भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1303, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1303
१२७४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मानव इस पौलोमीश्वरलिंगका पूजन करेगा, वह मेरा पार्षद होकर मेरे समीप पहुँच जायगा।' यह सुनकर पतिव्रता इन्द्राणी देवराज इन्द्रके समीप चली गयीं।

ब्रह्माजीके स्थानसे पश्चिम सोलह धनुषके अन्तरपर शाण्डिल्येश्वरलिंग है। जिसके दर्शनमात्रसे सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जाता है। ब्रह्मर्षि शाण्डिल्य ब्रह्माजीके सारथि माने गये हैं। वे तपस्वी महातेजस्वी, ज्ञाननिष्ठ और जितेन्द्रिय हैं। उन्होंने प्रभासक्षेत्रमें आकर बड़ी उग्र तपस्या की। सोमनाथके उत्तर एक महालिंग स्थापित करके उसकी सौ वर्षोंतक पूजा की। तत्पश्चात् मनोवांछित वस्तुको पाकर वे कृतकृत्य हो गये। मेरे प्रसादसे उन्हें अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त हुईं। शाण्डिल्येश्वर शिवका दर्शन करके मनुष्य तत्काल पापरहित हो जाता है।

शाण्डिल्येश्वरसे उत्तर और कपालेश्वरसे अग्निकोणमें पंद्रह धनुषपर सर्वपापनाशक क्षेमेश्वरलिंग है। राजा क्षेममूर्त्तिने भक्तिपूर्ण हृदयसे उसकी स्थापना की है। जो क्षेमेश्वरका दर्शन करता है, वह क्षेमको प्राप्त होता और उसका प्रत्येक कार्य क्षेमपूर्वक सिद्ध होता है।

पार्वती! वहाँसे परम उत्तम सागरादित्य दर्शन करनेके लिये जाना चाहिये। वह स्थान भैरवेश्वर तथा मृत्युंजय रुद्रसे पश्चिम और कामेश्वरलिंगसे दक्षिण एवं अग्निकोणमें थोड़ी ही दूरपर है। सूर्यवंशमें उत्पन्न महात्मा राजा सगरने प्रभासक्षेत्रको उत्तम तीर्थ जानकर वहीं भगवान् सूर्यकी स्थापना की और उसी स्थानपर तपस्या करके उन्होंने सूर्यदेवको प्रसन्न किया। दस हजार योजन विस्तृत और अठासी हजार योजन लम्बा समुद्र सगरके पुत्रोंकी ही कीर्ति है, इसीलिये उसका नाम सागर है। आज भी राजा सगरकी कीर्ति-कथा गायी जाती है और पुराणोंमें उनके सुयशकी गाथा प्रसिद्ध है। सागरादित्यका दर्शन करके मनुष्य जड, अन्ध, दरिद्र और दुःखी नहीं होता। उसे प्रियजनोंसे वियोग तथा रोग भी नहीं होते और वह कभी पापका आचरण नहीं करता। माघमासके शुक्लपक्षमें षष्ठी तिथिको उपवास करके जितेन्द्रिय मनुष्य रातमें उनके आगे शयन करे। फिर सप्तमीको सबेरे उठकर भक्तिभावसे सूर्यदेवकी पूजा करे और ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराये। यों करनेवाले मानव सूर्यनारायणके भक्तोंको प्राप्त होनेवाली उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। जो पुरुष दूर्वाके अंकुरोंसे भी भक्तिपूर्वक सूर्यदेवकी पूजा करते हैं, उन्हें वे सब यज्ञोंसे भी दुर्लभ फल देते हैं; इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके सूर्यनारायणकी आराधना करनी चाहिये। वे सबके आत्मा, समस्त लोकोंके स्वामी, देवताओंके भी देवता और प्रजाजनोंके पालक हैं। सूर्यदेव ही त्रिलोकीके मूल कारण तथा परम देवता हैं। जितेन्द्रिय मनुष्यको चाहिये कि वह विधिसे भगवान् सूर्यकी पूजा करके समस्त पातकोंका नाश करनेवाले इस स्तोत्रका पाठ करे। इस स्तोत्रमें सूर्यदेवके गुह्य, पवित्र एवं शुभ नाम हैं। विकर्तन, विवस्वान्, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, श्रीमान्, लोकचक्षु, ग्रहेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश्वर, कर्ता, हर्ता, तमिस्रहा, तपन, तापन, शुचि, सप्ताश्ववाहन, गभस्तिहस्त, ब्रह्मा तथा सर्वदेवनमस्कृत—इस प्रकार इक्कीस नामोंका जो स्तोत्र है, इससे सन्तुष्ट होकर भगवान् सूर्य शरीरको आरोग्य देते हैं, धन बढ़ाते हैं तथा यशकी प्राप्ति कराते हैं। जो सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों सन्ध्याओंके समय पवित्र होकर इससे सूर्यदेवकी स्तुति करता है अथवा जो इसे सुनता तथा पढ़ता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और अन्तमें सूर्यलोकको प्राप्त होता है।

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