संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1304, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* प्रभासखण्ड * १२७५
अक्षमालेश्वर, पाशुपतेश्वर, ध्रुवेश्वर तथा सिद्धि लक्ष्मीकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—सागरादित्यसे ईशानकोणमें पचास धनुषके अन्तरपर अक्षमालेश्वरलिंग है, जो दर्शन और स्पर्श करनेसे सब प्राणियोंके पापका नाश करनेवाला है। भादोंमें ऋषिपंचमीको अक्षमालेश्वरके समीप जाकर मनुष्य नरकके भयसे मुक्त हो जाता है। वहाँ गोदान, अन्नदान और जलदानको श्रेष्ठ बताया गया है। उक्त दान करनेसे मनुष्योंके सब पापोंका नाश होता है तथा परलोकमें उन्हें अनन्त सुखकी प्राप्ति होती है।
उग्रसेनेश्वरसे पूर्वभागमें तथा गोप्यादित्यसे अग्निकोणमें कुछ दक्षिणकी ओर पाशुपतेश्वरलिंग विद्यमान है, जो दर्शनमात्रसे समस्त पापोंका नाशक और सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाला है। इस युगमें उसका सन्तोषेश्वर नाम कहा गया है। वह सम्पूर्ण सिद्धियोंका स्थान, शिवभक्तोंका आश्रय तथा पाप-रोगोंका औषध है। पार्वती! पाशुपतेश्वरलिंगके समीप वामदेव, सावणि, अघोर तथा कपिल—ये चार महर्षि सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं। उस शिवलिंगके समीप श्रीमुख नामका एक वन है, जो लक्ष्मी देवीका स्थान है। वहाँ योगी और सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। वहाँ उत्तम शिवभक्तोंका वास है। प्रभासक्षेत्रमें वह मन्दिर मुझे सदैव रुचिकर है। उसमें सदा ही मेरा निवास रहता है। वहाँ जो शिवभक्त मेरे ध्यानमें संलग्न रहते हैं, वे सब मेरे पुत्र हैं और पवित्र होकर उत्तम सिद्धिको प्राप्त होते हैं। यह पाशुपतेश्वरलिंग परब्रह्मस्वरूप है। इसका एक नाम अनादीश्वर भी है। यहाँ निवास करनेवाले ब्राह्मणोंको सिद्धि और मुक्ति भी प्राप्त होती है और इसी शरीरसे वे छः महीनेमें सिद्ध हो जाते हैं। इस लिंगका प्राकट्य संसार-बन्धनसे छुटकारा दिलानेके लिये हुआ है। यह सब लोगोंके लिये दुर्लभ मोक्ष एवं परमपद है। इस लिंगमें शिवतत्त्वका सम्पूर्ण ज्ञान प्रतिष्ठित है। जो माघमासमें निरन्तर भक्तिपूर्वक इनकी पूजा करता है, वह सब यज्ञों और दानोंका फल पाता है। 'अग्निः' इत्यादि मन्त्रसे वहाँ भस्म लेकर अपने अंगोंमें लगानी चाहिये। यदि संचित अग्निमेंसे भस्म लेनी हो तो उस घरके निवासियोंसे लेनी चाहिये। पूरा मन्त्र इस प्रकार है—
अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलमिति भस्म, स्थलमिति भस्म, सर्वं ह वा इदं भस्माभवत्।
'अग्नि, वायु, जल और स्थल—सभी भस्म हैं। यह जो कुछ भी दिखायी देता है, सबको भस्म होना है।'
जिसने शिवकी दीक्षा नहीं ली है, वह इस शिवलिंगका स्पर्श न करे। ब्राह्मणोंसे भस्म लेनी चाहिये, शूद्रोंसे नहीं। शूद्रोंका पाशुपत-व्रतमें अधिकार नहीं है। मैं प्रत्येक युगमें ब्राह्मणोंका शरीर धारण करके प्रकट होता हूँ।
राजा उत्तानपादके ध्रुव नामका एक पुत्र था, जो महात्मा, ज्ञानी, सर्वज्ञ तथा प्रियदर्शन था। उसने एक समय प्रभासक्षेत्रमें आकर सहस्रों वर्षोंतक बड़ी कठोर तपस्या की। वह शिवलिंगकी स्थापना करके प्रतिदिन भक्तिपूर्वक उसकी पूजा तथा स्तुति करता था। वह स्तुति इस प्रकार है—
ध्रुव बोले—जो सच्चिदानन्दस्वरूप तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं, उन भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। भयंकर संसार-सागरसे पार होनेके लिये सुदृढ़ सेतु हैं, केवल ध्यानके द्वारा जिनका कुछ चिन्तन किया जाता है तथा जो सम्पूर्ण योगशक्तियोंसे युक्त हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। सिद्ध और चारण जिसके स्वच्छ सलिलका सेवन करते हैं, जो बड़ी-बड़ी लहरोंके कारण अत्यन्त भयंकर जान पड़ती है, आकाशसे वेगपूर्वक गिरती हुई उस गंगाको जिन्होंने चंचल फूलोंकी मालाके समान अपने मस्तकपर धारण