संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1298, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * १२६९
रहता हूँ। मधुसूदन ! जो इन एक सौ आठमेंसे एकमात्र बालरूपी ब्रह्माका भी दर्शन कर लेता है, उसे पूर्वोक्त सभी ब्रह्मविग्रहोंके दर्शनका पुण्य-फल प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण ! जो प्रभासमें इन नामोंद्वारा मेरा स्तवन करता है, वह मेरे धामको पाकर आनन्द भोगता है। मेरे इस स्तोत्रके पाठसे या श्रवणसे मानसिक, वाचिक और शारीरिक सभी पाप छूट जाते हैं। कार्तिककी पूर्णिमाको जब कृत्तिका नक्षत्र हो, तब प्रभासक्षेत्रमें वह तिथि मुझे बहुत प्रिय है। और यदि उसी तिथिमें रोहिणी नक्षत्र आ जाय तो वह पुण्यमयी महा कार्तिकी कहलाती है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। शनैश्चर, रविवार अथवा बृहस्पतिवार तथा कृत्तिका नक्षत्रके योगसे युक्त यदि कार्तिक-मासकी पूर्णिमा हो तो उसमें बालरूपी ब्रह्माजीका दर्शन करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। विशाखा नक्षत्रके सूर्य और कृत्तिका नक्षत्रके चन्द्रमा हों तो वह पद्मकयोग प्रभासक्षेत्रमें दुर्लभ है। करोड़ों पापोंसे युक्त मनुष्य भी उक्त योगमें प्रभासक्षेत्रके भीतर यदि बालरूपधारी ब्रह्माजीका दर्शन कर ले तो उसे यमलोक नहीं देखना पड़ता।
o
प्रत्यूषेश्वर, अनिलेश्वर, प्रभासेश्वर, रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, कुण्डेश्वरीदेवी तथा भूतेश्वरका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—तदनन्तर सोमेश्वरसे ईशानकोणमें पचास धनुषके अन्तरपर प्रत्यूषेश्वर नामक लिंग है। उसके दर्शनसे सात जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है। धर्मराजसे उनकी पत्नी विश्वाने आठ पुत्रोंको जन्म दिया, जो आठ 'वसु' कहलाये। उनके नाम इस प्रकार हैं—आप, भव, सोम, धर, अनल, अनिल, प्रत्यूष और प्रभास। इनमें सातवें वसु प्रत्यूष पुत्रकी इच्छासे प्रभासक्षेत्रमें आये और शिवलिंगकी स्थापना करके मेरा ध्यान करते हुए उन्होंने शान्तचित्तसे दिव्य सौ वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। उनकी भक्तिसे मैं प्रसन्न हुआ और मैंने उन्हें पुत्र दिया। योगियोंमें श्रेष्ठ देवल ही उनके पुत्र हैं। प्रत्यूषके द्वारा स्थापित और पूजित होनेसे उस लिंगका नाम 'प्रत्यूषेश्वर' हुआ। जो सन्तानहीन पुरुष उनकी आराधना करता है, उसके कुलमें कभी सन्ततिका नाश नहीं होता। जो भक्तिभावसे इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए सदा उनकी पूजा करता है, उसका महापाप भी नष्ट हो जाता है। माघ कृष्णा चतुर्दशीकी रात्रिमें वहाँ जागरण करना चाहिये। जागरण करनेसे मनुष्य सब दानों और यज्ञोंका फल पा लेता है।
वहाँसे उत्तर और ईशान दिशामें तीन धनुषकी दूरीपर अनिलेश्वरलिंग है, उनका बड़ा प्रभाव है। वह दर्शनमात्रसे सब पापोंका नाश करनेवाला है। पूर्वोक्त आठ वसुओंमेंसे अनिलने मेरी आराधना करके मेरा प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किया और शिवलिंगकी स्थापना की। इससे उन्हें मनोजव नामक पुत्र प्राप्त हुआ। अनिलेश्वरका दर्शन करके मनुष्य कभी अन्धा, बहरा, गूँगा, रोगी और निर्धन नहीं होता। जो उस लिंगपर एक फूल भी चढ़ा देता है, वह सदा सुख-सौभाग्यसे सम्पन्न तथा रूपवान् होता है।
गौरी-तपोवनसे पश्चिम सात धनुषकी दूरीपर प्रभासेश्वर नामक महान् शिवलिंग है, जिसकी स्थापना शिवपूजनपरायण आठवें वसु प्रभासने की है। प्रभासने वहाँ सौ वर्षोंतक तपस्या की। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने उन्हें मनोवांछित वर दिया। प्रभासके पुत्र विश्वकर्मा हुए। माघमासकी चतुर्दशीको समुद्रसंगममें स्नान करके मनुष्य भूमिशयन और उपवासका नियम ले शतरुद्रियका जप करे तथा पंचामृतसे प्रभासेश्वरको स्नान कराकर विधिपूर्वक