संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| १२७० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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उनकी पूजा करे। यों करनेसे वह सब पापोंसे मुक्त और सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न होता है।
प्रभासेश्वरसे ईशानकोणमें साठ धनुषकी दूरीपर पुष्करारण्य है। वहीं ज्येष्ठपुष्कर नामक कुण्ड है। वह समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। पुण्यहीन पुरुषोंके लिये वह दुर्लभ है। पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् श्रीरामने वहाँ रामेश्वरलिंगकी स्थापना की थी। उसकी पूजा करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है।
चौबीसवें त्रेतायुगकी बात है, पुरोहित वसिष्ठजीके द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ कराये जानेपर राजा दशरथके चार पुत्र हुए। उनमेंसे श्रीरामचन्द्रजी सीता और लक्ष्मणके साथ वनवासके लिये गये। उसी समय यात्रा-प्रसंगसे वे प्रभासक्षेत्रमें भी आये। ज्येष्ठपुष्करके समीप आकर वे विश्रामके लिये बैठे। सूर्यास्त हो जानेपर उन्होंने पृथ्वीपर पत्ते बिछाये और सो गये। कुछ रात बाकी रहनेपर स्वप्नमें उन्हें अपने पिता दशरथजीका दर्शन हुआ। प्रातःकाल उठकर उन्होंने ब्राह्मणोंसे यह सब बात कही।
तब ब्राह्मणोंने कहा—रघुनन्दन ! पितर आपका अभ्युदय चाहते हैं; जब वे वर देनेको उद्यत होते हैं, तभी स्वप्नमें अपने वंशजोंको दर्शन देते हैं। यह परम पुण्यमय स्थान भगवान् विष्णुका गुप्त तीर्थ है। प्रभासक्षेत्रमें इसकी पुष्कर नामसे प्रसिद्धि है। अतः यहाँ पितरोंका श्राद्ध कीजिये। निश्चय ही राजा दशरथ इस तीर्थमें आपके द्वारा दिया हुआ शुभ पिण्ड प्राप्त करना चाहते हैं। इसीलिये उन्होंने दर्शन दिया है।
उनकी बात सुनकर कमलनयन श्रीरामने श्राद्धके लिये ब्राह्मणोंको निमन्त्रित किया और लक्ष्मणजीसे कहा—'सुमित्रानन्दन ! तुम श्राद्धके लिये फल लेनेको जाओ।' 'बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मणजी गये और अनेक प्रकारके उत्तम फल ले आये। जानकीजीने उन फलोंको शीघ्र ही पकाकर तैयार किया। फिर कुतप काल (मध्याह्नके समय)-में नहा-धोकर पवित्र हो वल्कल धारण किये हुए श्रीरामचन्द्रजी श्राद्धके योग्य ब्राह्मणोंको बुला ले आये। गालव, देवल, रैभ्य, यवक्रीत, पर्वत, भारद्वाज, वसिष्ठ, जाबालि, गौतम, भृगु तथा अन्य बहुत-से वेदज्ञ ब्राह्मण श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा किये जानेवाले श्राद्धको सम्पन्न करनेके लिये आये। इसी समय श्रीरामचन्द्रजीने सीतासे कहा—'विदेहनन्दिनि ! आओ, ब्राह्मणोंके लिये पाद्य और अर्घ्य दो।' यह सुनकर सीताजी वृक्षोंके बीचमें चली गयीं और लताकुंजमें अपनेको छिपाकर श्रीरामचन्द्रजीकी दृष्टिसे ओझल हो गयीं। इधर श्रीरामचन्द्रजी 'सीते ! सीते !' कहकर पुकारने लगे। तब लक्ष्मणजीने ही ब्राह्मणोंको अर्घ्य देनेका कार्य किया। जब ब्राह्मणलोग भोजन कर चुके और पिण्डदानका कार्य समाप्त हो गया, तब जनकनन्दिनी सीता श्रीरामचन्द्रजीके पास आयीं। उन्हें देखकर श्रीरामने पूछा—'श्राद्धकाल उपस्थित होनेपर तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली गयी थीं?'
सीताजीने हाथ जोड़कर कहा—प्रभो! आज मैंने आपके पिता, पितामह, प्रपितामह तथा मातामह आदिको भी देखा है। वे पृथक्-पृथक् ब्राह्मणोंके अंगोंमें स्थित थे। अतः उनके सामने जानेमें मुझे लज्जा हुई। श्वशुरवर्गको उपस्थित देखकर मैं लज्जासे ही छिप गयी थी।
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने पुष्करके समीप ही वहाँसे एक धनुष दक्षिण हटकर रामेश्वरलिंगकी स्थापना की। जो मनुष्य गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक रामेश्वरका पूजन करता है, वह भगवान् विष्णुके उत्तम धाममें जाता है। शुक्ल अथवा मंगलयुक्त चतुर्थी तथा आश्विनमासकी षष्ठीको वहाँ श्राद्ध करनेसे महान् फल होता है। वहाँ पुष्करमें अपने वंशजोंद्वारा तर्पण किये जानेपर पितर और पितामह बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं और दूसरी किसी भी वस्तुकी इच्छा नहीं करते।
- प्रभासखण्ड * १२७१
रामेश्वरसे तीस धनुष पूर्व दिशामें लक्ष्मणेश्वर-लिंग है। यात्रामें गये हुए लक्ष्मणजीने उस देवपूजित लिंगको स्थापित किया था। जो स्त्री या पुरुष विधिपूर्वक स्नान कराकर भक्तिभावसे लक्ष्मणेश्वरका पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। रामेश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें जानकीश्वर-लिंग है। जो नारी माघमासकी तृतीयाको जानकीश्वरका पूजन करती है, उसके वंशमें दुर्भाग्य, दुःख और शोक नहीं होते।
तदनन्तर वामन स्वामीके नामसे प्रसिद्ध पापहारी विष्णुके समीप जाय। उनका स्थान पुष्करसे नैर्ऋत्यकोणमें बीस धनुषके अन्तरपर है। जिस समय उन्होंने दैत्यराज बलिको बाँधा था, उस समय पहला चरण वहीं (प्रभासक्षेत्रमें) रखा, दूसरा मेरु-शिखरपर रखा और तीसरा आकाशमें जब ऊपरकी ओर वे पैर बढ़ाने लगे तब उनके चरणोंके अग्रभागसे ब्रह्माण्ड फूट गया तथा वहाँसे जल निकल आया। वह जल उनके घुटनेके मार्गसे बहता हुआ इस पृथ्वीपर आया। वही इस पृथ्वीपर विष्णुपदी गंगाके नामसे प्रसिद्ध है। महानदी गंगा पहले प्रभासक्षेत्रके अन्तर्गत पुष्करमें ही आयी। जो मनुष्य विष्णुपदीमें स्नान करके भगवान्के चरणका दर्शन करता है, वह उनके परम धाममें जाता है। जो वहाँ ब्राह्मणको उपानह देता है वह श्रेष्ठ विमानपर चढ़कर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
वहाँसे दक्षिण जानकीश्वरके समीप परम उत्तम पुष्करेश्वरलिंग है, जिसकी पूजा ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार मुनिने सुवर्णमय कमलोंसे की है। वह सब पातकोंका नाश करनेवाला है। जो मनुष्य भक्तिसे गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा उनकी पूजा करता है, उसको पुष्करयात्राका फल मिलता है।
पुष्करसे वायव्यकोणमें तीस धनुषपर और भूतेश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें कुण्डेश्वरी देवीका स्थान है। वे देवी दरिद्रता और पापका नाश करनेवाली हैं। उनसे नैर्ऋत्यकोणमें पंद्रह धनुषकी दूरीपर शंखोदक कुण्ड है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। जो पुरुष अथवा सदाचारिणी स्त्री शंखावर्ता नामसे विख्यात देवीकी पूजा करती है, उसके सब मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। कलियुगमें शंखावर्ता देवी कुण्डेश्वरी नामसे प्रसिद्ध हैं। प्राचीन कालमें भगवान् विष्णुने जब शंख नामक दैत्यको मारा, उस समय उसके शंखाकार शरीरको इसी तीर्थके जलसे धोकर पवित्र किया और मेघके समान गम्भीर ध्वनिवाले उस शंखको वहीं बजाया। उसके गम्भीर नादसे देवी वहाँ आयीं और कुण्डके समीप स्थित होकर कारण पूछने लगीं। इसीसे उनका नाम 'कुण्डेश्वरी' हुआ। जो स्त्री या पुरुष माघमासकी तृतीयाको कुण्डेश्वरी देवीका पूजन करता है, उसे गौरी-पदकी प्राप्ति होती है। यात्राके फलकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंको वहाँ ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराना चाहिये।
कुण्डेश्वरीसे ईशानकोणमें बीस धनुषके अन्तरपर भूतनाथेश्वर शिव हैं। वह आदि-अन्तरहित लिंग कल्पपर्यन्त रहनेवाला है। पहले त्रेतायुगमें उसका नाम वीरभद्रेश्वर था। फिर कलियुगमें भूतेश्वर हुआ। जब द्वापर और कलियुगकी सन्धिक़ा समय चल रहा था, उस समय उस लिंगके प्रभावसे करोड़ों भूतप्राणी परमसिद्धि (मुक्ति)-को प्राप्त हुए थे। इसीसे भूतलपर वह 'भूतेश्वर' नामसे विख्यात हुआ। जो कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको रात्रिमें भूतेश्वर शिवका पूजन करके दक्षिण दिशामें जा जितेन्द्रिय, निर्भय एवं ध्यानपरायण होकर अघोरमन्त्रका जप करता है, उसको पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। वहाँपर पितरोंकी प्रेतयोनिसे मुक्तिके लिये तिल, सुवर्ण और पिण्डका दान करना चाहिये।
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१२७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
गोप्य़ादित्यकी स्थापना और महिमा तथा नीलसे हानि
भूतेशसे वायव्यकोणमें तीस धनुषकी दूरीपर गोप्यादित्यका स्थान है। पूर्वकालमें महातेजस्वी श्रीकृष्ण जब छप्पन कोटि यादवोंके सात प्रभासक्षेत्रमें आये, उस समय सोलह हजार गोपियाँ भी वहाँ आ गयीं। उनमेंसे जो सर्वश्रेष्ठ सोलह गोपियाँ बतायी गयी हैं, उनके नाम बताता हूँ; सुनो—लम्बिनी, चन्द्रिका, कान्ता, अक्रूरा, शान्ता, महोदया, भीषणी, नन्दिनी, अशोका, सुपर्णा, विमला, अक्षया, शुभदा, शोभना और पुण्या—ये हंस (श्रीकृष्णचन्द्र)-की कलाएँ मानी गयी हैं। परमात्मा श्रीकृष्ण ही हंस हैं और उनकी ये शक्तियाँ हैं। श्रीकृष्ण चन्द्रस्वरूप हैं और ये गोपियाँ उनकी कलाएँ हैं। उपर्युक्त पंद्रह कलाओंके सिवा, मालिनी उनकी सोलहवीं कला है। जो पुरुष इस प्रकार जानता है, उसे वैष्णव जानना चाहिये।
उन सोलह हजार गोपियोंने भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञा ले उस क्षेत्रमें निवास करनेवाले नारद आदि मुनियोंके सहयोगसे विधिपूर्वक भगवान् सूर्यकी स्थापना की और नाना प्रकारके दान दिये। महर्षियोंने वहाँ भगवान् सूर्यका नाम गोप्यादित्य रखा। इस प्रकार सूर्यदेवकी प्रतिष्ठा हो जानेपर वे सब गोपियाँ कृतार्थ हुईं और महान् यश पाकर श्रीकृष्णके साथ द्वारकाको गयीं। प्रभासक्षेत्रमें गोपियोंद्वारा स्थापित जो गोप्यादित्य हैं, उनका दर्शनमात्र करके मनुष्य दुःखशोकसे मुक्त हो जाता है। जो मानव माघमासकी सप्तमीको उपवास करके गोप्यादित्यकी पूजा करता है, वह अपने पितरोंको सात बार तृप्त कर लेता है। वह अपने समस्त रोगोंका नाश करता है और दुश्चेष्टापरायण दुर्जय शत्रुओंको भी जीत लेता है। सप्तमीको तैलका स्पर्श न करे, नीले रंगका वस्त्र न पहने, आँवला लगाकर स्नान न करे और कहीं किसीके साथ विवाद भी न करे। नीलके रँगे हुए वस्त्र धारण करके द्विज जो भी स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय तथा पितृतर्पण आदि कर्म करता है, वे तथा इसके पञ्च महायज्ञ भी उस नील सूत्रके कारण नष्ट हो जाते हैं। यदि ब्राह्मण नीलका रँगा वस्त्र अपने अंगोंमें धारण कर ले तो दिन-रात उपवास करके पंचगव्य पीनेसे शुद्ध होता है। यदि किसी ब्राह्मणके रोमकूपोंमें नीलके रसका (नीलमिश्रित जलका) प्रवेश हो जाय तो वह पतित हो जाता है और तीन कृच्छ्र-व्रत करनेपर उसकी शुद्धि होती है। यदि ब्राह्मण भूलसे भी नील-वृक्षोंके बीचसे निकल जाय तो वह दिन-रात उपवास करके पंचगव्य पीनेपर शुद्ध होता है। यदि ब्राह्मणके शरीरमें नीलकी लकड़ी गड़ जाय और रक्त दिखायी देने लगे तो उसे चान्द्रायण व्रत करना चाहिये। देवि! जो अनजानमें नीलका दाँतौन कर लेता है, वह दो बार कृच्छ्र-व्रत करनेपर उस पापसे शुद्ध होता है।*
पार्वती! कुरुजांगल (कुरुक्षेत्र)-में एक लाख गोदान करनेसे जो पुण्य होता है, वह सब गोप्यादित्यके दर्शनमात्रसे प्राप्त हो जाता है।
* नीलरक्तेन वस्त्रेण यत्कर्म कुरुते द्विजः। स्नानं दानं जपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम्॥
नश्यन्त्यस्य महायज्ञा नीलसूत्रस्य कारणात्। नीलरक्तं यदा वस्त्रं विप्रस्त्वङ्गेषु धारयेत्॥
अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति। रोमकूपे यदा गच्छेदद्रसं नीलस्य कस्यचित्॥
पतितस्तु भवेद् विप्रस्त्रिभिः कृच्छ्रैर्विशुद्ध्यति। नीलमध्ये यदा गच्छेदप्रमादाद् ब्राह्मणः क्वचित्॥
अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति। नीलदारु यदा भिन्द्याद् ब्राह्मणानां शरीरके॥
शोणितं दृश्यते चैव द्विजश्चान्द्रायणं चरेत्। कुर्यादज्ञानतो यस्तु नीलं वै दन्तधावनम्॥
कृत्वा कृच्छ्रद्वयं देवि तस्मात् पापाद् विशुद्ध्यति। (स्क० पु०, प्र० खं० ११५। ३१-३७)
| * प्रभासखण्ड * | १२७३ |
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रामेश्वर, चित्रांगदेश्वर तथा रावणेश्वरकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—तदनन्तर परशुरामजीके द्वारा स्थापित रामेश्वरलिंगका दर्शन करे। वह स्थान गोपीश्वरसे वायव्यकोणमें तीस धनुषकी दूरीपर है। जिस समय जमदग्निपुत्र परशुरामजीने पिताकी आज्ञासे अपनी माताका वध किया और पिताके अनुग्रहसे वह पुनः जीवित हो गयी, उस समय प्रभासक्षेत्रमें आकर उन्होंने अद्भुत तपस्या की। वे मेरे विग्रहकी स्थापना करके एक सौ पचास वर्षतक आराधनामें संलग्न रहे। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने उन्हें मनोवांछित वर दिया और उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगमें निवास किया। इससे महर्षि परशुराम कृतार्थ हुए। तदनन्तर भूमण्डलके सम्पूर्ण क्षत्रियोंका इक्कीस बार संहार करके वे माता-पिताके ऋणसे उऋण हुए। जो मनुष्य उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो मेरे धाममें जाता है।
रामेश्वरसे बीस धनुषके अन्तरपर नैर्ऋत्यकोणमें चित्रांगदेश्वरलिंग है। गन्धर्वोंके स्वामी चित्रांगदने उस क्षेत्रको परम पवित्र जानकर वहाँ शिवलिंग स्थापित किया और बड़ी भारी तपस्या करके मेरी आराधना की। जो पुरुष भाव-भक्तिसे युक्त हो उस लिंगकी पूजा करता है, वह गन्धर्वलोकमें जाता और गन्धर्वोंके साथ आनन्द भोगता है। शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको जो विधिपूर्वक उस शिवलिंगको स्नान कराकर भाँति-भाँतिके पुष्प, चन्दन और धूप आदिके द्वारा उसकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण मनोवांछित फलको प्राप्त कर लेता है।
उस स्थानसे दक्षिण और नैर्ऋत्यमें सोलह धनुषके अन्तरपर रावणेश्वरलिंग है, जिसकी स्थापना रावणने की है। वहाँ उसने भक्तिपूर्वक उपवास करके मेरी आराधना की और गीत, वाद्य आदिका आयोजन करके जागरण किया। पंद्रह दिनोंतक इस प्रकार मेरी अर्चना करनेपर आकाशवाणी हुई—'महाबाहु दशग्रीव! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरे प्रसादसे तीनों लोक तुम्हारे अधीन होंगे। मैं प्रतिदिन तुम्हारे द्वारा स्थापित शिवलिंगमें निवास करूँगा। राक्षसराज! जो मानव भक्तिपूर्वक रावणेश्वर लिंगकी पूजा करेंगे, वे शत्रुओंसे अजय होंगे। मेरी कृपासे उन्हें परमसिद्धि प्राप्त होगी।'
यों कहकर मेरी आकाशवाणी मौन हो गयी। रावणने भी सन्तुष्ट होकर बार-बार मेरा पूजन किया और तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छा रखकर वह पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो अभीष्ट स्थानको चला गया।
रावणेश्वरसे पश्चिम पाँच धनुष दूर सौभाग्यदायिनी गौरीका निवास है, जहाँपर सौभाग्यकी इच्छा रखनेवाली अरुन्धतीदेवीने गौरीजीकी आराधनामें तत्पर हो घोर तपस्या की थी। गौरीदेवीके प्रसादसे उन्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई। जो माघ शुक्ला तृतीयाको भक्तिपूर्वक गौरीजीका पूजन करता है, वह सात जन्मोंतक सौभाग्यशाली होता है।
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पौलोमीश्वर, शाण्डिल्येश्वर, क्षेमेश्वर तथा सागरादित्यका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—रावणेश्वरसे वायव्यकोणमें तीस धनुषकी दूरीपर पौलोमीश्वरलिंग है। उसकी स्थापना पुलोमपुत्री शचीने की थी। जिस समय तारकासुरने देवताओंका राज्य छीन लिया और स्वयं इन्द्रपदपर अधिकार जमा लिया तथा उसके भयसे व्याकुल इन्द्रदेव कहीं भाग गये, उस समय उनकी पत्नी शचीने शोकसे दुर्बल होकर मेरी आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने शचीसे कहा—'देवि! मेरा पुत्र तारकासुरका वध करेगा। तुम निश्चिन्त होकर जाओ। जो
| १२७४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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मानव इस पौलोमीश्वरलिंगका पूजन करेगा, वह मेरा पार्षद होकर मेरे समीप पहुँच जायगा।' यह सुनकर पतिव्रता इन्द्राणी देवराज इन्द्रके समीप चली गयीं।
ब्रह्माजीके स्थानसे पश्चिम सोलह धनुषके अन्तरपर शाण्डिल्येश्वरलिंग है। जिसके दर्शनमात्रसे सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जाता है। ब्रह्मर्षि शाण्डिल्य ब्रह्माजीके सारथि माने गये हैं। वे तपस्वी महातेजस्वी, ज्ञाननिष्ठ और जितेन्द्रिय हैं। उन्होंने प्रभासक्षेत्रमें आकर बड़ी उग्र तपस्या की। सोमनाथके उत्तर एक महालिंग स्थापित करके उसकी सौ वर्षोंतक पूजा की। तत्पश्चात् मनोवांछित वस्तुको पाकर वे कृतकृत्य हो गये। मेरे प्रसादसे उन्हें अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त हुईं। शाण्डिल्येश्वर शिवका दर्शन करके मनुष्य तत्काल पापरहित हो जाता है।
शाण्डिल्येश्वरसे उत्तर और कपालेश्वरसे अग्निकोणमें पंद्रह धनुषपर सर्वपापनाशक क्षेमेश्वरलिंग है। राजा क्षेममूर्त्तिने भक्तिपूर्ण हृदयसे उसकी स्थापना की है। जो क्षेमेश्वरका दर्शन करता है, वह क्षेमको प्राप्त होता और उसका प्रत्येक कार्य क्षेमपूर्वक सिद्ध होता है।
पार्वती! वहाँसे परम उत्तम सागरादित्य दर्शन करनेके लिये जाना चाहिये। वह स्थान भैरवेश्वर तथा मृत्युंजय रुद्रसे पश्चिम और कामेश्वरलिंगसे दक्षिण एवं अग्निकोणमें थोड़ी ही दूरपर है। सूर्यवंशमें उत्पन्न महात्मा राजा सगरने प्रभासक्षेत्रको उत्तम तीर्थ जानकर वहीं भगवान् सूर्यकी स्थापना की और उसी स्थानपर तपस्या करके उन्होंने सूर्यदेवको प्रसन्न किया। दस हजार योजन विस्तृत और अठासी हजार योजन लम्बा समुद्र सगरके पुत्रोंकी ही कीर्ति है, इसीलिये उसका नाम सागर है। आज भी राजा सगरकी कीर्ति-कथा गायी जाती है और पुराणोंमें उनके सुयशकी गाथा प्रसिद्ध है। सागरादित्यका दर्शन करके मनुष्य जड, अन्ध, दरिद्र और दुःखी नहीं होता। उसे प्रियजनोंसे वियोग तथा रोग भी नहीं होते और वह कभी पापका आचरण नहीं करता। माघमासके शुक्लपक्षमें षष्ठी तिथिको उपवास करके जितेन्द्रिय मनुष्य रातमें उनके आगे शयन करे। फिर सप्तमीको सबेरे उठकर भक्तिभावसे सूर्यदेवकी पूजा करे और ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराये। यों करनेवाले मानव सूर्यनारायणके भक्तोंको प्राप्त होनेवाली उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। जो पुरुष दूर्वाके अंकुरोंसे भी भक्तिपूर्वक सूर्यदेवकी पूजा करते हैं, उन्हें वे सब यज्ञोंसे भी दुर्लभ फल देते हैं; इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके सूर्यनारायणकी आराधना करनी चाहिये। वे सबके आत्मा, समस्त लोकोंके स्वामी, देवताओंके भी देवता और प्रजाजनोंके पालक हैं। सूर्यदेव ही त्रिलोकीके मूल कारण तथा परम देवता हैं। जितेन्द्रिय मनुष्यको चाहिये कि वह विधिसे भगवान् सूर्यकी पूजा करके समस्त पातकोंका नाश करनेवाले इस स्तोत्रका पाठ करे। इस स्तोत्रमें सूर्यदेवके गुह्य, पवित्र एवं शुभ नाम हैं। विकर्तन, विवस्वान्, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, श्रीमान्, लोकचक्षु, ग्रहेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश्वर, कर्ता, हर्ता, तमिस्रहा, तपन, तापन, शुचि, सप्ताश्ववाहन, गभस्तिहस्त, ब्रह्मा तथा सर्वदेवनमस्कृत—इस प्रकार इक्कीस नामोंका जो स्तोत्र है, इससे सन्तुष्ट होकर भगवान् सूर्य शरीरको आरोग्य देते हैं, धन बढ़ाते हैं तथा यशकी प्राप्ति कराते हैं। जो सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों सन्ध्याओंके समय पवित्र होकर इससे सूर्यदेवकी स्तुति करता है अथवा जो इसे सुनता तथा पढ़ता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और अन्तमें सूर्यलोकको प्राप्त होता है।
* प्रभासखण्ड * १२७५
अक्षमालेश्वर, पाशुपतेश्वर, ध्रुवेश्वर तथा सिद्धि लक्ष्मीकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—सागरादित्यसे ईशानकोणमें पचास धनुषके अन्तरपर अक्षमालेश्वरलिंग है, जो दर्शन और स्पर्श करनेसे सब प्राणियोंके पापका नाश करनेवाला है। भादोंमें ऋषिपंचमीको अक्षमालेश्वरके समीप जाकर मनुष्य नरकके भयसे मुक्त हो जाता है। वहाँ गोदान, अन्नदान और जलदानको श्रेष्ठ बताया गया है। उक्त दान करनेसे मनुष्योंके सब पापोंका नाश होता है तथा परलोकमें उन्हें अनन्त सुखकी प्राप्ति होती है।
उग्रसेनेश्वरसे पूर्वभागमें तथा गोप्यादित्यसे अग्निकोणमें कुछ दक्षिणकी ओर पाशुपतेश्वरलिंग विद्यमान है, जो दर्शनमात्रसे समस्त पापोंका नाशक और सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाला है। इस युगमें उसका सन्तोषेश्वर नाम कहा गया है। वह सम्पूर्ण सिद्धियोंका स्थान, शिवभक्तोंका आश्रय तथा पाप-रोगोंका औषध है। पार्वती! पाशुपतेश्वरलिंगके समीप वामदेव, सावणि, अघोर तथा कपिल—ये चार महर्षि सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं। उस शिवलिंगके समीप श्रीमुख नामका एक वन है, जो लक्ष्मी देवीका स्थान है। वहाँ योगी और सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। वहाँ उत्तम शिवभक्तोंका वास है। प्रभासक्षेत्रमें वह मन्दिर मुझे सदैव रुचिकर है। उसमें सदा ही मेरा निवास रहता है। वहाँ जो शिवभक्त मेरे ध्यानमें संलग्न रहते हैं, वे सब मेरे पुत्र हैं और पवित्र होकर उत्तम सिद्धिको प्राप्त होते हैं। यह पाशुपतेश्वरलिंग परब्रह्मस्वरूप है। इसका एक नाम अनादीश्वर भी है। यहाँ निवास करनेवाले ब्राह्मणोंको सिद्धि और मुक्ति भी प्राप्त होती है और इसी शरीरसे वे छः महीनेमें सिद्ध हो जाते हैं। इस लिंगका प्राकट्य संसार-बन्धनसे छुटकारा दिलानेके लिये हुआ है। यह सब लोगोंके लिये दुर्लभ मोक्ष एवं परमपद है। इस लिंगमें शिवतत्त्वका सम्पूर्ण ज्ञान प्रतिष्ठित है। जो माघमासमें निरन्तर भक्तिपूर्वक इनकी पूजा करता है, वह सब यज्ञों और दानोंका फल पाता है। 'अग्निः' इत्यादि मन्त्रसे वहाँ भस्म लेकर अपने अंगोंमें लगानी चाहिये। यदि संचित अग्निमेंसे भस्म लेनी हो तो उस घरके निवासियोंसे लेनी चाहिये। पूरा मन्त्र इस प्रकार है—
अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलमिति भस्म, स्थलमिति भस्म, सर्वं ह वा इदं भस्माभवत्।
'अग्नि, वायु, जल और स्थल—सभी भस्म हैं। यह जो कुछ भी दिखायी देता है, सबको भस्म होना है।'
जिसने शिवकी दीक्षा नहीं ली है, वह इस शिवलिंगका स्पर्श न करे। ब्राह्मणोंसे भस्म लेनी चाहिये, शूद्रोंसे नहीं। शूद्रोंका पाशुपत-व्रतमें अधिकार नहीं है। मैं प्रत्येक युगमें ब्राह्मणोंका शरीर धारण करके प्रकट होता हूँ।
राजा उत्तानपादके ध्रुव नामका एक पुत्र था, जो महात्मा, ज्ञानी, सर्वज्ञ तथा प्रियदर्शन था। उसने एक समय प्रभासक्षेत्रमें आकर सहस्रों वर्षोंतक बड़ी कठोर तपस्या की। वह शिवलिंगकी स्थापना करके प्रतिदिन भक्तिपूर्वक उसकी पूजा तथा स्तुति करता था। वह स्तुति इस प्रकार है—
ध्रुव बोले—जो सच्चिदानन्दस्वरूप तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं, उन भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। भयंकर संसार-सागरसे पार होनेके लिये सुदृढ़ सेतु हैं, केवल ध्यानके द्वारा जिनका कुछ चिन्तन किया जाता है तथा जो सम्पूर्ण योगशक्तियोंसे युक्त हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। सिद्ध और चारण जिसके स्वच्छ सलिलका सेवन करते हैं, जो बड़ी-बड़ी लहरोंके कारण अत्यन्त भयंकर जान पड़ती है, आकाशसे वेगपूर्वक गिरती हुई उस गंगाको जिन्होंने चंचल फूलोंकी मालाके समान अपने मस्तकपर धारण
| १२७६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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कर लिया, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने दैत्य, दानव, विद्याधर तथा नागगणोंको भी, जो इस पृथ्वीपर फल-मूलका आहार करते हुए तपस्यामें संलग्न रहे हैं, अपने परमपदकी प्राप्ति करायी है, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। यह सम्पूर्ण जगत् सदा जिनके अधीन रहता है, जो अपनी आठ मूर्तियोंद्वारा समस्त लोकोंका पालन करते हैं तथा जो परम कारण-तत्त्वोंके भी कारण हैं, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिन वरदायक परमेश्वरके चरणोंमें भक्तिपूर्वक प्रणाम करके तथा अमृतमयी वाणीसे जिनकी स्तुति करके उत्तम हृदयवाले भगवान् सूर्य अपनी दिव्य दीप्ति तथा किरणोंके द्वारा जगत्का अन्धकार दूर करते हैं, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ।
जो मनुष्य अपने मनको वशमें रखकर साक्षात् ध्रुवजीके द्वारा रचित इस रुचिर अर्थवाले स्तोत्रका पाठ करता है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता। उसके कर्म सदैव शुद्ध और पवित्र होते हैं तथा वह अनादिसिद्ध शिवलोकमें जाता है। पार्वती! शुद्ध चित्तवाले महात्मा ध्रुवके इस प्रकार स्तुति करनेपर मैं बहुत प्रसन्न हुआ और इस प्रकार बोला—‘वत्स ध्रुव! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमसे बहुत सन्तुष्ट हूँ। अब तुम परम शुद्ध हो गये। मैं तुम्हें दिव्यदृष्टि देता हूँ। तुम मुझे प्रत्यक्ष देखो।’
ध्रुवजीने कहा—देव! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे निर्मल भक्ति दीजिये और इस शिवलिंगमें सदा निवास कीजिये।
मैंने कहा—ध्रुव! तुमने जो माँगा है, वह सब मैंने तुम्हें दे दिया; साथ ही तुम्हें वह ध्रुव स्थान भी दिया, जिसे भगवान् विष्णुका परम पद कहते हैं। जो श्रावणकी अमावास्या तथा आश्विनकी पूर्णिमाको ध्रुवेश्वरकी पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है।
सोमेश्वरसे ईशानकोणमें थोड़ी ही दूरपर क्षेत्रपीठकी अधिष्ठात्री देवी वैष्णवी शक्ति है, जो सिद्धलक्ष्मीके नामसे विख्यात है। ब्रह्माण्डमें यह पहला पीठ है। इस पीठमें निवास करनेवाली भगवती महालक्ष्मी समस्त पापोंका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण अभीष्ट फलों और शुभको देनेवाली हैं। जो मनुष्य श्रीपंचमीके दिन गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक इनकी पूजा करता है, उसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। तृतीया, अष्टमी तथा चतुर्दशीको जो विधिपूर्वक लक्ष्मीदेवीकी पूजा करता है, उसके हाथमें सिद्धि आ जाती है।
महाकाली देवी, पुष्करावर्तका नदी, कंकालभैरव तथा चित्रादित्यकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—वहीं पातालविवरसे युक्त एक महापीठ है, जहाँ महाकाली देवी निवास करती हैं। वे सब दुःखोंकी शान्ति तथा समस्त शत्रुओंका नाश करनेवाली हैं कृष्णपक्षकी अष्टमीको आधी रातमें गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंसे विधिपूर्वक पूजा करनेपर वे समस्त दुःखोंका निवारण करती हैं। जो स्त्री शुद्धचित्त होकर एक वर्षतक प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीयाको विधिपूर्वक देवीकी पूजा करती है, वह सात जन्मोंतक क्षुधा, दुर्भाग्य और दीनताका कष्ट नहीं भोगती।
ब्रह्मकुण्डसे उत्तरमें थोड़ी ही दूरपर पुष्करावर्तका नदी है। पूर्वकालमें जब महात्मा सोमका यज्ञ प्रारम्भ हुआ, उस समय उनका निमन्त्रण पाकर सोमनाथकी प्रतिष्ठा करानेके लिये सब देवताओंके साथ ब्रह्माजी भी प्रभासक्षेत्रमें आये और इस प्रकार बोले—‘मैं जबतक यहाँ रहूँ तबतक त्रिपुष्कर तीर्थमें ही मुझे तीनों समयोंकी सन्ध्या करनी चाहिये।’ इसी समय जब लग्नकाल
- प्रभासखण्ड * १२७७
उपस्थित हुआ, तब वेदचिन्तक ब्राह्मणोंने बताया, यही प्रतिष्ठाके लिये सबसे उत्तम समय है। उस समय ब्रह्माजीको पुष्कर तीर्थकी ओर प्रस्थान करते देख निशानाथ चन्द्रमाने कहा—'भगवन्! ज्योतिषियोंने प्रतिष्ठाके लिये यही शुभ मुहूर्त बताया है। यह मुहूर्त बीतने न पाये, इसका ध्यान रखना चाहिये।' तब ब्रह्माजीने मन-ही-मन पुष्कर तीर्थोंका चिन्तन किया। उनके स्मरण करते ही वे तीनों नदीके तटपर प्रकट हुए। उस समय नदीमें ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठ—तीन भँवरें उठीं। उन तीनों आवर्तोंको देखकर लोकपितामह ब्रह्माजीने कहा—'आजसे यह सुन्दर नदी पुष्करावर्तका नामसे प्रसिद्ध होगी। जो मनुष्य इसमें स्नान करके भक्तिपूर्वक पितरोंका तर्पण करेगा, उसे तीनों पुष्करमें स्नानके समान पुण्य प्राप्त होगा। जो मानव श्रावण शुक्ला तृतीयाको उसमें पितरोंका तर्पण करता है, उसके वे पितर दस हजार कल्पोंतक तृप्त रहते हैं।'
वहीं कंकालभैरव नामक क्षेत्रपाल हैं, जिन्हें उस क्षेत्रकी रक्षाके लिये भैरवजीने नियुक्त किया है। जो श्रावण शुक्ला पंचमी तथा आश्विन शुक्ला अष्टमीको कंकालभैरवका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, उस महात्माके उस क्षेत्रमें निवासके लिये वे सब विघ्नोंका निवारण करते हैं और उसकी पुत्रकी भाँति रक्षा करते हैं। उस स्थानके दक्षिण भागमें ब्रह्मकुण्डके समीप दरिद्रताका नाश करनेवाले चित्रादित्य विराजमान हैं। प्राचीनकालमें इस पृथ्वीपर मित्र नामके एक धर्मात्मा कायस्थ निवास करते थे, जो सदा सब प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते थे। उनके दो सन्तानें हुईं—एक पुत्र और एक कन्या। पुत्रका नाम चित्र और कन्याका नाम चित्रा हुआ। चित्रा बड़ी सुन्दरी और सुशीला थी। इन दोनोंके जन्म लेते ही उनके पिता मित्रकी मृत्यु हो गयी। मित्रकी पत्नीने पतिके साथ चितामें प्रवेश किया। तदनन्तर इन दोनों अनाथ बालकोंका ऋषियोंने पालन किया। वे महान् वनमें ही बड़े हुए और बचपनसे ही व्रतपरायण रहे। एक बार प्रभासक्षेत्रमें आकर उन दोनोंने महादेव सूर्यकी स्थापना की और वे बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न हो गये। धर्मात्मा चित्रने धूप, माला, चन्दन आदि उपचारोंसे सूर्यदेवका पूजन किया और वसिष्ठजीके द्वारा बताये हुए अड़सठ नामोंद्वारा उनका स्तवन किया।
**चित्र बोले—**जो आदिदेव जगन्नाथ पापनाशक तथा रोग-निवारण करनेवाले हैं, उन आकाशके स्वामी भगवान् भास्करको मैं सिरसे प्रणाम करके उनकी स्तुति करता हूँ। उनके सहस्रों नेत्र, सहस्रों रश्मियाँ तथा सहस्रों किरणमय आयुध हैं। अनेक गुह्य नामोंद्वारा उनका स्तवन किया जाता है। उन प्रातःकाल गंगासागर-संगमपर निवास करनेवाले मुण्डीर स्वामीको मैं नमस्कार करता हूँ। मध्याह्नकालमें यमुनातटवर्ती भगवान् कालप्रियको और सूर्यास्तके समय चन्द्रभागा नदीके तटपर विराजमान श्रीमूलस्थानको मैं प्रणाम करता हूँ, जहाँ उपवास करके श्रीसाम्बजीको स्वतः सिद्धि प्राप्त हुई है। काशीमें लोहिताक्ष, गोभिलाक्षमें बृहन्मुख, प्रयागमें प्रतिष्ठान, महाद्युतिमें वृद्धादित्य, कोट्यक्षमें द्वादशादित्य, चतुर्घटमें गंगादित्य, नैमिषारण्यमें गोलस्थ, भद्रपुटमें भद्र, जयामें विजयादित्य, प्रभासमें स्वर्णवेतस, कुरुक्षेत्रमें सामन्त, इलावृतमें त्रिमन्त्र, महेन्द्रमें क्रमणादित्य, हिरण्यमें सिद्धेश्वर, कौशाम्बीमें पद्मबोध, ब्रह्मबाहुमें दिवाकर, केदारमें चण्डकान्ति, नित्यमें तिमिरापह, गंगामार्गमें हरद्वार, भूप्रदीपनमें आदित्य, सरस्वती-तटपर हंस, पृथूदकमें विश्वामित्र, उज्जयिनीमें नरद्वीप, सिद्धापुरीमें अमितद्युति, कुन्तीकुमारमें सूर्य, पंचनदीमें विभावसु, मथुरामें विमलादित्य, संज्ञिकमें संज्ञादित्य, श्रीकण्ठमें मार्तण्ड, दशार्णमें दण्डक, गोधनमें गोपति, मरुस्थलमें कर्णदेव, देवपुरमें पुष्प, लोहितमें केशवादित्य, वैदिशमें शार्दूल, शोणमें अरुणवासी, वर्द्धमानमें साम्बादित्य, कामरूपमें शुभंकर, कान्यकुब्जमें मिहिर, पुण्यवर्द्धनमें मन्दार, गान्धारमें क्षोभणादित्य, लंकामें अमरद्युति, चम्पामें कर्णादित्य, प्रबोधमें शुभदर्शी, द्वारावतीमें
१२७८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पार्वत्य, हिमवन्तमें हिमापह, लौहित्यमें महातेज, अमलांगमें धूर्जटि, रोहिकमें कुमार, पद्ममें पद्मसम्भव, लाटामें धर्मादित्य, अर्बुदमें स्थविर, कौवेरीमें सुखप्रद, कोसलमें गोपति, कोंकणमें पद्मदेव, विन्ध्यपर्वतपर तापन, काश्मीरमें त्वष्टा, चरित्रमें रत्नसम्भव, पुष्करमें हेमगर्भ, गभस्तिकमें सूर्य, प्रकाशामें मुज्जाल, तीर्थग्राममें प्रभाकर, काम्पिल्यमें इल्लकादित्य, धन्यकमें धन्यवासी, नर्मदा-तटपर अनल तथा सर्वत्र गगनाधिप नामसे प्रसिद्ध सूर्यदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। ये भगवान् भास्करके अड़सठ नाम हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर पवित्र हो भक्तिभावसे इन नामोंको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
महादेवजी कहते हैं—शुद्धचित्तवाले चित्रके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् सूर्यने प्रसन्न होकर कहा—'वत्स! तुम्हारा भला हो। तुम कोई वर माँगो।'
चित्रने कहा—उष्णरश्मे! सब कार्योंमें मेरी रुचि हो और मुझे कुशलता प्राप्त हो।
'एवमस्तु' कहकर भगवान् सूर्यने उनकी इच्छाका अनुमोदन किया। तबसे चित्र सर्वार्थ-कुशल हुए। धर्मराजको जब यह बात मालूम हुई, तब उन्होंने सोचा, यदि यह मेरा लेखक हो जाता तो बड़ा अच्छा होता। एक दिन चित्र क्षारसमुद्रके भीतर अग्नितीर्थमें स्नान करनेके लिये गये। उसमें प्रवेश करते ही यमदूत उन्हें शरीरसहित यमपुरी उठा ले गये। वहाँ वे चित्रगुप्त नामसे प्रसिद्ध हुए। चित्रगुप्तजी सम्पूर्ण विश्वके शुभाशुभ चरित्रोंको लिखते रहते हैं। इसीलिये उनके द्वारा स्थापित सूर्यदेवका नाम चित्रादित्य हुआ। जो मनुष्य सप्तमीको उपवास करके उनकी पूजा करता है, उसे सात जन्मोंतक दरिद्रता और दुःखोंकी प्राप्ति नहीं होती।
## लोमशेश्वर, चित्रपथा नदी, रूपकुण्ड, रत्नेश्वर तथा वैनतेयेश्वरका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—वहाँसे लोमशेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय। वह स्थान दुःखान्धकारिणीसे पूर्व भागमें सात धनुषकी दूरीपर है। महर्षि लोमशने उस लिंगकी स्थापना की है। लोमशेश्वरके प्रसादसे ही लोमशजी दीर्घायु हुए। जो भक्तिभावसे लोमशेश्वरकी पूजा करता है, वह दीर्घायु और सुखी होता है। उसके शरीरमें रोग और घाव नहीं होते। लोमशेश्वरके पश्चिमभागमें पाँच धनुषके अन्तरपर तृणविन्द्वीश्वर लिंग प्रतिष्ठित है। मुनीश्वर तृणविन्दु एक-एक मासपर कुशके अग्रभागसे एक विन्दुजल लेकर पीते और तपस्या करते थे। इस प्रकार अनेक वर्षोंतक प्रभासक्षेत्रमें मेरी आराधना करके वे परम सिद्धिको प्राप्त हो गये।
वहाँसे परम उत्तम चित्रपथा नदीके समीप जाय। वह ब्रह्मकुण्ड और चित्रादित्यके बीचमें होकर बहती है। जिस समय यमदूत चित्रको शरीरसहित उठा ले गये, उस समय यह समाचार पाकर उनकी बहिन चित्राको बड़ा दुःख हुआ। तब वह चित्रा नदीके रूपमें परिणत हो अपने भाईकी खोज करनेके लिये समुद्रमें समा गयी। ब्राह्मणोंने उसका नाम चित्रपथा रख दिया। जो मनुष्य चित्रपथामें स्नान करके चित्रादित्यका दर्शन करता है, वह सूर्यदेवके परमधाममें जाता है। कलियुगमें चित्रपथा नदी अन्तर्धान हो गयी है। केवल वर्षाकालमें उसका दर्शन होता है। भोजन करके या बिना भोजन किये, रातमें या दिनमें, पर्वके समय अथवा बिना पर्वके, मनुष्य पवित्र हो या अपवित्र—जब, जहाँ, जिस अवस्थामें चित्रपथा नदीका दर्शन करे, वही उसका पुण्यकाल है। उसका दर्शन ही पुण्यपर्व है। कोई समयविशेष उसकी महत्ताका कारण नहीं होता। स्वर्गवासी पितर उस नदीका दर्शन करके हर्षसे गाने और हँसने लगते हैं कि 'हमारे वंशका कोई यहाँ
* प्रभासखण्ड * । १२७९
आकर श्राद्ध करेगा और हमें एक कल्पतकके लिये तृप्त कर देगा।' यों जानकर सब पापोंके नाश और पितरोंकी तृप्तिके लिये वहाँ स्नान और श्राद्ध करना चाहिये।
महादेवी! ब्रह्मकुण्डके उत्तरभागमें रूपकुण्ड है। वहाँ स्नान करके मनुष्य चोरीके पापसे छूट जाता है। उसमें स्नान करनेके प्रभावसे उसके वंशमें सात जन्मोंतक कोई चोर और क्रूर नहीं होता। जो शस्त्रसे मारे गये हों अथवा पापी रहे हों, ऐसे पूर्वजोंकी मुक्तिके लिये वहाँ शिवरात्रिको विशेषरूपसे पिण्डदान आदि कार्य करने चाहिये।
वहीं उत्तम रत्नेश्वरलिंग है, जिसकी स्थापना साक्षात् भगवान् विष्णुने की है। जो रत्नकुण्डमें स्नान करके रत्नेश्वरकी पूजा करता है, वह सात जन्मोंतक लक्ष्मीवान्, बुद्धिमान् तथा गाय, बैल आदि पशुओंसे सम्पन्न होता है। जो श्रवण नक्षत्र और द्वादशीके योगमें विधिवत् उपवास करके भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह मनोवांछित फलको पाता है। पार्वती! वह स्थान मुझे विशेष प्रिय है। मैं वहाँ सदा निवास करता हूँ और प्रलयकालमें भी उसका त्याग नहीं करता। वह सुदर्शन नामक वैष्णव क्षेत्र कहा गया है। उसका विस्तार सब ओर छत्तीस-छत्तीस धनुषतक है। इस सीमाके भीतर जो कोई अधम प्राणी भी कालवश मृत्युको प्राप्त होते हैं, उन्हें परमपदकी प्राप्ति होती है। जो लोग वहाँ भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये सोनेका गरुड़ और पीताम्बर दान करते हैं, उन्हें यात्राका उत्तम फल प्राप्त होता है।
रत्नेश्वरसे उत्तरमें तीन धनुष दूर विनतानन्दन गरुड़के द्वारा स्थापित वैनतेयेश्वर लिंग है। जो मनुष्य पंचमीके दिन भक्तिपूर्वक गरुड़ेश्वरकी पूजा करता है, उसे सात जन्मोंतक सर्पजनित विषका भय नहीं प्राप्त होता। जो वैनतेयेश्वरको पंचामृतसे स्नान कराकर विधिवत् उनका पूजन करता है, वह स्वर्गलोकमें आनन्द भोगता है।
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रैवन्त और अनन्तेश्वरकी महिमा, सावित्रीकी कथा, सावित्री-व्रतकी महिमा तथा ब्रह्मा-सावित्रीके पूजनका महत्त्व
महादेवजी कहते हैं—महादेवि! तदनन्तर सावित्रीसे नैर्ऋत्यकोणमें स्थित अश्वारूढ़ राजभट्टारक रैवन्तकका दर्शन करनेके लिये जाय। उनके दर्शनसे मनुष्य सब आपत्तियोंसे छूट जाता है। जो रविवारयुक्त सप्तमी तिथिमें उनकी पूजा करता है, उसके वंशमें कोई भी मनुष्य दरिद्र नहीं होता; इसलिये यत्नपूर्वक उन्हींकी पूजा करे।
उससे दक्षिण अनन्तद्वारा स्थापित अनन्तेश्वर लिंग है। वह स्थान लक्ष्मणेश्वरसे पूर्व दिशामें है। वह सब पापोंका नाशक और बड़े भारी विषका विनाशक है। सिद्ध और गन्धर्व ही उसकी पूजा करते हैं। वह उपासकको मनोवांछित फल देनेवाला है। विशेषतः कृष्णपक्षकी अष्टमीमें जो अनन्तेश्वरकी पूजा करता है, वह घोर पातकोंसे मुक्त होकर नागलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
पार्वती! मद्रदेशमें अश्वपति नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा थे, जो सब प्राणियोंके हितमें तत्पर, क्षमावान्, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय थे। परंतु उनके कोई सन्तान नहीं थी। एक समय राजा अश्वपतिने प्रभासक्षेत्रकी यात्रा की। यहाँके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए वे सावित्रीस्थलपर आये। वहाँ उन्होंने सावित्री-व्रतका अनुष्ठान किया। इससे उनके ऊपर ब्रह्माजीकी प्रिय पत्नी भूर्भुवःस्वःस्वरूपा सावित्री देवी प्रसन्न हुईं और मूर्तिमती होकर उनके नेत्रोंके समक्ष प्रकट हुईं। उनके हाथमें कमण्डलु शोभा पा रहा था और मुख एवं नेत्र प्रसन्नतासे खिले हुए थे।
सावित्री बोलीं— राजन्! वर माँगो।
१२८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
राजाने कहा—देवि! मुझे संतान दो।
सावित्री बोलीं—राजन्! तुम्हें एक पुत्री प्राप्त होगी।
इतना कहकर सावित्रीदेवी अन्तर्धान हो गयीं। तदनन्तर कुछ कालके बाद राजा अश्वपतिके यहाँ एक दिव्यरूपधारिणी कन्या उत्पन्न हुई। सावित्रीकी पूजासे सावित्रीने ही प्रसन्न होकर वह कन्या दी थी, इसलिये ब्राह्मणोंने उसका नाम सावित्री रख दिया। वह राजकन्या मूर्तिमती लक्ष्मीकी भाँति बढ़ने लगी। उसे देखकर लोग यही कहते थे कि यह कोई देवकन्या ही पृथ्वीपर उतर आयी है। एक दिन उस देवरूपिणी कन्याको देखकर मन्त्रियोंसे परामर्श करके राजाने कहा—'बेटी! तुम्हारे विवाहका समय आ पहुँचा है, परंतु अबतक तुम्हारा किसीने वरण नहीं किया। मैं जब विचार करके देखता हूँ, तब यहाँ तुम्हारे योग्य कोई वर नहीं दिखायी देता। अतः देवता आदिके द्वारा मैं निन्दनीय न होऊँ, ऐसा कोई प्रयत्न करना आवश्यक है। मैंने धर्मशास्त्रोंमें यह बात सुनी है कि जो कन्या पिताके घरमें विवाह संस्कारके पहले ही अपनेको रजस्वला देखती है, उसके पिताको ब्रह्महत्याका पाप लगता है। अतः मैं तुम्हें बूढ़े मन्त्रियोंके साथ तीर्थयात्राके लिये भेजता हूँ, तुम स्वयं पतिका वरण करो।'
'जो आज्ञा' कहकर सावित्रीने पिताकी बात मान ली और यात्राके लिये निकली। वह राजर्षियोंके सुन्दर तपोवनोंमें गयी। वृद्ध महर्षियोंके चरणोंमें मस्तक झुकाया और समस्त आश्रमों एवं तीर्थोंमें घूम-फिरकर पुनः घरपर लौट आयी। वहाँ उसने अपने सामने आसनपर विराजमान देवर्षि नारदको देखा और प्रणाम करके पितासे कहा—'शास्वदेशमें एक धर्मात्मा क्षत्रिय राज्य करते थे। उनका नाम द्युमत्सेन है। वे दैववश अन्धे हो गये। उनका सामन्त रुक्मी पहलेसे ही उनसे वैर रखता था। उसने यह अवसर देखकर राजाका राज्य छीन लिया। राजा द्युमत्सेन अपनी पत्नीके साथ वनमें चले गये। उनकी पत्नीकी गोदमें एक छोटा-सा बालक भी था। राजाका वह पुत्र वनमें ही बड़ा हुआ है। वह परम धर्मात्मा है। उसका नाम सत्यवान् है। सत्यवान् ही मेरे मनके अनुरूप पति है। मैं उन्हींको प्राप्त करना चाहती हूँ।'
नारदजीने कहा—राजन्! सावित्री अभी बच्ची है, तभी इसने गुणवान् सत्यवान्का वरण किया है। उसके पिता सत्य बोलते हैं। उसकी माता सत्य भाषण करती है और वह स्वयं भी सत्य बोलता है। इसीलिये मुनियोंने उस राजकुमारका नाम सत्यवान् रखा है। सत्यवान्को अश्व बड़े प्रिय हैं। वह मिट्टीके अश्व बनाया करता है और अश्वके ही चित्र भी बनाता है, अतः उसका दूसरा नाम चित्राश्व है; किंतु उसे स्वीकार करके सावित्रीने बहुत बड़ा कष्ट मोल ले लिया है। द्युमत्सेनका वह पुत्र शिक्षा, दान और गुणोंमें देवताओंके समान है। उशीनरराज शिबिके समान सत्यवादी और ब्राह्मणभक्त है। ययातिके समान उदार, चन्द्रमाके समान सुन्दर, अश्विनीकुमारोंके समान रूपवान् तथा अतिशय बलवान् है। परंतु उसमें एक दोष है। आजसे एक वर्ष पूर्ण होनेपर उसकी आयु समाप्त हो जायगी और वह अपना शरीर त्याग देगा।
नारदजीकी यह बात सुनकर राजाने कन्यासे कहा—बेटी सावित्री! जाओ, किसी दूसरे श्रेष्ठ पतिका वरण करो। यह सत्यवान् तो एक ही वर्षमें शरीर त्याग देगा।
सावित्री बोली—पिताजी! राजालोग एक बार ही कोई बात कहते हैं। विद्वान् पुरुष भी एक ही बोली बोलते हैं और कन्याओंका दान भी एक ही बार किया जाता है। ये तीनों बातें एक-एक बार ही होती हैं। सत्यवान् दीर्घायु हों या अल्पायु, गुणवान् हों या गुणहीन—उन्हें एक बार मैंने वरण कर लिया, अब वे मेरे पति हो गये; अतः दूसरे किसीका वरण नहीं करूँगी। पहले मनसे निश्चय करके ही वाणीद्वारा किसी बातको
- प्रभासखण्ड * १२८१
कहा जाता है और फिर उसे कार्यरूपमें परिणत किया जाता है। मैंने भी यही किया है। इस विषयमें मेरा मन ही प्रमाण है।
नारदजीने कहा—राजन्! यदि सावित्रीकी यही इच्छा है तो आप भी इस सम्बन्धको स्वीकार करें और शीघ्र ही इसे कर डालें। आपकी पुत्रीके विवाहमें कोई विघ्न नहीं पड़ना चाहिये।
यों कहकर नारदजी स्वर्गको चले गये। राजाने उत्तम मुहूर्तमें वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंके द्वारा कन्याका सब वैवाहिक कार्य सम्पन्न कराया। सावित्री भी मनोवांछित पतिको पाकर बहुत प्रसन्न हुई। इस प्रकार उस आश्रममें निवास करते हुए उन तीनोंका कुछ समय व्यतीत हुआ। सावित्री दिन-रात चिन्तित रहती थी। नारदजीने जो बात कही थी, वह सावित्रीको भूलती नहीं थी। उसने मन-ही-मन हिसाब लगाकर यह जान लिया कि आजसे चौथे दिन मेरे पतिकी मृत्यु होनेवाली है। तत्पश्चात् उसने त्रिरात्रि-व्रत प्रारम्भ किया। उसे पूर्ण करके सावित्रीने स्नान किया और देवता-पितरोंका तर्पण करके उसने सास-ससुरके चरणोंमें प्रणाम किया। तदनन्तर सत्यवान् हाथमें फरसा लेकर वनको चले। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे गयी। सत्यवान्ने शीघ्रतापूर्वक फल, फूल, समिधा और कुशा एकत्र करके सूखे काष्ठका एक बोझ बाँधा। तत्पश्चात् वे बरगदकी शाखाका सहारा लेकर बोले—'प्रिये! मेरे सिरमें बड़ी पीड़ा हो रही है। मैं क्षणभर तुम्हारी गोदमें मस्तक रखकर सोना चाहता हूँ।'
सावित्री बोली—महाबाहो! आइये, विश्राम कीजिये। थोड़ी देर बाद हमलोग आश्रमपर चलेंगे।
तदनन्तर सावित्रीकी गोदमें मस्तक रखकर सत्यवान् ज्यों-ही पृथ्वीपर सोये त्यों-ही सावित्रीने एक पुरुषको देखा, जो काले और पीले रंगके दिखायी पड़ते थे। मस्तकपर किरीट और अंगोंमें पीताम्बर धारण किये वे साक्षात् सूर्यकी भाँति शोभा पा रहे थे। सावित्रीने उन्हें प्रणाम करके मधुर वाणीमें पूछा—'तुम कौन हो? दूर ही रहो; पति-भक्तिके प्रभावसे मुझे कोई धर्मसे गिरा नहीं सकता। प्रज्वलित अग्निशिखाकी भाँति मेरा कोई स्पर्श भी नहीं कर सकता।'
यमने कहा—पतिव्रते! मैं सबका संयमन करनेवाला यम हूँ। तुम्हारे पतिकी आयु क्षीण हो गयी है। मेरे दूत तुम्हारे समीप आकर इन्हें ले जानेमें असमर्थ हैं, इसलिये मैं स्वयं आया हूँ।
उनके यों कहनेपर सत्यवान्के शरीरसे अँगूठेके बराबर एक पुरुष निकला जो पाशमें बँधा हुआ था। सावित्रीने उसे देखा और स्वयं भी यमराजके पीछे-पीछे चलना प्रारम्भ किया। पातिव्रत्यके प्रभावसे उसे वहाँ जानेमें कोई श्रम नहीं होता था। उस समय यमराजने उससे कहा—'सावित्री! तू बहुत दूर चली आयी, अब लौट जा। इस मार्गपर कोई जीवित पुरुष नहीं चलता।'
सावित्री बोली—भगवन्! मुझे चलनेमें न तो परिश्रम होता है और न ग्लानि ही। एकमात्र पतिको छोड़कर स्त्रीके लिये दूसरा कोई अवलम्ब नहीं है।
इस प्रकार और भी बहुत-सी धर्मयुक्त मधुर बातें सुनकर सूर्यनन्दन यम सावित्रीपर बहुत प्रसन्न हुए और बोले—'देवि! तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।' तब सावित्रीने विनीत होकर पाँच वरदान माँगे—'मेरे महात्मा श्वशुरको नेत्र प्राप्त हों, उनका खोया हुआ राज्य भी मिल जाय, मेरे पति जीवित हों, निरन्तर उनके धर्मकी वृद्धि हो तथा मेरे पुत्रहीन पिताको पुत्रकी प्राप्ति हो।' धर्मराजने वरदान देकर उसे भेजा। पतिको पाकर सावित्रीका मन प्रसन्न हो गया। अब वह स्वस्थचित्त होकर पतिके साथ आश्रमपर गयी। ज्येष्ठकी पूर्णिमाको उसने यह व्रत किया था, जिससे उसके सौभाग्यकी रक्षा हुई।
पार्वतीने पूछा—महेश्वर! सावित्रीने जिस व्रतका पालन किया, वह कैसा है? बतानेकी कृपा करें।
१२८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
महादेवजी बोले—देवेश्वरी! पतिव्रता सावित्रीने जिस व्रतका पालन किया है, उसका वर्णन करता हूँ; सुनो। ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशीको दन्तधावनपूर्वक स्नान करके त्रिरात्र उपवासका नियम ग्रहण करे। जो स्त्री त्रिरात्र करनेमें असमर्थ हो, वह जितेन्द्रिय होकर त्रयोदशीको नक्तव्रत, चतुर्दशीको अयाचित व्रत और पूर्णिमाको उपवास करे। प्रतिदिन तड़ाग, किसी बड़ी नदी अथवा झरनेमें स्नान करे। यदि पाण्डुकूपमें स्नान कर ले तो सबमें स्नान करनेका फल प्राप्त हो जाता है। विशेषतः पूर्णिमाको सरसों, मिट्टी और जलसे स्नान करना चाहिये। एक पात्रमें बालू भरकर अथवा जौ, चावल या तिल आदि धान्य भरकर उसपर दो वस्त्रोंमें लपेटा हुआ बाँसका पात्र रखे और उसमें सोने-चाँदी अथवा मिट्टीकी बनी हुई सावित्रीदेवी और ब्रह्माजीकी सर्वांगशोभित प्रतिमा स्थापित करे। फिर उन प्रतिमाओंपर दो लाल वस्त्र चढ़ाये और अपनी शक्तिके अनुसार उन दोनों विग्रहोंकी पूजा करे। चन्दन, सुगन्धित पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तरोई या लटजीराके फूलोंसे, कुम्हड़ा और ककड़ीके फलोंसे, नारियल, छुहारा, कैथ, अनार, जामुन, नीबू, नारंगी, कंकोल, कटहल, जीरक, खाँड़, गुड़, लवण, चरभट तथा सप्तधान्य आदि वस्तुएँ बाँसके पात्रोंमें रखकर निवेदन करे। कण्ठसूत्रको सुन्दर केसर और कुंकुमसे रँगे। तत्पश्चात् मन्त्रोच्चारणपूर्वक पूजन करे। मन्त्र इस प्रकार है—
ओङ्कारपूर्विके देवि वीणापुस्तकधारिणि।
देव्यम्बिके नमस्तुभ्यमवैधव्यं प्रयच्छ मे॥
वीणा और पुस्तक धारण करनेवाली सच्चिदानन्दमयी माता सावित्री देवी! तुम्हें नमस्कार है। तुम मुझे सौभाग्य प्रदान करो।
इस प्रकार पूजा-प्रार्थना करके बहुत-से स्त्री-पुरुषोंके साथ गाना-बजाना करते हुए वहाँ जागरण करे। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे सावित्रीकी कथा कहलाये। ब्रह्मा-सावित्रीका विवाह करे। सारी सामग्री वेदज्ञ ब्राह्मणको दान करे। जिसकी जीविका कठिनाईसे चलती हो, ऐसे निर्धन अग्निहोत्री ब्राह्मणको सावित्रीकी प्रतिमा दान करे। उस रात्रिमें ब्राह्मण-दम्पतियोंको निमन्त्रित करके प्रातःकाल वटवृक्षके नीचे सावित्रीके सम्मुख भोजन कराये। वहाँ एक-एक ब्राह्मणको भोजन कराना कोटि-कोटि ब्राह्मणोंको भोजन करानेके समान पुण्यदायक कहा गया है। ब्राह्मणोंको भोजन कराते समय कड़वे तेलका बना हुआ सामान न परोसे। स्त्रीको खट्टा और खारा भोजन कभी नहीं देना चाहिये। पाँच प्रकारके मधुर भोजन कराये—१. दूध और घीमें बने हुए पूवे, २. अशोकवर्तिका (एक प्रकारका पकवान), ३. छुहारेके साथ बनी हुई पूपिका, ४. घी और गुड़से बना हुआ हलवा, ५. और मोदक। जो स्त्री ऐसा करती है, वह धन-धान्य और मनुष्योंसे पूर्ण होती है। उसका वंश भरा-पूरा रहता है, उसके कुलमें कभी कोई स्त्री विधवा नहीं होती। अथवा यदि तीर्थमें भोजनकी सुविधा न हो तो घर लौटनेपर भोजन कराये, जिससे सावित्री देवी प्रसन्न हों। इसी प्रकार अपने घरपर आकर पितरोंके लिये पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध भी करे। इससे पितर सन्तुष्ट होते हैं। ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। अपने घरमें श्राद्ध-दान करनेसे तीर्थकी अपेक्षा भी आठगुना पुण्य होता है। क्योंकि वहाँ नीच पुरुषोंकी दृष्टि नहीं पड़ती। पितरोंका श्राद्ध एकान्त एवं गुप्त होना चाहिये। नीच पुरुषोंकी दृष्टिसे दूषित होनेपर वह पितरोंको नहीं प्राप्त होता, अतः प्रयत्नपूर्वक श्राद्धको गुप्त रखकर ही करे। वही पितरोंके लिये तृप्तिदायक होता है।
- प्रभासखण्ड * १२८३
शालकटङ्कटा देवी, दशरथेश्वर, भरतेश्वर, लिंगचतुष्टय, कुन्तीश्वर, अर्कस्थल तथा त्रिसंगमतीर्थ आदिका महत्त्व
महादेवजी कहते हैं—पार्वती ! तदनन्तर शालकटंकटा देवीके समीप जाय। उनका स्थान सावित्रीसे दक्षिण तथा रैवन्तसे पूर्व दिशामें है। वे महान् पापपुंज तथा सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाली हैं। सिद्ध और गन्धर्व भी उनकी उपासना करते हैं। वे महाप्रचण्ड दैत्योंका नाश करनेवाली तथा महिषासुरमर्दिनी हैं। पुलस्त्य-पुत्र विश्रवाने उनकी स्थापना की है। माघ मासकी चतुर्दशीको जो उनकी पूजा करता है, वह पशु-धनसे सम्पन्न, बुद्धिमान्, विद्वान्, लक्ष्मीवान् और पुत्रवान् होता है।
तदनन्तर दशरथेश्वरका दर्शन करे। पूर्वकालमें सूर्यवंशके भूषण महाराज दशरथने प्रभासक्षेत्रमें आकर अत्यन्त दुष्कर तपस्या की। वहाँपर एक शिवलिंगकी स्थापना करके मुझे सन्तुष्ट किया और अत्यन्त तेजस्वी पुत्र प्राप्त होनेके लिये प्रार्थना की। तब मैंने उन्हें त्रैलोक्यपूजित पुत्र प्रदान किया, जिनका नाम श्रीराम था और जिनका यश तीनों लोकोंमें फैला हुआ है और आज भी त्रिभुवनके निवासी देवता, दैत्य, असुर तथा वाल्मीकि आदि महर्षि जिनकी कीर्ति-कथाका गान करते हैं। उस शिवलिंगके प्रभावसे राजा दशरथको महान् यश प्राप्त हुआ। जो कार्तिकमासमें कार्तिककी पूर्णिमाको विधिपूर्वक धूप, दीप और पूजा आदिके उपहारोंसे दशरथेश्वरकी पूजा करता है, वह यशस्वी होता है।
उससे उत्तर कोणमें थोड़ी ही दूरपर भरतेश्वरलिंग है। भूतलमें भरत नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जिनके नामसे लोकमें इस देशको भारतवर्ष कहते हैं। उन्होंने मेरे विग्रहकी स्थापना करके सहस्रों वर्षोंतक यहाँ दुष्कर तपस्या की, जिससे सन्तुष्ट होकर मैंने उन्हें आठ पुत्र और एक यशस्विनी कन्या प्रदान की। इस प्रकार अभीष्ट मनोरथ पाकर राजा भरत कृतकृत्य हुए और भारतवर्षके नौ विभाग करके उन्होंने अपने पुत्रों और पुत्रीको एक-एक भाग बाँट दिया। वे द्वीप उन पुत्रोंके नामसे ही प्रसिद्ध हुए। इन्द्रद्वीप, कुशेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व तथा वारुणि—ये आठ द्वीप हैं और यह कुमारी नामसे प्रसिद्ध नवाँ द्वीप है। इनमेंसे आठ द्वीप जो उत्तरमें स्थित थे, समुद्रमें डूब गये। ग्राम और देश आदिके सहित सागरमें विलीन हो गये। उनमेंसे यह कुमारी नामक द्वीप ही अवशेष है। यह विन्दुसरसे लेकर समुद्रतक दक्षिणसे उत्तरतक फैला हुआ है, जिसकी लम्बाई नौ हजार योजन और चौड़ाई एक हजार योजन है। जो भरतेश्वर लिंगका पूजन करता है, वह सब यज्ञों और दानोंका फल पाता है। जो कार्तिकमासकी पूर्णिमाको कृत्तिका नक्षत्रके योगमें भरतेश्वरका दर्शन करता है, वह स्वप्नमें भी भयंकर नरकको नहीं देखता।
सावित्रीके स्थानसे पश्चिम दिशामें एक ही स्थानपर चार शिवलिंग हैं, उनमें दो शिवलिंग तो पूर्वमें हैं और दो पश्चिममें। उन चारोंके नाम इस प्रकार हैं—कुशकेश्वर, गर्गेश्वर, पौरुषेश्वर तथा मैत्रेयेश्वर। जो जितेन्द्रिय मनुष्य भक्तिपूर्वक इन चारों लिंगोंका दर्शन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो मेरे परम धामको जाता है। वैशाख शुक्ला चतुर्दशीको वहाँ स्नान करके ब्राह्मणोंकी पूजा करे और उन्हें यथाशक्ति वस्त्र दे।
सावित्रीके पूर्वभागमें गड्ढेके भीतर कुन्तीश्वर नामसे प्रसिद्ध एक शिवलिंग है। पूर्वकालमें जब पाण्डवलोग तीर्थयात्राके प्रसंगसे कुन्तीके साथ प्रभासक्षेत्रमें आये थे, उस समय कुन्तीदेवीने वहाँ एक शिवलिंग स्थापित किया, जो समस्त पापभयको दूर करनेवाला है। जो मनुष्य कार्तिककी पूर्णिमाको
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विशेषरूपसे कुन्तीश्वरका पूजन करता है, वह समस्त कामनाओंसे सम्पन्न हो शिवलोकमें सम्मानित होता है। कुन्तीश्वर लिंगके दर्शनसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
पार्वती! वहाँसे अग्निकोणमें समस्त पातकोंका नाश करनेवाला पुण्यतीर्थ अर्कस्थल है। उसका दर्शन करके मनुष्य सात जन्मोंतक दरिद्र नहीं होता तथा उसके अठारहों प्रकारके कुष्ठ नष्ट हो जाते हैं। इसलिये सप्तमी तिथिको त्रिसंगमतीर्थमें स्नान करके पुण्यवान् मनुष्य उनका पूजन अवश्य करे। सिद्धेश्वरसे दक्षिणभागमें तीन धनुषके अन्तरपर माण्डव्येश्वर लिंग है। जो माघमासकी चतुर्दशीको जितेन्द्रिय होकर उसकी पूजा करके रातमें वहाँ जागरण करता है, वह यमलोकमें नहीं जाता।
वहींपर पुष्पदन्तने कठोर तपस्या करके एक शिवलिंग स्थापित किया, जिसका दर्शन करके प्राणी जन्म-मृत्युमय संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है और इहलोक तथा परलोकमें मनोवांछित फल प्राप्त करता है।
सिद्धेश्वरके पास ही थोड़ी दूर पूर्वकी ओर क्षेत्रपेश्वर नामका उत्तम लिंग है। शुक्लपक्षकी पंचमीको उनका दर्शन करनेसे मनुष्यको कभी सर्प नहीं काटता।
सरस्वती, हिरण्या और समुद्रका संगम देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। उसका नाम मिश्रतीर्थ है। वहाँका जल सब जलोंमें प्रधान है; इसलिये वह उत्तम तीर्थ है। सूर्यग्रहण आनेपर उसकी महत्ता कुरुक्षेत्रसे भी बढ़ जाती है। उस स्थानपर किया हुआ जप और दान कोटिगुना फल देनेवाला होता है। मंकीशसे पश्चिम भागमें कृतस्मर तीर्थतक दस करोड़ तीर्थोंका निवास है। उसके भीतर रहनेवाले कृमि, कीट, पतंग और श्वपच आदि भी स्वर्गलोकमें चले जाते हैं; फिर शुद्ध चित्तवाले पुरुषके लिये तो कहना ही क्या है? कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको वहाँ स्नान करके जो पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर तबतक तृप्त रहते हैं, जबतक आकाशमें सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र प्रकाशित रहते हैं। देवि! यह त्रिसंगम तीर्थ बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है।
त्रिसंगमके पास ही मंकीश्वर लिंग है। प्राचीन कालमें तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मंकि नामके एक महर्षि हो गये हैं। उन्होंने मेरे विग्रहकी स्थापना करके दस हजारसे कुछ अधिक वर्षोंतक यहाँ घोर तपस्या की थी। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने उन्हें वरदान दिया। तभीसे उस शिवलिंगका मंकीश्वर नाम प्रसिद्ध हुआ। जो माघमासकी त्रयोदशी और चतुर्दशी तिथियोंको पंचोपचारसे मंकीश्वरका पूजन करता है, वह मनोवांछित फल पाता है।
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देवमाता, शेषस्थान, प्रभासपंचक, रुद्रेश्वर, महाश्मशान तथा सरस्वती नदी और संगममें स्नानका महत्त्व
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! मंकीश्वरसे नैर्ऋत्य कोणमें देवमाताका स्थान है। वे गौरीरूप धारण करके वहाँ रहती हैं। सरस्वती देवीका ही नाम वहाँ देवमाता है। उन्होंने बड़वानलसे देवताओंकी माताके समान रक्षा की, इसीलिये उन्हें देवमाता कहते हैं। जो पतिव्रता स्त्री अथवा पुरुष माघमासकी तृतीयाको उनकी पूजा करते हैं, वे सब अभीष्ट फलोंको प्राप्त कर लेते हैं। जो वहाँ शर्करायुक्त खीर आदिसे ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराते हैं, वे एक सहस्र गौरी कन्याओंको भोजन देनेका फल पाते हैं।
नगरादित्यसे पूर्व दिशामें मित्रवनके भीतर जहाँ बलभद्रजीने शरीर छोड़ा है, वह स्थान शेषस्थान कहलाता है। उसीको नागस्थान भी कहते हैं। जो पुरुष त्रिसंगम तीर्थमें स्नान करके पंचमीको निराहार रहकर नागस्थानकी पूजा
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करता है तथा श्राद्ध करके ब्राह्मणको यथाशक्ति दक्षिणा देता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर मेरे लोकमें जाता है।
नागस्थानसे पश्चिम दिशामें प्रभासपंचक नामक स्थान है जो परम पुण्यमय आदितीर्थ है। उसके पश्चिम भागमें प्रभासक्षेत्र है, उससे दक्षिण भागमें वृद्धप्रभास है। उससे दक्षिण जलप्रभास है। उससे दक्षिण महाप्रभास है। तदनन्तर कृतस्मर प्रभास है, जहाँ श्मशानभैरव हैं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इन पाँच प्रभासोंका दर्शन करता है, वह जरा-मृत्युसे रहित परम पदको प्राप्त होता है। प्रभास तीनों लोकोंमें विख्यात आदितीर्थ है। वह देवताओंके लिये भी दुर्लभ तथा महापातकोंका नाशक है। प्रभासमें अमावास्याको एक रात व्रत रखनेवाला पुरुष सब पातकोंसे मुक्त हो शिवलोकमें जाता है। पुष्करमें स्नान करनेसे सात जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है।
आदिप्रभासके आगे तीन धनुषकी दूरीपर रुद्रेश्वर लिंग स्थित है, जहाँ मुझ रुद्रने ध्यान लगाकर अपने तेजको स्थापित किया है। उसका दर्शन और पूजन करके मनुष्य सब वांछित फलोंको प्राप्त कर लेता है।
कृतस्मरसे लगाकर मंकीश्वरतक महाश्मशान है, जो पुनर्जन्मका निवारण करनेवाला है। उस स्थानपर मरे हुए जीवके शरीरका दाह करना चाहिये। वह कर्मबीजके लिये ऊसर क्षेत्र कहा गया है। वह मुझे सदा अत्यन्त प्रिय है। मैं कल्पान्तमें भी उसका त्याग नहीं करता। मेरे लिये वह अविमुक्त क्षेत्रसे भी अधिक प्रिय है।
सरस्वतीका जल स्वतः पवित्र है। उसमें जहाँ-कहीं भी स्नान किया जा सकता है, किन्तु सरस्वती और समुद्रका संगम तो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। सब नदियोंमें सरस्वती नदी ही पुण्यदायिनी तथा समस्त लोकोंको सुख देनेवाली है। सरस्वतीको पाकर स्वर्गलोकमें पहुँचे हुए मनुष्य सदाके लिये शोकमुक्त हो जाते हैं। सरस्वतीका पावन जल पुण्यात्मा पुरुषोंको ही प्राप्त होता है। वैशाखकी पूर्णिमा तथा चन्द्रग्रहणके अवसरपर तो वह तीनों लोकोंके लिये भी दुर्लभ है। यदि सोमवती अमावास्याको वहाँ स्नानका सुयोग मिल जाय तो सौ कोटि पर्वोंसे क्या प्रयोजन है। मनुष्यकी हड्डी जबतक सरस्वतीके जलमें रहती है, उतने ही सहस्र वर्षोंतक वह मेरे लोकमें सम्मानित होता है। जो समर्थ होकर भी प्रभास तीर्थमें सरस्वतीका दर्शन नहीं करते, उन्हें जन्मके अन्धों और पंगुओंके समान जानना चाहिये। वे देश, वे तीर्थ, वे आश्रम तथा वे पर्वत धन्य हैं, जिनके बीचसे होकर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती नदी निकलती हैं। जो त्रिभुवनको पवित्र करनेवाली पुण्यदायिनी सरस्वतीकी शरण ले चुके हैं, वे संसाररूपी कीचड़की दुर्गन्ध फिर नहीं सूँघते। प्रभास तीर्थमें सरस्वती नदी स्वर्गकी सीढ़ी है। सरस्वतीके दर्शनसे मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है। सरस्वतीसे बढ़कर दूसरा कोई तीर्थ न हुआ है न होगा। जहाँ सरस्वतीका जल समुद्रकी लहरोंसे व्याप्त रहता है, उस संगममें जो मनुष्य स्नान करेंगे, वे प्रत्येक युगमें ऐश्वर्यवान् होंगे। जिन मनुष्योंका शरीर सरस्वतीके जलसे अभिषिक्त होता है, वे धन्य हैं, वे मुनि हैं और उन्हींका निर्मल यश सर्वत्र फैला हुआ है।
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श्राद्धके विषयमें कुछ ज्ञातव्य बातें
महादेवजी कहते हैं— पार्वती! सबेरे तीन मुहूर्ततक प्रातःकाल, फिर तीन मुहूर्त संगव-काल, फिर तीन मुहूर्त मध्याह्नकाल और उसके बाद तीन मुहूर्त अपराह्नकाल होता है। तदनन्तर तीन मुहूर्ततक सायाह्नकाल होता है। उसमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये। कुशके अग्रभागको दैव और
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मूलसहित अग्रभाग (द्विभुग्न कुश)-को पैतृक कहा गया है। उसमें अवलम्बित कुशोंको कुतुक माना गया है। श्राद्धकालमें शरीर, द्रव्य, स्त्री, भूमि, मन, मन्त्र तथा ब्राह्मण—इन सात वस्तुओंकी शुद्धिपर विशेष ध्यान देना चाहिये। श्राद्धमें तीन वस्तुएँ पवित्र मानी गयी हैं—दौहित्र, कुतपकाल तथा तिल। तीन बातें प्रशंसाके योग्य कही गयी हैं—शुद्धि, अक्रोध तथा अत्वरा (उतावलेपनका अभाव)। सात प्रकारका धन शुद्ध माना गया है—श्रुत, शौर्य, तप, कन्या, शिष्य आदि, कुल-परम्परा तथा न्यायवृत्तिसे जो प्राप्त हुआ हो। इनकी प्राप्तिके उपाय भी सात प्रकारके हैं— १. कृषि और २. वाणिज्यसे प्राप्त धन कुत्सित है। ३. शिल्पानुवृत्तिसे मिले हुए धनको शुक्ल (उत्तम) कहा गया है। ४. किये हुए उपकारके बदलेमें प्राप्त किया हुआ धन शबल (मध्यम श्रेणीका) बताया गया है। ५. सूद, ६. साहस और ७. छल-कपटसे कमाये हुए धनको कृष्ण (अधम) कहते हैं। अन्यायोपार्जित धनसे जो श्राद्ध किया जाता है, उससे चाण्डाल आदि योनियोंमें पड़े हुए लोगोंकी ही तृप्ति होती है। मनुष्य धरतीपर जो अन्न बिखेरते हैं, उससे पिशाचयोनिमें पड़े हुए पितरोंकी तृप्ति होती है। स्नानके वस्त्रसे धरतीपर जो जल गिरता है, उससे नीच योनियोंमें पड़े हुए पूर्वजोंकी तृप्ति होती है। धरतीपर जो सुगन्धित जलकी बूँदें पड़ती हैं, उससे देवयोनिमें आये हुए पितरोंकी तृप्ति होती है। पिण्ड उठानेपर जो अन्नके दाने पृथ्वीपर गिरते हैं, उनसे सम्मार्जनका जल पीनेवाले विकिर नामके पितर तृप्तिलाभ करते हैं। श्राद्ध-भोजन करके ब्राह्मणलोग जो आचमन और कुल्ला करते हैं, उससे पशुयोनिके पितर तृप्त होते हैं।
श्राद्धमें जो उत्तम माने गये हैं, ऐसे ब्राह्मणोंका वर्णन करता हूँ; सुनो। विशिष्ट, श्रोत्रिय, योगी, वेदवेत्ता, नाचिकेतसंज्ञक त्रिविध अग्नियोंका सेवन करनेवाला, अथवा 'अयं वाव यः पवते' इत्यादि तीन अनुवाकोंका अध्ययन और अनुष्ठान करनेवाला, 'मधुवाता ऋतायते' इत्यादि तीन ऋचाओंका जप करनेवाला, 'ब्रह्ममेतु माम्' इत्यादि तीन अनुवाकोंका अध्ययन और तत्सम्बन्धी व्रत करनेवाला पुत्रीका पुत्र, जामाता और भानजा, पंचाग्निकर्ममें तत्पर, तपोनिष्ठ, मामा, पिता-माताका भक्त, शिष्य, सम्बन्धी, बन्धु-बान्धव, वेदार्थका ज्ञाता और वक्ता, ब्रह्मचारी, सहस्रोंका दान करनेवाला तथा सौ वर्षकी आयुवाला पुरुष—ऐसे ब्राह्मण पंक्तिपावन जानने चाहिये। अपना भानजा तथा भाई-बन्धु मूर्ख भी हों तो भी श्राद्धमें उनका त्याग न करे। देवकर्ममें ब्राह्मणकी परीक्षा न करे, किंतु श्राद्धकर्ममें यत्नपूर्वक ब्राह्मणकी परीक्षा करे। जो चोर, पतित, नपुंसक और नास्तिक-वृत्तिके ब्राह्मण हैं, उन्हें मनुजीने यज्ञ और श्राद्धमें सम्मिलित करनेका निषेध किया है। जो जटाधारी, वेदाध्ययनरहित, दुर्बल, धूर्त तथा शूद्रोंके पुरोहित हों, उनका श्राद्धकर्ममें पूजन न करे। वैद्य, वेतन लेकर देव-पूजा करनेवाले, मांसविक्रेता तथा वाणिज्यसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मण भी यज्ञ और श्राद्धमें त्याज्य हैं। जो गँवार, राजसेवक, बुरे नखोंवाला, काले दाँतोंवाला, गुरुके प्रतिकूल आचरण करनेवाला, अग्निहोत्रका त्यागी, सूदखोर, राजयक्ष्माका रोगी, पशु-पालनकी वृत्तिसे जीनेवाला, परिवेत्ता (बड़े भाईसे पहले ही विवाह करनेवाला), निराकृति (किसी अंगसे हीन), ब्राह्मणद्वेषी, परिवित्ति (परिवेत्ताका बड़ा भाई), कुशीलव (नाचने-गानेवाला), अपकीर्णी (धर्मभ्रष्ट), दुःशील, काना, शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाला, उढ़रीका बेटा, जुआरी, शराबी, कोढ़ी, कलंकित, पाखण्डी, रस बेचनेवाला, धनुष-बाण बनानेवाला, बड़ी बहिनके अविवाहित रहते उसकी छोटी बहिनसे विवाह करनेवाला, मित्रद्रोही, पुत्रसे शिक्षा लेनेवाला, मिरगीका रोगी, घेघेवाला, श्वेतकुष्ठी, चुगलखोर, उन्मादी, अन्धा तथा
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वेदकी निन्दा करनेवाला—ये सभी ब्राह्मण श्राद्धमें त्याग देनेयोग्य हैं। जलके प्रवाहको छिन्न-भिन्न करनेवाला अथवा उसे रोकनेवाला, दूतकर्म करनेवाला, वृक्षारोपणकी वृत्तिसे जीनेवाला, कुत्तेसे शिकार खेलनेवाला, बाज पक्षीसे जीविका चलानेवाला, कुमारी कन्याको कलंकित करनेवाला, हिंसक, शूद्रवृत्तिसे जीनेवाला, आचारहीन, बहुत बड़े जनसमुदायकी पुरोहिती करनेवाला, प्रतिदिन भीख माँगनेवाला तथा मुर्दे ढोनेवाला—ऐसे ब्राह्मण यत्नपूर्वक त्याज्य हैं। जिनका आचरण निन्दित हो, वे अधम द्विज श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पंक्तिमें बैठनेके अधिकारी नहीं हैं; अतः विद्वान् ब्राह्मण देवकार्य और पितृकार्य दोनोंमें पूर्वोक्त ब्राह्मणोंको सम्मिलित न करे।
प्रत्येक मासमें अमावास्या आनेपर श्राद्ध करना चाहिये। अष्टका तिथि, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, विषुवयोग, अयनारम्भके दिन तथा सामान्यतः सूर्यकी प्रत्येक संक्रान्तिके दिन श्राद्ध करना चाहिये। कृष्णपक्षमें आर्द्रा, मघा, रोहिणी आदि नक्षत्रोंमें श्राद्धके योग्य द्रव्य और ब्राह्मणका संयोग प्राप्त होनेपर तथा गजच्छाया, व्यतीपात, भद्रा और वैधृतियोगमें भी श्राद्ध करना चाहिये। वैशाखकी तृतीया, कार्तिक शुक्ला नवमी, माघकी पूर्णिमा और भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी—ये युगादि तिथियाँ मानी गयी हैं। माघमासकी सप्तमीको भगवान् सूर्य पहले-पहल रथपर आरूढ़ हुए, इसलिये उसे 'रथ-सप्तमी' कहते हैं। आश्विन शुक्ला नवमी, कार्तिककी द्वादशी, चैत्र और भादोंकी तृतीया, फाल्गुनकी अमावास्या, पौषकी एकादशी, आषाढ़की दशमी, माघकी सप्तमी, श्रावणकी कृष्णाष्टमी, आषाढ़, कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठकी पूर्णिमाएँ—ये मन्वन्तरकी आदि तिथियाँ हैं जो दानके पुण्यको अक्षय करनेवाली हैं। मन्वन्तरादि तिथिमें बारह प्रकारके श्राद्ध करने चाहिये—नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धिश्राद्ध, सपिण्डन-श्राद्ध, पार्वण-श्राद्ध, गोष्ठ-श्राद्ध, शुद्धि-श्राद्ध, कर्मांग-श्राद्ध, दैविकश्राद्ध, क्षयाह-श्राद्ध और तुष्टि-श्राद्ध। इन सबमें सांवत्सरिक (क्षयाह) श्राद्ध श्रेष्ठ माना गया है। प्रतिदिन किये जानेवाले श्राद्धको 'नित्य-श्राद्ध' कहते हैं। उसमें विश्वेदेवकी पूजा नहीं की जाती। यदि अन्नसे श्राद्ध करनेकी शक्ति न हो तो केवल जलसे भी नित्यश्राद्ध किया जाता है। एकोद्दिष्ट श्राद्धका नाम नैमित्तिक श्राद्ध है। अभीष्ट वस्तुकी सिद्धिके लिये कामना रखकर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे काम्य-श्राद्ध कहते हैं। विवाह आदि उत्सवोंके अवसरपर जो श्राद्ध किया जाता है, वह वृद्धि-श्राद्ध कहलाता है। 'ये समाना०'—इत्यादि दो मन्त्रोंके द्वारा किये जानेवाले श्राद्धको 'सपिण्डन' कहते हैं। अमावास्या आदि पर्वोंपर किये जानेवाले श्राद्धको 'पार्वण' कहते हैं। गोशालामें जो श्राद्ध किया जाता है, वह गोष्ठश्राद्ध है। पापशुद्धिके लिये जो श्राद्ध किया जाता है, उसे 'शुद्धि' श्राद्ध कहते हैं। गर्भाधान, सोमयाग, सीमन्तोन्नयन तथा पुंसवन आदिमें जो श्राद्ध किया जाता है, वह कर्मांग-श्राद्ध है। देवताके उद्देश्यसे किये जानेवाले श्राद्धको 'दैविक श्राद्ध' कहते हैं। जो देशान्तरमें चला जाय, उसकी तुष्टिके लिये घीसे श्राद्ध करना चाहिये। इसे तुष्टि-श्राद्ध कहते हैं। बारह महीनेपर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे क्षयाह अथवा सांवत्सरिक श्राद्ध कहते हैं। जो वर्षके अन्तमें क्षयाहके दिन पिता और माताका आदरपूर्वक श्राद्ध नहीं करते, उनकी की हुई पूजाको मैं नहीं ग्रहण करता। जो मनुष्य पिताकी क्षयाह-तिथिको ठीक-ठीक नहीं जानता हो, उसे माघ अथवा मार्गशीर्षकी अमावास्याको सांवत्सरिक श्राद्ध करना चाहिये।
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श्राद्धविधि, सप्तशुद्धिका विचार, श्राद्धमें ग्राह्य एवं त्याज्यका निर्णय और सप्तार्चिषस्तोत्र
**महादेवजी कहते हैं—**अब मैं श्राद्धकी विधि बतलाता हूँ। श्राद्धके एक दिन पहले अपसव्य होकर पितरोंके प्रतिनिधिभूत ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे—'आपलोग पितृकार्य सम्पन्न करें और मुझपर प्रसन्न हों।' ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करनेके लिये अपनी जातिके विश्वस्त पुरुषोंको भेजना चाहिये। बिना फटा हुआ वस्त्र पवित्र माना गया है। यदि मूर्ख ब्राह्मण अपने सामने ही रहता हो और गुणवान् अपनेसे बहुत दूर बसता हो तो गुणवान्को भी श्राद्धका निमन्त्रण देना चाहिये, परंतु मूर्खको त्यागना नहीं चाहिये। जो अपने निकटवर्ती ब्राह्मणको पतित न होनेपर भी त्यागकर दूर रहनेवाले गुणवान्की पूजा करता है, वह नरकमें जाता है। वेद, विद्या और व्रतमें निष्णात श्रोत्रिय ब्राह्मण यदि घरपर आ जाय तो विधिपूर्वक उसका पूजन करके मनुष्य परम गतिको प्राप्त होता है। दोनों सन्ध्या, जप, भोजन, दन्तधावन, पितृकार्य, देवकार्य, मूत्रोत्सर्ग, मलोत्सर्ग, गुरुके समीप तथा यज्ञ—इन अवसरोंपर जो मौन रहता है, वह स्वर्गमें जाता है। यदि जप आदिमें किसी तरह मौन भंग हो जाय तो वैष्णव मन्त्रका उच्चारण और भगवान् विष्णुका स्मरण करना चाहिये। दान, स्नान, होम, भोजन और देवपूजनमें देवताओंके लिये सीधे कुश उपयोगमें लाये जाते हैं और पितरोंके लिये द्विगुणभुग्न कुश। उत्तरमुख होकर देवताओंका और दक्षिणमुख होकर पितरोंका कार्य करना चाहिये। अग्नि, भस्म, जौ और जलसे चिह्न बना देनेपर तथा चौखट बीचमें होनेपर भी पंक्तिदोष नहीं होता। इष्टश्राद्धमें क्रतु और दक्ष, वृद्धिश्राद्धमें सत्य और वसु, नैमित्तिक श्राद्धमें काल और काम, काम्य श्राद्धमें अध्व और विरोचन तथा पार्वण श्राद्धमें पुरूरवा एवं आर्द्रव नामके विश्वेदेवोंका आवाहन-पूजन बताया गया है। पलाशके पत्तेमें श्राद्ध करनेसे ब्रह्मतेजकी वृद्धि होती है। पीपलके पत्तेमें श्राद्धभोजन करनेवाला राजाओंका मान्य होता है। पाकड़के पत्तलमें श्राद्धभोजन करनेसे सब भूतोंपर प्रभुत्व प्राप्त होता है। वटके पत्तेमें भोजन करनेसे पुष्टि, प्रजा, वृद्धि, प्रज्ञा, धृति और स्मृतिकी प्राप्ति होती है। गम्भारीका पत्ता राक्षसोंका नाश करनेवाला और यशोदायक होता है। महुवेके पत्तेमें भोजन करनेसे उत्तम सौभाग्य प्राप्त होता है। अर्जुन वृक्षके पत्तेमें श्राद्ध करनेवाला सब अभीष्ट फलोंको प्राप्त कर लेता है। मदारके पत्तेमें श्राद्ध करनेसे उत्तम कान्ति और प्रकाशकी प्राप्ति होती है। बाँसके पात्रमें श्राद्ध करनेवाले पुरुषके खेत, बगीचे और पोखरेमें सदैव मेघ पानी बरसाते हैं। सोने-चाँदीके पात्रोंमें श्राद्ध करनेसे पूर्वोक्त सभी पत्रोंके फलकी प्राप्ति होती है। पलाश, अर्जुन, वट, पाकर, पीपल, विकंकत (कटाय), गूलर, बिल्व और चन्दन—ये यज्ञ-सम्बन्धी वृक्ष हैं। सरल, देवदार, साखू, खैर—ये वृक्ष समिधाके लिये प्रशस्त हैं। श्लेष्मातक, नक्तमाल्य, कैथ, सेमल, नीबू और बहेड़ा—ये वृक्ष श्राद्धकर्ममें निन्दित हैं।
जहाँ अनिष्ट शब्द सुनायी पड़ते हों जो बहुत रूखी और जीव-जन्तुओंसे भरी हो तथा जहाँ दुर्गन्ध फैल रही हो, ऐसी भूमिको श्राद्धकर्ममें त्याग दे। अंग, बंग, कलिंग, सिन्धुका उत्तर तट तथा जहाँ आश्रम-धर्म और वर्ण-धर्म नष्ट हो गये हों, ऐसे देश यत्नपूर्वक श्राद्धकर्ममें त्याग देने योग्य हैं। ब्राह्मण सत्ययुग, क्षत्रिय त्रेता, वैश्य द्वापर और शूद्र कलियुग माना गया है। विद्वान् पुरुष शुक्लपक्षके पूर्वाह्न और कृष्णपक्षके अपराह्नमें श्राद्ध करे। पितृकार्यमें रत्नि* बराबर कुश श्रेष्ठ माने गये हैं। मूलके पाससे कटे हुए कुश वेदीपर
* कोहनसे कनिष्ठिका अंगुलितकके मापको रत्नि या अरत्नि कहते हैं।
- प्रभासखण्ड * १२८९
आस्तरण करनेके लिये उत्तम होते हैं। इसी प्रकार साँवाँ, तिन्नी और दूर्वा भी श्रेष्ठ माने गये हैं। कुश सदैव पवित्र तथा श्राद्धकर्ममें आदरणीय हैं। ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाले पुरुषको उन कुशोंपर ही पिण्डदान करना चाहिये।
ब्राह्मणोंको श्रद्धापूर्वक गर्म-गर्म अन्न भोजन कराना चाहिये। फल, फूल और पेय पदार्थोंको ठंडा ही दे। जो स्नेहवश ब्राह्मणोंके हाथमें नमक या व्यंजन परोसता है, अथवा लोहेके पात्रसे परोसता है उस भोजनको राक्षस खाते हैं, पितर उसे नहीं ग्रहण करते। ब्राह्मणोंके पात्रोंमें चुपचाप अन्न परोसकर संकल्प करना चाहिये। करछुल आदिमें जो अन्न हो, उससे उनका सम्बन्ध नहीं रहना चाहिये। जो ब्राह्मण सूअरकी भाँति पात्रमें मुँह लगाकर चप-चप करते हुए खाता है, अथवा जो हाथमें ही भोजन रखकर उसीमें मुँह लगाता है तथा जो भोजनके समय बातचीत करता है, उसके खाये हुए अन्नको पितर नहीं ग्रहण करते। दो वर्षके बछड़ेके मुखमें जो सुखपूर्वक समा सकें, उतने ही बड़े पिण्ड बनाने चाहिये-यह व्यासका कथन है। स्त्री श्राद्धके पात्रको न हटाये। ज्ञानहीन तथा व्रतरहित पुरुष भी भोजनपात्रको न हटाये। स्वयं पुत्र ही आकर पिताके श्राद्धमें उच्छिष्ट पात्रोंको उठाये। तीन पिण्डोंमेंसे एकको तो जलमें डुबो दे, दूसरा पत्नीको दे दे और तीसरेको अग्निमें होम दे—इस प्रकार पिण्डोंकी यह त्रिविध गति है।१
पितृश्राद्धमें छन्दोग (सामवेदी) ब्राह्मणको, वैश्वदेवश्राद्धमें वैष्णवको, पुष्टिकर्ममें अध्वर्यु (यजुर्वेदी)-को तथा शान्तिकर्ममें अथर्ववेदी ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। दैवश्राद्धमें दो अथर्ववेदी ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख बिठाना चाहिये और पितृश्राद्धमें ऋग्वेदी, यजुर्वेदी तथा सामवेदी-इन तीन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख बिठाना चाहिये। चमेली, बेला और श्वेतजूही आदि फूलोंका श्राद्धमें सदा ही उपयोग करे। जलसे पैदा होनेवाले सभी तरहके फूल और चम्पाका भी श्राद्धमें उपयोग करना उचित है। महुआ, हींग, कपूर, मिर्च, गुड़, सेंधा नमक और चाँदी-ये श्राद्धमें उत्तम हैं। ब्राह्मण, कम्बल, गौ, सूर्य, अग्नि, अतिथि, तिल, दर्भ और विहित काल-ये नौ कुतप माने गये हैं।
रजस्वला स्त्री चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। परंतु दैवकार्य और पितृकार्यके लिये वह पाँचवें दिन शुद्ध होती है।२ धन और ब्राह्मणके अभावमें, परदेशमें तथा पुत्रजन्मके समय अथवा जिसकी स्त्री रजस्वला हो, वह आमश्राद्ध करे-ब्राह्मणको कच्चा अन्न दे दे। साँपके काटे हुए, ब्राह्मणके मारे हुए, दाढ़वाले, सींगवाले तथा बिच्छू आदिके द्वारा मारे हुए और आत्मघात करनेवाले प्राणियोंका श्राद्ध न कराये। सब भाइयोंसे सलाह करके बिना बँटे हुए धनके द्वारा ज्येष्ठ भाईने जो श्राद्ध और दान किया हो, वह सबके द्वारा किया हुआ माना जाता है। प्रतिवर्ष माता-पिताकी क्षयाह तिथिको जो श्राद्ध किया जाता है, उसे मलमासमें नहीं करना चाहिये—ऐसा व्यासजीका वचन है। गर्भमें, ऋण लेने-देनेके व्यवहारमें, प्रेतकर्ममें, मृत्युमें, मासिक श्राद्धमें तथा वार्षिक श्राद्धमें मलमासकी गणना नहीं की जाती है। विवाह आदिके अवसरोंपर सौरमास, यज्ञ आदिमें सावनमास तथा वार्षिक श्राद्ध और पितृकार्यमें चान्द्रमास उत्तम माना गया है। जिस राशिपर सूर्यके स्थित रहते समय ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यकी मृत्यु हो जाती है, उसी राशिमें मृत्युतिथिको पितृकर्म करना चाहिये। वषट्कार (इन्द्रयाग), होम (देवयाग),
१- अप्स्वेकं प्लावयेत् पिण्डमेकं पत्न्यै निवेदयेत्। एकं वै जुहुयादग्नावेषा तु त्रिविधा गतिः॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २००। ४४)
२- संशुद्धा स्याच्चतुर्थेऽह्नि स्नाता नारी रजस्वला। दैवे कर्मणि पित्र्ये च पञ्चमेऽहनि शुद्ध्यति ॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २००। ५१)