भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1296
  • प्रभासखण्ड * १२६७

ब्राह्मण कन्द अथवा मूल-फलकी एक-एक ग्रासकी आठ गुटिकाएँ बनाकर उन्हींका आहार करते हैं, वे 'गुटिक' कहलाते हैं। जो रातमें वीरासनसे बैठकर अपने शरीरको ही दण्ड देनेमें संलग्न हैं, वे 'दण्डी' कहे गये हैं। प्रभासक्षेत्रमें रहनेवाले जो ब्राह्मण इस प्रकारकी वृत्तियोंसे जीविका चलाते हैं, उनके द्वारा बालरूपधारी भगवान् ब्रह्मा सदैव पूजनीय हैं। जो महापातकी हैं और जिन्हें ब्राह्मणोंने अपनी पंक्तिसे बाहर कर दिया है, वे बालरूपधारी ब्रह्माजीका स्पर्श न करें। जो दीर्घजीवी होना चाहता है, वह ब्रह्मचारी, शान्त और जितेन्द्रिय ब्राह्मणका कभी अपमान न करे।

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ब्रह्माजीके प्रति भक्तिके भेद, रथयात्रा, ब्रह्माके एक सौ आठ नाम तथा कार्तिकपूर्णिमाको उनके दर्शनका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—भक्तिके तीन भेद हैं—लौकिकी, वैदिकी और आध्यात्मिकी। गन्ध, माला, शीतल जल, घी, गुग्गुल, धूप, काला, अगुरु, सुगन्धित पदार्थ, सुवर्ण, रत्न आदि आभूषण, विचित्र हार, न्यास, स्तोत्र, ऊँची-ऊँची पताका, नृत्य-वाद्य, गान, सब प्रकारकी वस्तुओंके उपहार तथा भक्ष्य, भोज्य, अन्न, पान आदि सामग्रियोंसे मनुष्योंद्वारा जो ब्रह्माजीकी पूजा की जाती है, वह लौकिकी भक्ति मानी गयी है। वेदमन्त्र और हविष्यभागके द्वारा जो यज्ञक्रिया की जाती है, वह वैदिकी भक्ति है। अमावास्या और पूर्णिमाको किया जानेवाला अग्निहोत्र, संस्रवप्राशन, दक्षिणादान, पुरोडाश, इष्टि, धृति, सोमपान, सब प्रकारके यज्ञकर्म, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदके मन्त्रोंका जप तथा संहिताभागका स्वाध्याय—ये सब कर्म जो ब्राह्मणोंद्वारा किये जाते हैं, वे वैदिकी भक्तिके अन्तर्गत हैं। जो प्रतिदिन इन्द्रियसंयमपूर्वक प्राणायाम एवं ध्यानमें संलग्न रहता है, भिक्षान्नसे जीवननिर्वाह करता है, व्रतके पालनमें स्थित रहता है, समस्त इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे समेटकर उन्हें हृदयमें स्थापित करके प्रजापति ब्रह्माजीका ध्यान करता है, वह आध्यात्मिकी भक्तिसे युक्त 'ब्रह्मभक्त' कहलाता है। ब्रह्माजीका ध्यान इस प्रकार करे—हृदयकमलकी कर्णिकाके आसनपर ब्रह्माजी विराजमान हैं, उनके शरीरका वर्ण लाल है, नेत्र बड़े सुन्दर हैं, मुख दिव्य तेजसे प्रकाशित है, उनके चार भुजाएँ हैं और हाथोंमें वरद एवं अभयकी मुद्राएँ हैं।'

जो ममता और अहंकारसे रहित, अनासक्त, परिग्रहशून्य, चारों पुरुषार्थोंके प्रति भी स्नेह न रखनेवाले, ढेला, पत्थर और सुवर्णको समान दृष्टिसे देखनेवाले, समस्त प्राणियोंके हितके लिये धर्मानुष्ठानमें तत्पर, सांख्ययोगकी विधिके ज्ञाता, धर्मके विषयमें संशयरहित तथा प्रतिदिन ब्रह्माजीकी पूजामें संलग्न रहनेवाले हैं, वे ही ब्राह्मण प्रभासक्षेत्रके श्रेष्ठ निवासी हैं।

गायत्री उत्तम मन्त्र है। जो पूर्णिमामें उपवास करके गायत्रीके अक्षरतत्त्वोंद्वारा ब्रह्माजीकी पूजा करता है, वह परम पदको प्राप्त होता है। यदि ब्राह्मण भयंकर संसार-सागरके पार उतरना चाहे तो प्रभासमें पूरे कार्तिकमासभर ब्रह्माजीके पूजनमें तत्पर रहे। जिनके दर्शनमात्रसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है, प्रभासक्षेत्रमें उन बालरूपधारी ब्रह्माजीकी कौन विद्वान् पूजा नहीं करेगा? जिनके एक दिनका अन्त होते ही देवता, असुर और मनुष्य आदि सब प्राणी विनाशको प्राप्त होते हैं, उनका पूजन कौन नहीं करेगा। रुद्र और विष्णुके रूपमें भी वे लोकनाथ ब्रह्माजी ही पूजित होते हैं। जो पूर्णिमाको उपवास करके जगत्पति ब्रह्माका विधिपूर्वक पूजन करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। कार्तिककी पूर्णिमाको सावित्रीसहित चतुर्मुख ब्रह्माजीको गाजे-बाजेके साथ नगरमें घुमाये। तत्पश्चात् उन्हें विश्राम-स्थानपर स्थापित करे। फिर ब्राह्मणोंको