भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1299, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1299
१२७०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उनकी पूजा करे। यों करनेसे वह सब पापोंसे मुक्त और सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न होता है।

प्रभासेश्वरसे ईशानकोणमें साठ धनुषकी दूरीपर पुष्करारण्य है। वहीं ज्येष्ठपुष्कर नामक कुण्ड है। वह समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। पुण्यहीन पुरुषोंके लिये वह दुर्लभ है। पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् श्रीरामने वहाँ रामेश्वरलिंगकी स्थापना की थी। उसकी पूजा करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है।

चौबीसवें त्रेतायुगकी बात है, पुरोहित वसिष्ठजीके द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ कराये जानेपर राजा दशरथके चार पुत्र हुए। उनमेंसे श्रीरामचन्द्रजी सीता और लक्ष्मणके साथ वनवासके लिये गये। उसी समय यात्रा-प्रसंगसे वे प्रभासक्षेत्रमें भी आये। ज्येष्ठपुष्करके समीप आकर वे विश्रामके लिये बैठे। सूर्यास्त हो जानेपर उन्होंने पृथ्वीपर पत्ते बिछाये और सो गये। कुछ रात बाकी रहनेपर स्वप्नमें उन्हें अपने पिता दशरथजीका दर्शन हुआ। प्रातःकाल उठकर उन्होंने ब्राह्मणोंसे यह सब बात कही।

तब ब्राह्मणोंने कहा—रघुनन्दन ! पितर आपका अभ्युदय चाहते हैं; जब वे वर देनेको उद्यत होते हैं, तभी स्वप्नमें अपने वंशजोंको दर्शन देते हैं। यह परम पुण्यमय स्थान भगवान् विष्णुका गुप्त तीर्थ है। प्रभासक्षेत्रमें इसकी पुष्कर नामसे प्रसिद्धि है। अतः यहाँ पितरोंका श्राद्ध कीजिये। निश्चय ही राजा दशरथ इस तीर्थमें आपके द्वारा दिया हुआ शुभ पिण्ड प्राप्त करना चाहते हैं। इसीलिये उन्होंने दर्शन दिया है।

उनकी बात सुनकर कमलनयन श्रीरामने श्राद्धके लिये ब्राह्मणोंको निमन्त्रित किया और लक्ष्मणजीसे कहा—'सुमित्रानन्दन ! तुम श्राद्धके लिये फल लेनेको जाओ।' 'बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मणजी गये और अनेक प्रकारके उत्तम फल ले आये। जानकीजीने उन फलोंको शीघ्र ही पकाकर तैयार किया। फिर कुतप काल (मध्याह्नके समय)-में नहा-धोकर पवित्र हो वल्कल धारण किये हुए श्रीरामचन्द्रजी श्राद्धके योग्य ब्राह्मणोंको बुला ले आये। गालव, देवल, रैभ्य, यवक्रीत, पर्वत, भारद्वाज, वसिष्ठ, जाबालि, गौतम, भृगु तथा अन्य बहुत-से वेदज्ञ ब्राह्मण श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा किये जानेवाले श्राद्धको सम्पन्न करनेके लिये आये। इसी समय श्रीरामचन्द्रजीने सीतासे कहा—'विदेहनन्दिनि ! आओ, ब्राह्मणोंके लिये पाद्य और अर्घ्य दो।' यह सुनकर सीताजी वृक्षोंके बीचमें चली गयीं और लताकुंजमें अपनेको छिपाकर श्रीरामचन्द्रजीकी दृष्टिसे ओझल हो गयीं। इधर श्रीरामचन्द्रजी 'सीते ! सीते !' कहकर पुकारने लगे। तब लक्ष्मणजीने ही ब्राह्मणोंको अर्घ्य देनेका कार्य किया। जब ब्राह्मणलोग भोजन कर चुके और पिण्डदानका कार्य समाप्त हो गया, तब जनकनन्दिनी सीता श्रीरामचन्द्रजीके पास आयीं। उन्हें देखकर श्रीरामने पूछा—'श्राद्धकाल उपस्थित होनेपर तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली गयी थीं?'

सीताजीने हाथ जोड़कर कहा—प्रभो! आज मैंने आपके पिता, पितामह, प्रपितामह तथा मातामह आदिको भी देखा है। वे पृथक्-पृथक् ब्राह्मणोंके अंगोंमें स्थित थे। अतः उनके सामने जानेमें मुझे लज्जा हुई। श्वशुरवर्गको उपस्थित देखकर मैं लज्जासे ही छिप गयी थी।

यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने पुष्करके समीप ही वहाँसे एक धनुष दक्षिण हटकर रामेश्वरलिंगकी स्थापना की। जो मनुष्य गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक रामेश्वरका पूजन करता है, वह भगवान् विष्णुके उत्तम धाममें जाता है। शुक्ल अथवा मंगलयुक्त चतुर्थी तथा आश्विनमासकी षष्ठीको वहाँ श्राद्ध करनेसे महान् फल होता है। वहाँ पुष्करमें अपने वंशजोंद्वारा तर्पण किये जानेपर पितर और पितामह बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं और दूसरी किसी भी वस्तुकी इच्छा नहीं करते।