भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1295
१२६६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सदा नमस्कार करें, अन्न-पान देकर सदैव उनकी पूजामें संलग्न रहें। सभी ब्राह्मण सब प्रकारके दान लेनेके अधिकारी हैं। दूसरा कोई दान लेनेमें समर्थ नहीं है। यदि लोभवश कोई दान ग्रहण करता है तो वह अधम गतिको प्राप्त होता है। तपस्यासे पवित्र हुआ ब्राह्मण पापरहित होता है। अतः प्रतिग्रह लेकर वह कष्टमें नहीं पड़ता और न उसे कोई पाप लगता है। जो हृदयमें सदा पवित्रभाव रखते हुए नित्य-निरन्तर ध्यानमें लगा रहता है, उस ब्राह्मणको दोषका सम्पर्क नहीं प्राप्त होता। ब्राह्मण जन्मसे ही महान् है। लोक और लोकेश्वर भी ब्राह्मणोंके पूजक हैं। ब्राह्मण यदि कुपित हों तो अपराधीको नष्ट कर सकते हैं, उसे अपने तेजसे जला सकते हैं। ये ही स्वर्गलोकमें पहुँचानेवाले सनातन देवदेव हैं। ब्राह्मण पूजनीय हैं, वन्दनीय हैं; उन्हींमें सब कुछ प्रतिष्ठित है। वे ही इन सब लोकोंका परस्पर पालन करते हैं। अपने स्वाध्याय और तपको प्रकट न करनेवाले ब्राह्मण उत्तम व्रतवाले हैं। जो विद्या और व्रतमें स्नात हैं, दूसरेके आश्रित न रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं, वे ब्राह्मण कुपित होनेपर कालसर्प बन जाते हैं; अतः उनका पूजन करना चाहिये, उन्हें कुपित नहीं करना चाहिये। अध्यात्मस्वरूपका चिन्तन करनेवाले ब्राह्मण ही सब प्राणियोंकी गति हैं। ब्राह्मण यदि विपत्तिमें पड़ा हो तो उसकी सब उपायोंसे रक्षा करे। ये ब्राह्मण मनुष्योंद्वारा सर्वत्र पूजा पाने योग्य हैं। फिर जो अपने चित्तको संयममें रखनेवाले तथा विशेषतः पुण्यक्षेत्रके निवासी हैं, उनके विषयमें तो कहना ही क्या है। जो द्विज विधिपूर्वक क्षेत्र-संन्यास तथा वृत्तिभेदके क्रम जानते हैं, वे क्षेत्रके पूर्ण फलके भागी होते हैं। प्राजापत्य, महीपाल, कपोत, ग्रन्थिक, कुटिक, वेताल, पद्म, हंस, धृतराष्ट्र, वक, कंक, गोपाल, त्रुटिक, प्रवर, गुटिक तथा दण्डिक—ये क्षेत्रवासी ब्राह्मणोंके भेद हैं।

अहिंसा, गुरु-शुश्रूषा, स्वाध्याय, शौच, संयम, सत्य तथा अस्तेय (चोरीका अभाव)—यह प्राजापत्योंका व्रत कहा गया है। शान्ति-पुष्टि आदि कर्मोंद्वारा जो इस मही (पृथ्वी)-का पालन करते हैं, वे महीपाल हैं। जो धरतीपर गिरे हुए अन्नके दानोंको कपोतकी भाँति चुनते हैं और इस तरह उञ्छवृत्तिसे जीविका चलाते हैं, वे साधु पुरुष कपोत कहलाते हैं। जो घर बनाकर रहते हैं, वे सद्ग्रन्थ या ग्रन्थिक हैं। जो सहसा घर त्याग देते हैं, वे शिवाराधनमें तत्पर रहनेवाले साधक कुटिक कहे गये हैं। जिनका तीर्थसेवनमें अनुराग है तथा जो पत्नीके साथ रहते हुए जो कुछ मिल जाय उसीपर संतोष करते हैं, वे महान् साहस (धैर्य)-से युक्त साधक वेताल कहलाते हैं। जो इन्द्रियोंको संयममें रखते हैं, परंतु कामनाओंमें आसक्त हैं, राज्य और धनकी इच्छासे साधनरत हो रहे हैं, वे 'पद्म' कहलाते हैं और सदा भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करते हैं। जो ज्ञानयोगसे युक्त हैं, जिनके केवल व्यवहारमें ही द्वैत है, वे साधक 'हंस' कहे गये हैं। जिन्होंने ब्रह्मचर्य, सत्त्वगुण तथा निर्लोभता आदि गुणोंसे सम्पूर्ण जगत्‌को जीत लिया है और जो सबका धारण-पोषण करते हैं, वे 'धृतराष्ट्र' माने गये हैं। जो सदा एकमात्र स्वार्थमें ही स्थित होकर ज्ञान, व्रत अथवा धर्मका आचरण करते हैं, उन्हें 'वक' कहते हैं। जो उत्कृष्ट सिद्धि प्राप्त करनेके लिये जलाशयका आश्रय ले कमलकी नाल और सिंघाड़ा आदि खाकर रहते हैं, वे साधक 'कंक' माने गये हैं। जो गौओंके साथ चलते, गोशालामें निवास करते तथा पंचगव्य रसका सेवन करते हैं, वे साधक 'गोपाल' माने गये हैं। जो कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि व्रतोंके द्वारा अपने शरीरको क्षीण करते हैं तथा त्रुटिकाल (आधे निमेष)-में ही भोजन कर लेते हैं, वे साधक त्रुटिक माने गये हैं। जो कुशकी पत्नी बनाकर मठमें स्थापित करते और गृहस्थ-धर्मका पालन करते हुए भिक्षावृत्तिसे जीवन-निर्वाह करते हैं, वे साधक 'प्रवर' या 'मठर' कहलाते हैं। जो