भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1297
१२६८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भोजन कराकर शाण्डिलेयकी पूजा करे। उसके बाद मंगलमय वाद्योंकी ध्वनिके साथ ब्रह्माजीको पुनः रथपर बिठाये। रथके आगे शाण्डिली-पुत्रकी विधिवत् पूजा करके ब्राह्मणोंसे पुण्याहवाचन कराये। रथपर चढ़ानेके बाद रातमें जागरण करे। ब्रह्माजीके दाहिने पार्श्वमें सावित्रीदेवीको स्थापित करे और भोजनको बायें पार्श्वमें। ब्रह्माजीके आगे एक कमल रख दे, फिर वाद्यों और शंखोंकी तुमुल ध्वनिके साथ समूचे नगरकी प्रदक्षिणा करते हुए रथको घुमाये और अपने स्थानपर आकर ब्रह्माजीकी आरती करके फिर उन्हें यथास्थान विराजमान करे। जो इस प्रकार यात्रा करता है, जो उस यात्राको देखता है अथवा ब्रह्माजीके रथको खींचता है, वह ब्रह्मधाममें जाता है। जो ब्रह्माजीके रथके पीछे दीप धारण करता है, वह पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका महान् फल पाता है। राजाको चाहिये कि वह ब्रह्माजीकी रथयात्रा अवश्य कराये। प्रतिपदाको ब्राह्मणभोजन कराना चाहिये और उन ब्राह्मणोंका नवीन वस्त्र, गन्ध, माला और अनुलेपन आदिके द्वारा पूजन करना चाहिये। जो कार्तिककी अमावास्याको ब्रह्माजीके मन्दिरमें दीप जलाता है, वह परम पदको प्राप्त होता है। सभी उत्सवोंके अवसरपर इन जगत्पति ब्रह्माजीकी पूजा करनी चाहिये।

पार्वती! अब मैं ब्रह्माजीके एक सौ आठ नाम कहता हूँ; उनका अष्टोत्तरशतनामस्तोत्र परम दिव्य, गोपनीय तथा पापनाशक है। वेदोंके ज्ञाता महात्मा ब्राह्मणको इसका उपदेश देना चाहिये। पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने पूछा—'देवदेव पितामह! आप किन-किन स्थानोंमें किस-किस नामसे निवास करते हैं? यह स्मरण करके बताइये।'

ब्रह्माजीने कहा—मैं पुष्करमें सुरश्रेष्ठ, गयामें प्रपितामह, कान्यकुब्जमें वेदगर्भ, भृगुकच्छमें चतुर्मुख, कौबेरीमें सृष्टिकर्ता, नन्दिपुरीमें बृहस्पति, प्रभासमें बालरूपी, वाराणसीमें सुरप्रिय, द्वारावतीमें चक्रदेव, वैदिशमें भुवनाधिप, पौण्ड्रकमें पुण्डरीकाक्ष, हस्तिनापुरमें पीताक्ष, जयन्तीमें विजय, पुरुषोत्तममें जयन्त, वाडमें पद्महस्त, तमोलिप्तमें तमोनुद, आहिच्छत्रीमें जनानन्द, कांचीपुरीमें जनप्रिय, कर्नाटकमें ब्रह्मा, ऋषिकुण्डमें मुनि, श्रीकण्ठमें श्रीनिवास, कामरूपमें शुभंकर, उड्डीयानमें देवकर्ता, जालन्धरमें स्रष्टा, मल्लिकामें विष्णु, महेन्द्रपर्वतपर भार्गव, गोमदमें स्थविराकार, उज्जयिनीमें पितामह, कौशाम्बीमें महादेव, अयोध्यामें राघव, चित्रकूटमें विरंचि, विन्ध्याचलमें वाराह, हरिद्वारमें सुरश्रेष्ठ, हिमवान् पर्वतपर शंकर, देहिकामें स्रुचाहस्त, अर्बुदमें पद्महस्त, वृन्दावनमें पद्मनेत्र, नैमिषारण्यमें कुशहस्त, गोपक्षेत्रमें गोविन्द, यमुनातटपर सुरेन्द्र, भागीरथीमें पद्मतनु, जनस्थलमें जनानन्द, कोंकणमें मध्वक्ष, काम्पिल्यमें कनकप्रभ, खेटकमें अन्नदाता, क्रतुस्थलमें शम्भु, लंकामें पौलस्त्य, काश्मीरमें हंसवाहन, अर्बुदमें वसिष्ठ, उत्पलावनमें नारद, मेधकर्मे श्रुतिदाता, प्रयागमें यजुष्पति, शिवलिंगमें सामवेद, मार्कण्डस्थानमें मधुप्रिय, गोमन्तमें नारायण, विदर्भमें द्विजप्रिय, अंकुलकमें ब्रह्मगर्भ, ब्रह्मवाहमें सुतप्रिय, इन्द्रप्रस्थमें दुरधर्ष, पम्पामें सुदर्शन, विरजामें महारूप, राष्ट्रवर्धनमें सुरूप, कदम्बकमें जनाध्यक्ष, समस्थलमें देवाध्यक्ष, रुद्रपीठमें गंगाधर, सुपीठमें जलद, त्र्यम्बकमें त्रिपुरारि, श्रीशैलमें त्रिलोचन, प्लक्षपुरमें महादेव, कपालमें वेधनाशन, शृंगवेरपुरमें शौरि, निमिषक्षेत्रमें चक्रधारक, नन्दिपुरीमें विरूपाक्ष, प्लक्षपादपमें गौतम, हस्तिनाथमें माल्यवान्, वाचिकमें द्विजेन्द्र, इन्द्रपुरीमें दिवानाथ, भूतिकामें पुरन्दर, चन्द्रामें हंसबाहु, चम्पामें गरुडप्रिय, महोदयमें महायक्ष, पूतक वनमें सुयज्ञ, सिद्धेश्वरमें शुक्लवर्ण, विभामें पद्मबोधक, देवदारुवनमें लिंगी, उदकमें उमापति, मातृस्थानमें विनायक, अलकामें धनाधिप, त्रिकूटमें गोविन्द, पातालमें वासुकि, कोविदारमें युगाध्यक्ष, स्त्रीराज्यमें सुरप्रिय, पूर्णगिरिमें सुभोग, शाल्मलिमें तक्षक, अमरमें पापहा, अम्बिकामें सुदर्शन, नरवापीमें महावीर, कान्तारमें दुर्गनाशन, पद्मावतीमें पद्मगृह तथा गगनमें मृगलाञ्छन नामसे