संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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गोप्य़ादित्यकी स्थापना और महिमा तथा नीलसे हानि
भूतेशसे वायव्यकोणमें तीस धनुषकी दूरीपर गोप्यादित्यका स्थान है। पूर्वकालमें महातेजस्वी श्रीकृष्ण जब छप्पन कोटि यादवोंके सात प्रभासक्षेत्रमें आये, उस समय सोलह हजार गोपियाँ भी वहाँ आ गयीं। उनमेंसे जो सर्वश्रेष्ठ सोलह गोपियाँ बतायी गयी हैं, उनके नाम बताता हूँ; सुनो—लम्बिनी, चन्द्रिका, कान्ता, अक्रूरा, शान्ता, महोदया, भीषणी, नन्दिनी, अशोका, सुपर्णा, विमला, अक्षया, शुभदा, शोभना और पुण्या—ये हंस (श्रीकृष्णचन्द्र)-की कलाएँ मानी गयी हैं। परमात्मा श्रीकृष्ण ही हंस हैं और उनकी ये शक्तियाँ हैं। श्रीकृष्ण चन्द्रस्वरूप हैं और ये गोपियाँ उनकी कलाएँ हैं। उपर्युक्त पंद्रह कलाओंके सिवा, मालिनी उनकी सोलहवीं कला है। जो पुरुष इस प्रकार जानता है, उसे वैष्णव जानना चाहिये।
उन सोलह हजार गोपियोंने भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञा ले उस क्षेत्रमें निवास करनेवाले नारद आदि मुनियोंके सहयोगसे विधिपूर्वक भगवान् सूर्यकी स्थापना की और नाना प्रकारके दान दिये। महर्षियोंने वहाँ भगवान् सूर्यका नाम गोप्यादित्य रखा। इस प्रकार सूर्यदेवकी प्रतिष्ठा हो जानेपर वे सब गोपियाँ कृतार्थ हुईं और महान् यश पाकर श्रीकृष्णके साथ द्वारकाको गयीं। प्रभासक्षेत्रमें गोपियोंद्वारा स्थापित जो गोप्यादित्य हैं, उनका दर्शनमात्र करके मनुष्य दुःखशोकसे मुक्त हो जाता है। जो मानव माघमासकी सप्तमीको उपवास करके गोप्यादित्यकी पूजा करता है, वह अपने पितरोंको सात बार तृप्त कर लेता है। वह अपने समस्त रोगोंका नाश करता है और दुश्चेष्टापरायण दुर्जय शत्रुओंको भी जीत लेता है। सप्तमीको तैलका स्पर्श न करे, नीले रंगका वस्त्र न पहने, आँवला लगाकर स्नान न करे और कहीं किसीके साथ विवाद भी न करे। नीलके रँगे हुए वस्त्र धारण करके द्विज जो भी स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय तथा पितृतर्पण आदि कर्म करता है, वे तथा इसके पञ्च महायज्ञ भी उस नील सूत्रके कारण नष्ट हो जाते हैं। यदि ब्राह्मण नीलका रँगा वस्त्र अपने अंगोंमें धारण कर ले तो दिन-रात उपवास करके पंचगव्य पीनेसे शुद्ध होता है। यदि किसी ब्राह्मणके रोमकूपोंमें नीलके रसका (नीलमिश्रित जलका) प्रवेश हो जाय तो वह पतित हो जाता है और तीन कृच्छ्र-व्रत करनेपर उसकी शुद्धि होती है। यदि ब्राह्मण भूलसे भी नील-वृक्षोंके बीचसे निकल जाय तो वह दिन-रात उपवास करके पंचगव्य पीनेपर शुद्ध होता है। यदि ब्राह्मणके शरीरमें नीलकी लकड़ी गड़ जाय और रक्त दिखायी देने लगे तो उसे चान्द्रायण व्रत करना चाहिये। देवि! जो अनजानमें नीलका दाँतौन कर लेता है, वह दो बार कृच्छ्र-व्रत करनेपर उस पापसे शुद्ध होता है।*
पार्वती! कुरुजांगल (कुरुक्षेत्र)-में एक लाख गोदान करनेसे जो पुण्य होता है, वह सब गोप्यादित्यके दर्शनमात्रसे प्राप्त हो जाता है।
* नीलरक्तेन वस्त्रेण यत्कर्म कुरुते द्विजः। स्नानं दानं जपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम्॥
नश्यन्त्यस्य महायज्ञा नीलसूत्रस्य कारणात्। नीलरक्तं यदा वस्त्रं विप्रस्त्वङ्गेषु धारयेत्॥
अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति। रोमकूपे यदा गच्छेदद्रसं नीलस्य कस्यचित्॥
पतितस्तु भवेद् विप्रस्त्रिभिः कृच्छ्रैर्विशुद्ध्यति। नीलमध्ये यदा गच्छेदप्रमादाद् ब्राह्मणः क्वचित्॥
अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति। नीलदारु यदा भिन्द्याद् ब्राह्मणानां शरीरके॥
शोणितं दृश्यते चैव द्विजश्चान्द्रायणं चरेत्। कुर्यादज्ञानतो यस्तु नीलं वै दन्तधावनम्॥
कृत्वा कृच्छ्रद्वयं देवि तस्मात् पापाद् विशुद्ध्यति। (स्क० पु०, प्र० खं० ११५। ३१-३७)