भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1294, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1294

* प्रभासखण्ड * १२६५

निवास करते हुए ब्रह्माजीका एक परार्ध व्यतीत हो गया और अब दूसरा चल रहा है। इस तरह बचपनसे ही उनका इस क्षेत्रमें निवास होता है। मनीषी पुरुषोंके द्वारा वे बारंबार वन्दनीय हैं। यात्राका उत्तम फल चाहनेवाले पुरुषोंको पहले उन्हींकी पूजा करनी चाहिये। जो भक्तिपूर्वक ब्रह्माजीकी पूजा करता है, वह निश्चय ही मेरा पूजन करता है। जो उनसे द्वेष करता है, वह मुझीसे द्वेष करता है और जो उनका पुजारी है, वह मेरा ही पूजक है। ब्रह्माजीकी पूजा करनेवाले पुरुषोंके द्वारा मैं और भगवान् विष्णु दोनों ही पूजित होते हैं। विष्णु सत्त्वगुणी हैं, ब्रह्माजी रजोगुणी हैं और मैं तमोगुणसे युक्त हूँ। ब्रह्माजी वायु, रुद्रदेव अग्नि तथा भगवान् विष्णु जलरूप हैं। मैं सामवेदका आश्रय हूँ। ब्रह्माजी ऋग्वेद धारण करते हैं तथा भगवान् विष्णु यजुर्वेदके स्वरूप एवं अथर्वकी कलाके आधार हैं। मुझे दक्षिणाग्नि, विष्णुको गार्हपत्याग्नि तथा ब्रह्माजीको आहवनीयाग्नि जानना चाहिये। ब्रह्माजी नाभिमें, विष्णु हृदयमें तथा सब भूतोंका आधारभूत मैं चक्र (मूलाधारसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रतक)-में स्थित हूँ। हम लोगोंके रूपमें शक्तिविशेषसे साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही स्थित हैं। ॐकार परब्रह्म है और गायत्री उत्तम प्रकृति है। इन दोनोंको जानकर मनुष्य पुरुषयोनिसे वियुक्त नहीं होता। पार्वती! इस प्रकार जो द्वैतरहित परब्रह्मको जानता है, वह सब कुछ जानता है। जो भेददर्शी है, वह नहीं जानता। परब्रह्म तो वास्तवमें एकरूप ही है, तथापि कार्यरूपसे वह पृथक्-सा प्रतीत होता है। जो उससे द्वेष करता है, वह ब्रह्मद्वेषी कहलाता है। मेरे दाहिने अंगमें ब्रह्मा और बायें अंगमें विष्णु विराजमान हैं; जो इन दोनोंसे द्वेष करता है, वह मेरा ही द्वेषी है। सुन्दरि! ऐसा जानकर मनमें भेदभाव न रखते हुए ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रकी एकरूपसे ही पूजा करनी चाहिये।


ब्राह्मणोंकी महिमा, क्षेत्रवासी ब्राह्मणोंके भेद

महादेवजी कहते हैं—देवि! पृथ्वीपर जो ब्राह्मण हैं, वे मेरे प्रत्यक्ष स्वरूप हैं। स्वर्गके देवता तो परोक्ष हैं, ब्राह्मण ही प्रत्यक्ष देवता हैं। ब्राह्मण मुझे प्रिय हैं। जो भक्तिभावसे उनकी पूजा करता है, वह सदा मेरी ही पूजा करता है। जो भक्तिद्वारा उन्हें संतुष्ट करता है, वह मुझे संतुष्ट कर लेता है। जो ब्राह्मण हैं, वह मैं हूँ। उनके साथ जिसका वैर है, वह मेरा भी वैरी है। प्रिये! पृथ्वीपर जितने भी ब्राह्मण हैं, उनमेंसे जिन्होंने वेदव्रतका पालन किया है, वे तो पूज्य हैं ही; जिन्होंने वेदोक्त व्रतोंका पालन नहीं किया है, वे भी पूजनीय हैं। ब्राह्मण जातिसे ही पवित्र हैं, वेदाभ्याससे उनकी पवित्रता और भी बढ़ जाती है। अतः हव्य और कव्य (यज्ञ और श्राद्ध)-में कहीं भी ब्राह्मण निन्दाके योग्य नहीं हैं। काने, कुबड़े, कोढ़ी, रोगी तथा दरिद्र ब्राह्मणोंका भी विद्वान् पुरुष अपमान न करे; क्योंकि वे मेरे स्वरूप कहे गये हैं। बहुत-से अज्ञानी मनुष्य इस बातको नहीं जानते। जो मेरे स्वरूपभूत ब्राह्मणोंको मारते हैं, उनसे शास्त्रविपरीत कर्म करवाते हैं, जहाँ नहीं भेजना चाहिये, वहाँ उन्हें भेजते हैं तथा उनसे दासता (सेवा-टहल) कराते हैं, वे जब मरते हैं, तब यमदूत उनके माथेपर आरा रखकर उससे उन्हें चीरते हैं—ठीक वैसे ही, जैसे बढ़ई लकड़ी चीरते हैं। जो ब्राह्मणको अंगभंग करता और उनके प्राण लेता है, उसे ब्रह्महत्यारा जानना चाहिये; उसके उद्धारके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है। वह पचास करोड़ नरकोंमेंसे प्रत्येकमें क्रमशः सहस्रों वर्षोंतक बहुत पीड़ित किया जाता है। इसलिये मानवोंको चाहिये कि वे ब्राह्मणोंको

संक्षिप्त स्कन्द पुराण · पृष्ठ 1294, कुल 1406 में से · BharatKosha