भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1302, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1302
* प्रभासखण्ड *१२७३

रामेश्वर, चित्रांगदेश्वर तथा रावणेश्वरकी महिमा

महादेवजी कहते हैं—तदनन्तर परशुरामजीके द्वारा स्थापित रामेश्वरलिंगका दर्शन करे। वह स्थान गोपीश्वरसे वायव्यकोणमें तीस धनुषकी दूरीपर है। जिस समय जमदग्निपुत्र परशुरामजीने पिताकी आज्ञासे अपनी माताका वध किया और पिताके अनुग्रहसे वह पुनः जीवित हो गयी, उस समय प्रभासक्षेत्रमें आकर उन्होंने अद्भुत तपस्या की। वे मेरे विग्रहकी स्थापना करके एक सौ पचास वर्षतक आराधनामें संलग्न रहे। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने उन्हें मनोवांछित वर दिया और उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगमें निवास किया। इससे महर्षि परशुराम कृतार्थ हुए। तदनन्तर भूमण्डलके सम्पूर्ण क्षत्रियोंका इक्कीस बार संहार करके वे माता-पिताके ऋणसे उऋण हुए। जो मनुष्य उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो मेरे धाममें जाता है।

रामेश्वरसे बीस धनुषके अन्तरपर नैर्ऋत्यकोणमें चित्रांगदेश्वरलिंग है। गन्धर्वोंके स्वामी चित्रांगदने उस क्षेत्रको परम पवित्र जानकर वहाँ शिवलिंग स्थापित किया और बड़ी भारी तपस्या करके मेरी आराधना की। जो पुरुष भाव-भक्तिसे युक्त हो उस लिंगकी पूजा करता है, वह गन्धर्वलोकमें जाता और गन्धर्वोंके साथ आनन्द भोगता है। शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको जो विधिपूर्वक उस शिवलिंगको स्नान कराकर भाँति-भाँतिके पुष्प, चन्दन और धूप आदिके द्वारा उसकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण मनोवांछित फलको प्राप्त कर लेता है।

उस स्थानसे दक्षिण और नैर्ऋत्यमें सोलह धनुषके अन्तरपर रावणेश्वरलिंग है, जिसकी स्थापना रावणने की है। वहाँ उसने भक्तिपूर्वक उपवास करके मेरी आराधना की और गीत, वाद्य आदिका आयोजन करके जागरण किया। पंद्रह दिनोंतक इस प्रकार मेरी अर्चना करनेपर आकाशवाणी हुई—'महाबाहु दशग्रीव! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरे प्रसादसे तीनों लोक तुम्हारे अधीन होंगे। मैं प्रतिदिन तुम्हारे द्वारा स्थापित शिवलिंगमें निवास करूँगा। राक्षसराज! जो मानव भक्तिपूर्वक रावणेश्वर लिंगकी पूजा करेंगे, वे शत्रुओंसे अजय होंगे। मेरी कृपासे उन्हें परमसिद्धि प्राप्त होगी।'

यों कहकर मेरी आकाशवाणी मौन हो गयी। रावणने भी सन्तुष्ट होकर बार-बार मेरा पूजन किया और तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छा रखकर वह पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो अभीष्ट स्थानको चला गया।

रावणेश्वरसे पश्चिम पाँच धनुष दूर सौभाग्यदायिनी गौरीका निवास है, जहाँपर सौभाग्यकी इच्छा रखनेवाली अरुन्धतीदेवीने गौरीजीकी आराधनामें तत्पर हो घोर तपस्या की थी। गौरीदेवीके प्रसादसे उन्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई। जो माघ शुक्ला तृतीयाको भक्तिपूर्वक गौरीजीका पूजन करता है, वह सात जन्मोंतक सौभाग्यशाली होता है।

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पौलोमीश्वर, शाण्डिल्येश्वर, क्षेमेश्वर तथा सागरादित्यका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—रावणेश्वरसे वायव्यकोणमें तीस धनुषकी दूरीपर पौलोमीश्वरलिंग है। उसकी स्थापना पुलोमपुत्री शचीने की थी। जिस समय तारकासुरने देवताओंका राज्य छीन लिया और स्वयं इन्द्रपदपर अधिकार जमा लिया तथा उसके भयसे व्याकुल इन्द्रदेव कहीं भाग गये, उस समय उनकी पत्नी शचीने शोकसे दुर्बल होकर मेरी आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने शचीसे कहा—'देवि! मेरा पुत्र तारकासुरका वध करेगा। तुम निश्चिन्त होकर जाओ। जो

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