनुष्य गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक रामेश्वरका पूजन करता है, वह भगवान् विष्णुके उत्तम धाममें जाता है। शुक्ल अथवा मंगलयुक्त चतुर्थी तथा आश्विनमासकी षष्ठीको वहाँ श्राद्ध करनेसे महान् फल होता है। वहाँ पुष्करमें अपने वंशजोंद्वारा तर्पण किये जानेपर पितर और पितामह बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं और दूसरी किसी भी वस्तुकी इच्छा नहीं करते।
- प्रभासखण्ड * १२७१
रामेश्वरसे तीस धनुष पूर्व दिशामें लक्ष्मणेश्वर-लिंग है। यात्रामें गये हुए लक्ष्मणजीने उस देवपूजित लिंगको स्थापित किया था। जो स्त्री या पुरुष विधिपूर्वक स्नान कराकर भक्तिभावसे लक्ष्मणेश्वरका पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। रामेश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें जानकीश्वर-लिंग है। जो नारी माघमासकी तृतीयाको जानकीश्वरका पूजन करती है, उसके वंशमें दुर्भाग्य, दुःख और शोक नहीं होते।
तदनन्तर वामन स्वामीके नामसे प्रसिद्ध पापहारी विष्णुके समीप जाय। उनका स्थान पुष्करसे नैर्ऋत्यकोणमें बीस धनुषके अन्तरपर है। जिस समय उन्होंने दैत्यराज बलिको बाँधा था, उस समय पहला चरण वहीं (प्रभासक्षेत्रमें) रखा, दूसरा मेरु-शिखरपर रखा और तीसरा आकाशमें जब ऊपरकी ओर वे पैर बढ़ाने लगे तब उनके चरणोंके अग्रभागसे ब्रह्माण्ड फूट गया तथा वहाँसे जल निकल आया। वह जल उनके घुटनेके मार्गसे बहता हुआ इस पृथ्वीपर आया। वही इस पृथ्वीपर विष्णुपदी गंगाके नामसे प्रसिद्ध है। महानदी गंगा पहले प्रभासक्षेत्रके अन्तर्गत पुष्करमें ही आयी। जो मनुष्य विष्णुपदीमें स्नान करके भगवान्के चरणका दर्शन करता है, वह उनके परम धाममें जाता है। जो वहाँ ब्राह्मणको उपानह देता है वह श्रेष्ठ विमानपर चढ़कर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
वहाँसे दक्षिण जानकीश्वरके समीप परम उत्तम पुष्करेश्वरलिंग है, जिसकी पूजा ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार मुनिने सुवर्णमय कमलोंसे की है। वह सब पातकोंका नाश करनेवाला है। जो मनुष्य भक्तिसे गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा उनकी पूजा करता है, उसको पुष्करयात्राका फल मिलता है।
पुष्करसे वायव्यकोणमें तीस धनुषपर और भूतेश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें कुण्डेश्वरी देवीका स्थान है। वे देवी दरिद्रता और पापका नाश करनेवाली हैं। उनसे नैर्ऋत्यकोणमें पंद्रह धनुषकी दूरीपर शंखोदक कुण्ड है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। जो पुरुष अथवा सदाचारिणी स्त्री शंखावर्ता नामसे विख्यात देवीकी पूजा करती है, उसके सब मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। कलियुगमें शंखावर्ता देवी कुण्डेश्वरी नामसे प्रसिद्ध हैं। प्राचीन कालमें भगवान् विष्णुने जब शंख नामक दैत्यको मारा, उस समय उसके शंखाकार शरीरको इसी तीर्थके जलसे धोकर पवित्र किया और मेघके समान गम्भीर ध्वनिवाले उस शंखको वहीं बजाया। उसके गम्भीर नादसे देवी वहाँ आयीं और कुण्डके समीप स्थित होकर कारण पूछने लगीं। इसीसे उनका नाम 'कुण्डेश्वरी' हुआ। जो स्त्री या पुरुष माघमासकी तृतीयाको कुण्डेश्वरी देवीका पूजन करता है, उसे गौरी-पदकी प्राप्ति होती है। यात्राके फलकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंको वहाँ ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराना चाहिये।
कुण्डेश्वरीसे ईशानकोणमें बीस धनुषके अन्तरपर भूतनाथेश्वर शिव हैं। वह आदि-अन्तरहित लिंग कल्पपर्यन्त रहनेवाला है। पहले त्रेतायुगमें उसका नाम वीरभद्रेश्वर था। फिर कलियुगमें भूतेश्वर हुआ। जब द्वापर और कलियुगकी सन्धिक़ा समय चल रहा था, उस समय उस लिंगके प्रभावसे करोड़ों भूतप्राणी परमसिद्धि (मुक्ति)-को प्राप्त हुए थे। इसीसे भूतलपर वह 'भूतेश्वर' नामसे विख्यात हुआ। जो कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको रात्रिमें भूतेश्वर शिवका पूजन करके दक्षिण दिशामें जा जितेन्द्रिय, निर्भय एवं ध्यानपरायण होकर अघोरमन्त्रका जप करता है, उसको पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। वहाँपर पितरोंकी प्रेतयोनिसे मुक्तिके लिये तिल, सुवर्ण और पिण्डका दान करना चाहिये।
$\sim\sim\circ\sim\sim$
१२७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
गोप्य़ादित्यकी स्थापना और महिमा तथा नीलसे हानि
भूतेशसे वायव्यकोणमें तीस धनुषकी दूरीपर गोप्यादित्यका स्थान है। पूर्वकालमें महातेजस्वी श्रीकृष्ण जब छप्पन कोटि यादवोंके सात प्रभासक्षेत्रमें आये, उस समय सोलह हजार गोपियाँ भी वहाँ आ गयीं। उनमेंसे जो सर्वश्रेष्ठ सोलह गोपियाँ बतायी गयी हैं, उनके नाम बताता हूँ; सुनो—लम्बिनी, चन्द्रिका, कान्ता, अक्रूरा, शान्ता, महोदया, भीषणी, नन्दिनी, अशोका, सुपर्णा, विमला, अक्षया, शुभदा, शोभना और पुण्या—ये हंस (श्रीकृष्णचन्द्र)-की कलाएँ मानी गयी हैं। परमात्मा श्रीकृष्ण ही हंस हैं और उनकी ये शक्तियाँ हैं। श्रीकृष्ण चन्द्रस्वरूप हैं और ये गोपियाँ उनकी कलाएँ हैं। उपर्युक्त पंद्रह कलाओंके सिवा, मालिनी उनकी सोलहवीं कला है। जो पुरुष इस प्रकार जानता है, उसे वैष्णव जानना चाहिये।
उन सोलह हजार गोपियोंने भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञा ले उस क्षेत्रमें निवास करनेवाले नारद आदि मुनियोंके सहयोगसे विधिपूर्वक भगवान् सूर्यकी स्थापना की और नाना प्रकारके दान दिये। महर्षियोंने वहाँ भगवान् सूर्यका नाम गोप्यादित्य रखा। इस प्रकार सूर्यदेवकी प्रतिष्ठा हो जानेपर वे सब गोपियाँ कृतार्थ हुईं और महान् यश पाकर श्रीकृष्णके साथ द्वारकाको गयीं। प्रभासक्षेत्रमें गोपियोंद्वारा स्थापित जो गोप्यादित्य हैं, उनका दर्शनमात्र करके मनुष्य दुःखशोकसे मुक्त हो जाता है। जो मानव माघमासकी सप्तमीको उपवास करके गोप्यादित्यकी पूजा करता है, वह अपने पितरोंको सात बार तृप्त कर लेता है। वह अपने समस्त रोगोंका नाश करता है और दुश्चेष्टापरायण दुर्जय शत्रुओंको भी जीत लेता है। सप्तमीको तैलका स्पर्श न करे, नीले रंगका वस्त्र न पहने, आँवला लगाकर स्नान न करे और कहीं किसीके साथ विवाद भी न करे। नीलके रँगे हुए वस्त्र धारण करके द्विज जो भी स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय तथा पितृतर्पण आदि कर्म करता है, वे तथा इसके पञ्च महायज्ञ भी उस नील सूत्रके कारण नष्ट हो जाते हैं। यदि ब्राह्मण नीलका रँगा वस्त्र अपने अंगोंमें धारण कर ले तो दिन-रात उपवास करके पंचगव्य पीनेसे शुद्ध होता है। यदि किसी ब्राह्मणके रोमकूपोंमें नीलके रसका (नीलमिश्रित जलका) प्रवेश हो जाय तो वह पतित हो जाता है और तीन कृच्छ्र-व्रत करनेपर उसकी शुद्धि होती है। यदि ब्राह्मण भूलसे भी नील-वृक्षोंके बीचसे निकल जाय तो वह दिन-रात उपवास करके पंचगव्य पीनेपर शुद्ध होता है। यदि ब्राह्मणके शरीरमें नीलकी लकड़ी गड़ जाय और रक्त दिखायी देने लगे तो उसे चान्द्रायण व्रत करना चाहिये। देवि! जो अनजानमें नीलका दाँतौन कर लेता है, वह दो बार कृच्छ्र-व्रत करनेपर उस पापसे शुद्ध होता है।*
पार्वती! कुरुजांगल (कुरुक्षेत्र)-में एक लाख गोदान करनेसे जो पुण्य होता है, वह सब गोप्यादित्यके दर्शनमात्रसे प्राप्त हो जाता है।
* नीलरक्तेन वस्त्रेण यत्कर्म कुरुते द्विजः। स्नानं दानं जपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम्॥
नश्यन्त्यस्य महायज्ञा नीलसूत्रस्य कारणात्। नीलरक्तं यदा वस्त्रं विप्रस्त्वङ्गेषु धारयेत्॥
अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति। रोमकूपे यदा गच्छेदद्रसं नीलस्य कस्यचित्॥
पतितस्तु भवेद् विप्रस्त्रिभिः कृच्छ्रैर्विशुद्ध्यति। नीलमध्ये यदा गच्छेदप्रमादाद् ब्राह्मणः क्वचित्॥
अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति। नीलदारु यदा भिन्द्याद् ब्राह्मणानां शरीरके॥
शोणितं दृश्यते चैव द्विजश्चान्द्रायणं चरेत्। कुर्यादज्ञानतो यस्तु नीलं वै दन्तधावनम्॥
कृत्वा कृच्छ्रद्वयं देवि तस्मात् पापाद् विशुद्ध्यति। (स्क० पु०, प्र० खं० ११५। ३१-३७)
| * प्रभासखण्ड * | १२७३ |
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रामेश्वर, चित्रांगदेश्वर तथा रावणेश्वरकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—तदनन्तर परशुरामजीके द्वारा स्थापित रामेश्वरलिंगका दर्शन करे। वह स्थान गोपीश्वरसे वायव्यकोणमें तीस धनुषकी दूरीपर है। जिस समय जमदग्निपुत्र परशुरामजीने पिताकी आज्ञासे अपनी माताका वध किया और पिताके अनुग्रहसे वह पुनः जीवित हो गयी, उस समय प्रभासक्षेत्रमें आकर उन्होंने अद्भुत तपस्या की। वे मेरे विग्रहकी स्थापना करके एक सौ पचास वर्षतक आराधनामें संलग्न रहे। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने उन्हें मनोवांछित वर दिया और उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगमें निवास किया। इससे महर्षि परशुराम कृतार्थ हुए। तदनन्तर भूमण्डलके सम्पूर्ण क्षत्रियोंका इक्कीस बार संहार करके वे माता-पिताके ऋणसे उऋण हुए। जो मनुष्य उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो मेरे धाममें जाता है।
रामेश्वरसे बीस धनुषके अन्तरपर नैर्ऋत्यकोणमें चित्रांगदेश्वरलिंग है। गन्धर्वोंके स्वामी चित्रांगदने उस क्षेत्रको परम पवित्र जानकर वहाँ शिवलिंग स्थापित किया और बड़ी भारी तपस्या करके मेरी आराधना की। जो पुरुष भाव-भक्तिसे युक्त हो उस लिंगकी पूजा करता है, वह गन्धर्वलोकमें जाता और गन्धर्वोंके साथ आनन्द भोगता है। शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको जो विधिपूर्वक उस शिवलिंगको स्नान कराकर भाँति-भाँतिके पुष्प, चन्दन और धूप आदिके द्वारा उसकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण मनोवांछित फलको प्राप्त कर लेता है।
उस स्थानसे दक्षिण और नैर्ऋत्यमें सोलह धनुषके अन्तरपर रावणेश्वरलिंग है, जिसकी स्थापना रावणने की है। वहाँ उसने भक्तिपूर्वक उपवास करके मेरी आराधना की और गीत, वाद्य आदिका आयोजन करके जागरण किया। पंद्रह दिनोंतक इस प्रकार मेरी अर्चना करनेपर आकाशवाणी हुई—'महाबाहु दशग्रीव! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरे प्रसादसे तीनों लोक तुम्हारे अधीन होंगे। मैं प्रतिदिन तुम्हारे द्वारा स्थापित शिवलिंगमें निवास करूँगा। राक्षसराज! जो मानव भक्तिपूर्वक रावणेश्वर लिंगकी पूजा करेंगे, वे शत्रुओंसे अजय होंगे। मेरी कृपासे उन्हें परमसिद्धि प्राप्त होगी।'
यों कहकर मेरी आकाशवाणी मौन हो गयी। रावणने भी सन्तुष्ट होकर बार-बार मेरा पूजन किया और तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छा रखकर वह पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो अभीष्ट स्थानको चला गया।
रावणेश्वरसे पश्चिम पाँच धनुष दूर सौभाग्यदायिनी गौरीका निवास है, जहाँपर सौभाग्यकी इच्छा रखनेवाली अरुन्धतीदेवीने गौरीजीकी आराधनामें तत्पर हो घोर तपस्या की थी। गौरीदेवीके प्रसादसे उन्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई। जो माघ शुक्ला तृतीयाको भक्तिपूर्वक गौरीजीका पूजन करता है, वह सात जन्मोंतक सौभाग्यशाली होता है।
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पौलोमीश्वर, शाण्डिल्येश्वर, क्षेमेश्वर तथा सागरादित्यका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—रावणेश्वरसे वायव्यकोणमें तीस धनुषकी दूरीपर पौलोमीश्वरलिंग है। उसकी स्थापना पुलोमपुत्री शचीने की थी। जिस समय तारकासुरने देवताओंका राज्य छीन लिया और स्वयं इन्द्रपदपर अधिकार जमा लिया तथा उसके भयसे व्याकुल इन्द्रदेव कहीं भाग गये, उस समय उनकी पत्नी शचीने शोकसे दुर्बल होकर मेरी आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने शचीसे कहा—'देवि! मेरा पुत्र तारकासुरका वध करेगा। तुम निश्चिन्त होकर जाओ। जो